अनान्येव चुप हो गया। वह शर्मिंदा था। बिना कुछ बोले वह मेज के पास इधर से उधर चहलकदमी कर रहा था, झुंझला कर अपने सिर के पिछले हिस्से को खुजला रहा था और बार-बार अपने कन्धों को हिला रहा था। वह ज्यों-ज्यों याद कर रहा था, उसकी शर्म और पीड़ा बढ़ती जा रही थी। वह अपने आप से जूझ रहा था.....
"` कितनी ओछी हरकत है!' उसने वाइन का एक ग्लास खाली किया और अपने सिर को झटकते हुए बोला, " मैंने सुना है, जब डॉक्टरी की पढाई में छात्रों को स्त्री-रोग पर पहला पाठ पढाया जाता है तो उन्हें सिखाया जाता है कि किसी बीमार स्त्री के बदन को हाथ लगाने के पहले और उसके वस्त्र हटाने से पहले उन्हें यह बात अच्छी तरह से अपने ज़ेहन में रखनी चाहिए कि उनमें से हर एक के घर में माँ, बहन या वाग्दत्ता है. .......... यह सलाह न केवल डॉक्टरों के लिए, बल्कि उन सब के लिए जरूरी है जो किसी न किसी रूप में जिंदगी में स्त्रियों के संपर्क में आते हैं। आज मेरी बीवी है, मेरी बेटी है, इसलिए आज मैं इस सलाह के महत्त्व को कितनी अच्छी तरह समझता हूँ! .. खैर, आगे क्या हुआ, सुनिए..... जब बिल्लो मेरी मिस्ट्रेस बन गयी, तब उसका नज़रिया मेरे नज़रिये से बिलकुल अलग हो गया। सबसे बड़ी बात यह थी कि वह एक गहरे प्रेम में डूब गयी। जो मेरे लिए एक साधारण, क्षणिक प्रसंग था, उसके लिए जिंदगी में उथल-पुथल मचानेवाली बहुत बड़ी घटना थी। मुझे याद है, मुझे लगा जैसे वह दीवानी हो गयी है। अपनी जिंदगी में पहली बार वह खुश थी। अपनी उम्र से वह पांच साल छोटी लग रही थी। उसके चहरे पर भावातिरेक और सम्मोहन देखा जा सकता था। आनंद विभोर होकर कभी वह हँसती और कभी रोती और लगातार बोलते हुए भविष्य के सपने बुनती कि कैसे हमलोग कल कॉकसस के लिए रवाना होंगे, कैसे जाड़े में पीटर्सबर्ग जाएंगे और फिर हमारी जिंदगी कैसी होगी....
"` और,मेरे पति के बारे चिंता मत करो!' उसने मुझे दिलासा देते हुए कहा, ‘उसे तो मुझे तलाक़ देना ही पड़ेगा। पूरा शहर जानता है कि उसका कोस्तोविच परिवार की बड़ी लड़की से सम्बन्ध है। मैं तलाक लेकर ही रहूंगी... और तब हम दोनों शादी करेंगे।'
" जब स्त्रियों को प्यार होता है तो बिल्लियों की तरह वे जल्दी ही नए वातावरण और नए लोगों के बीच रच-बस जाती हैं। मेरे कमरे में केवल डेढ़ घंटा बिताने के बाद बिल्लो इस कमरे को अपना घर समझ रही थी और मेरी चीजों को अपनी चीजें समझ रही थी। उसने सूटकेस में मेरा सामान सजाया, मुझे डाँटा कि मैंने अपना नया क़ीमती कोट खूँटी पर क्यों नहीं टाँगा और कुर्सी पर बेतरतीब क्यों फेंक दिया, वगैरह,वगैरह...
" उसे देखकर, उसकी बातें सुनकर मुझे ऊब और झुंझलाहट हो रही थी। मैं यह सोचकर थोड़ा हैरान था कि एक सुसभ्य, सुसंस्कृत और सहिष्णु स्त्री इतनी आसानी से, तीन चार घंटों के भीतर ही जिंदगी में पहले आगंतुक की मिस्ट्रेस बन गयी। मैं ख़ुद एक इज़्ज़तदार आदमी हूँ, इसलिए मुझे यह बात पसंद नहीं थी। दूसरी परेशान करने वाली बात यह थी कि बिल्लो जैसी स्त्रियाँ छिछली होती हैं और कुछ भी गंभीरता से नहीं लेतीं; उन्हें जिंदगी से इतना प्यार रहता है कि वे किसी पुरुष के प्रति प्रेम जैसी वस्तुतः मामूली-सी बात को इतना बढ़ा-चढ़ा कर देखती हैं कि यह उनके जीवन की ख़ुशी, वेदना और उथल-पुथल मचाने वाली बात बन जाती है…….अब चूँकि मैं परितृप्त था, मुझे अपने आप से झुंझलाहट हो रही थी कि मैं क्यों एक ऐसी स्त्री के साथ उलझ गया, जिसे मुझे आखिरकार धोखा ही देना पड़ेगा... और ध्यान दें, अपने ग़लत आचरण के बावजूद मुझे झूठ बोलना पसंद नहीं था।
"मुझे याद है बिल्लो मेरे पैरों के पास बैठी हुई थी, मेरे घुटनों के ऊपर सिर रखकर मुझे चमकती आँखों से देख रही थी।
"`कोल्या, क्या तुम मुझे प्यार करते हो? बहुत? बहुत-बहुत?'
