चेखव
(अनुवाद-राजीव रंजन सिंह)
"यह वर्ष 187.. की बात है। युद्ध के ठीक एक वर्ष बाद। मैं स्नातक बनने के बाद कॉकसस गया था और लगभग पाँच दिनों तक समुद्र तट पर बसे एन. शहर में ठहरा था। मैं आपको बताना चाहूंगा कि वह शहर मेरी जन्मस्थली है और वहीं मैं सयाना हुआ था, इसलिए ताज्जुब नहीं मुझे शहर बहुत आरामदायक, सुखद और मनोरम लग रहा था, हालाँकि राजधानी में रहने वाले किसी व्यक्ति को यह उतना ही उबाऊ और असुविधाजनक लगता जितना चुख्लोमा या काशीरा। उदास मन से मैं उस हाई स्कूल से गुज़रा जिसमें कभी मैंने पढ़ाई की थी और फिर शहर के चिरपरिचित बाग़ में टहलता रहा और उन लोगों को ढूँढ़ता रहा जिन्हें मैंने सालों से नहीं देखा था, लेकिन जो मुझे याद थे....उदास मन से ही मैं सब कुछ कर रहा था।
एक दिन शाम में मैंने उस जगह के लिए एक बग्घी ले ली जिसे क्वारंटाइन कहते हैं। यह एक छोटी सी वाटिका है जो सचमुच प्लेग के दिनों में क्वारंटाइन की जगह रही थी। अब वहाँ कंट्री विला हैं। क्वारंटाइन तक जाने के लिए आपको शहर से एक कच्ची सड़क होकर चार वर्स्ट जाना पड़ता है। जाते समय आपके बायीं ओर हल्का नीला समुद्र है और दायीं ओर मैदान; आप खुलकर साँस ले सकते हैं और आपकी आँखें मनमर्जी से चारों तरफ देख सकती हैं। वाटिका समुद्र तट पर है। मैं अपनी बग्घी छोड़कर चिरपरिचित द्वारों से टहलते हुए सबसे पहले पत्थरों से बने एक छोटे समर हाउस की ओर गया, जो मुझे बचपन में बहुत पसंद था। मेरे विचार में वह गोलाकार विशाल समर हाउस, जिसके बेढंगे स्तंभों में किसी पुराने मकबरे की सादगी और सोबकेविच के खुरदरेपन का संयोग है, उस शहर का सबसे कवित्वपूर्ण स्थल है। यह समर हाउस खड़ी चट्टानों पर बना हुआ है। यहाँ से समुद्र का बहुत ही खूबसूरत नज़ारा देखा जा सकता है।
"मैं एक बेंच पर बैठ गया और रेलिंग पर झुककर सामने देखने लगा........ समुद्र उतना ही भव्य, अंतहीन और दुर्गम दिख रहा था जैसा कि वह सात साल पहले था जब मैं हाई स्कूल पास कर शहर छोड़कर राजधानी जा रहा था। दूर में धुंए की एक काली पट्टी दिख रही थी - वहां एक स्टीमर था। धुंए की उस धुंधली सी स्थिर पट्टी और पानी पर मँडराती सीगल के अलावा सागर और आसमान की एकरसता को भंग करनेवाली कोई और चीज नहीं थी। समर हाउस के बाएं और दायें सागर के ऊबड़-खाबड़ घाट थे।
"आपको पता होगा, जब कोई उदास-उदास सा आदमी सागर के साथ या उस जैसे विराट विस्तार के साथ अकेला हो तो कुछ कारणों से उसकी उदासी पर उसका यह विश्वास भी हावी होने लगता है कि उसकी जिंदगी गुमनामी में ही बीतेगी और अनजाने ही उसके हाथ पेन्सिल की ओर बढ़ते हैं और उसके पास जो भी वस्तु होती है उसपर वह अपना नाम लिखने लगता है। शायद यही कारण है कि समर हाउस जैसे सुनसान और एकांत स्थलों में पेन्सिल से लिखी हुई या चाकू से खुदी हुई ढेर सारी इबारतें मिलती हैं। जहाँ तक मुझे याद है, रेलिंग पर मैंने यह वाक्य पढ़ा "यह निशानी इवान कोरोल्कोव ने 16 मई 1876 को बनायी है। " कोरोल्कोव की बगल में किसी स्थानीय स्वप्नदर्शी ने अपने नाम के साथ-साथ यह लिखा था "वहां, जहाँ सागर की लहरें विश्राम करती हैं, महान