एंतोन चेखोव
मुझे याद है,
जब मैं पांचवीं या
छठी कक्षा में पढ़ता था,
मैं अपने दादा के साथ बग्घी में बैठकर दोन अंचल के बोल्शोए
क्रिएपकोए गाँव से रोस्तोव गाँव जा रहा था। अगस्त का
उमस भरा बोझिल सा दिन था। गर्मी और धूल भरी आंधी के कारण हमारे कंठ सूख रहे थे और हमारी आँखें
बार-बार बंद हो जा रही थीं। हम न तो कुछ देखना चाहते थे, न सुनना या सोचना चाहते थे और इसीलिए जब हमारे
कोचवान, नाटे क़द के रूसी, कारपो ने घोड़ों
पर अपना चाबुक फटकारते समय मेरी टोपी पर भी प्रहार किया तो मैंने न कोई विरोध जताया और न मुँह से
कोई आवाज ही निकाली, बल्कि अर्द्ध-निद्रा से अपने आप को जगाते हुए दूर-दूर तक अपनी
उदास नज़र दौड़ायी यह देखने के लिए कि धूल के बादलों के उस
पार कोई बस्ती दिख रही
है या नहीं। हम घोड़ों को खुराक देने के लिए एक अर्मेनियाई गाँव में एक
धनी अर्मेनियन के दरवाजे रुके। मेरे दादा की इस अर्मेनियन से पुरानी जान-पहचान थी। मैंने अपनी ज़िंदगी में इस अर्मेनियन से अधिक विचित्र प्राणी नहीं देखा है।
एक छोटे गंजे सिर की
कल्पना कीजिए, जिससे घनी भौहें झूल रही हों, नाक चोंच जैसी हो, लम्बी
सफ़ेद मूंछों के
नीचे चौड़ा मुंह हो जिससे चेरिवुड का बना एक लम्बा पाइप निकला हुआ हो। यह छोटा सिर एक दुबले-पतले कुबड़े धड़
से अटपटे ढंग से जुड़ा हुआ था। वेशभूषा भी लाजवाब थी- एक
छोटी लाल जैकेट और खूब चमचमाता नीला पतलून। वह अपने पैरों को छितराते हुए,
चप्पल चटकाते हुए चलता था और पाइप को मुंह से निकाले
बिना बोलता था। उसके तौर-तरीके में सचमुच अर्मेनियाई अकड़ थी। वह मुस्कुराता नहीं था,
केवल अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से घूरता था और मेहमानों की ओर कम से
कम ध्यान देने की कोशिश
कर रहा था।
उस अर्मेनियन के कमरों में न गर्म हवा थी और न धूल, लेकिन बाहर के मैदानी इलाके और रास्ते
की तरह ही ये कमरे भी उबाऊ, दमघोटूं और बोझिल लग रहे थे। मुझे याद है धूल से सना और गर्मी से बेदम मैं एक कोने में
एक हरे रंग के बक्से पर बैठा हुआ था। बिना पेंट की हुई लकड़ी की दीवारों, फर्नीचर और गेरुए रंग से पुते फ़र्श से धूप
में सूखी हुई
लकड़ी की गंध
आ रही थी। मेरी नज़र जिधर भी जाती, उधर मक्खियाँ ही मक्खियाँ थीं।..... दादा और अर्मेनियन चारागाह, खाद और जई की फसल के बारे में बातें कर रहे थे। मुझे मालूम था
कि
समोवार आने में अभी एक घंटा लगेगा, दादा अपनी चाय पीने में भी कम से कम एक घंटा लगायेंगे और फिर
तीन-चार घंटे के लिए सो जाएँगे; मेरा चौथाई दिन इंतज़ार करते
बीतेगा और उसके बाद फिर से गर्मी, धूल और हिचकोले खाती हुई गाडी झेलनी होगी। मैं उन दो आवाज़ों का बड़बड़ाना सुन रहा था और मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं उस अर्मेनियन को, चीनी मिट्टी के बर्तनों से भरी उस आलमारी को
और धूप में तपती खिडकियों
को सदियों से देख रहा हूँ और शायद
अनंतकाल तक इसी तरह
देखता रहूँगा और
मुझे मैदान, धूप, मक्खियों से घोर नफ़रत होने लगी।.....
