Sunday, February 21, 2021

आहत और अपमानित, अध्याय ५

 

 

और इस प्रकार इचमेन्येव परिवार पीटर्सबर्ग आ गया। लम्बी जुदाई के बाद नताशा से मैं कैसे मिला मैं इसका वर्णन नहीं करूंगा। उन चार वर्षों में मैं उसे कभी भी नहीं भुला पाया था। बेशक मैं ख़ुद यह नहीं जानता था कि उसे याद करते समय मेरे मन में किस प्रकार की भावनाएँ उठती हैं, लेकिन जब हमने एक दूसरे को फिर से देखा तो मुझे ऐसा लगा जैसे वह मेरी नियति बनने वाली है। उनके पीटर्सबर्ग आने के शुरू के दिनों में मुझे ऐसा लगा था कि चार वर्षों के दौरान नताशा में कुछ ख़ास परिवर्तन नहीं आया है और वह अब भी वैसी ही छोटी बच्ची है जैसी वह चार वर्ष पहले थी। लेकिन बाद में मैं हर दिन उसमें कुछ नया पाता था जिससे मैं पूरी तरह अनभिज्ञ था, मानो जानबूझ कर वह बात छुपायी गयी हो। ऐसा लगता था जैसे नताशा ख़ुद को मुझसे छुपा रही है …. और यह सब जानने में कितना आनन्द था! 

पीटर्सबर्ग आने के बाद निकोलाई सर्जेयिच काफ़ी चिड़चिड़े और उदास रहने लगे थे। उनकी मुश्किलें बढ़ती जा रही थीं। वे आहत महसूस करते थे, ग़ुस्से में आग बबूला हो जाते थे, हमेशा कारोबारी दस्तावेज़ों को पढ़ते रहते थे और हमलोगों की भरपूर उपेक्षा करते थे। अन्ना एन्द्रेयेव्ना अत्यधिक व्यग्र होकर इधर-उधर घूमती रहती थीं और शुरू में उनकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। पीटर्सबर्ग से उन्हें डर लगता था। वह दीर्घ निःश्वास लेती थीं और दुखद कल्पनाओं से भरी रहती थीं; वह अपने पुराने वातावरण, इचमेन्येवका को याद कर रोती थीं। उन्हें यह चिन्ता सताती थी कि नताशा अब बड़ी हो गयी है, लेकिन उसके बारे में किसी को कोई फ़िक्र नहीं है। किसी बेहतर राज़दार को न पाकर वह मुझसे ही अपनी तरह-तरह की परेशानियों की चर्चा करने लगीं ।

उनके आने के कुछ ही दिन पहले मैंने अपना पहला उपन्यास समाप्त किया था। इसी के साथ मेरा साहित्यिक जीवन शुरू हुआ था।  नौसिखुआ होने के कारण मैं यह नहीं जानता था कि मैं अपनी पहली रचना के साथ क्या करूँ। इचमेन्येव परिवार में मैंने इसकी कोई चर्चा नहीं की थी।

वे तो मुझसे लगभग लड़ चुके थे कि मैं निठल्ला जीवन क्यों जीता हूँ, नौकरी क्यों नहीं करता और कोई ओहदा पाने की कोशिश क्यों नहीं करता।  निकोलाई सर्जेयिच अत्यन्त कटुता और झुँझलाहट के साथ मुझे धिक्कारते, हालाँकि इसमें उनका पितृ-तुल्य प्यार ही झलकता था। मुझे यह बताने में शर्म आती थी कि मैं क्या कर रहा हूँ। मैं उनसे कैसे कहता कि मैं नौकरी नहीं करना चाहता था, बल्कि उपन्यास लिखना चाहता था? और इसलिए मैंने कुछ समय तक  उन्हें धोखे में रखा कि मैं कोई ओहदा पाने की जी-तोड़ कोशिश कर रहा हूँ। निकोलाई सर्जेयिच को इन बातों की छानबीन करने की मुहलत नहीं थी। मुझे याद है एक दिन नताशा ने जब हम दोनों को इस मुद्दे पर बातचीत करते सुना तो मुझे एक ओर ले जाकर रोते हुए गिड़गिड़ा कर कहा कि मैं अपने भविष्य के बारे में सोचूँ। यह जानने की कोशिश में कि मैं क्या कर रहा हूँ, वह सवाल पर सवाल पूछती चली गयी। जब मैंने उसे भी अपना राज़ नहीं बताया तो उसने मुझसे वचन लिया कि मैं निठल्ला और आवारा बन कर ख़ुद को बरबाद नहीं करूंगा। हालाँकि मैंने उसे अपने काम के बारे में कुछ भी नहीं बताया, फिर भी मुझे याद है कि उस समय यदि अपनी रचना, अपने पहले उपन्यास के बारे में उसके मुँह से एक भी प्रशंसा का शब्द सुन लेता, तो उसके सामने आलोचकों और समीक्षकों की सारी प्रशंसात्मक टिप्पणियों को, जो मुझे बाद में मिलीं, भूल जाता। 