और वह खुश होकर हँस पड़ी...... मुझे इसमें केवल कोरी भावुकता, मनहूसियत और मूर्खता दिख रही थी। मेरी मनोदशा ऐसी थी जिसमें मैं हर बात में `विचारों की गहराई ' खोज रहा था।
"`बिल्लो, तुम्हें घर जाना चाहिए।' मैंने कहा, `नहीं तो तुम्हारे घरवाले पूरे शहर में तुम्हारी खोज करने लगेंगे। यदि माँ के घर पहुँचने में सुबह हो गयी तो तुम्हारे लिए सफ़ाई देना मुश्किल होगा..'
" बिल्लो राजी हो गयी। विदा होते समय हमने तय किया कि हम दोपहर में शहर के पार्क में मिलेंगे और दूसरे दिन प्यातिगोर्स्क साथ-साथ रवाना हो जाएँगे। मैं उसे छोड़ने के लिए बाहर तक गया। मुझे याद है किस तरह रास्ते भर मैं उसे सच्चे प्यार के साथ सहलाता-दुलराता रहा। एक पल ऐसा भी आया जब मुझे यह देखकर दुख होने लगा कि वह मुझ पर कितना भरोसा रखती है। मैं लगभग अर्धनिश्चय की स्थिति में सोचने लगा कि उसे व्यतिगोर्स्क लेकर चलना चाहिए, लेकिन जब मुझे याद आया कि मेरे सूटकेस में मेरे पास केवल छः सौ रूबल हैं और आज के बजाय जाड़े के दिनों में उससे पीछा छुड़ाना और कठिन होगा, मैंने अपनी दया पर फ़ौरन क़ाबू पा लिया।
"हम उस मकान तक आए जहाँ बिल्लो की माँ रहती थी। मैंने घंटी बजाई । दरवाज़े के पीछे किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।
बिल्लो ने अचानक गंभीर होकर ऊपर आसमान की ओर देखा और जल्दी से मेरे ऊपर कई बार सलीब का निशान बनाया मानो मैं कोई बच्चा हूँ और मेरा हाथ पकड़ कर उसे अपने होंठों पर दबाया। `कल मिलते हैं।' उसने कहा और अन्दर चली गयी।
"मैं सड़क पार कर सामने वाले फुटपाथ पर आ गया और वहां से उस मकान को देखने लगा। खिडकियों में पहले अँधेरा था, फिर एक खिड़की पर नयी जली मोमबत्ती की मद्धिम नीली रोशनी दिखाई पड़ी। रोशनी तेज हुई; मैंने उस रोशनी के साथ कमरों में चलती -फिरती परछाइयों को देखा।
" `उसका इन्तजार नहीं हो रहा था।' मैंने सोचा।
अपने होटल के कमरे में लौटने पर मैंने कपड़े बदले, थोड़ी सौटर्न पी, कुछ ताज़ा केवियर खाए, जिन्हें मैंने उस दिन दोपहर में बाजार से खरीदा था, आराम से समय बिताते हुए बिस्तर पर गया और एक सैलानी की गहरी शांत निद्रा में डूब गया।
" सुबह सरदर्द और एक असहज अहसास के साथ जगा। कोई बात मुझे परेशान कर रही थी।
"`क्या बात है?' अपनी असहजता का कारण ढूँढ़ते हुए मैंने अपने आप से पूछा, ` मैं किस बात के लिए इस कदर चिंतित हूँ?'
" मैं यह समझ गया कि मेरी बेचैनी के पीछे यह डर था कि बिल्लो आज कभी भी आ सकती है और मुझे यहाँ से निकलने से रोक सकती है। मुझे उससे झूठ बोलना पड़ेगा और न जाने कितने बहाने बनाने होंगे।
मैं जल्दी से तैयार हुआ, अपना सामान पैक किया और होटल छोड़ दिया। मैंने पोर्टर को कहा कि वह मेरा सामान शाम सात बजे तक रेलवे स्टेशन पहुंचा दे। मैंने पूरा दिन एक पुराने डॉक्टर मित्र के साथ बिताया और शाम में शहर छोड़ दिया। जैसा कि आप देख सकते है, मेरे उच्च विचार मुझे नीच और विश्वासघाती पलायन करने से नहीं रोक सके...