सिर पर ओढ़नी डाले एक नाटे क़द की रूसी खेतिहर स्त्री पहले
एक ट्रे में
चाय का सामान और
उसके बाद समोवार लेकर आई। अर्मेनियन ने धीरे
से बरामदे में निकलकर पुकारा, " माश्या,
आकर चाय ढालो।
तुम कहाँ हो माश्या?"
किसी के तेज़ कदमों की आहट सुनाई दी। कमरे में एक सोलह बरस की लड़की दाख़िल हुई। उसने एक सीधा-सादा सूती ड्रेस पहन रखा था और उसके ऊपर एक सफ़ेद ओढ़नी डाल रखी
थी। वह प्यालों और
तश्तरियों
को धो-पोंछकर उनमें चाय ढालने लगी। वह मेरी ओर
पीठ करके
खड़ी थी। मैं केवल
यही देख सकता था कि
वह दुबली-पतली, छरहरे बदन की है, नंगे पाँव है और उसकी छोटी-छोटी एड़ियाँ उसकी लम्बी सलवार के पायचों
से ढकी
हुई हैं।
अर्मेनियन ने मुझे चाय पीने के लिए आमंत्रित किया। मेज़ पर
बैठते हुए मैंने
लड़की की ओर देखा, जो मेरी तरफ़ चाय का प्याला बढ़ा रही थी- और अकस्मात् मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी रूह के ऊपर से तेज़
हवा चल रही है, जो धूल और उमस से भरे उस
दिन के सारे
प्रभाव को अपने साथ उड़ा ले जा रही है। मैंने अपनी
ज़िंदगी
में कभी भी या सपने में
भी ऐसा ख़ूबसूरत चेहरा नहीं देखा था। मेरे सामने एक अप्रतिम सौन्दर्य
मूर्तिमान था।
जैसे आकाश में बिजली
की कौंध को पहचानने
में कोई ग़लती नहीं
होती, वैसे ही मैं पहली नज़र में ही पहचान गया कि मेरे समक्ष जो है उसे सौन्दर्य
कहते हैं।
मैं यह सौगंध खाकर कह सकता हूँ कि माशा- या माश्या, जैसा कि उसका पिता उसे पुकारता था- अद्भुत सुन्दरी थी, लेकिन मैं यह नहीं जानता कि इसे सिद्ध
कैसे करूँ। कभी-कभी आपने
देखा होगा- क्षितिज पर बादलों के झुंड के झुंड आपस में सटे-सटे टंगे रहते हैं। उनके पीछे छुपा सूरज उनपर और
आसमान पर हर तरह के रंग की कूची चलाता है- लाल, नारंगी, सुनहली, नीली, मटमैली, गुलाबी। एक बादल संन्यासी जैसा लगता है
तो दूसरा मछली जैसा। तीसरा बादल पगड़ी बाँधे
तुर्क जैसा लगता है। सूर्यास्त की आभा एक तिहाई
आसमान पर छायी हुई है और वही आभा गिरजे के सलीब पर चमकती है, मेनर हाउस की खिड़कियों को रोशन करती है, नदी ताल-तलैये में झिलमिलाती है, पेड़ों पर कँपकँपाती है। दूर, बहुत
दूर सूर्यास्त की पृष्ठभूमि में जंगली हंसों का एक झुंड वापस अपने घोंसलों की ओर उड़ रहा है.... और ढोर-डंगर चराने वाला चरवाहा, बाँध पर अपनी गाड़ी में बैठा सर्वेयर और टहलने के लिए निकला एक भद्र पुरुष- सभी उस सूर्यास्त को देखते हैं और उनमें से हर कोई सोचता है कि यह
कितना ख़ूबसूरत है, लेकिन उनमें से कोई नहीं जानता और न कोई कह सकता है कि उसकी
ख़ूबसूरती वस्तुत: है कहाँ!