आख़िरकार मेरा उपन्यास प्रकाशित हुआ। इसके प्रकाशित होने के पहले ही साहित्यिक दुनिया में इसकी काफ़ी चर्चा हो गयी थी। ब. तो मेरी पाण्डुलिपि पढ़कर एक छोटे बच्चे की तरह ख़ुशी से झूम उठे थे। लेकिन यदि मुझे सचमुच ख़ुशी मिली थी तो अपनी सफलता के इन प्रथम मादक क्षणों में नहीं, बल्कि किसी को भी अपनी पाण्डुलिपि दिखाने या पढ़ाने के पहले ही उन लम्बी रातों के दौरान, जब मैं रचना कर रहा था और मेरा मन प्रबल आशा और भविष्य के सपनों से भरा रहता था, मुझे अपना कर्म प्यारा लगता था, जब मैं अपनी कल्पना में ख़ुद अपने द्वारा सर्जित चरित्रों के साथ जीता था, मानो वे मेरे परिवार के सदस्य हों और जीते-जागते इन्सान हों। मैं उन्हें प्यार करता था, उनके साथ-साथ हँसता-रोता था और अपने भोले-भाले नायक के लिए कभी-कभी सच्चे आँसू बहाता था।  

मैं इस बात का बखान नहीं कर सकता कि मेरी सफलता से वृद्ध दम्पती कितने ख़ुश हुए, हालाँकि पहले उन्हें इस बात पर बहुत आश्चर्य हुआ। उन्हें कितना अजीब लग रहा था।

जैसे कि अन्ना अन्द्रेयेव्ना को इस बात पर यक़ीन नहीं आ रहा था कि जिस नये लेखक की हर कोई तारीफ़ कर रहा था कि उसने कितनी ऊँचाई छूई है,  वह और कोई नहीं बल्कि उनका नन्हा वान्या था और वह इस बात पर बार-बार अपना सिर हिलाती थी। निकोलाई सर्जेयिच कुछ समय तक इस ख़बर पर यक़ीन नहीं कर सके, दरअसल शुरू में जब उन्हें उड़ती ख़बर मिली, तो वे बेहद आतंकित हो गये। उन्हें यह फ़िक्र होने लगी कि अब मुझे सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी। उन्हें यह भी चिन्ता थी कि आम तौर पर लेखक अनैतिक आचरण करते हैं। लेकिन मेरे बारे में लगातार नयी रिपोर्टें आ रही थीं, अख़बारों में लिखा जा रहा था और आख़िरकार जब उन्होंने ऐसे लोगों के मुख से मेरी बड़ाई सुनी जिनपर उनकी श्रद्धा थी तो उन्हें अपना विचार बदलना पड़ा। जब उन्होंने देखा कि मेरे पास अचानक ढेर सारा पैसा आ गया है और यह भी सुना कि साहित्यिक रचनाओं के लिए लोग कितना अधिक धन अर्जित कर सकते हैं , तो उनका रहा-सहा संदेह भी दूर हो गया।   अब संदेह की जगह उनमें उत्साह भरा विश्वास था, वे मेरे सौभाग्य पर एक बच्चे की तरह इतराने लगे और अचानक   मेरे शानदार भविष्य के बड़े-बड़े सपने देखने लगे। हर दिन वे मेरे लिए किसी नये कैरियर की कल्पना करते, कोई नयी योजना बनाते और उन योजनाओं में कैसे-कैसे सपने बुनते! लेकिन, मुझे याद है, उन उत्साहजनक सपनों के बीच भी उन्हें कभी-कभी सन्देह होने लगता था।

“लेखक, कवि। न जाने क्यों मुझे यह बात बड़ी अजीब लगती है। ..... कब कौन-सा कवि दुनिया में इतना कामयाब हुआ है कि उसकी गिनती अत्यंत उच्च प्रतिष्ठित लोगों में हो? आख़िर वे तो महज़ कलमघिस्सू होते हैं, उनका कितना भरोसा किया जा सकता है?”

 

मैंने ग़ौर किया था कि इस तरह के शक-शुबहे और नाज़ुक सवाल उन्हें अक्सर शाम के वक्त परेशान करते थे। ( ये छोटी-छोटी बातें और वह स्वर्णिम समय मुझे कितनी अच्छी तरह याद है!) शाम होते-होते मेरा बूढ़ा मित्र हमेशा व्याकुल, चिन्तित और शंकाग्रस्त हो ज़ाया करता था। नताशा और मुझे यह सब मालूम था और हम दोनों इस बात पर पहले से ही हँसने के लिए हमेशा तैयार बैठे रहते थे। मुझे याद है कि मैंने उन्हें ख़ुश करने के लिए कई क़िस्से सुनाये थे कि किस तरह सुमारोकोव को जेनरल बनाया गया था, देर्ज़ाविन को सोने से भरा हुआ स्नफ़-बॉक्स भेंट में दिया गया था, स्वयं महारानी लोमोनोस्सोव से मिलने गयी थीं। मैंने उन्हें पुश्किन और गोगोल के बारे में भी बताया था।