विचारों वाला एक शख्स खड़ा है।" उसकी लिखावट भी भीगे रेशम जैसी वायवीय और बेजान थी। किसी क्रोस नाम के आदमी को, जो संभवतः बहुत छोटे कद का मामूली आदमी रहा होगा, अपने मामूलीपन का इतना तीखा अहसास हुआ था कि उसने अपने चाकू से गहरी खुदाई कर दो इंच ऊंचे अक्षरों में अपना नाम उकेरा था। मैंने भी बिना सोचे-समझे अपनी जेब से पेन्सिल निकाली और एक स्तम्भ पर अपना नाम लिख दिया। लेकिन जो मैं कहने जा रहा हूँ उनका इन बातों से कोई सम्बन्ध नहीं है.. माफ़ करना, मैं थोड़े शब्दों में कोई कहानी नहीं कह सकता।
"मैं उदास था और थोडा ऊब भी गया था। ऊब, चुप्पी और लहरों की टकराहट की एकरस आवाजों ने मिलजुलकर मेरे भीतर धीरे-धीरे वैसे ही विचार भरने शुरू कर दिए, जिनकी हम अभी चर्चा कर रहे थे। सत्तर के दशक के आखिरी वर्षों में इस तरह के विचार जनता के बीच फैशनेबल हो गए थे और उसके बाद अस्सी के दशक के शुरू के वर्षों में साहित्य, विज्ञान और राजनीति में भी इन विचारों का प्रवेश हो चुका था। मेरी उम्र उस समय छब्बीस से अधिक नहीं रही होगी, लेकिन मैं अच्छी तरह जानता था कि जीवन निरुद्देश्य और निरर्थक है, सब कुछ धोखा और छलावा है, सखालिन द्वीप के कैदियों की जिंदगी नीस शहर की जिंदगी से तत्वतः और परिणामतः अलग नहीं है, कैंट के दिमाग और एक मक्खी के दिमाग के बीच का फर्क वस्तुतः कोई महत्त्व नहीं रखता, कोई भी दुनिया में सही या गलत नहीं है, सबकुछ कूड़ा करकट और उल-जलूल है और हर चीज..... मेरी बला से भाड़ में जाए! मैं जी रहा था और इस तरह, जैसे मैं जीने के लिए विवश करनेवाली किसी अनजान शक्ति के प्रति अहसान कर रहा था और उससे मानो यह कह रहा था, "हे अनजान शक्ति, जरा इधर देखो: मैं इस जिंदगी की रत्ती भर परवाह नहीं करता, फिर भी जी रहा हूँ!" मेरे सोच-विचार की दिशा एक ही थी, हालाँकि उसके रूप भिन्न-भिन्न थे। मैं एक ऐसे रसोइए की तरह था जो केवल एक ही घिसेपिटे आलू से सैकड़ों स्वादिष्ट व्यंजन बना सकता है। इसमें कोई शक नहीं कि मेरे विचार बिलकुल एकतरफा और कुछ हद तक संकीर्ण थे, लेकिन उस समय मुझे ऐसा लगता था जैसे मेरे चिंतन-क्षितिज का कोई ओर-छोर नहीं है और मेरी सोच सागर जैसी विस्तृत है। जहाँ तक मैं अपने अनुभवों के आधार पर कह सकता हूँ इस तरह के विचारों का एक अनोखा आकर्षण होता है। उनमें तम्बाकू या मार्फिया जैसा नशा होता है, जो एक आदत और आवश्यकता बन जाती है। आप अपने अकेलेपन के हर क्षण और हर सुविधाजनक मौके का उपयोग जीवन की निरर्थकता और कब्र के पार के अन्धकार सम्बन्धी विचारों की जुगाली करने में बिताते हैं। जब मैं समर हाउस में बैठा हुआ था, तब लम्बी नाकों वाले कुछ यूनानी बच्चे इठलाते हुए चहलक़दमी कर रहे थे। मैंने इस सुविधाजनक मौक़े का फ़ायदा उठाया और उन्हें देखते हुए प्रकार सोचने लगा:
"कोई पूछ सकता है कि इन बच्चों ने किस उद्देश्य से जन्म लिया है और किस लिए ये जी रहे हैं? क्या इनके जीवन का कोई अर्थ है? कल वे बड़े हो जाएंगे लेकिन बिना जाने कि वे क्यों बड़े हुए हैं और बिना किसी उद्देश्य के वे इस गर्त में अपनी जिंदगी गुजार देंगे और मर जाएंगे...'