" पूरे समय, जब मैं अपने दोस्त के साथ था और स्टेशन जा रहा था, मुझे एक बेचैनी घेरे रही। मैं बिल्लो के सामने पड़ने और उसके बाद के दृश्य की कल्पना से आतंकित था।
स्टेशन पहुँचने के बाद मैं जानबूझकर क्लोकरूम में तब तक बैठा रहा जब तक कि दूसरी घंटी नहीं बज गयी। अपने डिब्बे की ओर जाते वक्त ऐसा लग रहा था जैसे सर से पांव तक मैं चोरी के माल से अँटा हुआ हूँ। अत्यंत अधीरता और आतंक के साए में मैं तीसरी घंटी का इंतज़ार करता रहा।
"आखिरकार तीसरी घंटी के साथ मुझे मुक्ति मिली। हम कैदखाने, बैरक की बग़ल से गुजरते हुए खुले मैदान में आ गए; लेकिन अचरज की बात यह थी कि मेरी बेचैनी बरक़रार थी। अभी भी मैं एक ऐसे चोर के सामान महसूस कर रहा था, जो किसी भी तरह भाग जाने के लिए आतुर है। यह कैसा अजीब अहसास था? अपने आप को शांत करने और अपना ध्यान कहीं और लगाने के लिए मैं खिड़की से बाहर देखने लगा। ट्रेन समुद्र के किनारे-किनारे चल रही थी। समुद्र शांत था और उसमें से जामुनी आसमान की शांत और प्रसन्न छवि झाँक रही थी, जिसमें सूर्यास्त की मद्धम सुनहली लालिमा वाले धब्बे भी जहाँ-तहाँ दिख रहे थे। मछुआरों की काली नौकाएँ और बेड़े बिखरे हुए थे। शहर एक साफ़ और सुन्दर खिलौने की तरह ऊंची चट्टानों पर खड़ा था और सांझ का धुंधलका उसपर धीरे-धीरे छा रहा था। शहर के गिरजाघरों की सुनहली गुम्बदें, खिड़कियाँ और हरियाली- सब डूबते सूरज की रोशनी में नहा रहे थे, जैसे उनपर खौलता-पिघलता सोना तैर रहा हो... समुद्र की नम हवा के झोंकों में खेतों से उठनेवाली सुगंध भी मिल रही थी।
"ट्रेन तेज चल रही थी। मैं यात्रियों और गार्ड की हँसी सुन सकता था। हर तरफ ख़ुशी और चैन था, लेकिन मेरी अबूझ बेचैनी बढ़ती और बढ़ती ही चली जा रही थी...... मैंने शहर पर छाते हुए हलके धुंधलके को देखा और मुझे ऐसा लगा कि उस धुंधलके में, गिरजाघर और मकानों के आसपास , एक स्त्री अपने अर्थहीन , मूर्खतापूर्ण चेहरे के साथ मेरी खोज में इधर-उधर दौड़ रही है और एक छोटी बच्ची की आवाज में, गाते हुए स्वर में, किसी युक्रेनियन अभिनेत्री की तरह,`हे प्रभु! हे ईश्वर!' कहकर कराह रही है। मुझे उसका गंभीर चेहरा और बड़ी-बड़ी चिंताग्रस्त आँखें याद आयीं, जब उसने कल मेरे ऊपर सलीब का निशान बनाया था, मानो मैं उसके परिवार का सदस्य हूँ और अनायास मेरा ध्यान अपने हाथ की ओर गया, जिसे उसने कल अपने होंठों पर दबाया था।
"`क्या मुझे प्यार हो गया है?' मैंने अपने हाथ को सहलाते हुए सोचा।
" रात चढ़ने के बाद, जब सभी यात्री सो गए और मैं अपने अंतःकरण के साथ अकेला रह गया, तब जाकर मुझे वह बात समझ में आई जो अबतक मेरे लिए अबूझ थी। गाड़ी के डिब्बे के भीतर के अन्धकार में मेरी नज़रों के सामने बिल्लो की मूरत खड़ी थी – वह मूरत मेरे सामने से हट नहीं रही थी और अब मुझे यह बात साफ साफ समझ में आई कि मैंने हत्या जैसा जघन्य अपराध किया है। मेरा अन्तःकरण मुझे धिक्कार रहा था। इस असह्य अहसास को दबाने के लिए मैंने अपने आपको दिलासा देने की कोशिश की कि सब कुछ अर्थहीन और उद्देश्यहीन है, कि बिल्लो और मैं एक दिन मर जाएँगे और सड़ जाएँगे, कि मौत के सामने उसका दुःख कुछ भी नहीं है आदि,आदि.... कि आदमी की कोई स्वतंत्र इच्छाशक्ति नहीं है और इसलिए मैं दोषी नहीं हूँ। लेकिन इन सारी दलीलों से मेरी चिढ़ बढ़ती ही जा रही थी। जल्दी ही दूसरे विचारों के बीच ये दलीलें खो गयीं। बिल्लो ने जिस हाथ को चूमा था उसमें तनाव जैसा लग रहा था...
