Wednesday, September 9, 2020

आहत और अपमानित (अध्याय १) - दोस्तोयोवस्की


 

 

 


 

 

 पिछले साल 22मार्च की शाम मैंने एक अजीब वाकया देखा। पूरे दिन अपने लिए किराये की कोई जगह ढूँढ़ते हुए शहर की खाक छानता रहा था। मेरी पुरानी जगह सीलन भरी थी और मुझे बड़ी मनहूस खाँसी रहने लगी थी। पतझड़ शुरू होते  ही मैंने वहाँ से निकलने का मन बना लिया थालेकिन वसंत के आगमन के बाद भी मैं वहीं पड़ा रहा। पूरे दिन मैं एक भी अच्छी जगह नहीं खोज पाया। पहली बात तो यह थी कि मैं एक ऐसी जगह खोज रहा था जो किसी और के घर का हिस्सा न होबल्कि अलग हो ;  दूसरी बात यह थी कि भले ही  कमरा एक हो पर वह बड़ा होना चाहिए और साथ ही सस्ता भी होना चाहिए। मेरा यह अनुभव रहा है कि सँकरी जगह में सोच भी सँकरी हो जाती है।

जब मैं अपने अगले उपन्यास के बारे में सोच रहा  था तब मैं कमरे में एक छोर से दूसरे छोर तक टहलना पसंद करता था। प्रसंगवशअपनी रचनाओं के बारे में दिन-रात सोचनावे कैसे लिखे जाएंगेउनकी योजना बनानाउन्हें लिखने के बजाय मुझे ज़्यादा पसंद है और ऐसा किसी आलस्य के कारण नहीं है।   तो फिर ऐसा क्यों है?

 

दिन भर मैं अस्वस्थ महसूस करता रहा था और सूर्यास्त के समय तक तो मैं सचमुच बीमार लगने लगा था।  ऐसा लगा जैसे बुखार चढ़ रहा है।एक और बात थी कि पूरे दिन मैं पैदल चलता रहा था और इसलिए थक गया था।  शाम मेंअंधेरा होने के ठीक पहलेमैं वोज़नेसेंस्की प्रोस्पेक्ट से गुज़र रहा था। पीटर्सबर्ग में मार्च की धूप मुझे अच्छी लगती हैखासकर सूर्यास्त के समयजब हवा में ठंडक हो और आसमान साफ़ हो  पूरी गली अचानक एक अद्भुत रोशनी में नहायी हुई चमचमाने लगती है।सभी घर एकाएक आलोकित हो उठते हैं। उन घरों के कालेपीलेऔर मटमैले हरे रंग एक पल के लिए अपनी सारी मनहूसियत से ऐसे मुक्त हो जाते हैंजैसे किसी की आत्मा पर से अचानक अंधेरा छट गया होजैसे किसी ने किसी को चौंका दिया हो या किसी ने किसी को अपनी कुहनी से टहोका मारा हो।  एक नई दृष्टि खुलती हैएक नई विचार-श्रृंखला जन्म लेती है...... यह एक आश्चर्यजनक बात है कि सूरज  की एक किरण मानव आत्मा के लिए क्या-कुछ नहीं कर सकती!

 

लेकिन धूप विदा हो चुकी थीसर्दी बढ़ गयी थी और नाक में तेज ठंड  लगने लगी थीझुटपुटा गहरा हो रहा थादुकानों पर गैसबत्ती जलने लगी थी। जब मैं कन्फेक्शनर मुलर की दुकान के पास पहुँचा तो अचानक जड़वत् खड़ा हो गया और सड़क की दूसरी तरफ़ देखने लगाजैसे मुझे पूर्वाभास हुआ हो कि मेरे साथ कुछ असाधारण घटने वाला है;  ठीक उसी क्षण मैंने उस बूढ़े आदमी को अपने कुत्ते के साथ सड़क की दूसरी तरफ़ देखा। मुझे अच्छी तरह याद है कि उन्हें देखते ही एक अप्रिय अहसास मेरे दिलो दिमाग़ पर छा गया और वह अहसास क्या था में खुद नहीं बता सकता था।

 मैं कोई रहस्यवादी नहीं हूँ।  मैं किसी पूर्वाभास और भविष्यवाणी में विश्वास नहीं रखतालेकिन संभवत: अनेक लोगों की तरह मुझे भी अपनी ज़िन्दगी में कुछ ऐसे अनुभव हुए हैं जिन्हें ठीक-ठीक समझना कठिन है।   इस बूढ़े का ही उदाहरण लें: ऐसा क्यों था कि उस दिन उससे मिलते ही मुझे यह इलहाम हुआ कि उस शाम मेरे साथ कुछ अनहोनी घटेगी। लेकिन मैं बीमार था और बीमारी के अहसास बहुधा भ्रामक होते हैं।

 

