चेखव
(अनुवाद-राजीव रंजन सिंह)
"शाम की रोशनी में बिल्लो दिन से भी अधिक खूबसूरत लग रही थी। मुझे वह और अधिक भा रही थी और जाहिर था मैं भी उसे बुरा नहीं लग रहा था। परिस्थितियां भी रोमांस के अनुकूल थीं; पति घर से बाहर, कोई नौकर-चाकर आसपास नहीं, चारों ओर शांति और एकांत.. फिर भी मुझे अपनी सफलता पर भरोसा नहीं था। मैंने निश्चय किया कि सीधा वार करना चाहिए। पहले यह आवश्यक था कि बेतकल्लुफ़ी दिखाते हुए उसके संजीदा मिजाज को कुछ हल्की-फुल्की बातों की ओर मोड़ा जाए ....
" `कुछ और बातचीत की जाए, नतालिया स्तेपनोवना,' मैंने कहा, `कुछ खुशनुमा बातें .. पहले तो तुम इजाजत दो कि पुराने दिनों की याद में मैं तुम्हें बिल्लो कहूँ।'
" उसने मुझे इजाजत दे दी।
" `मुझे यह बताओ , बिल्लो, ' मैंने कहा, ` आखिर यहाँ की बालाओं को क्या हो गया है? पहले तो वे सब इतनी चरित्रवान और गुणवंती बनती थीं, लेकिन अब किसी के बारे में भी पूछो तो जो कुछ सुनने को मिलता है उससे रूह कांप जाती है.. एक किसी अफसर के साथ भाग गयी है, दूसरी एक हाई स्कूली लड़के के साथ गायब हो गयी है, तीसरी एक विवाहित महिला ने अपने पति को छोड़ दिया है और एक एक्टर के साथ भाग गयी है, चौथी ने भी अपने पति को छोड़कर एक अफसर को चुन लिया है .. इसी तरह की कितनी बातें सुन रहा हूँ .... जैसे कोई महामारी फैली हुई हो। ऐसा लगता है तुम्हारे शहर में कोई युवती बच नहीं सकेगी!
मेरे बोलने का अंदाज कुछ ऐसा था जैसे मैं कोई इशारा कर रहा हूँ। यदि बिल्लो जवाब देते हुए हँसती तो मैं इस तरह बातें जारी रखता, ‘सावधान रहना बिल्लो, कहीं कोई अफ़सर या एक्टर यहाँ से तुम्हें भगा न ले जाए।’ यह सुनकर वह अपनी खूबसूरत आँखें झुकाकर कहती, `मुझ जैसी को आखिर कौन भगाना चाहेगा? यहाँ मुझ से अधिक खूबसूरत और जवान स्त्रियाँ हैं!' तब मैं उससे कहता ` सच कहूँ बिल्लो, सबसे पहले तो ख़ुशी-ख़ुशी मैं ही तुम्हें भगा कर ले जाता।' और इसी तरह मैं बातें आगे बढ़ाता जाता और अंत में बात बन जाती। लेकिन जवाब देते हुए बिल्लो हँसी नहीं, बल्कि संजीदा हो गयी।
"`लोगों का कहना सच है।' उसने कहा ‘मेरी कज़न सोन्या ने अपने पति को छोड़ दिया और एक एक्टर के साथ चली गयी। इसमें कोई शक नहीं कि यह कोई अच्छी बात नहीं है.... लोगों को अपनी नियति स्वीकार करनी चाहिए, लेकिन मैं इन स्त्रियों को दोषी भी नहीं मानती... कभी-कभी हालात आदमी पर हावी हो जाते हैं।’
‘यह सही है बिल्लो, लेकिन ऐसे भी क्या हालात हो सकते हैं जो महामारी का रूप ले ले?’