केवल मैं ही उस अर्मेनियन लड़की की ख़ूबसूरती का
क़ायल नहीं था। सत्तर साल पार कर चुके
मेरे दादा यूँ तो स्त्रियों और प्रकृति के सौन्दर्य से हमेशा अछूते और उदासीन रहते थे, उस
दिन माशा को पूरे एक मिनट प्यार भरी नज़रों से घूरते रहे और उस अर्मेनियन से पूछा :
''क्या यह तुम्हारी बेटी है, एवर्ट नाजारिच?''
''हाँ, यह
मेरी बेटी है।'' अर्मेनियन ने कहा।
''अच्छी है! बहुत अच्छी है!'' मेरे दादा ने सर हिलाते हुए कहा।
किसी चित्रकार की नज़र से देखें तो उस अर्मेनियन लड़की का
सौन्दर्य क्लासिकल और
गम्भीर क़िस्म का
सौन्दर्य था। यह वह सौन्दर्य था,
जिसे देखते समय, न जाने क्यों, ऐसा लगता है जैसे आप बिलकुल सही अनुपात
देख रहे हैं- बाल,आँखें, नाक, मुँह, गर्दन,वक्ष और उस युवा शरीर का हर कम्पन जैसे एक परिपूर्ण लय में आबद्ध हो और
जिसकी रचना करने में क़ुदरत से जरा-सी भी चूक न हुई हो। आप किसी कारण से यह मानने लगते हैं कि यदि
कोई आदर्श सुन्दर स्त्री है तो उसकी नाक
वैसी ही होगी जैसी माशा की है- एकदम
सीधी खड़ी और हल्की वक्र,
आँखें ऐसी ही गहरी
काली होंगी, दृष्टि ऐसी ही बेपरवाह होगी। आपको लगता है जैसे उसके काले और
घुंघराले बाल और उसकी भवें उसके
गालों की मुलायम
सफ़ेद चमक के साथ कुछ इस तरह दिख रही हैं,जैसे
किसी शांत नदी में
हरे सरकंडे खड़े हों।
माशा की सफ़ेद गर्दन और वक्ष अभी अविकसित थे, लेकिन
आप जानते हैं कि महान सर्जनात्मक प्रतिभा के
बग़ैर कोई मूर्तिकार उन्हें नहीं गढ़ पायेगा। आप माशा को देखते रहते हैं और धीरे-धीरे आपके दिलो-दिमाग़ पर यह
इच्छा हावी होने लगती
है कि माशा को कुछ
कहा जाए, कुछ ऐसा जो उसे अत्यन्त प्रीतिकर लगे, कुछ ऐसा जो सच्चा और सुन्दर हो, उतना ही सुन्दर जितनी वह ख़ुद है।
पहले कुछ क्षणों में मैं यह देखकर दुखी और शर्मिन्दा था कि
माशा मेरी ओर क़तई
ध्यान नहीं दे रही है, बल्कि पूरे समय उसकी निगाह नीचे झुकी
हुई है। ऐसा लग रहा था
जैसे उसकी अपनी एक अनोखी
दुनिया है- गर्वीली और प्रसन्न- जो उसे मुझसे अलग कर रही है और मेरी नज़रों से उसकी रक्षा कर रही
है।
''ऐसा
इसलिए है क्योंकि मेरे ऊपर मनों धूल है।'' मैंने
सोचा, ''धूप में मेरी त्वचा जल गयी है और शायद अभी मैं बहुत
छोटा भी हूँ।''
लेकिन धीरे-धीरे मैं अपना दुख भूल गया और केवल उस सौन्दर्य के अहसास में डूब गया। मैं अब उबाऊ मैदान और धूल-गर्द के
बारे में नहीं सोच रहा था,
मक्खियों की भिनभिनाहट नहीं सुन रहा था, चाय का भी स्वाद नहीं ले रहा था- सिर्फ
यह महसूस कर रहा
था कि एक ख़ूबसूरत
लड़की मेज़ की दूसरी तरफ़ खड़ी है।
सौन्दर्य का यह अहसास कुछ अलग क़िस्म का था। माशा मेरे मन में
न कोई उत्तेजना या
उन्माद या आह्लाद
संचरित कर रही थी, बल्कि एक पीड़ादायक परन्तु सुखद उदासी की
भावना भर रही थी। यह उदासी किसी सपने की तरह
अनिश्चित और अस्पष्ट थी। पता नहीं क्यों, मुझे
अपने लिए, अपने दादा के लिए, उस अर्मेनियन के लिए और यहाँ तक कि उस
