Wednesday, August 4, 2021

फिदरस (भाग द्वितीय)

 प्लेटो 


सुकरात: तो ठीक है। हे स्पष्ट स्वर वाली म्यूज़ (प्रेरणा की देवी), नहीं जानता कि तुम अपने गीत की मधुरता के कारण या लिगुरिया के संगीतप्रेमी निवासियों के कारण इस रूप में जानी जाती हो। तुम ‘कथा कहने में मेरी मदद करो’, जिसे मैं अपने अच्छे दोस्त के दबाव में कह रहा हूँ। तुम मदद करो ताकि यह दोस्त, जो मुझे पहले से ही ज्ञानवान समझता है, मुझे और अधिक अपना प्रिय समझे।

      तो एक समय की बात है एक बहुत सुन्दर लड़का या यूँ कहिए एक सुन्दर नौजवान था, जिसके अनेक प्रेमी थे। उन प्रेमियों में से एक अत्यंत चतुर था। उसने लड़के को यक़ीन दिला दिया था कि वह उसका प्रेमी नहीं है, हालाँकि सच बात यह थी कि वह भी वैसा ही प्रेमी था, जैसे दूसरे प्रेमी थे। एक बार अपना दावा पेश करते समय उसने वस्तुतः उसे यह समझाने की कोशिश की कि उसे प्रेमी के बजाय ग़ैर-प्रेमी को तरजीह देनी चाहिए। उसने जो कुछ कहा, उसका सार-संक्षेप इस प्रकार है:

मेरे दोस्त, यदि कोई व्यक्ति किसी विषय पर सफलतापूर्वक विचार करना चाहता है, तो उसे आरम्भ में ही एक बात करनी होगी। उसे जानना होगा कि वह जिसपर विचार करने जा रहा है, वह चीज़ है क्या; अन्यथा वह निश्चित रूप से पूरी तरह भटक जाएगा। ज़्यादातर लोगों को यह अहसास ही नहीं होता है कि वे नहीं जानते हैं कि अमुक चीज़ वस्तुतः है क्या; फलस्वरूप जब वे उसपर चर्चा शुरू करते हैं तो वे परस्पर मान्य परिभाषा का उपयोग नहीं करते हैं। वे यह मानकर चलते हैं कि वे उस चीज़ को जानते हैं; लेकिन उन्हें बाद में आसानी से पता चल जाता है कि वे न तो एक दूसरे के साथ सहमत हैं और न अपने आप से। चूँकि बात ऐसी है, हम दोनों के लिए बेहतर यह होगा कि हम उन ग़लतियों से बचें, जिनका आरोप हम दूसरों पर लगाते हैं। चूँकि हमारे सामने सवाल यह है कि प्रेमी को महत्व दिया जाए या ग़ैर-प्रेमी को, इसलिए सबसे पहले हमें प्रेम की किसी एक परिभाषा पर सहमत हो जाना चाहिए। यह परिभाषा ऐसी होनी चाहिए, जिसमें प्रेम की प्रकृति और प्रेम का प्रभाव, दोनों दिखे, ताकि जब हम इस बात पर विचार करें कि प्रेम लाभदायक है या हानिकारक, तो हमारे सामने प्रेम की स्पष्ट छवि होनी चाहिए। 

तो, सब जानते हैं कि प्रेम एक प्रकार की चाहत है। हम यह भी जानते हैं कि जो ख़ूबसूरत है, उसे लोग चाहते हैं, भले ही वे उसके प्रेमी न हों। इस स्थिति में हम प्रेम करने वाले और प्रेम नहीं करने वाले के बीच कैसे फ़र्क़ करेंगे?