"`यह समझना तो बहुत आसान है....' बिल्लो ने भृकुटि पर बल डालते हुए कहा, ‘पढ़ी-लिखी लड़कियाँ और औरतें यह नहीं जानतीं कि वे अपनी ज़िन्दगी के साथ क्या करें। आगे पढ़ना या स्कूल टीचर बनना हरेक के वश की बात नहीं है। उन्हें शादी करनी पड़ती है। लेकिन किनसे? तुम्हारे जैसे लड़के तो पढ़ाई पूरी कर यूनिवर्सिटी चले जाते हैं और फिर अपने शहर
में कभी वापस आते नहीं। वे वहीँ राजधानी में ही शादी करते हैं और यहाँ की लड़कियाँ यहीं छूट जाती हैं। अच्छे और समझदार लोगों के अभाव में वे व्यापारियों और यूनानियों से शादी कर लेती हैं जो केवल क्लबों में पीना और पीकर मारपीट करना जानते हैं…….. ऐसी शादी के बाद उन्हें किस तरह की जिंदगी मिल सकती है? तुम खुद समझ सकते हो कि यदि कोई पढ़ी-लिखी अच्छे संस्कारों वाली स्त्री किसी मूर्ख, बदमिजाज पति के साथ रह रही हो और
अचानक उसकी भेंट किसी सुसभ्य अफ़सर, एक्टर या डॉक्टर से हो जाए और उससे उसे प्यार हो जाए, तो उसे अपनी मौजूदा जिंदगी कितनी असह्य लगने लगती है! इसीलिए वह अपने पति को छोड़कर भाग जाती है। इस कारण उसे दोषी क़रार नहीं दिया जाना चाहिए।’
"` यदि ऐसी बात है, बिल्लो, तो आखिर शादी की ही क्यों जाए?' मैंने पूछा।
"`क्योंकि’ बिल्लो ने कहा, ‘हर लड़की यह सोचती है कि किसी भी क़िस्म का पति, पति न होने से बेहतर है। कुल मिलाकर सच यह है, निकोलाइ अनास्तास्येविच, एक स्त्री के लिए यहाँ की ज़िन्दगी अच्छी नहीं है, किसी रूप में अच्छी नहीं ! पहले एक लड़की के रूप में उसका दम घुटता है और बाद में एक विवाहिता के रूप में।.... सोन्या भाग गयी और वह भी एक एक्टर के साथ। इसपर लोग हँसते हैं। लेकिन कोई उसके दिल में झांके तो वे नहीं हँसेंगे ......।’
अजोरका दरवाजे के बाहर फिर भूँकने लगा। वह किसी पर गुर्राया, फिर पीड़ा से चिचियाया
और बैरक की दीवाल से लगकर छटपटाने लगा। अनान्येव के चेहरे पर कुत्ते के प्रति ममता देखी जा सकती थी। उसने अपनी कथा रोकी और बाहर कुत्ते के पास चला गया। दो मिनट तक हम सुन सकते थे कि वह कैसे ‘अच्छा अजोरका! प्यारा अजोरका!’ कहकर उसे
शांत कर रहा था।
"` हमारा निकोलाइ अनास्तास्येविच सबके आकर्षण का केंद्र बना रहना चाहता है।’ वॉन स्तेनबर्ग ने मुस्कुराते हुए कहा। ‘अच्छा आदमी है!' उसने थोडा रुककर कहा।
बैरक में वापस आकर इंजीनियर ने हमारे ग्लासों में फिर वाइन ढाली और मुस्कुराते हुए अपनी कथा जारी रखी:
" और इस तरह मेरा सीधा वार खाली गया। मैं कुछ और नहीं कर सकता था। मैंने अपने अपावन विचारों को किसी और अनुकूल अवसर के लिए मुल्तवी कर दिया, अपनी असफलता को मन ही मन स्वीकार किया और एक तरह से इन विचारों से किनारा कर लिया। बिल्लो की आवाज, शाम की हवा और शांत वातावरण के बीच मैं भी धीरे धीरे एक सौम्य और मधुर मनोदशा में खोता चला गया। मुझे याद है, मैं एक खुली खिड़की के पास एक आरामकुर्सी पर बैठकर पेड़ों तथा आसमान पर घिरते अन्धकार को देख रहा था। बबूल और नीम्बू के पेड़ वैसे ही थे जैसे वे आठ वर्ष पहले थे; मेरे लड़कपन के दिनों की तरह ही दूर से किसी ख़राब पियानो के बजने की आवाज आ रही थी और पहले की ही तरह लोग एवेन्यू में आ-जा रहे थे, लेकिन ये लोग मेरे बचपन के लोग नहीं थे। एवेन्यू में टहलनेवालों में न तो मैं था और न मेरे मित्र और न वे जिनसे मैं प्यार करता था। उनकी जगह अजनबी हाई स्कूली लड़के और अजनबी लड़कियां थीं। मैं उदास हो गया। जब मैंने बिल्लो से अपने परिचितों के बारे में पूछा तो पाँच बार ‘गुजर गए' सुना; मेरी उदासी कुछ- कुछ उस तरह की थी जैसी किसी भले आदमी की शवयात्रा के दौरान होती है।
खिड़की पर बैठे हुए, बाहर लोगों को टहलते हुए देखकर और पियानो की आवाज़ सुनते हुए मैंने ज़िन्दगी में पहली बार अपनी आँखों से देखा कि कितनी द्रुतगति से एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी का स्थान लेती है और किसी व्यक्ति के जीवन में सात या आठ वर्ष कितना भारी महत्व रखते हैं।
" बिल्लो ने मेज पर सौटर्न की एक बोतल रखी। मैंने एक ड्रिंक लिया, मिजाज थोड़ा नरम हुआ और किसी विषय पर विस्तार से बातें करने लगा। बिल्लो सुन रही थी और पहले की तरह ही मेरी और मेरी बुद्धिमत्ता की बड़ाई कर रही थी। समय गुजर रहा था। आसमान इतना अँधेरा हो गया था कि बबूल और नीम्बू के पेड़ों की आकृतियाँ आपस में मिल गयी थीं। एवेन्यू में लोगों का टहलना बन्द हो गया था।पियानो शान्त हो गया था और केवल समुद्र के लहरों की आवाज आ रही थी।