 बूढ़े की कमर झुकी हुई थी। फुटपाथ को अपनी छड़ी से ठकठकाते हुए अपने मंद और कमज़ोर कदमों से वह कन्फेक्शनर की दुकान की ओर बढ़ रहा था। वह अपने पाँव ऐसे बढ़ा रहा थाजैसे वे छड़ी होंजैसे वे घुटनों से मुड़ते नहीं हों। मैंने अपनी ज़िन्दगी में कभी भी इतने अजीब और विद्रूप शक्ल वाले आदमी को नहीं देखा है। मुलर की दुकान पर पहले भी जब मैंने उसे देखा था उसका मेरे ऊपर हमेशा बुरा असर पड़ा था। उसका लम्बा क़ददोहरी हो गयी पीठसाक्षात् मृत्यु जैसा चेहरा जिसपर अस्सी वर्षों की छाप पड़ी हुई थीउघड़ी सिलाई वाला उसका फटा पुराना ओवरकोटकम से कम बीस साल पुराना चिथड़ा हो चुका गोल हैटजो उसके सफ़ेद बाल-  नहीं-  पीले-सफेद बाल की एकमात्र लट वाले गंजे सिर को ढक रहा था और उसकी सारी चालढालउसकी निरुद्देश्य सी लगनेवाली एक-एक हरकत,  जैसे कोई कमानी लगी हो- जो भी उससे पहली बार मिलता उसपर इन सबकी गहरी छाप पड़ती थी। यह देखकर सचमुच आश्चर्य होता था कि एक बूढ़ा आदमीजिसके जीवन की सारी प्राण-ऊर्जा कब की खत्म हो चुकी हैअकेला है और उसकी देखभाल करनेवाला कोई नहीं है , खासकर इस हालत में जब वह ऐसा दिखता है जैसे कोई पागल अपने पहरेदारों के चंगुल से निकल भागा हो।   मैं उसकी ठठरी हो गयी काया को देख कर भी स्तब्ध थाऐसा लगता था जैसे उसे शरीर है ही नहींजैसे उसकी हड्डियों के ऊपर सिर्फ त्वचा चिपकी हुई है। उसकी बड़ी-बड़ी निस्तेज आँखें हमेशा सामने घूरती रहती थींअगल-बगल कभी नहीं और मुझे पूरा यक़ीन था वे आँखें कुछ भी नहीं देखती थीँहालाँकि वह आपको देखता था वह आपकी ओर ऐसे बढ़ता था जैसे उसके सामने पूरी खाली जगह हो। मैंने इस बात को कई बार गौर किया। वह कुछ ही दिन पहले से मुलर की दुकान पर आने लगा था।उसके साथ हमेशा उसका कुत्ता होता था । कोई भी नहीं जानता था कि वह कहाँ से आया है। मुलर की दुकान के किसी भी ग्राहक ने उसे टोकने की हिम्मत नहीं की और उसने भी किसी को नहीं टोका।

 

 

 

“ वह घिसटते हुए मुलर की दुकान पर क्यों आता हैवहाँ पर उसे क्या काम है?”  मैं गली की दूसरी तरफ़ स्थिर खड़े होकर उसे घूर रहा था और सोच रहा था। मेरे अन्दर एक चिड़चिड़ाहट जन्म ले रही थीजो बीमारी और थकान से उपजी थी। “वह क्या सोच रहा है?”  मैं अनुमान लगा रहा था उसके भेजे में क्या है?’’ लेकिन क्या वह अभी भी किसी चीज़ के बारे में सोचता हैउसका चेहरा इतना मरा-मरा सा है कि उसपर कोई भाव है ही नहीं। और उसे इतना घिनौना और लिजलिजा कुत्ता कहाँ से मिलाजो उसका साथ एक पल के लिए भी नहीं छोड़ता हैऐसा लगता है यह कुत्ता जैसे उसका अभिन्न अंग है और वह देखने में भी तो बिलकुल उसी के जैसा लगता है।

 

 

 

 वह सड़ियल कुत्ता ऐसे देखता था जैसे वह भी अस्सी साल का बूढ़ा होहाँ, सच में ऐसा ही रहा होगा।  पहली बात यह थी कि यह कुत्ता इतना बूढ़ा दिखता थाजितना आम तौर पर कुत्ते नहीं दिखते हैं और दूसरी बात यह थी कि जब मैंने उसे पहली बार देखा था तो उसी समय किसी कारण से ऐसा लगा जैसे यह कुत्ता दूसरे कुत्तों जैसा हो नहीं सकता ; यह एक असाधारण कुत्ता हैइसके साथ कोई बात हैजो विलक्षण हैअलौकिक है;  शायद यह कुत्ते के रूप में कोई प्रेत हैऔर शायद इसकी नियति किसी रहस्यमय अनजान तरीके से अपने मालिक की नियति से बँधी हुई है। इसे देखते ही आपको लगेगा कि इसने पिछली बार जब खाना खाया होगा तबसे कम से कम बीस साल जरूर बीत गये होंगे। वह किसी कंकाल जैसा दुबला था या आप कह सकते हैं कि वह बिलकुल अपने मालिक जैसा था। उसके सारे बाल झड़ चुके थे और उसकी दुम एक छड़ी की तरह टांगों के बीच लटक रही थी।  उसका सिर और लम्बे कान उदास-उदास से आगे की ओर ढुलके हुए थे। मैंने कभी भी अपनी जिन्दगी में इतने मरियल कुत्ते को नहीं देखा था। जब दोनों सड़क पर चलते थेमालिक आगे-आगे और कुत्ता पीछे-पीछे उसकी एड़ियों से सटे उसके कोट के निचले किनारे को अपनी नाक से छूते हुएजैसे वह उससे चिपका हुआ हो  उनकी चाल और पूरा सूरतेहाल ऐसा थाजैसे हर कदम पर वे चीख-चीख कर कह रहे हों: “हम बूढ़े हैंबूढ़े। हे ईश्वर कितने बूढ़े हो चुके हैं हम! ” मुझे याद है एक बार मेरे मन में यह ख्याल भी आया कि वह बूढ़ा और उसका कुत्ता गावरनी द्वारा बनाये गये रेखाचित्रों वाली हॉफमैन की किताब के किसी पन्ने से किसी तरह बाहर निकल आये हैं और उस किताब के चलते-फिरते इश्तहार के रूप में इस दुनिया में कदमताल कर रहे हैं।

