Saturday, December 22, 2018

रोशनी (भाग-१)

चेखव
(अनुवाद-राजीव रंजन सिंह)
बाहर एक कुत्ता  बदहवास सा   भूँक रहा था। इंजीनियर अनान्येव, उसका सहायक विद्यार्थी   वॉन स्तेनबर्ग और मैं यह देखने के लिए  झोपड़े से बाहर निकल आए कि वह किस पर भूँक रहा है। मैं तो मेहमान था। मैं अंदर भी रह सकता था, लेकिन सच तो यह था कि वाइन पीने के कारण  मेरा सर घूम रहा था और इसलिए  बाहर खुली  हवा में आकर  मुझे अच्छा ही  लगा।
जब हम बाहर आए तो अनान्येव ने कहा, 
"यहाँ तो कोई नहीं है। क्यों उल्लू बना रहे हो अजोरका? बुद्धू कहीं के!"
दूर-दूर तक कोई नज़र नहीं आ रहा था।
"बुद्धू" अजोरका काले रंग का एक पालतू कुत्ता था। अकारण  भूँकने के लिए झेंपते हुए वह पास आकर  दुम हिलाने लगा। इंजीनियर झुककर उसके कानों के बीच सहलाने लगा। 
"क्यों भाई? बिना किसी बात के क्यों भूँक रहे हो? " उसने ऐसे लहजे में कहा जैसे नेक तबीयत के लोग बच्चों और कुत्तों से बातें करते हैं । "क्या कोई बुरा सपना देखा है? " उसने मेरी ओर मुड़ते हुआ कहा " डॉक्टर, मैं चाहूँगा कि आप स्नायु रोग से पीड़ित  इस अनोखे जीव पर ध्यान दें। क्या आप यकीन करेंगे कि यह अकेलापन बिलकुल बर्दाश्त नहीं कर पाता है। हमेशा डरावने सपने देखता है और यदि आप इस पर चिल्लाएँ तो यह ऐसे बर्ताव करता है जैसे हिस्टीरिया का दौरा पड़ा हो। "
"हाँ, अत्यंत उच्च संवेदना वाला कुत्ता है।" विद्यार्थी बोल उठा ।
अजोरका को यह बात समझ में आ गयी  कि बात उसी के बारे में हो रही है। उसने सिर ऊपर की ओर उठाया और एक विषादपूर्ण राग अलापा, मानो कह रहा हो, "हाँ यह सच है कि मुझे कभी-कभी असहनीय दुख होता है, लेकिन, हो सके तो आपलोग इसके लिए मुझे माफ करेंगे।" 
अगस्त की रात थी। तारे थे, लेकिन अंधेरा घना था । अपनी जिंदगी में मैंने आज तक अपने आपको इतने अजीब वातावरण के बीच  नहीं पाया था और इसलिए तारों भरी यह रात असलियत की तुलना में अधिक मनहूस,  खौफनाक    और अंधेरी लग रही थी। मैं एक रेलवे लाईन पर था जो अभी बन ही रही थी। ऊंचा, अधबना बांध, बालू, मिट्टी और गिट्टी के टीले, गड्ढे, इधर उधर खड़े ठेले, मज़दूरों  के मिट्टी के झोपड़ों की सपाट छतें- इन सब बेतरतीबियों पर  अंधेरे की कालिख पुती थी और धरती इतनी रहस्यमय और आदिम लग रही थी जैसे सृष्टि  अभी शुरू भी नहीं हुई हो। मेरे सामने जो कुछ था उसमें इतनी कम व्यवस्था थी कि बड़े-बड़े विकराल गड्ढों वाली इस विरूपित धरती पर मानव आकृतियों और लंबे तार के खंभों को देखना रहस्यमय लग रहा था। दोनों इस दृश्य में अटपटे दिख रहे थे और किसी और ही दुनिया के लग रहे थे। चारों ओर सन्नाटा  था, केवल हमारे सिर के काफी ऊपर टेलिग्राफ के  तारों से घन-घन की उबाऊ आवाज आ रही थी। 
हम बांध पर चढ़ गए और उसकी ऊंचाई से नीचे देखने लगे। लगभग सौ गज की दूरी पर, जहां गड्ढे और मिट्टी के टीले रात के अंधकार में गुम हो रहे थे, एक धुंधली रोशनी टिमटिमा रही थी। उससे परे एक और रोशनी और उससे भी परे दूसरी और तीसरी रोशनी चमक रही थी और वहाँ से सौ कदम आगे दो लाल आँखें अगल-बगल चमक रही थीं - शायद किसी झोपड़े की खिड़कियाँ- और फिर उसके आगे ऐसी ही रोशनी की लंबी लड़ी, जो दूर क्षितिज तक एक दूसरे के निकटतर और धुंधली होती हुई चली गयी थी और उसके बाद बाईं ओर अर्धवृत्त बनाते हुए बहुत दूर अंधेरे में अदृश्य हो गयी थी। रोशनी स्थिर थी। उनमें और रात के सन्नाटे में और टेलिग्राफ के तारों के उबाऊ संगीत में कुछ समानता लग रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे उस बांध के नीचे कोई भारी राज़ दफन हो और इसका पता केवल इन रोशनियों, रात और टेलिग्राफ के तारों को हो। 
“हे ईश्वर , यह कितना भव्य दृश्य है!" अनान्येव ने कहा, "ऐसा विस्तार और ऐसी खूबसूरती जिससे आदमी की नजर नहीं हटती । और वाह, क्या बांध है! यह बांध नहीं है मेरे मित्र, बल्कि साक्षात मोण्ट ब्लांक  है! इसे बनाने में लाखों खर्च हुए हैं।......"