मैं लेटता, फिर उठकर बैठ जाता, स्टेशनों पर वोदका पीता, जबर्दस्ती सैंडविच खाता और अपने आप को सांत्वना देता कि जिंदगी अर्थहीन है - लेकिन किसी भी बात से मुझे चैन नहीं मिल रहा था। मेरे मस्तिष्क के अन्दर कुछ अजीब व्यापार चल रहा था, जिसे आप चाहें तो हास्यास्पद कह सकते हैं। मेरे भीतर भांति-भांति के परस्पर विरोधी विचारों का एक पहाड़ बनता जा रहा था, जो आपस में गड्ड- मड्ड हो रहे थे और एक दूसरे को काट रहे थे, लेकिन मैं, उन विचारों का विचारक, जिसके पांव हमेशा जमीन पर रहे हैं, उन विचारों को न तो समझ पा रहा था और न आवश्यक और अनावश्यक विचारों के बीच अपना रास्ता खोज पा रहा था। जाहिर था कि मुझ विचारक ने विचार करने की कला ही नहीं सीखी थी। मैं अपने दिमाग को ठीक करने में उसी तरह नाकाम था जैसे मैं किसी घड़ी की मरम्मत नहीं कर सकता। जिंदगी में पहली बार मैं किसी विषय पर गंभीरता से, ध्यानपूर्वक सोचने का प्रयास कर रहा था, लेकिन यह सब इतना अजीब था कि मैंने सोचा,`मैं पागल हो रहा हूँ।’ पागलपन का विचार अक्सर ऐसे लोगों को आता है जिनका दिमाग केवल संकट की घड़ी में काम करता है।
" मैं एक रात और एक दिन और उसके बाद फिर दूसरी रात इसी तरह कष्ट में रहा। मुझे पूरा यकीन हो गया कि इस स्थिति से उबरने में मेरी सोच कोई मदद नहीं कर रही है। आख़िरकार मुझे भान हुआ कि मैं किस किस्म का जीव हूँ। मैं यह समझ गया कि मेरे विचारों का मूल्य ताम्बे के छदाम के बराबर भी नहीं है। सच बात तो यह थी कि बिल्लो से मिलने के पहले मैंने सोचना शुरू भी नहीं किया था और गंभीर चिंतन का क्या अर्थ है, इसका मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था। अब इस घटना के बाद मुझे अहसास हुआ कि मेरा न तो कोई विश्वास था, न कोई निश्चित नैतिक मानदंड। मेरे पास न ह्रदय था न विवेक। केवल एक तकनीकी विषय का ज्ञान, इधर-उधर से मिले कुछ अधकचरे विचार, बेकार के संस्मरण, दूसरों के चिंतन- -यही मेरी मानसिक और नैतिक सम्पदा थी। मेरी मानसिक प्रक्रिया उतनी ही सरल और प्राथमिक स्तर की थी, जितनी एक याकुत (साइबेरिया की जन-जाति) की होती है। यदि मैं झूठ बोलना नहीं पसंद करता था, चोरी नहीं करता था, किसी की हत्या नहीं की थी और आमतौर पर कोई भारी गलती नहीं की थी, तो वह अपने विश्वास के कारण नहीं- क्योंकि मेरे कोई विश्वास थे भी नहीं, बल्कि इसलिए कि नर्सरी के दौरान सुनी कहानियाँ और पारम्परिक नैतिकता मेरे खून और मज्जा के अंग बनकर, अनजाने ही, मेरी जिंदगी को दिशा दे रही थीं, हालाँकि मैं उन्हें भी मूर्खतापूर्ण समझता था....