 

मैंने सड़क पार की और उस बूढ़े के पीछे-पीछे कनफेक्शनर की दुकान में दाखिल हुआ।

 

 दुकान में बूढ़ा अजीब तरीके से पेश आता था। अपने काउंटर पर खड़ा मुलर पिछले कुछ दिनों से इस बिन बुलाये मेहमान को देखकर नाक भौं सिंकोड़ने लगा था। सबसे पहली बात यह थी कि इस अनोखे मेहमान ने आज तक कभी किसी चीज की फरमाइश नहीं की थी।  हर बार वह एक कोने की ओर सीधे बढ़ जाता जहाँ स्टोव था और वह वहाँ कुर्सी पर बैठ जाता। यदि स्टोव के पास की सीट पर कोई पहले से बैठा हो तो वह थोड़ी देर तक उस व्यक्ति के पास किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति में खड़ा रहता और फिर कुछ-कुछ हैरान सा होकर वह दूसरे कोने में खिड़की के पास चला जाता।  वहाँ वह एक कुर्सी खींचकर बैठ जाता, सिर से अपना हैट उठा कर उसे नीचे फ़र्श पर अपनी बगल में रखता, हैट की बगल में अपनी छड़ी रखता और इसके बाद अपनी कुर्सी में धँसते हुए निश्चल तीन-चार घंटों तक पड़ा रहता।  वह अख़बार छूता नहीं, न उसके मुँह से कोई शब्द या कोई आवाज निकलती। वह केवल वहाँ बैठा रहता और फटी-फटी आँखों से अपनी नाक की सीध में घूरता रहता, लेकिन उसकी दृष्टि इतनी निष्प्राण थी कि कोई भी इस बात पर  दाँव लगा सकता था कि वह अपने आसपास न तो कुछ देखता है न सुनता है।  कुत्ता एक ही जगह पर दो-तीन बार चक्कर लगाने के बाद अपने मालिक के पैरों के निकट उदास होकर बैठ जाता। कुत्ते की नाक मालिक के जूतों के बीच होती। वह गहरी साँस लेता और फर्श पर पसर जाता। कुत्ता पूरी शाम बिना हिले-डुले पड़ा रहता जैसे कुछ देर के लिए मर गया हो। इन्हें देखकर किसी को भी यह ख़्याल आ सकता था कि ये दोनों प्राणी दिन भर कहीं मृत पड़े हुए थे और सूर्यास्त के समय ही इनमें फिर जान आयी है, केवल इसलिए ताकि वे कोई रहस्यमय और गोपनीय फ़र्ज़ निभाने के लिए मुलर की दुकान में आ सकें।  तीन या चार घंटे बैठने के बाद आखिरकार बूढ़ा उठता था, अपना हैट उठाता था और शायद अपने घर की ओर चल पड़ता था। कुत्ता भी उठ जाता और पहले की तरह ही अपने डोलते सिर और झूलती पूँछ के साथ यंत्रवत् धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए अपने मालिक के पीछे चल देता।   दुकान पर रोज आने वाले ग्राहक उस बूढ़े से कतराने लगे । वे उसके आस पास बैठते भी नहीं थे मानो उससे उन्हें विकर्षण होता हो। बूढ़े को इन बातों का कोई भान नहीं था।

 

 

 

 इस कनफेक्शनर की दुकान के अधिकतर ग्राहक जर्मन थे। वे वोज़नेसेन्सकी प्रोस्पेक्ट के सभी भागों से आते थे। प्राय: वे विभिन्न प्रकार की दुकानों के मालिक थे- कार्पेन्टरबेकरपेन्टरहैट बनाने वाले,लगाम बनाने वाले- सही जर्मन अर्थों में पितृसत्तात्मक लोग।  मुलर की दुकान पर पितृसत्तात्मक परम्परा का पूरा निर्वाह किया जाता था।  अक्सरहाँ दुकान का मालिक अपने किसी परिचित ग्राहक की मेज़ पर जाकर बैठता और उनके साथ पंच पीता।  दुकानदार के परिवार के छोटे बच्चे और कुत्ते भी कभी घर से बाहर निकलकर ग्राहकों से मिलते थे और वे ग्राहक बच्चों और कुत्तों को सहलाते थे।  वे सब एक दूसरे को जानते थे और उनमें एक दूसरे के प्रति आदर था। जब मेहमान जर्मन अख़बारों को पढ़ने में तल्लीन रहते थेदुकानदार के कमरों में खुलनेवाले दरवाज़े से एक टूटे हुए पिआनो पर मेइन लिबेर ऑगस्टिन’ धुन बजाने की आवाज आती। यह धुन दुकानदार की सबसे बड़ी बेटी बजाती थी। वह छोटे कद की जर्मन तरुणी थी जिसके बाल पीत वर्णी थेजैसे कोई सफ़ेद चूहा हो। लोग वाल्ज का खुशी-खुशी स्वागत करते थे। मैं हर महीने के शुरू के दिनों में मुलर की दुकान पर रूसी पत्रिकाएँ पढ़ने के लिए जाता थाजिन्हें वहाँ लिया जाता था।   