लड़की के लिए भी दुख हो रहा था और ऐसा लग रहा था जैसे हम चारों अपनी
ज़िन्दगी की कोई बहुत
बड़ी और ज़रूरी चीज़
खो बैठे हैं, जिसे हम फिर कभी नहीं पा सकेंगे। मेरे
दादा भी उदास हो गये थे; अब वह खाद या जई के बारे में बातें नहीं
कर रहे थे- बस चुपचाप उदास नज़रों से माशा को देख रहे थे।
चाय के बाद मेरे दादा नींद की झपकी लेने के लिए लेट गये और मैं
घर के बाहर ड्योढ़ी में चला गया। यह घर उस
अर्मेनियाई गाँव के सभी घरों की तरह धूप में तप रहा था- आसपास न कोई पेड़ था, न कोई सायबान और न कोई छाया। चिलचिलाती
धूप के बावजूद उस
अर्मेनियन के घर का
विशाल आहाता गूजबेरी और जंगली बेरों की रंग बिरंगी झाड़ियों के कारण प्रफुल्लित दिख रहा था। उस बड़े
आहाते के एक कोने में एक बाड़े के पीछे नयी कटी फ़सल की रौंदाई चल रही थी। एक खम्भे से
बंधे हुए पंक्तिबद्ध एक दर्जन घोड़े खम्भे के चारों ओर वृत्त बनाते हुए दौड़ रहे थे।
उनके साथ-साथ लम्बा चोग़ा और पतलून पहने हुए नाटे क़द का एक रूसी दौड़ रहा था, उनपर चाबुक बरसा रहा था और कुछ ऐसे लहजे
में चिल्ला रहा था, जैसे घोड़ों पर ताने कस रहा हो और उनपर
रोब झाड़ रहा हो।
''अबे ओ जंगली!.... जा तुम्हें प्लेग लील ले! डर गया क्या?''
घोड़े भूरे,
सफ़ेद और चितकबरे
रंगों के थे। वे बेमन से बिना कोई ज़ोर लगाये दौड़ रहे थे और उस रूसी के तानों से आहत होकर अपनी दुम हिला रहे थे। यह
उनकी समझ के
परे था कि उन्हें एक
ही जगह पुआल के ऊपर गोल-गोल क्यों घूमना है। हवा उनके खुरों के नीचे से सुनहली भूसी की आँधी उड़ा रही थी, जो उस बाड़े से निकलकर दूर-दूर तक जा रही थी। कटी फ़सल की गट्ठरों की एक नयी टाल
के पास खेतिहर औरतों की एक टोली हाथों में हँसिया लिये खड़ी थी, गाड़ियाँ इधर से उधर जा रही थीं और उस
टाल के परे दूसरे आहाते
में एक दर्जन घोड़ों
का एक और झुंड एक खम्भे के चारों ओर चक्कर काट रहा था और उसी तरह का ठिगने क़द का एक और रूसी चाबुक
फटकार रहा था और घोड़ों को दुत्कार रहा था।
जिन सीढ़ियों पर मैं बैठा था वे तप रही थीं; गर्मी के कारण जंगले और खिड़कियों की चौखटों की लकड़ियों से द्रव निकल रहा था; लाल सोनपंखी पक्षी सीढ़ियों और झिलमिली के पीछे की धारीदार छाया में धूप से
बचने की कोशिश कर रहे थे। सूरज मेरे सिर, छाती
और पीठ को तपा रहा था, लेकिन इन बातों की ओर मेरा ध्यान न था।
मैं केवल अपने पीछे के
कमरों और गलियारों की
ऊबड़-खाबड़ फर्श पर किसी के नंगे कदमों की पदचाप के प्रति सचेत था। चाय का सामान समेटने के बाद माशा
सीढ़ियों से नीचे दौड़ गयी। जैसे हवा में पंख फड़फड़ाते
हुए पंछी उड़ते हैं, कुछ उसी फुरती से वह घर के बाहर बनी एक
कालिख पुती कोठरी में घुस गयी, जो सम्भवत: रसोईघर था। वहाँ से भुने मांस की गंध आ रही थी और कोई नाराज़ होकर ऊँचे स्वर में
अर्मेनियन भाषा में चिल्ला रही थी। माशा रसोईघर के अंधेरे द्वार में अदृश्य हो गयी और उसकी
जगह देहरी पर हरे रंग की सलवार में