हमने यह पाया है कि हममें से हर कोई दो प्रकार के मार्गदर्शी सिद्धान्तों का अनुसरण करते हैं। पहला, सुख की जन्मजात इच्छा और दूसरा, हर स्थिति में सर्वोत्तम क्या है, इसका निर्णय करने की क्षमता, जो हम दूसरों से सीखते हैं। ये आन्तरिक पथ-प्रदर्शक कभी आपस में सहमत रहते हैं, तो कभी असहमत, कभी एक हावी रहता है, तो कभी दूसरा। जब निर्णय करने की क्षमता हमें विवेक के मार्ग से सर्वोत्कृष्ट की दिशा में ले जाती है और जब यह क्षमता हम पर आधिपत्य रखती है, तो इस आधिपत्य को हम संयम का नाम देते हैं, लेकिन जब चाहत हमें अविवेक के मार्ग से सुख की ओर खींचकर ले जाती है और हमारे ऊपर शासन करती है तो इस शासन को हम लम्पटता कहते हैं। लेकिन सच यह है कि इस लम्पटता के भी कई नाम हैं, क्योंकि इसके कई रूप हैं। जब इनमें से कोई एक रूप किसी व्यक्ति में स्पष्ट रूप से दिखने लगता है तो हम उस व्यक्ति को ऐसे नाम से पुकारते हैं, जिसे धारण करना कोई गर्व या बड़प्पन की बात नहीं है। यदि खाने के मामले में हमारे लिए क्या सर्वोत्कृष्ट है, इसका निर्णय करने की क्षमता पर हमारी चाहत हावी हो जाए, तो हम इसे पेटूपना कहते हैं और ऐसा आचरण करने वाला व्यक्ति पेटू कहलाता है। इसी तरह यदि पीने के मामले में चाहत हावी हो जाए तो हम सब जानते हैं कि ऐसे व्यक्ति को हम किस नाम से पुकारते हैं। इसी तरह हम यह भी जानते हैं कि जब एक या दूसरी इच्छा विवेक पर हावी हो जाए तो ऐसे लोगों को हम क्या-क्या नाम देते हैं।

यह सब कहने का तात्पर्य क्या है, इसमें अब कोई सन्देह नहीं रह गया होगा; फिर भी इसे बयान करने से बात साफ़ हो जाएगी। जब सौन्दर्य का उपभोग करने के लिए विवेकहीन चाहत सही आचरण की प्रेरणा देने वाले विवेक पर हावी हो जाती है और अपनी जैसी ही अन्य कामनाओं से नयी शक्ति पाकर  शारीरिक सौन्दर्य की ओर आगे बढ़ती है तो यह शक्ति ही इस चाहत को प्यार का नाम प्रदान करती है। 

फिदरस, मेरे दोस्त, क्या ऐसा नहीं लगता जैसे आज मैं किसी दैवी प्रेरणा से बोल रहा हूँ?

 

फिदरस: सच में, सुकरात,  तुम्हें एक असाधारण वाग्मिता (वाक्-चातुर्य) मिली है।

 

सुकरातः तो चुपचाप सुनो, क्योंकि सच में ऐसा लगता है जैसे इस जगह किसी देवता की उपस्थिति है और इसलिए तुम्हें इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि ज्यों-ज्यों मेरा भाषण आगे बढ़ेगा, मैं आविष्ट होता जाऊंगा। अभी ही मेरी शैली बदल गयी है।

 

फिदरस: तुमने ठीक कहा।

 

सुकरात: लेकिन इसके लिए तुम ज़िम्मेवार हो। फिर भी, मैं बोलना जारी रखता हूँ। हो सकता है, ख़तरा टल जाए। लेकिन ईश्वर की जो इच्छा। हमारा काम है कि युवक के प्रति जो हमारा सम्बोधन है, उसे आगे बढ़ाएँ। 

तो मेरे दोस्त, हमें जिस विषय पर विचार करना है उसका सच्चा स्वरूप बताया जा चुका है और उसकी परिभाषा भी दी जा चुकी है। हम उस परिभाषा को ध्यान में रखते हुए आगे कह सकते हैं कि प्रेमी या ग़ैर-प्रेमी पर कृपा करने से क्या लाभ होगा या क्या हानि होगी।

वह व्यक्ति, जो चाहत के वशीभूत है और सुख-भोग का ग़ुलाम है, अपने प्रियपात्र से यथासंभव अधिक से अधिक सुख पाने की लालसा रखेगा। एक बीमार को वही अच्छा लगता है जो उसे रोके-टोके नहीं, क्योंकि जो मज़बूत है या उससे सबल है, उसे वह बुरा लगता है। इसलिए यदि संभव हो तो वह ऐसे प्रियपात्र के साथ रहना नहीं चाहेगा जो गुणों में उसके बराबर या बेहतर है। वह हमेशा अपने से कमज़ोर को चुनेगा और कमज़ोरी अज्ञानियों, कायरों, ख़राब वक्ताओं, मन्दबुद्धि जनों में मिलती है————- बुद्धिमानों, बहादुरों, सफल वक्ताओं, कुशाग्र बुद्धि वालों में नहीं। मन की ये दुर्बलताएँ और ऐसी ही अन्य दुर्बलताएँ यदि प्रियपात्र में हों तो प्रेमी को ख़ुशी मिलती है। यदि ये दुर्बलताएँ उसमें जन्म से ही मौजूद न हों तो प्रेमी उसमें इन दुर्बलताओं को विकसित करता है, क्योंकि यदि वह ऐसा न करे तो उसे ख़ुशी नहीं मिलती है।