"उन बच्चों को इठलाकर चलते हुए और किसी विषय पर संजीदगी से बात करते हुए देखकर मुझे उनसे चिढ़ होने लगी। ऐसा लगता था जैसे वे अपनी छोटी बेरंग जिंदगी से बहुत खुश हैं और वे जानते हैं कि उनके जीवन का क्या प्रयोजन है...... मुझे याद है कि मैंने एवेन्यू की आखिरी छोर से तीन स्त्रियों को आते देखा था। वे जवान थीं, एक गुलाबी ड्रेस में और बाकी दो सफ़ेद ड्रेस में; वे साथ-साथ एक-दूसरे की बांहों में बाहें डाले टहल रही थीं और किसी बात पर हँस रही थीं। मैं अपनी नज़रों से उनका पीछा कर रहा था और सोच रहा था `मैं इतना ऊब गया हूँ कि दो-चार दिन के लिए यदि किसी स्त्री से प्रेम-प्रसंग हो जाए तो मजा आ जाए!'
"इस बात पर मुझे याद आया कि अभी तीन हफ्ते पहले ही मैं सेंट पीटर्सबर्ग वाली प्रेमिका के साथ था और यह विचार मेरे मन में आया कि एक संक्षिप्त प्रसंग के लिए यह सही अवसर है। सफ़ेद ड्रेस पहनी बीच वाली लड़की अपनी सहेलियों की तुलना में अधिक ख़ूबसूरत और कम उम्र की लग रही थी। उसके तौर-तरीक़े और उसकी हंसी से मैं अनुमान लगा सकता था कि वह सीनियर हाई स्कूल की छात्रा रही होगी। जब मैंने उसके वक्ष स्थल की ओर देखा तो ऐसा नही था कि मेरे मन में कोई विकार उत्पन्न नहीं हुआ था। मैंने सोचा:
"शायद यह संगीत और एटिकेट सीख रही है, किसी यूनानी से शादी करेगी, बदरंग और बेवक़ूफ़ाना ज़िन्दगी जीएगी; ढेर सारे बच्चे पैदा करेगी और मर जाएगी। एक निरर्थक जिंदगी।"
"मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि मैं अपने उच्च विचारों में अभद्र भाषा का पुट डालने में माहिर था। कब्र के परे छाये अन्धकार सम्बन्धी मेरे विचार वक्षस्थल और पिंडलियों के सौन्दर्य की तारीफ़ करने से मुझे नहीं रोक सकते थे। उच्च विचार हमारे प्यारे बैरोन को हर शनिवार वुकोलोव्का जाने और वहां डॉन जुआन जैसी शरारत करने से नही रोकते हैं। जहाँ तक मुझे याद है स्त्रियों के प्रति मेरा रवैया अत्यंत अपमानजनक था। आज उस हाई-स्कूली लड़की की याद कर मुझे उस समय के अपने विचारों पर शर्म आती है, लेकिन उस समय मेरे अंतःकरण में कोई हलचल नहीं थी। मैं इज्जतदार माँ-बाप का बेटा था; ईसाई था; ऊंची शिक्षा पायी थी; स्वभाव से न तो दुष्ट था न मूर्ख; लेकिन हाई-स्कूल की लड़कियों को अपनी आँखों से निर्वस्त्र करने में मुझे थोड़ी भी हिचकिचाहट नहीं हो रही थी। दरअसल बात यह थी कि जवानी के अपने अधिकार होते हैं और सिद्धांततः हमारी सोच ऐसे अधिकारों का विरोध नहीं करती, चाहे ये अधिकार अच्छे हों या घृणित। यदि कोई यह समझता है कि जिंदगी उद्देश्यहीन है और मृत्यु अवश्यम्भावी, तो वह प्रकृति से संघर्ष या पाप की धारणा के प्रति अत्यंत उदासीन होगा। चाहे तुम संघर्ष करो या नहीं करो, तुम मरोगे और सड़ोगे. ....