लाल चेहरे वाली एक अर्मेनियन वृद्धा दिखाई देने लगी। वृद्धा नाराज़ थी और किसी को डाँट रही थी। थोड़ी देर बाद माशा दरवाज़े पर
आयी। रसोईघर की गर्मी से तपकर उसका चेहरा लाल हो रहा
था । वह अपने कंधे पर एक बड़ी काली डबल रोटी
लिये हुई थी। डबल रोटी के बोझ तले
दबती-लहराती हुई वह आहाते में दौड़ती हुई वहाँ गयी, जहाँ
रौंदाई चल रही थी। वह
फुरती से बाड़े को
फलाँगती, सुनहली भूसी के बादल से गुजरती, गाड़ियों के पीछे अदृश्य हो गयी। घोड़ों को हाँकनेवाले उस नाटे
रूसी ने अपना चाबुक नीचे किया और चुपचाप एक मिनट
तक गाड़ियों की दिशा में देखता रहा। जब वह अर्मेनियन लड़की फिर से घोड़ों की
बगल से कुलाँचें मारती, बाड़े कूदती निकली तो उसकी नज़र लड़की का पीछा करती रही और फिर जैसे हताश होकर वह घोड़ों पर चिल्लाने
लगा:
''तुम्हें प्लेग लील जाए, बदमाश! शैतान!''
पूरे समय मैं निरन्तर उसके नंगे पैरों की धप-धप सुन रहा था और
यह देख रहा था कि
कैसे वह किसी ख़्याल में डूबी हुई आहाते
में इधर से उधर जा रही थी। कभी वह मेरी बगल
से हवा में सरसराहट पैदा करती हुई सीढ़ियों से नीचे दौड़ जाती, कभी रसोईघर में गायब हो जाती , कभी रौंदाई के बाड़े की ओर दौड़ जाती और
कभी गेट के बाहर निकल जाती और मैं
उसे देखने के लिए अपनी गर्दन बार-बार मोड़ता।
जितनी बार उसके सौन्दर्य का झोंका मुझे छूकर गुजरता, मेरी उदासी उतनी ही बढ़ती जाती। मैं दुखी था- उसके लिए, अपने लिए और उस नाटे रूसी के लिए भी, जो हर बार उसे उदास नज़रों से देखता था, जब
वह भूसी के उड़ते बादलों के बीच से गुजरकर गाड़ियों के पीछे चली जाती थी। मैं क्यों उदास
था? शायद उसकी ख़ूबसूरती से मुझे ईर्ष्या हो
रही थी या मुझे पछतावा हो रहा था कि वह लड़की
मेरी नहीं है और न कभी होगी या मुझे इस बात का
दुख था कि मैं उसके लिए अजनबी हूँ;
शायद मुझे हल्का सा
अहसास हो रहा था कि उसका
अनुपम सौन्दर्य बस एक
दुर्घटना है और वह भी अनावश्यक दुर्घटना और इस धरती की हर वस्तु की तरह कुछ ही दिनों का मेहमान
है: या, ईश्वर जाने, मेरी उदासी वह अनोखी वेदना थी जो असली सौन्दर्य को देखकर हर
इन्सान में जग जाती है।
इन्तज़ार के तीन घंटे कैसे गुज़रे पता ही नहीं चला। जब कारपो
नदी से घोड़ों को
नहलाकर वापस लौटा और
उन्हें गाड़ी में जोतने लगा,
तब मुझे ऐसा लगा जैसे
माशा को जी भर देखने के लिए मुझे वक़्त ही नहीं
मिला। भींगे घोड़े खुश होकर नथुनों से फूत्कार कर रहे
थे और पहियों पर अपने खुर मार रहे थे। कारपो चिल्लाया,''पीछे!पीछे!'' मेरे दादा जग गये। माशा ने हमलोगों के लिए
चर्र-चूँ आवाज़ करने वाला गेट खोला। हमलोग बग्घी
में बैठे और आहाते से बाहर निकल आए। हम सब चुपचाप यात्रा कर रहे थे, जैसे एक-दूसरे से नाराज़ हों।
जब दो या तीन घंटे बाद रोस्तोव और नाहितचेवन गाँव दूर में
दिखने लगे, तो कारपो, जो
अब तक चुप था, चारों ओर तेज़ नज़र डाल कर बोला:
''क्या बला की ख़ूबसूरत थी- वह अर्मेनियन
छोकरी!''