" जवान लोग हर जगह एक जैसे होते हैं। किसी युवक से शालीनता से पेश आओ, उसकी खातिरदारी करो, उसे वाइन पिलाओ, उसे गुमान होने दो कि वह एक दिलचस्प आदमी है, तो वह भूल जाएगा कि अब उसके जाने का समय हो गया है। वह अनवरत बक- बक करता रहेगा.. उसके मेज़बानों के लिए आँखें खुली रखना मुश्किल हो रहा हो, सोने का समय आ गया हो, लेकिन उसकी बकवास बंद नहीं होगी। मैं भी उसी तरह का युवा था। एक बार मैंने घड़ी देखी, साढे दस बज चुके थे। मैंने जाने की इजाज़त मांगी।
" `रास्ते की खातिर एक और ड्रिंक ले लो' बिल्लो ने कहा ।
" मैंने एक ड्रिंक रास्ते की खातिर लिया और फिर कोई लम्बी चर्चा छेड़ दी-- भूल गया कि जाने का समय हो गया है और एक बार फिर बैठ गया। लेकिन उसी समय बाहर से कुछ पुरुष स्वर और उनके क़दमों की आहट सुनाई दी। कुछ लोग खिड़की के नीचे से होकर गुजरे
और दरवाज़े पर आकर रुक गए।
"`लगता है मेरे पति वापस आ गए हैं.....' बिल्लो ने ध्यान से सुनते हुए कहा।
'' दरवाज़ा खुला और अब हॉल से आवाजें आने लगीं। मैंने दो पुरुषों को डाइनिंग रूम के दरवाजे से गुजरते देखा: एक भारी-भरकम डील-डौल का था और एक स्ट्रा हैट पहने हुआ था। उसके बाल काले थे और नाक तोते जैसी थी। दूसरा सफ़ेद ट्यूनिक पहने हुए कोई नौजवान अफसर था। दरवाजे से गुजरते हुए उन्होंने उदासीनता से बिल्लो और मुझपर उड़ती नजर डाली। मुझे ऐसा लगा दोनों नशे में थे।
“ `उसने जो कुछ कहा वह झूठों का पुलिंदा था, लेकिन तुमने उसपर विश्वास कर लिया।‘ उनमें से एक ऊंचे नकियाये सुर में बोल रहा था, `पहली बात तो यह कि वह कोई बड़ा क्लब नहीं था। बहुत छोटा क्लब था। ‘
“`तुम गुस्से में हो जुपिटर। इसका मतलब है कि गलती तुम्हारी थी…’ दूसरे ने हँसते और खाँसते हुए कहा। जाहिर था यह अफसर की आवाज थी।
`सुनो, क्या मैं आज तुम्हारे यहाँ रुक सकता हूँ? सच बताओ, इससे तुम्हें कोई असुविधा तो नहीं होगी?’
“`यह कोई पूछनेवाली बात है! न केवल तुम रुक सकते हो, बल्कि तुम्हें रुकना ही चाहिए। तुम बीयर लोगे या वाइन ?’
“ वे हमसे दो कमरे दूर बैठे हुए थे, जोर-जोर से बातें कर रहे थे और जाहिर था उन्हें बिल्लो या उसके मेहमान में कोई दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन पति के आते ही बिल्लो में बदलाव आ गया था। पहले वह झेंपी, उसके बाद उसके चेहरे पर एक डरा-सहमा अपराधी-सा भाव आ गया;
वह असहज हो गयी और मुझे ऐसा लगने लगा जैसे अपने पति से मुझे मिलाने में उसे संकोच हो रहा था और अब वह चाहती थी कि मैं वहाँ से जाऊं ।
" मैं चलने के लिए उठ गया। बिल्लो ड्योढ़ी तक मुझे छोड़ने आयी। `हमलोग शायद फिर नहीं मिलेंगे।.. ईश्वर तुम्हारी हर मुराद पूरी करे!' उसने मुझसे हाथ मिलाते हुए कहा। उस क्षण की उसकी डरी-सहमी उदास मुस्कुराहट और दीन स्नेही आँखें मुझे आज तक याद हैं।
''उसके मुंह से एक उच्छ्वास भी नहीं निकला। मुझे विदा करते वक्त उसके हाथ में एक मोमबत्ती थी और रोशनी की चमकती चित्तियाँ उसकी गर्दन और चेहरे पर खेल
रही थीं, जैसे वे उसकी उदास मुस्कुराहट का पीछा कर रही हों। मैंने पुरानी बिल्लो को याद किया जिसे मैं सहलाना-दुलराना चाहा करता था और आज की बिल्लो को ध्यान से देखा। कुछ कारणों से मुझे उसके शब्द याद आये, 'लोगों को अपनी नियति स्वीकार करनी चाहिए' और मुझे एक बेचैनी का अहसास हुआ। हालाँकि मैं अपने आप में खुश रहने वाला लापरवाह किस्म का शख्स था, फिर भी मेरी सहज बुद्धि ने अनुमान लगाया और मेरे अंतःकरण ने भी गवाही दी कि मेरे सामने एक नेक, दयालु और स्नेहमयी, किन्तु प्रताड़ित स्त्री खड़ी है।
"मैंने सर झुकाकर उससे विदा ली और गेट की ओर आगे बढ़ गया। अँधेरा हो चुका था। जुलाई में दक्षिणी प्रदेशों में शाम जल्दी आ जाती है और वातावरण में अन्धकार जल्दी फैलता है। दस बजते-बजते इतना अँधेरा हो जाता है कि हाथों को हाथ नहीं सूझता। गेट तक जाते-जाते ही मैंने माचिस की लगभग दो दर्जन तीलियाँ जला ली थीं।
" `बग्घी!' मैंने गेट से बाहर निकलकर पुकारा। जवाब में कहीं से भी कोई आवाज़ नहीं आई, फुसफुसाहट तक नहीं। `बग्घी!' मैंने फिर पुकारा `कोई बग्घी है क्या!'