 

जब मैं दुकान के भीतर गया तो मैंने देखा कि बूढ़ा पहले से ही खिड़की के पास बैठा हुआ है और उसका कुत्ता हमेशा की तरह उसके पैरों  के पास पसरा हुआ है। मैं बिना कुछ बोले एक कोने में बैठ गया और अपने आप से  पूछने लगा कि मैं यहाँ क्यों आया हूँजबकि यहाँ पर मुझे कोई काम नहीं है और मैं बीमार हूँ। बेहतर तो यह होता कि मैं जल्दी घर जाताचाय पीता और सो जाता। क्या मैं यहाँ केवल इस बूढ़े को घूरने के लिए आया हूँमैं हैरान था। ‘‘आखिर मुझे इस बूढ़े से क्या मतलब है?’’ मैंने सोचा। मुझे वह अजीब सा दर्दनाक अहसास याद आया जब मैंने थोड़ी देर पहले उसे गली में देखा था। और इन रूखे जर्मनों से मेरा क्या वास्ता?  मेरी इस अवास्तविक मनोदशा का क्या अर्थ हैछोटी-छोटी बातों पर इस तरह बेचैन हो जाने का क्या मतलब हैमैंने अपने स्वभाव के इस पहलू पर हाल ही में गौर किया है। इससे मैं न ठीक से जी पाता हूँ और न जीवन के प्रति कोई स्पष्ट दृष्टिकोण ही अपना पाता हूँ। मेरे पिछले उपन्यास की तीखी आलोचना करते हुए  एक सुधी समीक्षक ने मेरी इस कमजोरी पर पहले ही टिप्पणी की है।  लेकिन सारी हिचक और आत्मग्लानि के बावजूद मैं वहीं टिका रहा । इस बीच मेरी तबीयत और बिगड़ रही थी और मैं उस गर्म कमरे को छोड़ना नहीं चाहता था।  मैंने फ्रैन्कफर्ट से निकलनेवाला अख़बार उठायाकुछ पंक्तियाँ पढ़ीं और ऊँघने लगा।  जर्मनों ने मुझे परेशान नहीं किया। वे पढ़ रहे थे और सिगरेट पी रहे थे और आधे घंटे में एक-दो बार धीमे स्वर में एक दूसरे से किसी खबर की चर्चा कर रहे थे या कोई चुटकुला सुना रहे थे । इसके बाद अपनी राष्ट्रीयता में दोगुने अभिमान के साथ वे फिर पढ़ने में मशगूल हो गये।

 

 

 

मैं आधे घंटे तक ऊँघता रहा और एक तेज कँपकँपी के साथ जग गया। यह बिलकुल जरूरी था कि मैं घर जाऊँ।

 

लेकिन इस बीच कमरे में एक निःशब्द तमाशा चल रहा था, जिसने मुझे फिर रोक लिया ।  मैंने पहले ही कहा है कि बूढ़ा कुर्सी पर बैठते ही किसी पर अपनी नज़र टिका लेता था और पूरी शाम उसकी नज़र वहीं टिकी रहती थी।  बीते दिनों उस देखते हुए भी न देखने वाली निरर्थक टकटकी का शिकार मैं बना था।  यह बहुत ही अप्रिय, वस्तुत: असह्य अहसास था और मैं आम तौर पर जितनी जल्दी हो सके अपना स्थान बदल लेता था।  इस समय बूढ़े का शिकार एक ठिगने क़द का गोलमटोल बहुत ही साफ़-सुथरा जर्मन था। उसके कालर स्टार्च की वजह से एकदम खड़े थे और चेहरा असाधारण रूप से लाल था। वह इस दुकान में नया आगन्तुक था। मुझे बाद में पता चला कि वह रिगा का रहनेवाला व्यापारी है और उसका नाम एडम इवानिच शुल्ज़ है। वह मुलर का करीबी दोस्त था, लेकिन उसे अभी तक उस बूढ़े या दुकान के दूसरे ग्राहकों के बारे में कुछ पता नहीं था।  वह अपने पंच की चुस्की लेते हुए मज़ा ले लेकर डॉर्फबार्बियर पढ़ रहा था। अचानक उसने नज़र उठायी और देखा कि बूढ़े की नज़र उस पर टिकी हुई है।  वह थोड़ा परेशान हो गया।  एडम इवानिच बहुत ही तुनकमिज़ाज और संवेदनशील आदमी था, जैसा कि सभी ‘श्रेष्ठ’ जर्मन होते हैं।  यह बात उसके लिए बड़ी नागवार थी कि कोई उसे इस तरह से बदतमीज़ी से घूरे।  अपने गुस्से को दबाते हुए उसने अपनी नज़र उस ढीठ बूढ़े से हटायी, अपने आप में कुछ बड़बड़ाया और अख़बार की आड़ में अपने चेहरे को छुपा लिया। लेकिन पाँच मिनट के भीतर ही वह अख़बार के पीछे से आशंका भरी नज़रों से झाँकने के लिए मजबूर हो गया और उसने देखा कि उसका निरंतर और निरर्थक घूरना जारी है।  