और
उसने घोड़ों पर चाबुक बरसा दिया।
2
कुछ सालों बाद,
जब मैं कॉलेज में पढ़
रहा था, मैं ट्रेन से दक्षिण जा रहा था। एक स्टेशन पर- शायद बाइलगेरोड और हारकोव के
बीच- मैं अपने डिब्बे से उतरकर प्लेटफार्म पर
टहल रहा था। स्टेशन से सटे बाग़ में, प्लेटफार्म पर और बाहर खेतों मेँ शाम
उतर रही थी। स्टेशन की ओट के कारण
सूर्यास्त नहीं दिख रहा था,
लेकिन इंजिन से उठते
हुए धुएँ के बादलों की फुनगी पर गुलाबी
रोशनी दिख रही थी, जो इंगित कर रही थी कि सूरज अभी पूरी तरह डूबा नहीं है।
प्लेटफार्म पर चहलक़दमी करते समय मैंने देखा कि ज़्यादातर
यात्री दूसरे दर्जे के
एक डिब्बे के पास खड़े
थे या उसी के आसपास मँडरा रहे थे। उन्हें देखकर ऐसा लगता था जैसे कोई नामी-गिरामी हस्ती उस डिब्बे
में हो। जिज्ञासु दर्शकों की भीड़ में वह फ़ौजी
अफ़सर भी था, जो मेरे डिब्बे में मेरे साथ सफ़र कर
रहा था और जिससे थोड़ी देर
पहले ही मेरा परिचय
हुआ था। वह काफ़ी तेज़दिमाग़,
मिलनसार और सहृदय
व्यक्ति लगता
था- जैसा कि अक्सर
यात्रा में होता है हमारी भेंट संयोगवश भले लोगों से हो जाती है।
मैंने
उससे पूछा, '' उधर क्या देख रहे हो?''
उसने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन
अपनी आँखों से एक नवयुवती की ओर इशारा किया। वह सत्रह या अठारह साल की रही होगी। उसने
एक रूसी ड्रेस पहन रखा था। सिर पर हैट नहीं था
और एक छोटी सी शाल लापरवाही से कंधे पर पड़ी हुई थी। वह कोई यात्री नहीं थी, शायद स्टेशन मास्टर की बहन या बेटी रही होगी। वह डिब्बे से सटकर खिड़की के पास
खड़ी थी और ट्रेन में बैठी हुई एक बुज़ुर्ग महिला
से बातें कर रही थी। इसके पहले कि मैं यह सोचूँ
कि मैं क्या देख रहा हूँ,
अकस्मात् मैं उसी
अहसास में डूब गया, जिसे मैंने पहली बार उस अर्मेनियाई गाँव में महसूस
किया था।
इसमें
कोई दो राय नहीं हो सकती कि वह लड़की ग़ज़ब की ख़ूबसूरत थी।
यदि उसके सौन्दर्य का सविस्तार वर्णन किया जाए, जैसा कि अक्सर किया जाता है, तो केवल उसके घने घुंघराले सुनहले बालों को ही वास्तव में सुन्दर
कहा जा सकता था।
उसके सिर पर एक काला रिबन बँधा हुआ था, जिससे खुले बाल नीचे लटक रहे थे। उसके चेहरे की अन्य सारी विशेषताएँ या तो अपारम्परिक थीं या अति साधारण। एक ख़ास