 

“मैं जानता हूँ, मेरे बच्चे, वह सब जानता हूँ” उन्होंने कहा, हालाँकि ये क़िस्से उन्होंने शायद पहली बार सुने थे। “लेकिन, वान्या, मुझे इस बात की ख़ुशी है कि तुमने कविता नहीं लिखी है। कविता बकवास होती है, मेरे बच्चे; तर्क मत करो, मुझ जैसे बूढ़े आदमी पर यक़ीन करो। मैं तो तुम्हारा भला ही चाहूंगा। कविता निरा बकवास है, केवल समय की बर्बादी है। कविता स्कूली बच्चों के लिए ही ठीक कही जा सकती है। तुम्हारे जैसे अनेक नौजवान कविता के कारण पागल हो जाते हैं.....मानता हूँ पुश्किन महान थे, इससे कौन इन्कार कर सकता है! फिर भी, कविता तुकबंदी के सिवा क्या है....एक हवाई चीज़ है.... हालाँकि मैंने ज़्यादा पढ़ा भी नहीं है...लेकिन गद्य अलग बात  है। गद्य लेखक हमें बहुत कुछ सिखा सकता है, मिसाल के तौर पर देशभक्ति के बारे में या सद्गुणों के बारे में... हाँ, मेरे बच्चे, मैं जो कहना चाहता हूँ ठीक-ठीक नहीं कह पा रहा हूँ, लेकिन तुम समझ रहे हो...मुझे तुम्हारी ही चिन्ता है । खैर , तुम अब पढ़कर सुनाओ।” एक संरक्षक के अन्दाज़ में उन्होंने अपनी बात समाप्त की। हम सब एक मेज़ के चारों ओर बैठे हुए थे और मैं आख़िरकार उन्हें अपनी किताब दिखाने आया था, “देखें तुमने क्या लिखा है, जो चारों तरफ़ इतना हंगामा है। सुनाओ।”

मैंने किताब खोली और पढ़ना शुरू किया। उसी दिन प्रिंटर से मेरा उपन्यास आया था और आख़िरकार मेरे हाथ में उसकी एक प्रति थी। मैं  भागा-भागा उनके पास आया था ताकि उन्हें पढ़कर सुना सकूँ।

 

इस बात को लेकर मेरे मन में न जाने कितनी ग्लानि और अफ़सोस रहता था कि प्रिंटर के पास पांडुलिपि होने के कारण मैं उन्हें पहले उपन्यास नहीं पढ़ा पाया। नताशा तो कई बार रो चुकी थी, मुझसे झगड़ चुकी थी और मुझे उलाहना दे चुकी थी कि मैंने उसे पढ़ाने के पहले दूसरों को पढ़ने दिया है......... लेकिन अब आख़िरकार हम सब एक मेज़ के चारों ओर बैठे हुए थे। वृद्ध महाशय के चेहरे पर विशेष रूप से गम्भीर और आलोचनात्मक भाव था। वे मेरी रचना  को काफ़ी सख़्त कसौटी पर आँकने के लिए तैयार थे, ताकि “वे ख़ुद अपनी राय पक्की कर सकें।” अन्ना एन्द्रेयेव्ना भी काफ़ी संजीदा थीं; मुझे लग रहा था उन्होंने इस अवसर के लिए ही विशेष रूप से एक नया कैप पहना था।

उन्होंने काफ़ी अरसे से देखा होगा कि मैं उनकी लाड़ली नताशा को कितने बेइंतहा प्यार के साथ देखा करता था। यह भी कि उससे बात करते समय मेरी साँसें उखड़ने लगती हैं और आँखें चौंधिया जाती हैं और नताशा भी मेरे प्रति पहले से अधिक सदय है। हाँ! अब अन्ततः सफलता, स्वर्णिम आशा और भरपूर आनन्द की घड़ी आ चुकी है। उस बुजुर्ग महिला ने इस बात पर भी गौर किया होगा कि उसका पति मेरी ज़्यादा बड़ाई करने लगा है और अपनी बेटी और मुझे कुछ अलग नज़रों से देखने लगा है।. . और अचानक वह भयभीत हो गयी थीं। आख़िर मैं कोई काउंट, लॉर्ड या प्रिंस तो था नहीं, यहाँ तक कि कोई युवा, खूबसूरत प्रिवी काउंसिलर भी नहीं था जिसके सीने पर तमग़ा जड़ा होता है। अन्ना एन्द्रेयेव्ना की ख्वाहिशों में कोई कटौती नहीं होनी चाहिए।

“इस आदमी की हर तरफ़ तारीफ़ हो रही है” उन्होंने मेरे बारे में सोचा, “ लेकिन क्यों? लेखक, कवि.. लेकिन लेखक में ऐसी क्या क़ाबलियत होती है?”

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