मैंने पहले ही बताया है कि प्रिंस विधुर थे। उन्होंने कच्ची उम्र में ही शादी की थी और धन के लालच में की थी। मास्को में उनके माता-पिता की माली हालत काफ़ी ख़राब थी और उनसे जो कुछ मिला था उसे नगण्य ही कहा जाएगा। वास्सिलयेव्स्को को बार-बार बंधक रखा गया था। उस जायदाद पर ढेर सारा क़र्ज़ हो गया था। बाईस वर्ष की उम्र में प्रिंस को एक सरकारी विभाग में नौकरी करनी पड़ी, क्योंकि उनके पास उस समय धन के नाम पर एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी। उन्होंने एक ‘पुरातन ख़ानदान की अकिंचन सन्तान’ के रूप में जीवन मंच पर पदार्पण किया था। लगान वसूली करने वाले एक ठेकेदार की प्रौढ़ा बेटी से शादी कर उन्होंने अपने आप को उबार लिया था।
यह सच है कि ठेकेदार ने दहेज देने में भी उनके साथ छल किया था, लेकिन इसके बावजूद अपनी पत्नी के पैसों के बल पर वे अपनी जायदाद वापस ख़रीदने में कामयाब हो गये और फिर से अपने पैरों पर खड़े हो गये । प्रिंस के पल्ले पड़ी ठेकेदार की बेटी अनपढ़ और कुरूप थी। उसमें केवल एक बड़ा गुण था: उसका स्वभाव अच्छा था और प्रिंस का कहना मानती थी। प्रिंस ने उसके इस गुण का भरपूर फ़ायदा उठाया। शादी के एक साल बाद प्रिंस अपनी पत्नी को, जिसने इस बीच उसके पुत्र को जन्म दिया था, उसके ठेकेदार पिता के पास मास्को में छोड़कर एक दूसरे प्रांत में चले गये। यहाँ उन्हें पीटर्सबर्ग में रहने वाले किसी प्रभावशाली कुटुम्बी की सहायता से कोई बड़ा पद मिल गया।
उनकी महत्वाकांक्षा थी कि उन्हें जीवन में मान-सम्मान और तरक़्क़ी मिले और उनका एक कैरियर हो। जब उन्हें यह अहसास हुआ कि कि वे अपनी बीवी के साथ न तो पीटर्सबर्ग में और न मास्को में ही रह सकते हैं, तो उन्होंने निश्चय किया कि जब तक कोई बेहतर समाधान न हो, वे प्रान्तों में ही अपने कैरियर की शुरूआत करेंगे। लोग कहते हैं कि शादी के पहले साल के दौरान ही उन्होंने अपने निर्मम व्यवहार से अपनी पत्नी को बेज़ार कर दिया था। निकोलाई सर्जेयिच इस अफ़वाह पर क़तई यक़ीन नहीं करते थे और प्रिंस का यह कहते हुए ज़ोर-शोर से बचाव करते थे कि प्रिंस इस तरह का आचरण कर ही नहीं सकते। लेकिन सात साल बाद ही उनकी पत्नी गुज़र गयी और शोक-संतप्त पति तुरन्त पीटर्सबर्ग लौट आये । दरअसल पीटर्सबर्ग में आते ही उनके कारण थोड़ी सनसनी फैल गयी। अपनी सम्पत्ति, सुदर्शन व्यक्तित्व, जवानी, अनगिनत गुण, वाक्चातुर्य, उत्कृष्ट अभिरुचि और मौज-मस्ती वाले स्वभाव के कारण पीटर्सबर्ग के समाज में प्रिंस का प्रवेश एक ऐसे व्यक्ति के रूप में हुआ, जो चाटुकार या स्वार्थी नहीं है, बल्कि स्वतंत्र और आत्मनिर्भर है।
लोग कहते हैं कि प्रिंस के व्यक्तित्व में सचमुच कुछ ऐसा था जो अत्यन्त मोहक था, कुछ ऐसा जो दूसरों पर हावी हो जाता था और लोगों को मंत्रमुग्ध कर देता था। स्त्रियों में उनके प्रति ज़बरदस्त आकर्षण था। समाज की एक चर्चित सुन्दरी के साथ मेलजोल के कारण उन्हें और ख्याति मिल रही थी। स्वभाव से कंजूसी की हद तक किफ़ायती होने के बावजूद वह अनाप-शनाप ख़र्च कर रहे थे; जरूरत पड़ने पर वे जुए में बड़ी रक़म हार सकते थे, दरअसल चेहरे पर कोई शिकन लाए बिना वे बहुत बड़ी हानि सह सकते थे। लेकिन वे पीटर्सबर्ग तफ़रीह करने नहीं आये थे। उनका मक़सद अपना कैरियर बनाना और समाज में अपनी हैसियत को निर्विवाद रूप से स्थापित करना था। वे अपने मक़सद में कामयाब हुए। काउंट नैन्स्की प्रिंस के एक संबन्धी थे, जिनकी समाज में बड़ी प्रतिष्ठा थी। यदि प्रिंस उनके सामने एक साधारण उम्मीदवार के रूप में आते तो उन्होंने उनकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया होता। लेकिन समाज में प्रिंस की सफलता देखकर वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन पर विशेष ध्यान देने का निश्चय किया और यहाँ तक कि वे इस बात के लिए भी तैयार हो गये कि प्रिंस का सात साल का पुत्र उनके परिवार में आकर पले।