क़िस्म के चुलबुलेपन के कारण या सम्भवत: निकट
दृष्टि की वजह से उसकी आँखें विस्फारित थीं; उसकी नाक एक ओर थोड़ी झुकी हुई थी; उसका मुँह छोटा था और चेहरे का काट तीखा नहीं था; उसके
कंधे उसकी उम्र के हिसाब से दुबले और अविकसित थे- लेकिन
इन सब के बावजूद वह
बेहद ख़ूबसूरत लग रही
थी। उसे देखकर मुझे पूरा यक़ीन हो गया कि रूसी चेहरे को सुन्दर दिखने के लिए पूरी तरह से सौन्दर्य
शास्त्र के अनुरूप होना जरूरी नहीं है। सच
तो यह था कि यदि उसकी नाक हल्की झुकी होने के बजाय किसी और तरह की होती, मिसाल के तौर
पर उस अर्मेनियन लड़की की नाक जैसी सीधी खड़ी
और दोषरहित होती, तो शायद केवल इस बदलाव से उस चेहरे का सारा आकर्षण
चला जाता।
वह खिड़की के पास खड़ी होकर बातें कर रही थी। शाम की बढ़ती
आर्द्रता से थोड़ी सिहरती
हुई, वह रुक-रुक
कर बार-बार हमलोगों की ओर मुड़कर देखती, एक
पल अपने हाथ अपनी कमर पर
रखती और फिर दूसरे ही
पल हाथ ऊपर उठाकर अपने बाल सँवारती । वह बोल रही थी, हँस रही थी। कभी उसके चेहरे पर आश्चर्य का भाव
आता, कभी डर का। मुझे याद नहीं एक क्षण के लिए भी उसका चेहरा और उसका शरीर निश्चल
था। उसकी ख़ूबसूरती का सारा राज़ और सारा जादू
इन्हीं छोटी-छोटी मनोरम भंगिमाओं,
उसकी मुस्कुराहट, उसके चेहरे पर बनते-बिगड़ते भावों, हम
सब पर तेज़ नज़र डालने के उसके अन्दाज़ में था। शायद यह जादू उसकी अनगिनत चेष्टाओं में छुपे सौन्दर्य को निखारती
उसकी तरुणाई, उसकी ताजगी और उसकी आत्मा की पवित्रता में था, जो उसकी हँसी और आवाज में ध्वनित हो रही थी। इनके साथ-साथ
उसमें एक निर्बलता भी थी, जो हमें बच्चों में, चिड़ियों में, मृगछौनों में और नवजात पौधों में इतनी
प्रिय लगती है।
यह सौन्दर्य कुछ-कुछ तितलियों के सौन्दर्य जैसा था। बाग में
मँडराती, फूलों के ऊपर नृत्य करती तितलियों का सौन्दर्य
हँसी-खुशी और उल्लास से चहकती दुनिया का सौन्दर्य
है; किसी गम्भीर चिन्तन, शोक और विश्रान्ति के साथ उसका कोई मेल
नहीं है। ऐसा
लगता था जैसे प्लेटफार्म पर तेज़ हवा का एक झोंका या बारिश की बौछार आ जाए तो वह नाज़ुकबदन कुम्हला जाएगी और उसका
चंचल सौन्दर्य किसी फूल के पराग की तरह बिखर जाएगा।
जब हम दूसरी घंटी बजने के बाद अपने
डिब्बे में वापस आए तो उस फौजी अफ़सर ने आह भरते
हुए कहा, '' तो! ....''