एडम इवानिच ने इस बार भी कुछ नहीं कहा। लेकिन जब यह घटना तीसरी बार दोहरायी गयी तो वह भड़क उठा। उसे लगा कि उसे अपनी प्रतिष्ठा बचानी होगी और इतने भद्रजनों की आँखों के सामने रिगा जैसे उत्कृष्ट नगर, जिसका वह अपने आप को प्रतिनिधि समझता था, की इज्जत पर बट्टा नहीं लगने देगा। उसने अधीरता से अख़बार मेज़ पर फेंका और जिस डंडे से अख़बार नत्थी था उसे मेज पर जोरों से ठकठकाया। पंच और अमोर प्रोपरे पीने के कारण उसका चेहरा और लाल हो गया था। उसने अपनी छोटी रक्तिम आँखें उस घिनौने बूढ़े पर गड़ा दीँ। ऐसा लग रहा था जैसे जर्मन और उसका आक्रांता, दोनों एक दूसरे को अपनी-अपनी दृष्टि की चुम्बकई शक्ति से काबू करना चाहते थे और इस बात का इंतजार कर रहे थे कि उन दोनों में से कौन पहले असहज होता है और अपनी आँखें झुकाता है।  डंडे की ठकठकाहट और एडम इवानिच के कड़े तेवर ने सभी ग्राहकों का ध्यान खींचा। सबलोग अपना काम छोड़कर संजीदगी और निःशब्द कौतूहल के साथ दोनों विरोधियों को देखने लगे। दृश्य हास्यास्पद होता जा रहा था, लेकिन उस लाल चेहरे वाले ठिगने भद्र पुरुष की उद्धत आँखों का जोर पूरी तरह ढीला पड़ गया।  बूढ़ा गुस्से से आग बबूला हुए शुल्ज़ को उसी तरह बिलकुल सीधी रेख में घूरे जा रहा था और उसे इस बात का कोई अहसास नहीं था कि वह सब लोगों के कौतूहल का केन्द्र था। वह इस तरह अविचल था जैसे वह धरती पर नहीं, बल्कि चन्द्रमा पर हो।  आखिरकार एडम इवानिच का धैर्य जवाब दे गया और वह विफर पड़ा।

 

‘मुझे इस तरह से घूर-घूर कर क्यों देख रहे हो?’ वह अत्यन्त उग्र होकर  जर्मन में ऊँची चीखती आवाज में चिल्लाया।

 

लेकिन उसका प्रतिद्वन्द्वी उसी तरह उसे चुपचाप देखता रहा जैसे वह उसके सवाल को समझा नहीं, यहाँ तक कि शायद सुना भी नहीँ। एडम इवानिच ने तय किया कि वह उससे रूसी में बात करेगा।  

 

 

 

‘मैं तुमसे पूछ रहा हूँ कि मुझे तुम इस तरह से खोजी नज़र से क्यों देख रहे हो?’ उसका गुस्सा बढ़ता जा रहा था, ‘तुम नहीं जानते कि राजदरबार तक मेरी पहुँच है!’ वह अपनी कुर्सी से झटके से उठते हुए बोला।

 

 

लेकिन उस बूढ़े पर जूँ तक नहीं रेंगी। जर्मनों के बीच रोष की एक लहर सुनी जा सकती थी। खुद मुलर हंगामा सुनकर कमरे में आ गया। जब उसे पता चला कि मामला क्या है उसने सोचा कि बूढ़ा बहरा है और वह उसके कान के निकट झुक गया।

 

 

‘मास्टर शुल्ज़ तुमसे विनती कर रहे हैं कि तुम उन्हें घूरना बंद करो।’ उसने उस अबूझ आगन्तुक को ध्यान से देखते हुए जोरों से चिल्लाते हुए कहा। 

 

 

 उस बूढ़े ने मुलर को यंत्रचालित दृष्टि से देखा; अचानक उसके भावहीन चेहरे पर किसी चिन्ताजनक विचार की छाया दिखी, एक तरह की असहज करने वाली व्याकुलता। वह घबरा गया, कराहते और हाँफते हुए वह अपना हैट उठाने के लिए झुका, हैट के साथ-साथ अपनी छड़ी भी उठायी, अपनी कुर्सी से उठा और एक ऐसे भिखमंगे के समान, जिसे गलत जगह पर बैठने के कारण उठाकर निकाल दिया गया हो, दीन मुस्कान के साथ वह कमरे से बाहर जाने लगा। उस जरा-जर्जर दीन हीन बूढ़े की डरी सहमी जल्दबाजी में किसी को भी द्रवित करने, किसी के भी हृदय को करुणा से विगलित करने के लिए इतना कुछ था कि एडम इवानिच सहित वहाँ बैठे सभी लोगों का रुख एक पल में बदल गया।  