" लेकिन वहां न कोई बग्घी थी, न कोई छकड़ा। कब्र का सन्नाटा था। मुझे केवल सागर की उनींदी -सी झप-झप और सौटर्न पीने के कारण अपनी धड़कन सुनाई दे रही थी। मैंने ऊपर आसमान की ओर देखा। एक भी तारा नहीं था। जाहिर था आसमान बादलों से ढका था। किसी कारण से मैंने बेवकूफी भरी मुस्कुराहट के साथ अपने कंधे उचकाए और एक बार फिर, हालाँकि क्षीण आशा के साथ बग्घी के लिए आवाज़ लगायी, `बग्घी...!!’। मेरी प्रतिध्वनि ही सुनाई दी।
" मैदान से होकर चार वर्स्ट तक अंधेरे में पैदल चलने का विचार मुझे आकर्षक नहीं लग रहा था। चलने का निश्चय करने के पहले मैं बहुत देर तक उधेड़बुन में रहा और बग्घी के लिए आवाज़ लगाता रहा और फिर कंधे उचकाकर बिना सोचे, यूँ ही वाटिका की ओर लौट गया। वहां भयानक अन्धकार था। पेड़ों के पीछे विला की खिडकियों में जहाँ -तहां बुझी-बुझी-सी लाल रोशनी थी। मेरे कदमों की आहट से और समर हाउस के रास्ते में बार-बार माचिस की तीली जलाने के कारण एक कौआ डरकर एक पेड़ से उड़कर दूसरे पर जा रहा था, जिससे पत्तों की सरसराहट की आवाज आ रही थी। मैं परेशान और शार्मिन्दा था। कौआ शायद यह समझ रहा था और `काव!काव!' बोलकर मुझे चिढ़ा रहा था। मैं इसलिए परेशान था, क्योंकि मुझे पैदल चलना पड़ा और यह सोचकर शर्मिंदा था कि एक स्कूली लड़के की तरह बिल्लो के सामने बक-बक करता रहा था।
" मैं किसी तरह समर हाउस पहुँचा, अंधेरे में ही बेंच खोजी और उस पर बैठ गया। दूर नीचे अँधेरे में से समुद्र के उग्र गर्जन की आवाज आ रही थी। मुझे याद है कि कैसे मैं एक अंधे की तरह न तो समुद्र, न आसमान और न समर हाउस ही देख पा रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे पूरी दुनिया में केवल वे विचार हैं जो मेरे नशे से कुंद दिमाग़ में इधर-उधर चक्कर काट रहे हैं और कोई एक अदृश्य शक्ति है जो नीचे एकरस स्वर में गुर्रा रही है। जब मैं ऊंघने लगा तो ऐसा लगा यह आवाज समुद्र की नहीं बल्कि मेरे विचारों की ही है और पूरी दुनिया में केवल मैं हूँ। इस तरह पूरी दुनिया को अपने में समेटे हुए मैं बग्घी, शहर, बिल्लो—सबको भूल गया। मैंने खुद को उस अहसास के प्रति समर्पित कर दिया जो मुझे अति प्रिय है। यह अहसास है निपट अकेलेपन का, जब आपको लगता है कि इस अँधेरे और रूपहीन ब्रह्मांड में केवल आपका अस्तित्व है। यह बहुत ही दर्प भरा दानवी अहसास है, जो रूसियों के लिए सुलभ है, क्योंकि उनके विचार और अहसास उतने ही व्यापक, असीमित और क्रूर होते हैं, जितने उनके मैदान, जंगल और बर्फ हैं। यदि मैं कोई कलाकार होता तो मैं एक ऐसे रूसी का चेहरा अवश्य चित्रित करता जो स्थिर बैठा हुआ है, जिसकी टाँगें अन्दर की ओर मुड़ी हुई हैं, सर हाथों पर टिका हुआ है और जो पूरी तरह इस निपट अकेलेपन के अहसास में डूबा हुआ है। इस अहसास के साथ-साथ वह जीवन की निरर्थकता, मृत्यु, कब्र का अँधेरा आदि विचारों से भी भरा हुआ है .. ऐसे विचार जिनका मूल्य ताम्बे के एक छदाम के बराबर भी नहीं है ..लेकिन उसके चेहरे की भाव-व्यंजना सुन्दर होगी।
" मैं वहां बैठा-बैठा ऊंघ रहा था, वहां से उठने का निश्चय करने में अक्षम था। मुझे गर्माहट और शांति मिल रही थी। अचानक समुद्र की निरंतर एकरस आवाज के बीच कुछ और आवाज़ें सुनाई पड़ने लगीं, जो मेरी आत्मलीनता को तोड़ रही थीं... कोई एवेन्यू में तेज कदमों से चल रहा था। समर हाउस के पास आकर ये कदम रुक गए। एक छोटी बच्ची की तरह रोती- सुबकती आवाज सुनाई दी:
"` हे ईश्वर! यह सब कब ख़त्म होगा?'