उसके
इस '' तो! '' का
क्या अर्थ था - इसका निश्चय मैं नहीं करना चाहूंगा।
शायद वह उदास था। शायद वह उस सौन्दर्य और वासंती शाम को छोड़कर
भीड़ और उमस भरे डिब्बे
में वापस नहीं आना चाहता था;
या शायद मेरी ही तरह
वह उस ख़ूबसूरत लड़की
के लिए, अपने लिए, मेरे
लिए और उन सभी यात्रियों के लिए दुखी था, जो
अनमने होकर अपने-अपने डिब्बे में लौट रहे थे। जब हम
स्टेशन की खिड़की की बगल से गुजरे तो वहाँ एक
लाल बालों वाला कृशकाय टेलिग्राफिस्ट बैठा हुआ था। उसके बाल खड़े किन्तु घुंघराले थे, चेहरा
शुष्क और जबड़े चौड़े थे। वह अपने उपकरण के पास बैठा हुआ था। उसे देखकर अफ़सर ने लम्बी साँस ली और कहा:
'' मैं
दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस टेलिग्राफिस्ट को उस ख़ूबसूरत लड़की से प्यार है। इस वीराने में एक छत के नीचे
उस अप्सरा के साथ रहना और उससे प्यार नही होना
किस इंसान के वश की बात है?
और यह कैसी आपदा है, मेरे दोस्त, नियति की कैसी विडंबना है कि आप एक नेक इंसान हैं, लेकिन आप उम्रदराज़ हो गये हैं, आपकी कमर झुक गयी है और आप मैले-कुचैले कपड़ों में
अस्त-व्यस्त बिखरे-बिखरे से रहते हैं और आपको
प्यार एक ऐसी ख़ूबसूरत और मूर्ख लड़की से हुआ है, जो
आपकी ओर रत्ती भर भी ध्यान
नहीं देती। शायद
हालात इससे भी बदतर हो सकते हैं;
फ़र्ज़ कीजिए कि
टेलिग्राफिस्ट को
प्यार हो गया हो, लेकिन वह शादीशुदा हो और उसकी बीवी भी
उसी की तरह झुकी कमर वाली,
मैली-कुचैली और नेक
इंसान हो!''
प्लेटफार्म पर हमारे डिब्बे और अगले डिब्बे के बीच में रेलिंग
पर अपनी कुहनी
टिकाये गार्ड खड़ा था
और वह उस खूबसूरत लड़की की दिशा में देख रहा था। उसका झुर्रियों भरा दाग़दार भद्दा मांसल चेहरा रातों
में जगने और ट्रेन के लगातार झटके खाने के कारण
थका-थका दिख रहा था,
लेकिन उस चेहरे पर भी
एक कोमलता और गहरी उदासी देखी जा सकती
थी, मानो वह उस लड़की में अपनी खुशी, अपना लड़कपन, गम्भीरता, पवित्रता, पत्नी, बच्चे
देख रहा हो; मानो वह पछता रहा हो और अपने पूरे अस्तित्व में महसूस कर रहा हो कि वह लड़की उसकी नहीं है और अपने असमय आ
चुके बुढ़ापे, अपने गँवारूपन, अपने भद्दे मांसल चेहरे के कारण एक आम आदमी और आम
यात्री की साधारण खुशियाँ भी उसके लिए स्वर्ग के समान दुर्लभ हैं।
तीसरी घंटी और सीटी बजी और ट्रेन धीरे-धीरे चलने लगी। हमारी
खिड़कियों के सामने
से पहले गार्ड, फिर स्टेशन मास्टर, बाग़ और ख़ूबसूरत मुस्कान बिखेरती वह
लड़की गुज़र गयी।
खिड़की से सिर निकालकर मैंने पीछे देखा। वह लड़की ट्रेन को
देखती हुई प्लेटफार्म
पर चलकर उस खिड़की तक
पहुँची जहाँ वह टेलिग्राफिस्ट बैठा हुआ था। वहाँ उसने रुककर अपने बाल ठीक किये और दौड़ती हुई बाग में
चली गयी। अब सूर्यास्त और हमारे बीच स्टेशन नहीं
था । सामने खुला मैदानी इलाका था,
लेकिन सूरज पहले ही
डूब चुका था। हरे
रेशमी भुट्टों वाले मक्के के खेतों के ऊपर
धुएँ के काले बादल जम से गये थे। वासंती हवा
में, आकाश में गहराते अंधकार में और रेल के
डिब्बे में उदासी थी।
हमारा
जाना-पहचाना गार्ड डिब्बे में आया और मोमबत्तियाँ जलाने लगा।
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