यह बात बिलकुल साफ थी कि किसी और को अपमानित करने की बात तो दूर रही उस बूढ़े को यह अहसास था कि उसे एक भिखारी की तरह कहीं से भी बाहर निकाला जा सकता है।

 

 

मुलर एक दयालु आदमी था।

 

 

‘नहीं, नहीं,’ उसने उसके कन्धे थपथपाते हुए आश्वस्त करते हुए कहा, ‘बैठो- बैठो। अबेर हेर शुल्ज़ केवल यह कह रहे हैं कि उन्हें घूरो नहीं। राज दरबार में उन्हें लोग जानते हैं।’ 

 

 

लेकिन वह बेचारा बूढ़ा यह भी नहीं समझा; वह पहले से भी ज़्यादा घबरा गया। वह अपना फटा-पुराना नीला रुमाल उठाने के लिए झुका, जो उसके हैट से नीचे गिर गया था। वह अपने कुत्ते को पुकारने लगा जो अपने पंजों पर अपनी थूथन टिकाये गहरी नींद में ग़ाफ़िल सा फ़र्श पर निश्चल पड़ा हुआ था। 

 

 

‘अज़ोरका, अज़ोरका,’ उसने अपनी काँपती बूढ़ी आवाज़ में पुकारा। ‘अज़ोरका!’

 

 

अज़ोरका हिला तक नहीं।

 

 

‘अज़ोरका, अजोरका’ बूढ़े ने परेशान होकर बार-बार पुकारा और अपनी 

छड़ी से कुत्ते को कोंचने लगा। लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ।

 

उसके हाथ से छड़ी छूट गयी। वह झुका, अपने घुटनों के बल बैठा और दोनों हाथों से अज़ोरका के माथे को पकड़कर उठाया। बेचारा कुत्ता मर चुका था। अनदेखे ही वह अपने मालिक के चरणों में बुढ़ापे और शायद भूख का भी शिकार होकर मर गया था। बूढ़ा उसे एक मिनट तक देखता रहा। वह स्तब्ध था, जैसे वह समझ नहीं पा रहा था कि अज़ोरका मर चुका है; फिर वह अपने पुराने सेवक और दोस्त के और करीब झुक गया और उसके मृत चेहरे को अपने पीले गाल से हलके से दबाया। एक मिनट तक खामोशी छायी रही। हम सब पर इस दृश्य का गहरा असर हुआ। आखिरकार वह उठा । वह एकदम पीला पड़ चुका था और काँप रहा था, जैसे वह बुखार में हो।   

 

 

 

‘तुम इसे स्टफ करा सकते हो।’ दयालु मुलर ने कहा। वह उसे किसी भी तरह ढाढ़स बंधाना चाहता था। ‘तुम इसे अच्छी तरह स्टफ करा सकते हो। फ्योदोर कार्लिच क्रूगर सुन्दर ढंग से स्टफिंग करते हैं। फ्योदोर कार्लिच क्रूगर स्टफिंग में पारंगत हैं।’ मुलर ने जमीन से छड़ी उठाकर बूढ़े को देते हुए अपनी बात दोहरायी।

 

 

‘हाँ, मैं बहुत अच्छा स्टफ कर सकता हूँ।‘ स्वयं हेर क्रूगर सामने आकर विनम्रता पूर्वक बोल पड़े।

 

 

.

वह एक लम्बा, दुबला-पतला और भलामानस जर्मन था। उसके लाल बाल आपस में उलझे हुए थे और अपनी तोतानुमा नाक पर चश्मा पहन रखा था।

‘फ्योदोर कार्लिच क्रूगर में हर तरह की सुन्दर स्टफिंग बनाने की कमाल की प्रतिभा है।’ मुलर ने अपने सुझाव पर और उत्साह दिखाते हुए कहा।

 

 

 

 

‘हाँ, मेरे पास हर तरह की सुन्दर स्टफिंग बनाने का हुनर है।’ हेर क्रूगर ने फिर दोहराया। ‘और मैं तुम्हारे कुत्ते की मुफ्त स्टफिंग कर दूंगा।’ उसने अत्यंत उदारता और आत्मबलिदान की भावना से विभोर होकर कहा।

 

 

 

 

‘नहीं, स्टफिंग करने के लिए मैं तुम्हें पैसे दूंगा!’ एडम इवानिच शुल्ज़ जोर से चिल्लाया। ऐसा कहते हुए वह पहले की तुलना में दुगुना लाल हो गया। उसके चेहरे पर भी उदारता की चमक थी और वह महसूस कर रहा था कि  इस दुर्घटना में उसका भी निर्दोष योगदान है। 

 

बूढ़े ने यह सब सुना लेकिन जाहिर था कि वह कुछ भी नहीं समझ रहा था। वह पहले की तरह ही एक बार फिर काँपने लगा।

 

 ‘रुको! एक ग्लास गुट कॉग्नैक पियो!’ मुलर इस रहस्यमय अतिथि को वहाँ से निकलने का प्रयास करते देख चिल्लाया।

 

 

वे उसके लिए ब्रांडी ले आए। बूढ़े ने यंत्रवत् ग्लास उठाया, लेकिन उसका हाथ काँपने लगा, और जब  तक कि वह उसे ओंठों तक लाता आधी ब्रांडी छलक चुकी थी। उसने एक बूंद पिये बिना ग्लास वापस ट्रे पर रख दिया। इसके बाद एक अजीब और पूरी तरह अवांछनीय मुस्कुराहट के साथ वह उठा और अज़ोरका को वहीं  फ़र्श पर छोड़कर  तेज और डगमगाते कदमों के साथ दुकान से बाहर चला गया। सब लोग चकित होकर खड़े हो गये। जर्मन भद्र लोक एक दूसरे को गोल-गोल आँखें नचाते हुए कहने लगे, “अरे वाह! कितनी अद्भुत घटना है!”