लाखों की लागत वाले बांध और रोशनी को देखकर इंजीनियर आनंदातिरेक से भावविभोर हो रहा था। वाइन की खुमारी में भावुक होकर उसने वॉन स्तेनबर्ग के कंधे पर चपत लगाई और मज़ाकिया लहजे में कहा: " मिखाइलो मिखाइलिच, किन ख्यालों में डूबे हो? अपने हाथों से बनाई दुनिया को देखना अच्छा लगता है। है न? पिछले साल यही जगह कैसी उजाड़ और बंजर थी! मानव जीवन का कहीं भी कोई निशान  नहीं था। लेकिन अब देखो: जीवन है, सभ्यता है.....और सोचो तो यह सब कितना आश्चर्यजनक है! हम तुम मिलकर रेलवे बना रहे हैं और हमारे बाद एक या दो सदियों में भले लोग कारखाने, स्कूल, अस्पताल बनाएँगे और इस तरह जीवन आगे बढ़ेगा। है न? "
विद्यार्थी अपनी जेबों  में  हाथ डाले, बिना हिले-डुले, एकटक रोशनी देख रहा था । वह इंजीनियर की बातें नहीं सुन रहा था, बल्कि कुछ सोच रहा था।  जाहिर था कि वह अभी कुछ कहने या सुनने के मूड में नहीं था। लंबी चुप्पी के बाद वह मेरी ओर मुड़ा और धीरे से बोला: " जानते हैं यह अंतहीन रोशनी  की  लड़ी कैसी  है? इसे देखकर मुझे उन लोगों की याद आ रही है जो हजारों वर्ष पहले इस धरती के निवासी थे। ऐसा लगता है जैसे वे अमलेकियों या फिलिस्तीनीयों  के कैंप हैं या ओल्ड टेस्टमेंट की किसी जाति ने वहाँ अपना शिविर लगा रखा है  और सौल या डेविड से लड़ने के लिए सुबह का इंतज़ार हो रहा है। इस भ्रम को यकीन में बदलने में बस इतनी ही कमी है कि कहीं से कोई तुरही बजने की या किसी इथिओपियाई भाषा में एक दूसरे को पुकारते  संतरियों की आवाजें  सुनाई पड़े।" और  उसके सुर में सुर मिलाते हुए हवा का एक झोंका लाइन के ऊपर से इस तरह शोर मचाता गुजरा मानो हथियारों के झनझनाने की आवाज आ रही हो। 
इसके बाद एक चुप्पी छा गई। पता नहीं इंजीनियर और विद्यार्थी क्या सोच रहे थे, लेकिन मुझे ऐसा लग रहा था जैसे सचमुच मैंने प्राचीन काल के निवासियों को देखा हो और संतरियों को एक अनजानी भाषा में बातें करते सुना हो। मेरी कल्पना द्रुत गति से शिविरों, अजीब शक्ल वाले सैनिकों, उनकी पोशाकों, उनके जिरह-बख्तर की तस्वीर बनाने लगी।
"हाँ," विचारों में डूबा हुआ विद्यार्थी बुदबुदा रहा था "इस दुनिया में कभी फिलिस्तीनी और अमलेकी रहते थे, युद्ध करते थे। उन्होंने अपनी भूमिका अदा की और अब उनका कोई चिह्न भी नहीं है। हमारा भी यही हश्र   होगा। अभी हमलोग रेलवे बना रहे हैं और यहाँ खड़े होकर दर्शन बघार रहे हैं - लेकिन दो हजार वर्ष बीतने पर न तो इस बांध का और न कड़ी मेहनत करने के बाद सोए हुए इन लोगों का धूल-गर्द में भी नमोनिशान  मिलेगा।  सच में यह विचार बहुत भयावह है।"
"तुम्हें ऐसे विचार छोड़ देने चाहिए.." इंजिनियर ने संजीदगी के साथ उसे डाँटते हुए कहा।  
"क्यों?"