दूसरी बात यह है, मेरे प्रिय मित्रो, कि बचपन से ही हमारी सोच हमें हर स्थिति में अपने बचाव में तर्क ढूँढ़ना सिखाती है। हमारे ऊपर ह्रदय का शासन नहीं रहता, बल्कि हम पर तर्क-शक्ति हावी रहती है। स्वत:स्फूर्त भावना, प्रेरणा— सब कुछ बाल की खाल निकलनेवाली मीमांसा के सामने दम तोड़ देती है। जहाँ भी तर्क-वितर्क हावी रहता है, वहां संवेदना का अभाव रहता है और इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि संवेदनहीन लोग शुचिता का अर्थ नहीं समझते। शुचिता की वे ही कदर करते हैं जो भावप्रवण, सच्चे और स्नेहशील होते हैं। तीसरी बात यह है कि यदि हमारी सोच जीवन की सार्थकता से इन्कार करती है तो वह हर अलग व्यक्तित्व की सार्थकता से भी इन्कार करेगी। यह बात कोई भी समझ सकता है कि यदि मैं नताल्या स्तेपनोवना के व्यक्तित्व को महत्त्व नहीं देता तो इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका अपमान होता है या सम्मान। आज मैं उसे अपमानित करता हूँ, उसका दाम चुकता हूँ, और कल मैं उसे पूरी तरह भूल जाता हूँ।
"और इस तरह समर हाउस में बैठकर मैं युवतियों को घूर रहा था। एवेन्यू में एक और स्त्री ने कदम रखा। उसके ब्लोंड सर पर कोई हैट नहीं था । एक बुनी हुई शाल उसके कन्धे पर थी। वह एवेन्यू से टहलती हुई समर हाउस में आई और रेलिंग पकड़कर चुपचाप नीचे और दूर समुद्र की ओर देखने लगी। जब वह अन्दर आई तो उसने मुझपर जरा भी ध्यान नहीं दिया, जैसे मैं वहां मौजूद ही नहीं था। मैंने उसके पांव से सर तक ( सर से पांव तक नहीं, जैसा कि हम पुरुषों को देखते हैं) मुआयना किया। वह जवान थी, उम्र पच्चीस से अधिक नही लग रही थी, आकर्षक थी, सुगठित थी, संभवतः शादीशुदा थी और संभ्रान्त घर की महिला थी। उसके पहनावे में सादगी थी, लेकिन वह आधुनिक फैशन और सुरुचि के अनुरूप था, जैसा कि एन. की सभी कुलीन महिलाओं में देखा जाता है।
" इसके साथ मेरा प्रेम-प्रसंग होना चाहिए....." उसकी सुन्दर कमर और बांहों को घूरते हुए मैंने सोचा "बुरी नहीं है.... किसी डॉक्टर या हाई स्कूल शिक्षक की बीवी होगी..."
"लेकिन उसके साथ प्रेम-प्रसंग करना, उसे सैलानियों की तरह आनन- फानन में किसी रोमांस की नायिका बनाना न केवल कठिन था बल्कि एक तरह से असंभव था। उसके चेहरे की ओर देखते हुए मैं यही सोच रहा था। उसकी भाव-भंगिमा और देखने के अंदाज से ऐसा लग रहा था, जैसे सागर, दूर में उठता धुआँ और आकाश उसके लिए उबाऊ हो चुका था और उन्हें देखते हुए उसकी आँखें थक गयी थीं। जाहिर था वह जीवन से ऊब गयी थी और कुछ निराशाजनक विचारों ने उसे घेर रखा था। लेकिन उसकी मुखमुद्रा पर जबर्दस्ती ओढ़ी गयी उदासीनता भी नहीं थी, जिसे हर उस स्त्री की मुखमुद्रा पर देखा जा सकता है जो अपने करीब किसी अजनबी पुरुष की मौजूदगी महसूस करती है।
" उस सुंदरी ने मेरी ओर एक उडती हुई, उचटी- सी नज़र डाली और बेंच पर बैठकर कुछ सोचने लगी। मैं उसकी भावभंगिमा से समझ सकता था कि उसे मुझमें कोई रुचि नहीं है और अपने महानगरीय हाव-भाव से मैं उसमें कोई उत्सुकता भी नहीं जगा पाया था। फिर भी मैंने सोचा कि उससे कोई बात की जाए और मैंने उससे पूछा:
" `मैडम , क्या आप बता सकेंगी कि शहर के लिए कितने बजे गाड़ियाँ मिलती हैं?'