"मैं समझ गया कि मैं न तो कोई विचारक हूँ, न कोई दार्शनिक, बल्कि एक पाखण्डी हूँ। ईश्वर ने मुझे एक स्वस्थ और तेज रूसी दिमाग दिया है जिसमें प्रतिभा प्रस्फुटित हो रही है। आप कल्पना कर सकते हैं कि अपनी जिंदगी के छब्बीसवें वर्ष में यह दिमाग किस प्रकार का है- बिलकुल कोरा,स्वच्छंद और किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से मुक्त, बस इंजीनियरिंग के थोड़े-बहुत ज्ञान से प्रकम्पित। यह दिमाग युवा है और इसे काम चाहिए। वह काम की तलाश कर रहा है और अचानक उस दिमाग में संयोगवश बाहर से एक सुन्दर विचार दस्तक देता है- जीवन की उद्देश्यहीनता और कब्र के अँधेरे का विचार। वह दिमाग उस विचार को आतुरता से आत्मसात करता है, अपनी पूरी ऊर्जा उसके लिए समर्पित करता है, उसके हर रूप से खेलता रह्ता है, जैसे बिल्ली चूहे के साथ खेलती है। इस दिमाग के पास न तो शिक्षा है, न कोई व्यवस्था है, लेकिन इससे उसे अबतक कोई हानि नहीं पंहुची है। अपनी कुदरती शक्तियों के सहारे, केवल अपने प्रयत्न से वह इस सर्वव्यापी विचार से रू-ब-रू होता है और एक महीने के भीतर ही इस दिमाग का स्वामी उसी पुराने आलू से सैकड़ों स्वादिष्ट व्यंजन बना रहा होता है और अपने आपको विचारक समझने लगता है.....
" हमारी पीढ़ी ने इस पाखण्ड को, इस गंभीर चिंतन के खेल को विज्ञान, साहित्य, राजनीति और उन सभी क्षेत्रों में प्रवेश कराया है जहाँ आसानी से ऐसा किया जा सकता था। लेकिन इस चतुराई ने एक ठंडापन, एकरसता और एकांगी नजरिये को जन्म दिया है। मुझे तो ऐसा लगता है कि इस नजरिए के कारण गंभीर विचारों के प्रति जन समुदाय में एक अजीब तरह का रुख देखा जा सकता है, जैसा पहले कभी नहीं था।
" उस दुर्घटना के कारण मैं अपनी असामान्यता और चौतरफा अज्ञान समझ पाया। जब मेरे अंतःकरण ने मुझे वापस एन. जाने पर मजबूर किया और जब मैंने बिना किसी हिचकिचाहट के बिल्लो के सामने पश्चात्ताप किया, एक छोटे बच्चे की तरह माफ़ी मांगी और उसके साथ रोया....तब, ऐसा लगता है उसके बाद ही, मैंने सामान्य रीति से सोचना शुरू किया...."
अनान्येव बिल्लो के साथ अपनी आखिरी मुलाकात का संक्षिप्त वर्णन कर चुप हो गया।
"अच्छा...." इंजीनियर की कहानी समाप्त होने पर विद्यार्थी ने कहा, “तो इस धरती पर ऐसी घटनाएँ भी घटती हैं!"
पहले की तरह ही उसके चेहरे से मानसिक जड़ता झलक रही थी। जाहिर था, अनान्येव की कहानी का उसपर कोई असर नहीं पड़ा। कुछ पल के विश्राम के बाद जब इंजीनियर ने फिर उसी विचार को दोहराया जिसे वह पहले कह चुका था, विद्यार्थी ने चिढ़कर अपनी भौहें सिकोड़ी, मेज पर से उठकर अपने बिस्तर के पास गया, बिस्तर ठीक किया और कपड़े बदलने लगा।
"तुम्हें ऐसा लगता है जैसे तुम सचमुच अपनी बात से किसी को क़ायल करने में कामयाब हो गए हो। " उसने चिढ़ते हुए कहा।
" मैंने किसी को क़ायल किया?" इंजीनियर ने कहा, "मेरे प्यारे दोस्त, क्या मैंने ऐसा कोई दावा किया? ईश्वर तुम्हारी मदद करे! तुम्हें कौन क़ायल कर सकता है? तुम खुद भुगतोगे उसके बाद ही इस सच को समझ सकोगे।"
" और क्या खूब दलील है तुम्हारी!" विद्यार्थी अपना नाइट शर्ट पहनते हुए बोला, "तुम जिन विचारों को इतना नापसंद करते हो उसे युवाओं के लिए हानिकारक मानते हो, लेकिन बूढ़े-बुजुर्गों के लिए उसे स्वाभाविक कहते हो। जैसे बाल सफ़ेद हों तो सब कुछ जायज़ है... इस तरह के सठियापे का अधिकार तुम्हें कहाँ से मिल गया? इसका आधार क्या है? यदि ये विचार ज़हरीले हैं तो सबके लिए सामान रूप से ज़हरीले होंगे।"