"क्योंकि.... ऐसे विचार जिन्दगी के आखिर में आने चाहिए, शुरुआत में नहीं।  इन विचारों के लिए तुम्हारी उम्र अभी कच्ची है।"
"ऐसा क्यों?" विद्यार्थी ने फिर पूछा। 
"जीवन की क्षणभंगुरता, तुच्छता, उद्देश्यहीनता, मृत्यु  की अवश्यम्भाविता, कब्र के पार का अंधेरा आदि बड़े उच्च विचार हैं, लेकिन मेरे प्यारे दोस्त, ये बुढ़ापे में ही सहज और स्वाभाविक लगते हैं, क्योंकि उस उम्र में ये विचार वर्षों की आतंरिक यात्रा के बाद आते हैं। ये विचार वस्तुतः बौद्धिक निधि हैं, क्योंकि ये कष्ट और पीड़ा से अर्जित होते हैं; लेकिन ऐसे युवा मस्तिष्क के लिए जो अभी वास्तविक जिन्दगी की दहलीज पर ही है ये विचार किसी भयावह आपदा से कम नहीं हैं! सच में,  भयावह आपदा!" अनान्येव ने हाथ घुमाते हुए अपने शब्दों को दोहराया। "मेरा तो मानना है कि तुम्हारी उम्र में ऐसी बातें सोचने से बेहतर है कि कुछ भी न सोचा जाए।  मैं बिलकुल संजीदगी से कह रहा हूँ, बैरोन।  दरअसल मैं बहुत दिनों से इस बारे में तुमसे बात करना चाहता था।  जब से हमारी मुलाकात हुई है तब से ही मैं  देख रहा हूँ कि तुम्हें इस  तरह के मनहूस विचार बहुत पसंद हैं।"
"सच में? लेकिन ये मनहूस क्यों  हैं?" विद्यार्थी ने मुस्कुराते हुए पूछा। उसके चेहरे और उसके स्वर से मुझे दिख रहा था कि  उसने केवल विनम्रतावश पूछा है और इंजीनियर द्वारा छेड़ी  गयी चर्चा में उसे कोई दिलचस्पी नहीं है।  मेरी भी ऑंखें बार-बार बंद हो रही थीं।  मैं यह सोच रहा  था कि टहलने के तुरंत बाद हमलोग एक दूसरे को विदा कहेंगे और सो जाएँगे, लेकिन मेरी उम्मीद जल्दी पूरी नहीं हुई।  
जब हम झोपड़े में लौटे तो इंजीनियर ने खाली बोतलों को मेज पर से हटाया और एक बड़ी टोकरी से दो भरी बोतलें निकालीं और उनके काग निकलकर काम करने वाली मेज पर बैठ गया।  जाहिर था उसका इरादा पीने, गपियाने और काम करते रहने  का था। अपने ग्लास से छोटी-छोटी चुस्की लेते हुए वह पेंसिल से कुछ नक्शों पर नोट बना रहा था और विद्यार्थी को बता रहा था कि उसके सोचने का तरीका ठीक नहीं है। विद्यार्थी उसकी  बगल में बैठकर चुपचाप हिसाब-किताब की जांच कर रहा था।  मेरी तरह ही उसे भी बोलने या सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उनके काम में बाधा न डालने के इरादे से मैं उनकी मेज से थोड़ा हटकर एक मुड़ी टांगों वाली फोल्डिंग चारपाई पर बैठा था। मुझे ऊब हो रही थी और हर पल यह इंतजार कर रहा था कि वे मुझे सो जाने के लिए कहेंगे।  एक बजने वाला था। मेरे पास करने के लिए कुछ भी नहीं था, इसलिए अपने इन नए परिचितों को ध्यान से देखने लगा। मैं अनान्येव या विद्यार्थी से इससे पहले कभी नहीं मिला था। मैं जिस रात का वर्णन कर रहा हूँ उसी रात उनसे मेरा पहली बार परिचय हुआ था।