" `शायद दस या ग्यारह बजे....'
"मैंने उसे धन्यवाद दिया। उसने मुझे फिर से देखा और अचानक उसके भावहीन चेहरे पर उत्सुकता जगी और फिर जैसे उसे आश्चर्य हुआ हो... मैं शीघ्र ही अपने चेहरे पर उपेक्षा का भाव ले आया; मछली फँस रही थी। वह अचानक बेंच से उठ खड़ी हुई, जैसे उसे किसी ने डंक मारा हो। थोड़ी झेंपकर मुस्कुराते हुए उसने मुझे ऊपर से नीचे देखा और सकुचाते हुए पूछा:
" `सुनो, क्या तुम अनान्येव हो?'
" `हाँ, मैं अनान्येव हूँ,' मैंने कहा.
" `और तुमने मुझे नहीं पहचाना? नहीं?'
"मैं थोड़ा चिढ़ गया था। मैंने उसे ध्यान से देखा और - यकीन करें या न करें- मैंने उसे पहचाना, लेकिन उसके चेहरे से नहीं, उसकी देहयष्टि से नहीं, बल्कि उसकी शर्मीली और थकी मुस्कान से। यह तो नतालिया थी, जिसे हम सब बिल्लो कहते थे। यह वह लड़की थी जिससे सात-आठ साल पहले मुझे बेइंतिहा प्यार था, जब मैं हाई-स्कूल यूनिफार्म पहनता था। ` ओह , बीते दिनों की भूली बिसरी बातें...' मुझे याद आया बिल्लो लगभग पंद्रह-सोलह साल की छोटी-सी दुबली लड़की हुआ करती थी जो हाई स्कूल के दिनों में विशेष रूप से प्लेटोनिक प्यार के लिए बनायी गयी थी। उसका क्या जादू था! पीतवर्णी, सुकुमार, हल्की - जैसे, उसे फूँक दें तो शेमल के रोएँ जैसी आकाश में ऊपर और ऊपर उड़ती चली जाएगी। उसके चेहरे पर एक झेंप और घबराहट रहती थी, उसके हाथ छोटे-छोटे थे, उसके मुलायम बाल कमर के नीचे तक लटकते रहते थे और उसकी पतली कमर में एक अजीब सम्मोहन था- कुल मिलाकर वह चांदनी जैसी वायवीय और पारदर्शी लगती थी- यानी एक हाई-स्कूली लड़के की नजर से देखा जाए तो वह अनुपम सुंदरी थी... मैं उससे प्यार करता था और कोई ऐसा वैसा प्यार नहीं! मैं रातों में सो नहीं पाता था, कविताएं लिखता था..... कभी-कभी वह शाम में शहर के पार्क में किसी सीट पर बैठी मिलती थी और हम हाई-स्कूली लड़के उसके आसपास मंडराते रहते थे और उसे प्रशंसा भरी नजरों से देखते रहते थे... हमारी सारी आहों, मिन्नतों और तारीफों के बदले में वह केवल शाम की नम हवा में ठिठुरती, अपनी बरौनियों को मिचमिचाती और डर-डर कर मुस्कुरा भर देती थी। उन दिनों वह सचमुच छोटी प्यारी बिल्ली जैसी लगती थी; जब हम उसे देखते तो उसे सहलाने का जी करता और इसीलिए हम उसे बिल्लो कहते थे।
“इन सात-आठ सालों में बिल्लो काफ़ी बदल चुकी थी। वह अब बड़ी हो गयी थी, उसका बदन भर गया था और उस पुरानी दुबली-पतली, नाज़ुक सी बिल्लो से अब कोई समानता नहीं रह गयी थी। उसके नाक-नक्श पर उम्र का असर था या उसका सौन्दर्य फीका पड़ गया था, ऐसी बात नहीं थी, लेकिन चेहरे पर पुरानी वाली चमक नहीं थी और थोड़ी कठोरता आ गयी थी। उसके बाल अब छोटे लग रहे थे,वह थोड़ी लम्बी हो गयी थी, उसके कंधे लगभग दुगुने चौड़े हो गए थे और सबसे खास बात यह थी कि अभी से उसके चेहरे पर मातृत्व और परवशता की वह छाप थी, जो उसकी उम्र में इज्जतदार औरतों में आम तौर पर देखी जा सकती है। स्वाभाविक है उसका यह रूप पहले मैंने नहीं देखा था। ...एक वाक्य में कहूँ तो उसमें स्कूली लड़की और प्लेटोनिक प्यार की केवल एक बात- उसकी शर्मीली मुस्कान बच गयी थी और बाकी सारी बातें खो गयी थीं......।