" उसकी आवाज और रोने से ऐसा लग रहा था जैसे कोई दस-बारह साल की लड़की हो। वह रुक-रुक कर समर हाउस में आ गयी। वह बैठ गयी। वह प्रार्थना कर रही थी...
" ` हे प्रभु!' वह रोते हुए बोल रही थी, `अब नहीं सहा जाता। इसे कौन सह सकता है! मैं सहती रही और चुप रही... लेकिन, मेरे प्रभु, मैं भी तो जीना चाहती हूँ..'
" इसी तरह वह विलाप करती जा रही थी। मैं उस लड़की को देखना चाहता था और उससे बातें करना चाहता था। वह डरे नहीं इसलिए मैंने पहले ज़ोरों की आह भरी, गला साफ़ किया और सावधानी से माचिस की एक तीली जलाई ... अँधेरे में तेज रोशनी जल उठी और रोती हुई लड़की का चेहरा चमक उठा। वह बिल्लो थी... "
" आश्चर्य! घोर आश्चर्य!" वॉन स्तेनबर्ग बोल उठा, " अँधेरी रात, समुद्र का गर्जन, कष्ट में नायिका, पूरे ब्रह्माण्ड में अकेलेपन के अहसास के साथ नायक ... ईश्वर ही जानता है कि अब क्या होगा! अब बस चाक़ू चमकाते हुए लुटेरों के आने की बारी है!"
" मैं तुम्हें सच्ची कहानी सुना रहा हूँ, परी कथा नहीं। "
" क्या फर्क पड़ता है यदि यह सच्ची भी हो.. वैसे भी यह कहानी किसी मुकाम पर नहीं पहुच रही है... घटना भी तो बहुत पुरानी है। "
" मुझ पर हँसने के पहले थोडा सब्र रखो, मुझे अपनी बात तो पूरी करने दो।” अनान्येव ने झुंझलाते हुए कहा, " मेहरबानी करके बीच में दखल मत दो। मैं डॉक्टर से बात कर रहा हूँ, तुमसे नहीं।" वह विद्यार्थी पर तिरछी नजर डालते हुए मेरी ओर मुड़ गया। विद्यार्थी अपने बही खातों पर झुका हुआ था। जाहिर था उसे इंजीनियर को छेड़ने में मजा आ रहा था।
इंजीनियर ने आगे कहा, " खैर, जब बिल्लो ने मुझे देखा, तो न वह चौंकी और न डरी, जैसे उसे उम्मीद थी कि मैं समर हाउस में मिलूंगा। वह जोर-जोर से साँस ले रही थी और ऐसे काँप रही थी जैसे उसे बुखार हो। मैं तीली के बाद तीली जला रहा था और उसकी रोशनी में यह देख रहा था कि आंसुओं से भीगे उसके चेहरे पर पहले वाली समझदारी, दीनता और थकान नहीं थी। यह कोई और ही चेहरा था जिसे आज तक मैं नहीं समझ पाया हूँ। उसके चेहरे पर न तो पीड़ा थी, न असहजता थी, न कोई चाहत थी और न कोई ऐसा भाव था, जिसे वह अपने शब्दों और आंसुओं से प्रकट कर रही थी... मुझे यह मानना पड़ेगा कि शायद सच यह था कि उसका चेहरा मेरी समझ के बिलकुल परे था और इसीलिए वह मुझे अर्थहीन और उन्मत्त लग रहा था।
"`मैं और नहीं सह सकती...' बिल्लो एक बिलखते बच्चे के स्वर में बोल रही थी, ‘निकोलाइ अनास्तास्येविच , मुझमें अब उतनी ताकत नहीं है। माफ़ करना, निकोलाइ अनास्तास्येविच.. मैं इस तरह से नहीं जी सकती... मैं शहर में अपनी माँ के घर जाऊँगी.... मुझे वहां ले चलो.... ईश्वर के लिए, मुझे वहां ले चलो!"