इसके साथ-साथ यह भी सच है कि ऐसा प्रेमी ईर्ष्यालु होगा। वह युवक को दूसरों की संगति में जाने से हमेशा रोकेगा, जिससे उसका बड़ा अहित होगा, क्योंकि अच्छे लोगों की संगति ही उसे अच्छा इंसान बना सकती है। इतना ही नहीं सबसे अधिक हानिकारक बात यह होगी कि वह उसे उन महान विषयों की संगति से भी रोकेगा, जिससे उसकी बुद्धिमत्ता में वृद्धि होती…… यहाँ मेरा आशय दर्शन से है। प्रेमी अपने प्रियपात्र को दर्शन की चर्चा से दूर रखेगा, क्योंकि उसे डर है कि दर्शन का ज्ञान हो जाने पर प्रियपात्र उसे हिक़ारत की नज़र से देखेगा। और इस प्रकार आम तौर पर उसका यही प्रयत्न रहेगा कि प्रियपात्र पूरी तरह अज्ञानी बना रहे और उसपर आश्रित रहे, ताकि उसे ज़्यादा से ज़्यादा ख़ुशी मिले और प्रियपात्र को ज़्यादा से ज़्यादा नुक़सान पहुँचे।

इसलिए, जहाँ तक युवक के मन का सम्बन्ध है किसी प्रेमी को अभिभावक या संगी बनाना लाभदायक नहीं माना जा सकता। 

अब मन के बाद शरीर। हमें यह देखना होगा कि जो युवक ऐसे व्यक्ति के क़ब्ज़े में आ गया है जो अच्छाई के बजाय सुखभोग का दास बन गया है, उसमें किस प्रकार की शारीरिक प्रवृति को बढ़ावा मिलेगा। इसमें कोई दो मत नहीं कि ऐसा प्रेमी किसी स्वस्थ युवक के बजाय किसी कमज़ोर युवक की ओर आकृष्ट होगा, जिसे अत्यन्त विलासपूर्ण और आरामदायक वातावरण में पाला गया है, जिसे खुली हवा में जाने नहीं दिया गया है, जिसने पुरुषोचित व्यायाम के श्रम और स्वेदजल के बजाय आरामतलबी में अपनी ज़िन्दगी गुज़ारी है। ऐसे युवक के पास स्वाभाविक सौन्दर्य नहीं रहता और इसलिए वह कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों का प्रयोग करता है या कुछ ऐसे टोटकों का सहारा लेता है जो इतने स्पष्ट हैं कि उनकी और व्याख्या की ज़रूरत नहीं है। फिर भी, इस विषय को छोड़ने के पहले हम एक वाक्य में निष्कर्ष बताना चाहेंगे। इस प्रकार के युवक की शारीरिक विशिष्टता कुछ ऐसी होगी कि युद्ध या संकट के समय, जब पुरुष के साहस और शक्ति की परीक्षा होती है, उस युवक को देखकर शत्रु पक्ष ख़ुश होगा, दोस्तों को दुख होगा और हाँ, प्रेमी भी दुखी होंगे।