"नहीं, मेरे प्यारे दोस्त, ऐसा मत कहो!" इंजीनियर ने कहा और शरारतन आंख मारी "ऐसा मत कहो! पहली बात तो यह है कि बूढ़े बुजुर्ग पाखंडी नहीं होते। उनका निराशावाद बाहर से नहीं आता, न वह अव्यस्थित रूप में आता है, बल्कि उनका निराशावाद उनके अपने मस्तिष्क की गहराइयों से उपजता है और तब, जब वे हीगलों और केंटों को जज़्ब कर चुके होते हैं, भीषण यातना भोग चुके होते हैं और गलतियों पर गलतियाँ कर चुके होते हैं। उनके निराशावाद के पीछे उनका निजी अनुभव और ठोस दार्शनिक चिंतन है। दूसरी बात यह कि बूढ़े-बुजुर्गों का निराशावाद हमारी तुम्हारी तरह घिसेपिटे विचारों से नहीं बना है, बल्कि उसके मूल में वेदना है, एक ईसाई भावना है, क्योंकि उन विचारों के पीछे मानवजाति के प्रति प्यार और मानवीय सरोकार हैं। ऐसे लोगों में वह अहं नहीं मिलता जो पाखंडियों में देखा जा सकता है। तुम जिंदगी से इसलिए नफरत करते हो क्योंकि उसका अर्थ छिपा हुआ है- खासकर तुमसे, और तुम केवल अपनी निजी मौत से डरे हुए हो। लेकिन जो सच्चा चिन्तक है उसे इस बात का कष्ट है कि सच सब लोगों से छिपा हुआ है और वह सबके लिए दुखी है। मसलन, यहाँ से थोड़ी ही दूर पर इवान अलेक्सांद्रोविच नाम का एक सरकारी फोरेस्टर रहता है। वह बेहतरीन इंसान है। पहले कहीं शिक्षक था, थोडा-बहुत लिखता भी है। पता नहीं वह कौन है, लेकिन वाकई होशियार है और दर्शन शास्त्र में भी उसकी पैठ है। उसने बहुत पढ़ा है और अभी भी पढ़ता है। हमारी भेंट एक बार गुन्जोव इलाके में हुई थी। उन दिनों वहां स्लीपर और पटरी बिछायी जा रही थी। वैसे यह कोई कठिन काम नहीं है, लेकिन इवान अलेक्सांद्रोविच जैसे आम इंसान के लिए यह किसी जादू से कम नहीं। अनुभवी कारीगर स्लीपर बिछाने और उसपर पटरी लगाने में एक मिनट से भी कम वक्त लेता है। उस समय सभी कारीगर रौ में थे और बहुत तेजी और सफाई से काम कर रहे थे। खास तौर पर एक कारीगर हथौड़े से कील के ऊपरी सिरे पर चोट करने में इतना माहिर था कि उसके एक ही प्रहार से कील अन्दर चली जाती थी जबकि हथौड़े का हत्था काफी लम्बा था और कील भी लगभग एक फुट लम्बी थी। इवान अलेक्सांद्रोविच बहुत देर तक मुग्ध होकर कारीगरों को काम करते हुए देखता रहा और इसके बाद सजल नेत्रों से उसने मुझे कहा, `कितने अफ़सोस की बात है कि ऐसे कमाल के लोग भी एक दिन नहीं रहेंगे!'
मैं इस तरह के निराशावाद को समझ सकता हूँ. ..."
"तुम्हारी किसी भी बात से कुछ भी साबित नहीं होता।" विद्यार्थी ने चादर ओढ़ते हुए कहा, "यह सब निरा बकवास है! कोई भी कुछ नहीं जानता। शब्दों से कुछ भी नहीं सिद्ध होता।" उसने चादर के नीचे से बाहर झाँका, जरा सा सिर उठाया, चिढ़कर भौंहें चढ़ाई और जल्दबाजी में कहा, "नादान लोगों को ही आदमी की जुबान और उसकी दलीलों पर भरोसा रहता है और वे उन्हें अहमियत देते हैं । शब्दों से कुछ भी सिद्ध किया जा सकता है और किसी भी तर्क का खंडन किया जा सकता है। जल्द ही लोग इतने वाक्पटु हो जाएँगे कि वे साबित कर देंगे कि दो दुनी सात होता है। मैं सुनना और पढ़ना पसंद करता हूँ, लेकिन आप सब मुझे माफ़ करें, मैं विश्वास नहीं कर सकता और न करना चाहता हूँ। मैं केवल ईश्वर का विश्वास करूंगा। आपलोग चाहे क़यामत तक बातें करते रहें और पाँच सौ और बिल्लो को रिझा लें, आप पर विश्वास तभी होगा जब मेरा सिर फिर जाएगा..... गुड नाइट !'