उस दिन शाम में काफी देर से एक घोड़े पर सवार  होकर  मैं  एक मेले से लौट रहा था। मुझे एक किसान के घर जाना था जिसके पास मैं ठहरा हुआ था।  अँधेरे में मैं एक गलत मोड़ मुड़  गया और सही रास्ता भूल बैठा।  रेलवे लाइन  का चक्कर लगाते-लगाते रात और अँधेरी हो गयी और  रेलवे लाइन के इस इलाके में  पैदल और घुड़सवार पथिकों को अँधेरे में लूटने वाले गिरोहों की  बातें सोच-सोचकर मुझे डर लगने लगा।  इसीलिए जो भी पहला झोपड़ा मिला वहां मैं ने दस्तक दी।  यहाँ अनान्येव और विद्यार्थी ने मेरा गर्मजोशी से स्वागत किया।  जैसा कि अचानक मिले अजनबियों के साथ होता है, हम लोग शीघ्र ही एक दूसरे से परिचित हो गए।  पहले  चाय पर और फिर वाइन पीते हुए एक दूसरे के और करीब आ गए और ऐसा लगने लगा जैसे हम एक दूसरे को सालों से जानते हैं।  घंटा बीतते न बीतते मैं यह जान गया कि वे कौन थे और किस्मत उन्हें शहर से दूर इस मैदानी इलाके में क्यों ले आई थी। वे भी यह जान गए कि मैं कौन था, मेरा पेशा क्या था और मेरी सोच क्या थी।
इंजीनियर निकोलाइ अनास्तास्येविच अनान्येव  चौड़े कन्धों वाला भारी-भरकम डील-डौल वाला आदमी था। उसे देखकर ऐसा लगता था जैसे वह ओथेलो की तरह  "उम्र की ढलान" की शुरुआत पर  है और दिनोंदिन स्थूलकाय  होता जा रहा है।  वह ऐसी अवस्था में था जब शादी-ब्याह तय करने वाली बूढी औरतें कहती   हैं कि  "शादी के लिए आदमी पकी उम्र का है" यानी वह न तो बच्चा है, न बूढा।  वह अच्छे खाने, अच्छी शराब और अतीत का गुणगान करने का शौक़ीन है, चलते समय थोड़ा  हाँफता है और नींद में जोरों से खर्राटे लेता है। अपने आसपास के लोगों के साथ उसके  व्यवहार में  एक ऐसी शांत विनोदप्रियता देखी जा सकती है जो अक्सर ऐसे भले लोगों का स्वभाव बन जाती है, जो  नौकरी में तरक्की पाकर सीनियर हो जाते हैं और जिनके बदन पर दिन-ब-दिन चर्बी चढ़ती चली जाती है।
उसके बाल और दाढ़ी अभी सफ़ेद नहीं हुए थे, लेकिन नवयुवकों से बात करते समय अचेतन रूप से उसमें एक बड़प्पन का भाव आ जाता था  और वह उन्हें " मेरे प्रिय ... " कह कर संबोधित करता था। वह सोचता था कि उनके सोचने के ढंग पर हास-परिहास  के साथ उपदेश देने का उसे हक है। उसकी चालढाल और उसकी आवाज शांत, सहज और आत्म-विश्वास से भरी थी, जिनसे यह जाहिर हो रहा था कि जैसे उसे अच्छी तरह मालूम है कि उसके पांव सही दिशा में हैं, उसके पास निश्चित काम है, सुरक्षित आजीविका है, भविष्य के प्रति पक्का दृष्टिकोण है ........उसके धूप में झुलसे, मोटी नाक वाले चेहरे और चौड़ी  गर्दन को देखकर ऐसा लगता था जैसे वह कह रहा हो :
" मैं खूब खाया-पीया, तंदुरुस्त  और अपने आप  से संतुष्ट हूँ और एक समय आएगा जब तुम जवान लोग भी खूब खाए-पीये, तंदुरुस्त और अपने आप से संतुष्ट हो जाओगे..." 