" रोती स्त्रियों के सामने मैं न तो बोल पाता हूँ और न चुप रह पाता हूँ। मैं बुरी तरह घबरा गया और उसे सांत्वना देने के लिए कुछ अनर्गल बकने लगा।
"` नहीं-नहीं, मैं माँ के पास जाऊँगी!" बिल्लो ने जोर देकर कहा और व्याकुल होकर मुझे पकड़ते हुए (उसके हाथ और आस्तीन आंसुओं में भींगे हुए थे) उठ गयी। ` माफ़ करना , निकोलाइ अनास्तास्येविच... मैं जा रही हूँ। मैं अब और नहीं सह सकती....'
" मैं घबरा गया था, लेकिन जैसे उसके दुःख से अछूता था। मेरे लिए बिल्लो के आँसू, उसका काँपना और चेहरे की भावहीनता किसी छिछले फ़्रांसिसी या युक्रेनियन मेलोड्रामा की याद दिला रही थी, जिसमें हर छोटी-मोटी, सस्ती वेदनाओं को घड़ों आंसुओं में डुबोया जाता है। मैं उसे समझ नहीं पा रहा था और मैं यह जानता था कि मैं उसे समझ नहीं रहा हूँ। मुझे चुप रहना चाहिए था, लेकिन कुछ कारणों से, शायद इस डर से कि कहीं मेरी चुप्पी मूर्खता न समझी जाए, मैं यह जरूरी समझ रहा था कि उसे माँ के घर जाने से रोका जाए और अपने घर पर ही रुकने के लिए मनाया जाए। कोई भी रोते हुए दिखना नहीं चाहता, लेकिन मैं तब तक तीली पर तीली जलाता गया, जब तक कि माचिस की डिब्बी खाली नहीं हो गयी। मैं आज तक नहीं समझ पाया हूँ कि मैं इस तरह की निर्मम रोशनी को क्यों जरूरी समझ रहा था। भावनाशून्य लोग अक्सर दूसरों के साथ फूहड़ तरीके से पेश आते हैं।
" आखिरकार बिल्लो ने मेरी बाँह में बाँह डाली और हमलोग चल पड़े। गेट से बाहर निकलकर हमलोग दायीं ओर मुड़े और कच्चे धूल भरे रास्ते से धीरे-धीरे चलने लगे। अँधेरे में मेरी ऑंखें धीरे-धीरे अभ्यस्त होने लगी थीं। मैं रास्ते के दोनों तरफ पुराने दुबले-पतले बलूत के पेड़ों और नीम्बू के पेड़ों की आकृतियों में फर्क कर पा रहा था। शीघ्र ही मैं अपनी दायीं ओर समुद्र का टेढ़ा-मेढ़ा गहरे कछारों वाला किनारा देख पा रहा था, जिसमें से जहाँ-तहाँ छोटी-मोटी गहरी खाड़ियाँ निकली हुई थीं। खाड़ियों को चारों ओर से घेरनेवाली झाड़ियाँ ऐसी दिख रही थीं, जैसे लोग ज़मीन पर बैठे हों। यह सब काफ़ी डरावना था। मैं आशंकाग्रस्त होकर समुद्री किनारे की ओर देखता। समुद्र की आवाज और मैदानी सन्नाटा मेरी कल्पनाशक्ति को आतंकित कर रहा था।
बिल्लो चुप थी। आधा वर्स्ट चलने के पहले ही वह थक चुकी थी और उसका दम फूल रहा था। मैं भी चुप था।
"क्वारंटाइनसे एक वर्स्ट दूर एक बहुत ऊंची चिमनी वाली चारमंजिला इमारत है, जिसमें अब कोई निवास नहीं करता है। कभी यहाँ भाप से चलनेवाली आटा-चक्की हुआ करती थी। यह इमारत चट्टानों पर अकेली खड़ी है और दिन में यह समुद्र और मैदान से दूर से देखी जा सकती है। इमारत खाली होने के कारण उसके आसपास से गुजरनेवालों के क़दमों की आहट और उनकी आवाजों की प्रतिध्वनि साफ़-साफ़ गूंजती है। यह सब बहुत रहस्यमय लग रहा था। आप कल्पना कर सकते हैं कि किस प्रकार मैं अँधेरी रात में एक ऐसी स्त्री की बाँह में बाँह डाले चल रहा था जो अपने पति को छोड़कर भाग रही थी और हम दोनों एक ऐसी ऊंची आकृति की बगल से गुजर रहे थे जो हमारे हर कदम को दुहरा रहा था और अपनी सैकड़ों अँधेरी आँखों से लगातार घूर रहा था। मेरी जगह कोई आम युवा होता तो वह रोमानियत में डूब गया होता, लेकिन मैं उन अँधेरी खिड़कियों को देखकर सोच रहा था, `यह सब कितना भव्य है, लेकिन एक समय आएगा जब यह इमारत धूल में मिल जाएगी और न तो बिल्लो, न उसका दुःख और न मैं और मेरे विचारों का कोई नामोनिशान बच जाएगा.. सब कुछ कितना निरर्थक और निस्सार है!....'