 

 

 

लेकिन मैं तेजी से बूढ़े के पीछे चल पड़ा। दुकान से कुछ कदम आगे दाहिनी ओर एक द्वार से घुसते ही बड़े-बड़े मकानों के बीच से  एक सँकरी और अंधेरी गली जाती है। मुझे ऐसा लगा जैसे बूढ़ा उसी गली में मुड़ा होगा। गली में दाहिनी ओर एक मकान बन रहा था जिसके चारों तरफ़ बाँस की बल्लियाँ लगी हुई थीं। मकान के चारों ओर की घेराबंदी गली के बीचोबीच तक पहुँच गयी थी और उस घेरे की बगल से चलने के लिए लकड़ी के तख्ते डाल दिये गये थे।  मकान और घेरे से बने एक अंधेरे कोने में मैंने बूढ़े को पाया। वह लकड़ी से बने फुटपाथ के किनारे बैठा हुआ था। वह अपने दोनों हाथों से अपना सिर थामे हुए था और उसकी दोनों कुहनियाँ दोनों घुटनों पर टिकी हुई थीं। मैं उसकी बगल में बैठ गया। 

 

 

 

 ‘सुनो’ मैंने कहा। मैं नहीं जानता था कि बात कैसे शुरू की जाए। ‘अज़ोरका के लिए शोक मत करो। आओ, मैं तुम्हें घर ले चलता हूँ। मैं तुरंत एक टैक्सी बुलाता हूँ। तुम कहाँ रहते हो?’

 

 

बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया। मैं तय नहीं कर पा रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए। गली में और कोई राहगीर दिख भी नहीं रहा था। अचानक उसने मेरी बाँह जोर से पकड़ ली।

 

 

 

‘दम घुट रहा है!’ उसने भर्रायी आवाज में धीमे से कहा, ‘दम घुट रहा है!’  

 

 ‘हमें घर चलना चाहिए,’ मैं उठते हुए और उसे जबर्दस्ती उठाते हुए चिल्लाया, ‘तुम चाय पीकर आराम करना.... मैं एक टैक्सी लाता हूँ.. मैं एक डॉक्टर को बुलाऊंगा.... मैं एक डॉक्टर को जानता हूँ....’    

 

 

मुझे याद नहीं मैंने उसे और क्या-क्या कहा। उसने उठने की कोशिश की, लेकिन फिर वह जमीन पर गिर गया और उसी भर्रायी डूबती आवाज में कुछ बुदबुदाने लगा। मैं और निकट झुककर उसकी बातें सुनने लगा।

 

 

 ‘वासिलयेव्स्की आइलैंड में’ उसकी साँस टूटने लगी। ‘छठी गली। छ..ठी...ग...ली’ 

 

वह चुप हो गया।

 

 

 

‘तुम वासिलयेव्स्की आइलैंड में रहते हो? तब तो तुम गलत दिशा में आ गये हो। तुम्हें बायें मुड़ना था, तुम दायें मुड़ गये। मैं तुम्हें वहाँ सीधे ले चलता हूँ....’

 

बूढ़ा हिला तक नहीं। मैंने उसका हाथ उठाया। हाथ इस तरह गिर गया जैसे वह निर्जीव हो। मैंने उसके चेहरे को देखा, उसे छुआ........ वह मर चुका था।

 

 

 

मुझे ऐसा लगा जैसे यह सब किसी सपने में हो रहा हो।

 

 