विद्यार्थी ने अपने सिर पर चादर खींच ली और दीवार की ओर पलट गया। संकेत स्पष्ट था कि अब वह सुनना या बात करना नहीं चाहता। इसके साथ ही तर्क-वितर्क समाप्त हो गया।
सोने के पहले इंजीनियर और मैं बैरेक से बाहर आये और हम एक बार फिर रोशनी देखने लगे।
"हमलोगों ने अपनी बक-बक से आपको थका दिया।" अनान्येव ने जम्हाई लेते हुए आसमान की ओर देखते हुए कहा, "लेकिन क्या किया जाए दोस्त? इस अंतहीन एकरसता के बीच ख़ुश होने का केवल एक जरिया है कि वाइन पी जाए और दर्शन बघारा जाए।
“........... कितना शानदार बाँध है!" जब हमलोग बाँध के नजदीक आये तो वह खुश हो गया, "यह बाँध नहीं, माउंट अरारात है!"
वह थोड़ी देर चुप रहा और फिर बोला:"उन रोशनियों को देखकर बैरोन को अमेलिकियों की याद आई, लेकिन मुझे वे मनुष्यों की विचार – शृंखला जैसी लगती हैं………. आपको मालूम होगा कि हर आदमी के विचार इसी तरह बिखरे रहते हैं और वे अंधेरे में एक रेखा बनाते हुए किसी उद्देश्य की ओर अग्रसर रहते हैं, लेकिन किसी चीज पर रोशनी डाले बिना और अँधेरे को रौशन किये बिना वे बहुत दूर- वृद्धावस्था के परे- विलीन हो जाते हैं....... लेकिन, बस, बहुत हो चुका दर्शन..... अब सोने का समय हो गया है। "
जब हम बैरेक में वापस आये तो इंजीनियर मुझे इस बात के लिए मनाने लगा कि मैं उसका बिस्तरा ले लूं। "प्लीज!" उसने मुझसे अनुनय किया और दोनों हाथों को अपनी छाती से लगाया। "जहाँ तक मेरी बात है, आप चिंता न करें। मैं कहीं भी सो सकता हूँ। अभी कुछ देर तक तो मैं सोऊंगा ही नहीं.. मेरी बात मान लें। " मैंने बात मान ली, कपड़े बदले और लेट गया। वह अपनी डेस्क पर बैठकर अपनी ड्राइंग देखने लगा।
"हम जैसे लोगों के पास सोने का वक्त कहाँ रहता है, दोस्त!" उसने धीमी आवाज में कहा। मैं लेटे हुए अपनी आँखें बंद कर चुका था। "बीवी-बच्चों वाले आदमी के लिए नींद कहाँ! उन्हें खिलाओ-पिलाओ, पहनाओ-ओढ़ाओ और आनेवाले दिनों के लिए पैसे जोड़ो। मेरे दो बच्चे हैं। एक लड़की है और एक छोटा बेटा है। बेटा तो पक्का शैतान है। देखने में खूबसूरत है... अभी छः साल का भी नहीं है, लेकिन दिमाग कितना तेज है! ... मैंने कहीं उनके फ़ोटो रखे हैं…….. मेरे बच्चे, मेरे बच्चे!" वह अपने काग़ज़ों को उलट पलट करने लगा। उसे फ़ोटो मिल गए और वह उन्हें निहारने लगा। मुझे नींद आ गयी।
मैं अजोरका के भूकने और कुछ लोगों के ऊंचे स्वर में बोलने से जग गया। वॉन स्तेनबर्ग, अंडरवीयर में, नंगे पांव, बिखरे बालों में दरवाजे पर खड़ा था और किसी के साथ ऊंचे स्वर में बातें कर रहा था। सुबह हो रही थी। ...
सुबह का धुंधला नीलाभ अँधेरा दरवाजे, खिडकियों और दीवारों की दरारों से अन्दर झांक रहा था। मेरे बिस्तर, कागजों की ढेर से अटी मेज और अनान्येव पर हल्का उजाला पड़ रहा था। इंजीनियर एक फेल्ट का लबादा लपेटे फर्श पर पसरा हुआ था. लबादे में से उसकी बालों भरी, मांसल छाती दिख रही थी और वह इतनी जोर से खर्राटा ले रहा था कि मुझे सचमुच विद्यार्थी पर तरस आया, जिसे हर रात उसी कमरे में सोना पड़ता होगा।
"हम इन्हें क्यों ले लें?" वॉन स्तेंबर्ग चिल्ला रहा था। " हम इनका क्या करेंगे? इंजीनियर चलिसोव के पास जाओ। ये किनके बॉयलर हैं?"
"निकितिन" एक मनहूस भारी आवाज ने जवाब दिया।
"तो ठीक है, चलिसोव के पास जाओ... हमारा इससे कोई मतलब नहीं। खड़े क्यों हो? जल्दी जाओ!"