उसने एक सूती कमीज पहन रखी थी, जिसका कालर तिरछा  था और लम्बे सूती पतलून के पांयचे उसके  ऊंचे  बूटों के अन्दर ठुँसे हुए थे।  कुछ छोटी-छोटी बातों से, मसलन उसके रंगीन ऊनी कमरबंद,  कढ़ाई किए हुए कालर   और उसकी कुहनी पर लगी हुई पट्टी से मैं यह अंदाजा  लगा सकता था कि वह शादीशुदा  है और संभवतः उसकी बीवी उसे बहुत प्यार करती है। 
बेरोन वॉन स्तेनबर्ग  ट्रांसपोर्ट  इंस्टिट्यूट  का विद्यार्थी था। वह    तेईस- चौबीस   साल का युवा था।  केवल    उसके  सफेद   बाल,   हल्की दाढ़ी और खुरदरे नाकनक्श से झलकते  रूखेपन में ही   बाल्टिक  प्रान्तों के बैरोनों के खानदान के कुछ चिह्न रह गए थे।   बाकी उसकी सारी बातें – उसका नाम, मिखाइल मिखाइलोविच, उसका धर्म, उसके विचार, उसकी मुख-मुद्रा  सब कुछ पूरी तरह रूसी थे। अनान्येव की तरह ही उसने सूती कमीज और ऊंचे बूट पहन रखे  थे। अपने सुडौल कन्धों, बढे हुए बाल और  धूपमें तपे चेहरे के कारण न तो वह विद्यार्थी   लग रहा था, न  ही बैरोन, बल्कि एक साधारण रूसी मजदूर   लग रहा था।  स्वभाव से वह चुप्पा था, बिना किसी खास रुचि के बेमन  से पी रहा था, यंत्रवत खातों की जाँच कर रहा था और पूरे समय ऐसा लग रहा था जैसे कुछ और ही सोच रहा हो। उसकी चाल-ढाल और स्वर शांत और सहज थे पर उसकी सहजता इंजीनियर की सहजता से अलग थी। उसके धूप में तपे, हल्के व्यंग्यात्मक  स्वप्निल चहरे और भौहों के नीचे से देखती आँखों  और उसके पूरे व्यक्तित्व से आध्यात्मिक जड़ता और मानसिक काहिली झलकती थी। वह ऐसे देख रहा था जैसे उसे इससे कोई  फर्क  नहीं पड़ता कि उसके सामने रोशनी जल रही है या नहीं, उसका वाइन अच्छा है या बेस्वाद  या जिन खातों की वह जाँच कर रहा है  वे सही हैं  या गलत .... उसके समझदार और शांत चेहरे पर जैसे लिखा हो: "मुझे किसी निश्चित काम में, सुरक्षित आजीविका में और भविष्य के प्रति किसी  खास  दृष्टिकोण   में कोई महत्त्व की बात नहीं दिखाई देती। ये सब निरर्थक बातें हैं।  पहले  मैं पीटर्सबर्ग में था, अभी मैं इस झोपड़े में बैठा हुआ हूँ, पतझड़ के मौसम में मैं वापस पीटर्सबर्ग चला जाऊँगा और फिर वसंत ऋतु में यहाँ वापस आ जाऊँगा... इन  सब का क्या अर्थ है मैं नहीं जानता और कोई भी नहीं जानता... .. और इसलिए इनके  बारे में बातचीत करने का कोई मतलब नहीं है।"
वह बिना किसी दिलचस्पी के इंजीनियर की बातें सुन रहा था जैसे ऊंची कक्षाओं के छात्र-सैनिक उदासीन हमदर्दी के साथ किसी बूढ़े फौजी के पुराने अभियानों की कहानियाँ सुनते हैं।  ऐसा लग रहा था जैसे इंजीनियर की बातों में उसको कोई भी नई बात नहीं मिल रही थी और जैसे  यदि उसे बातचीत करने में अरुचि नहीं होती तो वह स्वयं कुछ नई और चतुराईपूर्ण बातें बताता। 
 इस बीच अनान्येव बेहद जोश में आ गया था।  उसने अपना सहानुभूतिपूर्ण मजाकिया लहजा छोड़ दिया था और और ऐसी संजीदगी और जोशोखरोश के साथ बातें कर रहा था जो उसके चेहरे की शांत भाव-भंगिमा से बेमेल लग रहा था।  जाहिर था कि वह अमूर्त समस्याओं के प्रति उदासीन नहीं था,  बल्कि उन्हें पसंद करता था, लेकिन वह यह नहीं जानता था कि इन समस्याओं की चर्चा कैसे की जाए।  इस वजह से  उसकी बातें इतनी बोझिल हो जा रही थीं कि कुछ  अंतराल के बाद ही मैं उन्हें समझ पा रहा था। 