" जब हमलोग चक्की के सामने आये तो बिल्लो अचानक रुक गयी, अपनी बाँह छुड़ाकर बातें करने लगी, लेकिन अपनी आवाज में, किसी बच्ची की आवाज में नहीं।
"`निकोलाइ अनास्तास्येविच,मैं जानती हूँ तुम्हें यह सब अजीब लग रहा होगा। लेकिन मैं बहुत दुखी हूँ। तुम कल्पना नहीं कर सकते मैं कितनी दुखी हूँ। इसकी कल्पना करना संभव भी नहीं है। मैं तुम्हें नहीं बता सकती, क्योंकि बताना भी असंभव है... यह कैसी जिंदगी है.. '
" बिल्लो ने अपने आप को रोका, जबड़े भींचे और आह भरी - जैसे वह जबरदस्ती रुलाई रोक रही हो। `कैसी जिंदगी है!’ उसने आतंकित होकर फिर दोहराया।
वह दक्षिणी, थोड़े युक्रेनियन लहजे में बोल रही थी, जो खास तौर पर स्त्रियों के भावाविष्ट स्वर को संगीतमय बना देती है, ‘कैसी जिंदगी है! हे ईश्वर इस सबका क्या अर्थ है?'
"जैसे अपनी जिंदगी के रहस्य को समझने के लिए उसने हैरानी में अपने कंधे उचकाए, अपना सर हिलाया और अपने हाथों को ऊपर उछाला। वह ऐसे बोल रही थी जैसे गा रही हो। उसकी चाल में एक सलीका और सौन्दर्य था जो मुझे एक मशहूर युक्रेनियन अभिनेत्री की याद दिला रहा था।
"`हे ईश्वर, ऐसा लगता है जैसे मैं किसी गड्ढे में गिर गयी हूँ।' उसने अपने हाथ मलते हुए कहा, `काश मैं एक पल के लिए भी खुश होकर जी पाती , जैसे और लोग जीते हैं! हे प्रभु, मैं इतना गिर चुकी हूँ कि अपने पति को छोड़कर एक आवारा स्त्री की तरह एक अजनबी के साथ भाग रही हूँ! इसके बाद मेरा क्या भला हो सकता है?'
" उसकी चाल और आवाज के आकर्षण में डूबा हुआ मैं यह जानकर खुश हो रहा था कि अपने पति से उसका सम्बन्ध अच्छा नहीं है। `इसके साथ प्रेम प्रसंग चले तो मजा आये!' यह विचार मेरे मन में आने लगा और फिर यह क्रूर विचार मेरे दिल-दिमाग पर छाता चला गया। पूरी यात्रा में यह विचार मेरे दिमाग से कभी भी नहीं उतरा और बार-बार मुझे लुभाता रहा।
" चक्की से लगभग डेढ़ वर्स्ट चलने के बाद हमें बायेँ मुड़कर कब्रिस्तान की बगल से शहर जाना था। मोड़ पर, कब्रिस्तान के कोने के निकट एक पत्थरों से बनी पनचक्की थी। उसकी बगल में एक झोपड़ी थी जिसमें चक्की वाला रहता था. हम चक्की और झोपड़ी की बगल से गुजरे, बायें मुड़े और कब्रिस्तान के द्वार तक गए। इस जगह बिल्लो रुक गयी और बोली:
"`मैं वापस जा रही हूँ, निकोलाई अनास्तास्येविच। तुम जाओ, मैं अकेले ही वापस चली जाऊंगी। मुझे डर नहीं लगता...'
"` अरे क्या कहती हो!' मैं जैसे डर गया, `जब हम चल पड़े हैं तो यात्रा पूरी कर ही लेते हैं...'
"`मैं एक छोटी बात पर नाराज हो गयी ... बिलकुल मामूली-सी बात थी। तुमसे बातचीत करने के बाद मुझे बीते दिनों की याद आ रही थी। मैं कई भूली-बिसरी बातों के बारे में सोचने लगी.... मैं उदास थी और और मुझे रुलाई आ रही थी, लेकिन मेरा पति उस ऑफिसर के साथ था और मुझसे ठीक से पेश नहीं आ रहा था। मैं यह बर्दाश्त नहीं कर पायी.... मैं शहर माँ के पास क्यों जाऊं? क्या मैं वहां ज्यादा खुश रहूंगी? मुझे वापस जाना चाहिए... लेकिन.... चलो, ' बिल्लो ने हंसते हुए कहा ,`क्या फर्क पड़ता है!'