"हम दोनों बातें करने लगे। जब उसने सुना कि मैं इंजीनियर हूँ, उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा।
"`क्या बात है!' उसने प्रसन्न होकर मेरी आँखों में झाँका। `कितनी शानदार बात है! तुम सबने कितना अच्छा किया है! तुम्हारे बैच में एक भी लड़का नाकामयाब नहीं रहा। सब के सब कामयाब हुए। एक इंजीनियर है, दूसरा डॉक्टर है, तीसरा स्कूल-टीचर है, चौथा, सुना है सैंट पीटर्सबर्ग में मशहूर गायक है। तुम सबने अच्छा किया है। कितने गर्व की बात है!'
"बिल्लो की आँखें सच्ची ख़ुशी और भलमनसाहत से चमक रही थीं। वह एक बड़ी बहन या बचपन की स्कूल टीचर की तरह मेरी तारीफ़ कर रही थी। लेकिन मैं उसके दोस्ताना चेहरे को देखकर सोच रहा था, `इसके साथ प्रेम-प्रसंग में कितना मजा आएगा!'
" 'याद है, नतालिया स्तेपनोवना,' मैंने पूछा, `कैसे मैं बाग़ में फूलों के एक गुच्छे के साथ-साथ तुम्हारे लिए कुछ लिखकर लाया था और तुम मेरा नोट पढ़ते ही कैसे हक्का-बक्का हो गयी थी?'
" `नहीं मुझे याद नहीं है।' उसने हँसते हुए कहा, ‘लेकिन मुझे याद है कि तुमने मेरे कारण आगस्तस को द्वंद्व युद्ध के लिए ललकारा था।...'
" `अब, यह मुझे याद नहीं है।...'
'जो बीत गयी सो बात गयी…….’ बिल्लो ने आह भरते हुए कहा, `मैं कभी तुम सब लड़कों के लिए एक छोटी -सी देवी के सामान थी, लेकिन अब तुम लोगों की ओर गर्व से देखने की मेरी बारी है।..'
“आगे बातचीत से मुझे पता चला कि हाई स्कूल छोड़ने के बाद बिल्लो ने इसी शहर के एक निवासी से शादी कर ली थी, जो आधा यूनानी और आधा रूसी था और किसी बैंक या बीमा सोसाइटी के लिए काम करता था और गेंहू का भी व्यापार करता था। उसके नाम का उच्चारण थोडा कठिन था.. पोपौलाकी या स्कारंदोपौलो.... ऐसा ही कुछ था.. वाक़ई मैं भूल गया हूँ ...... अपने बारे में बिल्लो बहुत कम बता रही थी और वह भी बेमन से। बातचीत केवल मेरे बारे में हो रही थी। उसने मेरे संस्थान, मेरे सहकर्मी, सैंट पीटर्सबर्ग, मेरी योजनाएं- सबके बारे में पूछा; जो कुछ भी मैंने बताया उससे उसे बेहद ख़ुशी हो रही थी और बार-बार वह `क्या खूब!' बोल उठती थी।
"हम दोनों नीचे टहलते हुए सागर तक चले गए, रेत पर बहुत देर तक चहलकदमी करते रहे और जब शाम में समुद्र से नम हवा का झोंका आने लगा तो हम लोग फिर वापस आ गए। पूरे समय मेरे और बीते दिनों के बारे में बातें होती रहीं। हम तब तक टहलते रहे जब तक कि विला की खिडकियों पर सूर्यास्त का प्रतिबिम्ब धुंधला नहीं पड़ने लगा।