"मैं इस तरह के विचारों से दिली नफरत करता हूँ।" उसने कहा, "जब मैं छोटा था तब मैं भी इन्हीं विचारों का गुलाम था। आज भी मैं इनसे पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ हूँ।  मैं तुम्हें बताना चाहूँगा कि शायद अपनी मूर्खता के कारण और शायद इसलिए कि ये विचार मेरे स्वाभाविक विचार नहीं थे- इनके कारण मुझे हानि ही उठानी पड़ी। इसे समझना आसान है। जीवन की उद्देश्यहीनता, निरर्थकता और दृश्य जगत की क्षणभंगुरता के विचार,  जिसे सोलोमोन ने भी "जीवन की निस्सारता" कहा है, आज भी  चिंतन की दुनिया के सर्वोच्च और अंतिम चरण के विचार माने जाते हैं। जब कोई चिन्तक उस स्तर तक पहुंचता है, तो उसका चिंतन रुक जाता है, क्योंकि उसके  परे जाने का कोई मार्ग नहीं है।  सामान्य मस्तिष्क की गतिविधि  यहीं पर पूर्ण हो जाती है और यह स्वाभाविक है और सृष्टि की व्यवस्था के अनुरूप है।  हमारा दुर्भाग्य यह है कि हम सोचने की शुरुआत वहां से करते हैं जहाँ पर  सामान्य लोग सोचना समाप्त करते हैं।  जैसे ही हमारा मस्तिष्क स्वतंत्र  रूप से  काम करने लगता है, हम आनन-फानन में सीधे सर्वोच्च शिखर पर  पहुँच  जाते  हैं और उसके नीचे के सोपान के बारे में कुछ भी जानना  नहीं  चाहते।"
"इसमें क्या बुराई है?" विद्यार्थी ने कहा।  
"लेकिन तुम्हें समझना चाहिए कि यह एक अस्वाभाविक बात  है।" अनान्येव लगभग गुस्से में घूरते हुए चिल्लाया।  "यदि हम निचले पायदानों से गुजरे बगैर सीधे चोटी पर पहुँच जाएं तो इस लम्बी सीढ़ी का, यानी पूरी जिंदगी का- उसके विविध रंगों, ध्वनियों और विचारों का हमारे लिए कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।  तुम्हारी उम्र में ऐसे विचार घातक  और बेमानी हैं।  यह तुम अपने स्वतंत्र बौद्धिक जीवन में हर कदम पर देख सकते हो।  फ़र्ज़ करो कि तुम अभी इसी क्षण डार्विन या शेक्सपियर को पढने के लिए बैठते हो। अभी  एक भी पृष्ठ समाप्त नहीं होगा कि तुम्हारे विचारों का जहरीला असर दिखने लगेगा; तुम्हें अपनी लम्बी जिंदगी, शेक्सपियर  और डार्विन निरर्थक और बेमानी लगेंगे,  क्योंकि तुम जानते हो तुम मर जाओगे, कि शेक्सपियर  और डार्विन भी मर चुके हैं, कि उनके विचारों ने उन्हें मौत से नहीं बचाया और न यह धरती बचेगी, न तुम, और यदि इस तरह से जीवन का कोई अर्थ नहीं बचता तो सम्पूर्ण विज्ञान, काव्य  और उच्च विचार केवल मनबहलाव के उपाय हैं, केवल वयस्क लोगों के खेल-खिलौने; और इस तरह तुम दूसरे पृष्ठ पर ही पढना छोड़ दोगे।  अब, मान लो कि तुम्हें एक समझदार आदमी मानकर लोग तुमसे कुछ जानना चाहते हैं, मिसाल के तौर पर, वे युद्ध के बारे में तुम्हारे विचार जानना चाहते हैं: क्या युद्ध होना चाहिए? क्या यह नैतिक दृष्टि से उचित है? इस विकट प्रश्न के उत्तर में तुम केवल कंधे उचका दोगे  और कोई घिसापिटा जवाब दे दोगे, क्योंकि तुम्हारा जो सोचने का ढंग है उससे तुम्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि हजारों लोगों की  स्वाभाविक मृत्यु होती है या वे  हिंसा के शिकार होते हैं। दोनों स्थितियों में परिणाम तो एक ही है- -- चिता की राख और विस्मरण।  