अब हम इन स्पष्ट पहलुओं को छोड़कर अगला प्रश्न करते हैं। ऐसे प्रेमी की संगति और अभिभावकत्व में प्रियपात्र को  धन-सम्पदा की दृष्टि से क्या लाभ होगा या क्या हानि होगी? एक बात तो स्पष्ट है कि प्रेमी की सर्वोपरि कामना यह होगी कि युवक अपने माता-पिता, कुटुम्बियों और दोस्तों से, जो उसे प्रेम और संबल प्रदान करते हैं, दूर हो जाए, क्योंकि ये लोग युवक के साथ उसकी संगति के मार्ग में अड़चन खड़ी कर सकते हैं। लेकिन यदि युवक के पास धन-सम्पदा हो, तो प्रेमी को लगेगा कि उसपर अपना जादू चलाना आसान नहीं होगा और यदि किसी तरह जादू चल भी जाए तो उसे क़ाबू में रखना कठिन होगा। यही कारण है कि प्रेमी को ऐसे युवक से शिकायत होगी , जिसके पास धन-दौलत है और यदि उस युवक का वैभव समाप्त हो जाए तो उसे ख़ुशी होगी। इसके अलावा ऐसा प्रेमी यह भी चाहेगा कि उसका प्रियपात्र यथासम्भव बिना बीवी-बच्चे के, बिना अपनी गृहस्थी के रहे, ताकि उसे अधिक दिनों तक सुख उपभोग का अवसर मिल सके।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि दुनिया में और भी बुराइयाँ हैं, लेकिन ईश्वर ने उनके साथ कुछ क्षणिक सुख भी जोड़ा है। उदाहरण के लिए, जो चाटुकार हैं, वे वस्तुतः डरावने और ख़तरनाक हैं, लेकिन प्रकृति से उन्हें हँसमुख या विनोदी स्वभाव मिला है, जो अच्छा लगता है। वारांगनाएँ या उसी प्रकार के पेशे से जुड़े अन्य लोग हानिकर हो सकते हैं, लेकिन रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में वे मनोनुकूल आचरण करते हुए भी पाये जाते हैं। इसके विपरीत, प्रेमी न केवल हानिकर होता है, बल्कि किसी युवक के लिए  उससे अधिक ख़राब संगति की कल्पना नहीं की जा सकती। एक पुरानी कहावत है, ‘जेठ और माघ में कोई तालमेल नहीं हो सकता’। सम्भवतः इसका तात्पर्य यह है कि हमउम्र लोगों की पसन्द एक जैसी होती है और इसलिए ऐसे लोग ही आपस में अच्छे मित्र हो सकते हैं। जब ऐसे हमउम्र लोगों के बीच की दोस्ती भी फीकी पड़ सकती है, तो उस दोस्ती के बारे में क्या कहा जाए जिसमें न केवल उम्र की विषमता है, बल्कि कुछ इस प्रकार की बाध्यताएँ हैं जो किसी भी परिस्थिति में असह्य मानी जाएंगी। ख़ासकर  इस प्रकार के युगल के आपसी संबंध में ये बाध्यताएँ तो और असह्य हैं।

बुजुर्ग प्रेमी कभी भी अपने प्रियपात्र से बिछुड़ना नहीं चाहता। वह दिन रात एक बाध्यकारी और प्रबल शक्ति के अधीन रहते हुए अपने प्रियपात्र को निरन्तर देखने, सुनने, स्पर्श करने या अन्य शारीरिक अनुभवों का सुखोपभोग करने के प्रलोभन में फँसा रहता है। युवक की हर ज़रूरत पूरी करने के लिए वह सदैव तत्पर रहता है, लेकिन वह प्रियपात्र को किस प्रकार की ख़ुशी या सान्त्वना दे सकता है? घंटों अपने प्रेमी के पार्श्व में रहते हुए प्रियपात्र को जो असुविधा होती है, उससे क्या वह मुक्ति दिला सकेगा? जब प्रियपात्र प्रेमी के उस चेहरे को देखता है, जिसकी ख़ूबसूरती बढ़ती उम्र ने छीन ली है; जब उसे ऐसे दुष्परिणाम झेलने पड़ते हैं, जिनका ज़िक्र करना भी अशोभनीय है, तब उसपर क्या बीतती होगी? और प्रेमी अपने प्रियपात्र की किस तरह निरन्तर चौकसी करता रहता है ताकि वह किसी और  से मिले जुले नहीं! इसके अलावा वह जब बेमौसम तारीफ़ करता है और फिर उसके तुरन्त बाद पूरी संजीदगी में उसकी निर्मम आलोचना करता है तो यह सब कितना असह्य हो जाता है, ख़ासकर तब जब यह सब ऐसी अभद्र भाषा में किया गया हो जिसे सुना नहीं जा सकता!