"` चलो घर पर चाय पीते हैं' बिल्लो ने कहा, ` समोवार मेज पर लग चुकी होगी…….. ...... मैं आजकल घर पर अकेले ही हूँ।' जब उसका विला हरियाली के बीच से दिखने लगा तो उसने कहा, ‘मेरे पति हमेशा शहर में ही रहते हैं, केवल रात में लौटते हैं, और वह भी हर रात नहीं। मैं सचमुच अकेले ऊब जाती हूँ।'
" मैं उसके पीछे -पीछे उसकी पीठ और कन्धों की मन ही मन सराहना करते हुए चल पडा। मुझे ख़ुशी थी कि वह शादीशुदा है। अस्थायी रोमांस के लिए विवाहित स्त्रियाँ नवयुवतियों की अपेक्षा अधिक उपयुक्त हैं। मुझे यह जानकर भी ख़ुशी हुई कि उसका पति घर पर नहीं था..... लेकिन मुझे यह भी लग रहा रहा था कि यहाँ रोमांस की गुंजाइश नहीं है।
"हम दोनों अन्दर गए। बिल्लो के घर के कमरे छोटे थे, छत नीची थी; इसमें समर विला के फर्नीचर थे (रूसी आदमी अपने विला में भारी- भरकम और असुविधाजनक फ़र्नीचर रखता है, ऐसी फ़ालतू चीजें जिन्हें बाहर फेंकने में परेशानी होती है, लेकिन जिनके लिए अन्दर भी जगह नहीं रहती है)। छोटी-छोटी बातों से यह अनुमान लगाना आसान था कि बिल्लो और उसके पति की माली हालत अच्छी थी और वे सालाना पाँच या छह हज़ार रूबल खर्च करते होंगे। मुझे याद है बिल्लो जिसे डाइनिंग रूम कह रही थी, उसके बीचोंबीच एक छह पाँवों वाली गोल मेज़ पर समोवार और चाय की प्यालियाँ रखी हुई थीं। मेज़ के किनारे एक खुली किताब, एक पेन्सिल और एक कॉपी रखी हुई थी। मैंने किताब पर नज़र डाली और पहचाना कि यह मालिनीं और बुरेनिन की अंकगणित के सवालों वाली किताब थी। जहाँ तक मुझे याद है किताब `कंपनी नियम ' पर खुली हुई थी।
" `तुम किसे पढ़ा रही हो?' मैंने पूछा ।
" `किसी को भी नहीं' उसने कहा। ` मैं हिसाब हल कर बीते दिनों को याद कर रही थी। मैं ऊब जाती हूँ, क्योंकि मेरे पास कुछ करने के लिए है भी नहीं।'
" `तुम्हारे कोई बच्चे हैं?'
" `एक बेटा था, लेकिन वह केवल एक हफ्ते का मेहमान रहा।'
"हम दोनों चाय पीने लगे। चूंकि वह मुझसे बेहद प्रभावित थी, बिल्ली ने एक बार फिर कहना शुरू किया कि यह कितनी अच्छी बात है कि मैं एक इंजीनियर हूँ और वह मेरी कामयाबी से कितनी ख़ुश है। उसकी बातें और उसकी सच्ची मुस्कुराहट को देखकर मुझे विश्वास होने लगा था कि मुझे यहाँ सफलता नहीं मिलने वाली। यदि आप किसी मूर्ख स्त्री के पीछे पड़े हैं या ऐसी स्त्री के पीछे जो आपकी ही तरह जोखिम पसंद हो और जीवन का लुत्फ़ उठाना चाहती हो या आपसे बिलकुल अपरिचित हो तो आप अपनी कामयाबी पर यकीन कर सकते हैं। लेकिन यदि आप ऐसी स्त्री से मिले हैं जो मूर्ख नहीं, संजीदा है, जिसके चेहरे पर थकी हुई परवशता और भलमनसाहत है, जो सचमुच आपका साथ पसंद करती है और आपकी इज्जत करती है, तो आपको कुछ और सोचना पड़ेगा। यहाँ सफल होने के लिए एक दिन से कहीं अधिक लम्बे वक्त की जरूरत होगी।
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