हम दोनों रेलवे लाइन बना  रहे हैं। कोई पूछ सकता है कि आख़िर हम क्यों इतनी परेशानी मोल लें, क्यों  अपने दिमाग पर जोर डालें,  क्यों नयी चीजों  की खोज करें, क्यों पुरानी चीजें छोड़ें, क्यों इसकी चिंता करें कि मजदूर चोरी करते हैं कि नहीं करते हैं, जबकि हम जानते हैं कि आज से दो हजार सालों में इस रेलवे लाइन का नामोनिशान मिट जाएगा? और इसी तरह की बातें...तुम्हें यह बात माननी चाहिए कि इस तरह की मनहूस सोच के साथ किसी भी तरह की प्रगति संभव नहीं है और न तो विज्ञान, कला या चिंतन ही संभव है।  हम समझते हैं कि हम दूसरों की अपेक्षा, शेक्सपियर  की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान हैं,  लेकिन सच में देखा जाए तो एक विचारक के रूप में हमारी उपलब्धि कुछ भी नहीं है, क्योंकि हम विचार के निचले पायदानों पर उतरना ही नहीं चाहते और जहाँ हम हैं उससे उच्चतर स्थिति है ही नहीं।  परिणाम यह होता है कि इस बिंदु पर आकर हमारा चिंतन पूरी तरह थम जाता है और न हम ऊपर जा पाते हैं न नीचे.... मैं इन विचारों से लगभग छः साल परेशान रहा और मैं ईश्वर की सौगंध लेकर कह सकता हूँ कि इस पूरे समय में मैंने एक भी अच्छी किताब नहीं पढ़ी, न तो अपने ज्ञान में और न अपने नैतिक चरित्र में कोई नई ऊँचाई पाई। क्या यह असफलता नहीं है? और इस तरह हम  न केवल अपने आप को नुक़सान पहुचाते हैं, बल्कि दूसरों की जिंदगी में भी जहर घोलते हैं।  इस निराशावाद के साथ तो हमें जीवन से संन्यास लेकर किसी गुफा की शरण लेनी चाहिए या जितनी जल्दी हो सके इस दुनिया से कूच कर जाना चाहिए, लेकिन हम ऐसा नहीं करते, बल्कि सार्वभौमिक नियम को मानते हुए हम जीते हैं, महसूस करते हैं, औरतों से प्यार करते हैं, बच्चों का पालन-पोषण करते हैं  और सड़कें बनाते हैं।"
"हमारे विचारों के कारण किसी को भी गर्मी या सर्दी नहीं लगती।"  विद्यार्थी ने बेरुखी से कहा। 
"नहीं, मैं इससे सहमत नहीं हो सकता।  तुमने अभी तक जिंदगी देखी नहीं है।  जब थोड़ी और जिंदगी जी लोगे, तब मेरे दोस्त, तुम्हें यह बात समझ में आएगी।  हमारे विचार उतने निर्दोष नहीं हैं, जितना तुम समझते हो।  व्यावहारिक जिंदगी में, तरह-तरह के लोगों के साथ टकराते समय ये विचार मूर्खता और भयावह स्थिति की ओर ले जाते हैं।  मैं कई बार ऐसे अनुभवों से गुजरा हूँ। मैं नहीं चाहता कि मेरे सबसे बुरे दुश्मन भी ऐसे अनुभवों से गुजरें।"
" मसलन?" मैंने पूछा.
"मसलन? " इंजीनियर ने दोहराया।  थोड़ी देर सोचने के बाद उसने मुस्कुराकर कहा, "मसलन, केवल एक घटना लें।  दरअसल यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि पूरा का पूरा उपन्यास है- कथानक और चरमोत्कर्ष सहित।  एक बेहतरीन सीख! सच में कैसी सीख!"
उसने हमारे लिए और अपने लिए और वाइन ढाली,  उसे पिया और अपनी चौड़ी  हथेली से अपनी चौड़ी छाती को थपथपाते हुए अपनी बात जारी रखी।  वह विद्यार्थी  के बजाय मुझसे बातें कर रहा था। 

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