जब तक उसका प्रेम टिकता है वह प्रियपात्र को नुक़सान पहुँचाता है और उसके लिए असह्य बना रहता है, लेकिन जब उसका प्यार चुक जाता है तो उसकी दुर्भावना दिखने लगती है। आरम्भिक दिनों में प्रियपात्र को अपनी असह्य संगति के लिए राज़ी करने के लिए जब वह क़समें खाता है और वादे करता है तो उन वादों में भविष्य में पूरे किये जाने वाले सपने भी शामिल होते हैं, लेकिन जब इन वादों को पूरा करने का वक़्त आता है तो प्रेमी के भीतर ऐसा बदलाव आ जाता है मानो वह बिलकुल नया व्यक्ति हो। अब उसके मन पर प्रेम और जुनून का शासन नहीं है, बल्कि विवेक और संयम की सत्ता है। युवक इस परिवर्तन को नहीं समझ पाता है और अतीत में उसने अपने प्रेमी के लिए जो कुछ किया है, उसका वह प्रतिदान मांगता है। वह अपने प्रेमी को याद दिलाता है कि पहले उन के बीच क्या कुछ घटा था, क्या वादे किये गये थे, क्या क़समें खायी गयी थीं। वह इस प्रकार बातें करता है जैसे अब भी वह उसका प्रेमी हो , लेकिन उसका पूर्वप्रेमी तो अब विवेक और संयम से चालित है, लेकिन उसे यह कहने की हिम्मत नहीं है कि वह अब एक नया इन्सान बन गया है, और न उसे कोई ऐसा रास्ता दिखता है जिससे वह पुरानी मूर्खता के दिनों में किये गये वादों को पूरा कर सके। उसे डर है कि वह पहले की तरह ही आचरण करता रहा तो एक दिन वह फिर पुराना व्यक्ति बन जाएगा। और इसलिए अब वह अपनी ज़िम्मेदारियों से ऐसे भागता है जैसे कोई क़र्ज़दार भाग रहा हो। युवक आहत होकर उसका पीछा करता है और पूरी कायनात से उसकी बेवफ़ाई की फ़रियाद करता है, हालाँकि उसे आरम्भ से ही यह बात समझ लेनी थी कि उसे एक विवेकहीन प्रेमी के सामने समर्पण नहीं करना चाहिए था। इससे बेहतर वह इन्सान है जिसमें विवेक है, भले ही प्रेम न हो। उसे यह पता होना चाहिए था कि उसने जो ग़लत चुनाव किया उसका अर्थ यह था कि उसने एक बेवफ़ा, चिड़चिड़ा, ईर्ष्यालु और असह्य इन्सान की ग़ुलामी स्वीकार की है, जो उसकी धन-सम्पत्ति और ख़ूबसूरती को नष्ट करेगा और सबसे अधिक उस आध्यात्मिक विकास को क्षति पहुँचाएगा,जिसका देवताओं और मनुष्यों की नज़र में सर्वोच्च स्थान है।

तो, प्रिय युवक इससे तुम यही सीख लो। यह जानो कि प्रेमी जब तुम्हें देखता है तो उसमें कोई सद्भावना नहीं रहती, बल्कि उसमें वासना के अतिरेक के सिवा कुछ नहीं रहता, क्योंकि ‘जैसे भेड़ के लिए भेड़िया है, वैसे ही युवक के लिए उसका प्रेमी है।’

मुझे मालूम है , फिदरस, कि मुझे अपने सम्भाषण का अन्त पद्य में करना था। अब मैं इसके आगे एक भी शब्द नहीं कहूंगा। इसी के साथ मेरा सम्भाषण पूरा होता है।

 

फिदरस: मैं तो यह समझ रहा था कि अभी तक तुमने आधी बात ही कही है और अब तुम प्रेम न करने वाले के बारे में भी उतनी ही बातें बताओगे, उसके अच्छे गुण गिनाओगे और यह दिखलाओगे कि प्रियपात्र को उसकी ओर क्यों झुकना चाहिए। ऐसा करने के बजाय तुम अचानक रुक क्यों रहे हो, सुकरात?

 

सुकरात: मेरे दोस्त, क्या तुमने नहीं देखा कि दोष दर्शाने के बावजूद मैं स्तुति- काव्य की सीमाओं से आगे निकलकर महाकाव्यात्मक होता जा रहा हूँ? यदि मैं दूसरे पक्ष की स्तुति करने लगा तो न जाने मैं किस हद तक पहुँच जाऊँ! क्या तुम नहीं देख रहे कि मुझ पर उन ख़ूबसूरत ताक़तों का पूरा क़ब्ज़ा हो जाएगा जिनके आग़ोश में तुम मुझे जानबूझकर धकेल रहे हो? इसलिए मैं तुम्हें एक वाक्य में बताना चाहूंगा कि एक पक्ष के बारे में मैंने जो-जो बुराई दिखायी है, दूसरे पक्ष में उसी अनुपात में अच्छाई है। इसलिए बेकार की चर्चा करने से क्या फ़ायदा? दोनों के बारे में जो कुछ कहा जा सकता था वह सब कहा जा चुका है। इसलिए मेरी कथा को अपने हाल पर छोड़ दिया जाए। इसके पहले कि तुम मुझे कुछ और बोलने के लिए मजबूर करो, मैं नदी पार करना चाहूंगा। 