" मुझे याद है कि कब्रिस्तान के द्वार पर लिखा था, `वह घडी आ गयी है जब मृतात्मा ईश्वर पुत्र की आवाज सुनेंगे।' मुझे अच्छी तरह मालूम था कि देर-सबेर वह समय आएगा जब मैं, बिल्लो, उसका पति और सफ़ेद ट्यूनिक पहना वह ऑफिसर कब्रिस्तान की चहारदीवारी के भीतर घने वृक्षों के नीचे चिर निद्रा में सो रहे होंगे। मुझे यह भी मालूम था कि मेरे साथ एक दुखी और अपमानित इंसान चल रहा है - यह सब मैं जानता था, लेकिन इसके साथ-साथ मुझपर एक दमघोंटू भय भी हावी हो रहा था कि बिल्लो वापस चली जाएगी और मैं उसे रोक नहीं पाऊंगा। उस रात का अनुभव मेरी जिंदगी का अनोखा अनुभव था जब अत्यंत महान विचार और अत्यंत गर्हित विचार मेरे दिमाग में साथ- साथ चल रहे थे. .... यह एक डरावनी बात थी।
" कब्रिस्तान के बाद ही हमें एक बग्घी मिल पायी। हम बग्घी से बोल्शाया स्ट्रीट तक गए, जहाँ बिल्लो की माँ रहती थी। वहां हमने बग्घी छोड़ी और फुटपाथ पर पैदल चलने लगे। बिल्लो पूरे समय चुप थी। मैं उसे देख रहा था और बार-बार खुद से कह रहा था, `तुम शुरू क्यों नहीं करते? यही समय है।' जिस होटल में मैं ठहरा हुआ था, उससे बीस कदम पहले बिल्लो एक लैम्प पोस्ट के पास रुक गयी और रो पड़ी।
"`निकोलाइ अनास्तास्येविच!' उसने कहा। वह रो रही थी, हंस रही थी और अपनी आर्द्र चमकती आँखों से मेरे चेहरे की और देख रही थी। `मैं तुम्हारी हमदर्दी को कभी नहीं भूलूंगी.... तुम कितने अच्छे हो! और तुम सब के सब कितने अच्छे हो! सच्चे, दयालु, सहृदय, बुद्धिमान... कितनी अच्छी बात है!.
" उसकी नजर में मैं एक सर्वगुणसंपन्न सुशिक्षित व्यक्ति था। उसके भीगे, हँसते चेहरे पर न केवल स्नेह और ख़ुशी थी, बल्कि यह कसक भी थी उसकी जिंदगी में ऐसे लोग नहीं थे और ईश्वर ने उसे किसी ऐसे इंसान की बीवी बनने का सौभाग्य नहीं दिया है। वह बुदबुदाती रही `यह कितनी अच्छी बात है!' उसके चेहरे पर बच्चों जैसी ख़ुशी, आंसू, दबी-दबी मुस्कराहट, उसके सर में लापरवाही से बंधा स्कार्फ और उससे झाँकते मुलायम बाल लैम्प की रोशनी में मुझे बचपन की उस बिल्लो की याद दिला रहे थे, जिसे मैं उन दिनों सहलाना चाहता था।
"मैं अपने आपको रोक नहीं सका और उसके बाल, कन्धों, बाँहों को सहलाने लगा....
"`बिल्लो, तुम क्या चाहती हो?' मैं फुसफुसाया,`कहो तो तुम्हारे साथ पृथ्वी के आखिरी सिरे तक चलने को तैयार हूँ। मैं तुम्हें इस गर्त से बाहर निकालूँगा और तुम्हें हर तरह की ख़ुशी दूंगा। मैं तुमसे प्यार करता हूँ..... चलो यहाँ से चलते हैं। मैं ठीक कह रहा हूँ न?'
" बिल्लो के चेहरे पर हैरानी थी। वह लैम्प के नीचे से हट गयी और मुझे फटी-फटी आँखों से देखने लगी। मैंने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया और उसके चेहरे, गर्दन और कन्धों पर चुम्बनों की बारिश कर दी। मैं कसमें खा रहा था और वादे कर रहा था। प्रेम-प्रसंगों में कसमें और वादे एक तरह से जिस्मानी जरूरत है। उनके बिना प्यार नहीं किया जा सकता। कभी-कभी आपको मालूम रहता है कि आप झूठ बोल रहे हैं और वादा करना जरूरी भी नहीं है, फिर भी आप कसमें खाते जाते हैं और वादे करते जाते हैं। बिल्लो हैरान होकर पीछे हट रही थी और मुझे बड़ी-बड़ी आँखों से घूर रही थी..
"`नहीं! ऐसा मत करो!' वह मुझे अपने हाथों से परे धकेलते हुए बुदबुदाई।
" मैंने उसे कसकर अपनी बाँहों में भर लिया। वह अचानक एक पागल की तरह रोने लगी। उसके चेहरे पर वही अर्थहीनता और भावशून्यता आ गयी, जिसे मैंने समर हाउस में माचिस की तीलियाँ जलाते हुए देखा था। बिना उसकी रजामंदी के और उसे बोलने का मौका दिए बिना मैं उसे अपने होटल के कमरे की ओर खींचने लगा... वह जैसे बेहोश थी और चल नहीं पा रही थी, लेकिन मैंने उसकी बाँह पकड़ी और एक तरह से उसे उठा कर ले आया... मुझे याद है जब हमलोग सीढ़ियों से ऊपर जा रहे थे तो लाल कलगी वाला हैट पहने हुए एक आदमी ने मुझे चकित होकर घूरा और बिल्लो की ओर अदब से सिर झुकाया...."
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