इस घटना के कारण मुझे काफी दिक़्क़तों से गुजरना पड़ा और इस परेशानी में न जाने कैसे मेरा बुखार अपने आप उतर गया। बूढ़ा जहाँ रहता था उसका पता चल गया। लेकिन वह वासिलयेव्स्की आइलैंड में नहीं रहता था, बल्कि जिस जगह पर उसने आखिरी सांस ली थी,उस जगह से कुछ ही कदम दूर पर क्लूजेन भवन की पाँचवीं मंजिल पर छत के ठीक नीचे बने एक अलग फ्लैट में रहता था, जिसमें एक छोटा सा प्रवेश द्वार था, छत काफी नीची थी, लेकिन कमरा बड़ा था और खिड़कियों के नाम पर तीन सुराख थे। उसने वहाँ बड़ी बदहाली की जिन्दगी जी थी। उसके कमरे में फर्नीचर के नाम पर एक मेज़, दो कुर्सियाँ और एक बहुत पुराना सोफा था जिसकी गद्दी पत्थर की तरह सख्त हो गयी थी और जिससे चारों ओर रेशे निकले हुए थे; बाद में पता चला ये चीजें भी मकान मालिक की ही थीं। जाहिर था स्टोव बहुत दिनों से गर्म नहीं किया गया था और कहीं कोई मोमबत्ती भी नहीं मिली। मुझे अब ऐसा लगता है कि बूढ़ा मुलर की दुकान में केवल इसलिए जाता था ताकि वह किसी ऐसे कमरे में बैठ सके जहाँ रोशनी हो और गर्मी हो।  मेज़ पर एक मिट्टी का खाली मग रखा हुआ था जिसकी बगल में एक बासी रोटी की पपड़ी पड़ी थी। घर में कहीं कोई पैसा नहीं था, एक छदाम भी नहीं। कोई और कपड़ा भी नहीं था, जिसमें उसे दफ़नाया जा सके। किसी ने इसके लिए अपनी कमीज दी। जाहिर था कि वह इस तरह से बिलकुल अलग-थलग नहीं जी सकता था और इसलिए निःसंदेह कोई न कोई बीच में उससे मिलने जरूर आता होगा।   मेज़ की दराज़ में से किसी ने उसका पासपोर्ट निकाला। मृतक जन्म से विदेशी था,  हालाँकि वह रूस का नागरिक था। उसका नाम जेरेमी स्मिथ था, पेशे से मेकेनिकल इंजीनियर था और उसकी उम्र अठहत्तर साल की थी। मेज़ पर दो किताबें पड़ी थीं- एक भूगोल की छोटी सी किताब और एक रूसी में न्यू टेस्टामेंटजिसके हाशिये में पेंसिल से निशान लगाये गये थे और नाखून से खरोंचा गया था। इन किताबों को मैंने अपने लिए ले लिया । मकान मालिक और दूसरे किरायेदारों से पूछताछ की गयी- वे सब उस बूढ़े के बारे में शायद ही कुछ जानते थे। मकान में अनेक किरायेदार थे, ज्यादातर कारीगर या जर्मन औरतें जो भोजन और परिचर्या की शर्त पर दूसरों को मकान किराये पर देती थीँ। उस ब्लॉक का एक सुपरिटेंडेंट था, वह भी इस पुराने किरायेदार के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बता सका, सिवाय इसके कि कमरा छह रूबल मासिक किराये पर दिया गया था, मृतक पिछले चार महीनों से वहाँ रह रहा था, पिछले दो महीनों से उसने किराये के नाम पर एक पाई भी नहीं चुकायी थी और उसे अब बाहर निकालना पड़ता। जब लोगों से  यह पूछा गया कि क्या कोई उससे मिलने वहाँ आता थातो कोई भी ठीक-ठीक जवाब नहीं दे पाया। यह एक बड़ा ब्लॉक था, नोआ के आर्क के समान यहाँ ढेरों लोग आते होंगे, किस-किसको याद रखा जाए! पिछले पाँच वर्षों से जो यहाँ दरबान था, वह शायद कुछ जानकारी दे सकता था, लेकिन वह एक पखवाड़े पहले ही अपने गाँव चला गया था और अपनी जगह अपने भतीजे को छोड़कर गया था, जो अभी आधे किरायेदारों को चेहरे से पहचानता तक नहीं था।      मुझे पता नहीं यह सब पूछताछ किस नतीजे पर पहुँची, लेकिन आखिरकार बूढ़े को दफ़नाया गया। उन दिनों हालाँकि मुझे बहुत सारी बातों का ख्याल रखना पड़ रहा था, फिर भी मैं वासिलयेव्स्की आइलैंड, छठी गली में गया और वहाँ जाने पर मुझे अपने आप पर हँसी आयी। छठी गली में मकानों की एक आम कतार के सिवा मैं और क्या देख सकता था? लेकिन मरने के वक़्त बूढ़ा छठी गली और वासिलयेव्स्की आइलैंड की बातें क्यों कर रहा था? क्या वह प्रलाप कर रहा था? 

 

मैं स्मिथ के ख़ाली लॉज में गया। मुझे पसंद आया और मैंने उसे अपने लिए किराये पर ले लिया। मुख्य विशेषता यह थी कि कमरा बड़ा था, हालाँकि छत नीची थी, इतनी कि शुरुआत में डर लगा कि मेरा सिर टकरा जाएगा। बाद में इसकी आदत हो गयी। छह रूबल महीने पर इससे बेहतर क्या मिल सकता था। सबसे बड़ी ख़ासियत इसकी स्वतंत्रता थी जिससे मैं आकृष्ट हुआ। मुझे केवल अब घर के काम-काज के लिए कोई प्रबंध करना था, क्योंकि मैं किसी नौकर की मदद लिए बिना नहीं जी पाऊँगा । कुछ समय के लिए एक पोर्टर घर के बेहद ज़रूरी काम करने के लिए तैयार हो गया। मैंने यह भी सोचा कि क्या पता बूढ़े को खोजते हुए किसी दिन कोई आ जाए। लेकिन उसकी मौत के बाद पाँच दिन बीत गये थे और अब तक कोई नहीं आया था।


अनुवाद: राजीव रंजन सिंह 

 

 

 

 


 


 

 

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