 

फिदरस: गरमी थोड़ी कम हो जाने दो, सुकरात। अभी तो दोपहर की कड़ी धूप है। थोड़ा इन्तज़ार करते हैं और तुमने जो बताया है, उसकी चर्चा करते हैं। धूप ढले तो चलेंगे।

 

सुकरात: फिदरस, सम्भाषण सुनने के लिए तुममें असीम उत्साह है, जिसकी तारीफ़ किये बिना मैं नहीं रह सकता। तुम्हारे जीवन-काल में जितने सम्भाषण हुए हैं, उनमें शायद सबसे अधिक सम्भाषण तुम्हारी वजह से हुए हैं—- या तो तुमने ख़ुद सम्भाषण दिया है या दूसरों को किसी न किसी तरीक़े से सम्भाषण देने के लिए प्रेरित किया है। थेब्स का सिमयास एक अपवाद हो सकता है, बाक़ी सबसे तुम आगे हो और अभी ऐसा लग रहा है जैसे तुम्हारी वजह से मुझे फिर कुछ कहना पड़ेगा।

 

फिदरस: लेकिन क्यों? तुम्हारा आशय क्या है?

 

सुकरात: जब मैं अभी-अभी नदी के उस पार जाने के लिए तैयार हो रहा था, मुझे अपना सुपरिचित दैवी संकेत मिला। जब मैं कोई नया कार्य आरम्भ करने के लिए आगे बढ़ता हूँ तो अक्सर यह संकेत मुझे रोकता है। अचानक मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने कोई आवाज सुनी, जो मुझे कह रही है कि मैंने ईश्वर के प्रति कोई अपराध किया है, जिसका प्रायश्चित किये बिना मैं इस स्थान से हिलूँ नहीं। तुम जानते हो कि मैं एक द्रष्टा हूँ—— बहुत उत्तम कोटि का तो नहीं, लेकिन एक साधारण स्तर के शोधार्थी की तरह मैं अपनी छोटी-मोटी उलझनें सुलझा लेता हूँ और इसलिए मैं यह बात अच्छी तरह समझ रहा हूँ कि मेरा अपराध क्या है। सच तो यह है, फिदरस, कि आदमी के मन के भीतर ही एक दैवी शक्ति है, क्योंकि जब कुछ देर पहले सम्भाषण कर रहा था तो उसी समय मुझे थोड़ी बेचैनी सी लगी। ऐसा लगा जैसे इबिकस के शब्दों में मैं ‘इन्सानों की दुनिया में शोहरत कमाने के लिए ईश्वर की नज़र में पाप कर रहा हूँ।’ लेकिन अब मुझे अपने पाप का अहसास हो रहा है।

 

फिदरस: कैसा पाप?

 

सुकरात: फिदरस, तुमने जो सिद्धान्त बताया और जिसकी मैंने व्याख्या की, वह तो एक भयावह सिद्धान्त है।

 

फिदरस: कैसे?

 

सुकरात: यह तो एक मूर्खतापूर्ण सिद्धान्त है, जो ईश्वर के प्रति घोर तिरस्कार दर्शाता है। इससे बुरा और क्या हो सकता है?

 

फिदरस: तुम कुछ और प्रकाश डालो ताकि मैं तुमसे सहमत हो सकूँ।

सुकरात: क्या तुम यह नहीं मानते कि प्रेम एक देवता है, अफ्रोडाइट देवी की सन्तान है?