"हुज़ूर, हमलोग मिस्टर चलिसोव के पास गए थे।" भारी आवाज ने और भी अधिक मनहूसियत के साथ कहा, "हम दिन भर उन्हें खोजते रहे। उनके दफ्तर में बताया गया कि वे दिम्कोव इलाके में हैं। हम पर दया करके इन्हें ले लें। कब तक इन्हें हम ढोते फिरेंगे? लाइन के किनारे-किनारे इन्हें खींच-खींच कर हम थक चुके हैं......"
"क्या बात है?" अनान्येव जागते हुए और जल्दी से अपना सिर उठाते हुए चिल्लाया।
"ये लोग निकितिन से कुछ बॉयलर ले आये हैं।" विद्यार्थी ने कहा, "और ये चाहते हैं कि हम इन्हें ले लें। लेकिन इनका हम करेंगे क्या?"
"इन्हें ब्लेज के पास भेज दो।"
"हुज़ूर, हम पर कृपा करें। इस मसले को सुलझा दें। घोड़ों ने दो दिन से कुछ भी नहीं खाया है। मालिक नाराज़ हो रहा होगा। तो क्या इन्हें वापस ले जाना पड़ेगा? रेलवे ने बॉयलर मंगवाया था, इसलिए रेलवे को लेना चाहिए...."
"अरे मूर्ख, क्या तुम यह नहीं समझ रहे हो कि यह हमारा काम नहीं है? जाओ, चलिसोव के पास जाओ!"
"क्या है? कौन है?" अनान्येव फिर गुर्राया, " जहन्नुम में जाओ तुमलोग!" वह उठकर दरवाजे तक गया। "
"क्या है?"
मैंने कपडे बदले और दो मिनट बाद बाहर आ गया। अनान्येव और विद्यार्थी, दोनों नंगे पांव और अंडरवीयर में खड़े थे और जोर-जोर से एक गाड़ीवान को कुछ समझा रहे थे। गाड़ीवान के सिर पर कोई हैट नहीं थी और हाथ में चाबुक थी। ज़ाहिर था वह उन्हें नहीं समझ पा रहा था। दोनों के चेहरों पर झल्लाहट थी।
"तुम्हारे बॉयलर का मैं क्या करूंगा?" अनान्येव चिल्लाया, "क्या मैं उन्हें सिर पर पहनूंगा? यदि तुमको चलिसोव नहीं मिला तो उसके असिस्टेंट को खोजो और हमें बख्शो!"
मुझे देखकर विद्यार्थी को शायद रात की बातचीत याद आ गयी। उसके चेहरे पर चिंता की जगह मानसिक जड़ता का भाव आ गया। उसने गाड़ीवान को हाथ से इशारा किया और कुछ सोचते हुए बैरक के अन्दर चला गया।
बादलों से घिरी हुई सुबह। अभी-अभी जगे मजदूर लाइन पर इधर-उधर दिख रहे थे, जहाँ रात में रोशनी जल रही थी। आवाजें और ठेलों की चरमराहट सुनाई पड़ रही थी। कामकाजी दिन शुरू हो रहा था। रस्सियों की लगाम से कसा एक टट्टू अपनी गर्दन को आगे किये हुए बालू से भरी गाड़ी को बाँध के ऊपर खींच रहा था।
मैंने विदा लेना शुरू किया... रात में बहुत कुछ कहा गया, लेकिन मैं अपने साथ एक भी मसले का हल लेकर नहीं जा रहा था। पूरी बातचीत में से सुबह मेरे ज़ेहन में छननी में बचे तलछट की तरह केवल रोशनी और बिल्लो की छवि बच गयी थी। मैं अपने घोड़े पर चढ़ा। मैंने आखिरी बार विद्यार्थी और अनान्येव पर, धुँधली,नशीली आँखों वाले उस उन्मादी कुत्ते पर, सुबह की धुंध में इधर से उधर जाते मजदूरों पर, बांध पर और अपनी गर्दन ऐंठते निरीह घोड़े पर नजर डाली और सोचा, "इस दुनिया में किसी भी चीज का कोई अर्थ नहीं है।"
मैंने घोड़े को चाबुक लगाई। घोड़ा लाइन के किनारे-किनारे सरपट दौड़ पडा। थोड़ी ही देर बाद मैं अंतहीन, सपाट मैदान और बादलों से ढके, ठंढे आसमान को देख रहा था। मुझे याद आया कि हम रात में किन मसलों का हल ढूंढ रहे थे। मैं सोच रहा था और धूप से जला मैदान, विस्तृत आसमान, बलूत के जंगल, दूर अँधेरे और धुंध में ढंका क्षितिज जैसे मुझे कह रहा था, "नहीं, इस दुनिया में किसी चीज का कोई अर्थ नहीं है।"
सूरज उग रहा था।
No comments:
Post a Comment