 

फिदरस: ऐसा कहा तो जाता है।

 

सुकरात: लेकिन लाइसियस यह नहीं मानता और तुमने भी मुझपर जादू डालकर मुझसे जो सम्भाषण उगलवाया, उसके अनुसार भी प्रेम देवता नहीं है। यदि प्रेम देवता है या कोई दैवी सत्ता है, जो कि वह निश्चित रूप से है, तो वह कोई अशुभ भावना नहीं हो सकता; लेकिन दोनों सम्भाषणों में उसे अशुभ ही बताया गया है। तो इन सम्भाषणों का प्रेम के प्रति यही अपराध था, और इसके साथ-साथ उनमें बेकार की बातों को इस प्रकार पेश किया गया है, जैसे वे बड़े महत्व की बातें हों और ऐसा सिर्फ़ इसलिए किया गया ताकि कुछ अभागे लोगों को धोखे और छलावे में रखा जाए और उनकी वाहवाही लूटी जाए।

और इसलिए मेरे दोस्त, मुझे अपने आप को पवित्र करना होगा। देवताओं और वीर नायकों के प्रति वाणी में किये गये इस प्रकार के अपराधों के शुद्धीकरण के लिए एक पुरातन विधि है, जो स्टेसिकोरस को ज्ञात था, हालाँकि होमर को इसकी जानकारी नहीं थी। जब हेलेन की निन्दा करने के कारण स्टेसिकोरस की आँखों की ज्योति चली गयी तो उसने होमर की भाँति यह नहीं पूछा कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। एक सच्चा कलाकार होने के कारण वह अपने अन्धेपन का कारण समझ गया और तुरन्त ही उसने  निम्नलिखित पंक्ति लिखी:

 

मिथ्या है यह आख्यान 

तुमने कभी भी सुसज्जित जहाज़ों में यात्रा नहीं की

और न तुम ट्राय के बुर्ज तक पहुँचे।

 

और इस प्रत्याख्यान की रचना करते ही उसकी दृष्टि वापस मिल गयी। अब, मैं इस मुक़ाम पर इन कवियों से भी अधिक बुद्धिमत्ता का कार्य करूंगा। इसके पहले कि मुझे कोई हानि पहुँचे, मैं प्रेम के प्रति प्रत्याख्यान की रचना करता हूँ। मुझे शर्म से अपना सिर ढँकने की ज़रूरत नहीं है।

 

फिदरस: इससे अच्छी और क्या बात हो सकती है, सुकरात!

सुकरात: हाँ फिदरस, तुम सहमत होगे कि दोनों सम्भाषण—- पहला, जिसे पुस्तक से लिया गया था और दूसरा, जिसे मैंने बाद में सुनाया—- कितने श्रद्धाविहीन थे! मान लो, हम दोनों को उस तरह की बातें करते हुए कोई ऐसा आदमी सुनता, जिसका चरित्र उदार और मानवीय है और जो अपने जैसे ही किसी व्यक्ति को प्यार करता है। हमसे यह सुनकर कि प्रेमी छोटी-मोटी वजहों से एक दूसरे से घोर नफ़रत करने लगते हैं और वे अपने प्रियपात्र को हानि पहुँचाते हैं, क्या वह हमारे बारे में यह धारणा नहीं बनाएगा कि हमलोग अत्यन्त निम्न कोटि के लोगों के बीच बड़े हुए हैं और हमने कभी भी उत्कृष्ट प्रेम का उदाहरण देखा ही नहीं है? क्या वह हमारी प्रेम-निन्दा को पूरी तरह अस्वीकार्य नहीं मानेगा?

 

फिदरस: हाँ सुकरात, वह शायद यही कहेगा।

 

सुकरात: इसलिए इस प्रकार के प्रेमियों के प्रति आदर प्रकट करते हुए और प्रेम देवता के प्रति श्रद्धा दर्शाते हुए, मैं एक अच्छे सम्भाषण के माध्यम से अपने मुँह का कड़वा स्वाद मिटाना चाहूंगा। लाइसियस को भी यह सलाह दूंगा कि वह और देर किये बिना हमें बताये कि यदि दोनों पक्षों में बाक़ी बातें बराबर हों तो हमें क्यों प्यार न करने वाले के बजाय प्यार करने वाले को प्रश्रय देना चाहिए।

 

फिदरस: आश्वस्त रहो कि ऐसा किया जाएगा। जब तुम प्रेमी का स्तुतिगान सुना दोगे तो मैं भी लाइसियस को प्रेमी के समर्थन में सम्भाषण लिखने के लिए बाध्य करूंगा।

 

सुकरातः मुझे तुम पर भरोसा है, बशर्ते तुम जैसे हो, वैसे ही बने रहो।

 

फिदरस: तुम आत्मविश्वास के साथ अपनी बात शुरू करो।


 

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