इन्हीं दिनों प्रिंस वास्सिलयेव्स्को गये थे और निकोलाई सर्जेयिच के सम्पर्क में आए थे। आख़िरकार काउण्ट के प्रभाव से उन्हें एक महत्वपूर्ण विदेशी दूतावास में बहुत ऊँचा ओहदा मिला और वे विदेश चले गये। बाद में उनके क्रियाकलापों के बारे में कुछ अस्पष्ट सी अफ़वाहें सुनने को मिली थीं। लोगों का कहना था कि उन्हें विदेश में कुछ अप्रिय कार्य करने का ज़िम्मा सौंपा गया था, लेकिन कोई साफ़-साफ़ यह नहीं बताता था कि वह कार्य क्या था। सब लोगों को केवल यह मालूम चला कि बाद में उन्हें चार सौ कृषक-दासों वाली एक जायदाद ख़रीदने में सफलता मिली, जिसका मैंने पहले ही ज़िक्र किया है। अनेक वर्ष बीतने के बाद वे विदेश से वापस लौटे और चूँकि सरकारी नौकरी में उनका ओहदा अत्यन्त ऊँचा था, इसलिए उन्हें फ़ौरन पीटर्सबर्ग में एक ऊँचा पद मिल गया। इचमेन्येवका में यह अफ़वाह फैल गयी कि प्रिंस दूसरी शादी करने वाले हैं और यह रिश्ता उन्हें एक अत्यन्त सम्पन्न, प्रतिष्ठित और प्रभावशाली परिवार से जोड़ेगा। “वे तो महानता की सीढ़ियाँ चढ़ते जा रहे हैं,” निकोलाई सर्जेयिच ने ख़ुश होकर अपने हाथ रगड़ते हुए कहा। उस समय मैं पीटर्सबर्ग में यूनिवर्सिटी में पढ़ रहा था और मुझे याद है सर्जेयिच ने मुझे एक पत्र भेजा था कि मैं पता करूँ कि क्या यह ख़बर सही है। उन्होंने प्रिंस को भी एक पत्र लिखकर उनसे मेरी सिफ़ारिश की थी, लेकिन प्रिंस ने उस पत्र का कोई जवाब नहीं भेजा। मुझे केवल यह पता था कि प्रिंस का पुत्र, जो काउण्ट के परिवार में पला था और बाद में लीसे ( फ़्रेंच स्कूल) में था, उन्नीस साल की उम्र में अपनी पढ़ाई पूरी कर चुका था। मैंने निकोलाई सर्जेयिच को यह ख़बर भेजी तथा साथ ही उन्हें यह भी बताया कि प्रिंस अपने बेटे को बहुत प्यार करते हैं, उसकी हर इच्छा पूरी करते हैं और अभी से उसके भविष्य की बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाते रहते हैं। यह सब मैंने अपने उन सहपाठियों से जाना था जो नन्हें प्रिंस को क़रीब से जानते थे। इन्हीं दिनों अचानक एक सुबह निकोलाई सर्जेयिच को प्रिंस वाल्कोव्स्की का एक ख़त मिला जिससे वे काफ़ी अचम्भे में पड़ गये।
अब तक प्रिंस, जैसा कि मैंने पहले ही चर्चा की है, अपनी ख़तोकिताबत में केवल कारोबार से जुड़ी बातों का ज़िक्र करते थे, लेकिन इस बार उन्होंने पूरी तरह बेतकल्लुफ़ी दिखलाते हुए दोस्ताना तरीक़े से अपने निजी मामलों के बारे में लिखा। उन्होंने अपने बेटे की शिकायत की थी कि वह अपनी हरकतों से उन्हें परेशानी में डाल रहा है। हालाँकि यह सच है कि ऐसे किशोरों की कारगुज़ारियों को गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए (ज़ाहिर है वे अपने बेटे के पक्ष में सफ़ाई दे रहे थे ), फिर भी उन्होंने यह निश्चय किया है कि वे उसे दण्ड देंगे और उसके मन में डर पैदा करेंगे; और उसे कुछ दिनों के लिए निकोलाई सर्जेयिच के संरक्षण में ग्रामांचल में निवास करने का हुक्म देंगे। प्रिंस ने लिखा था कि यह क़दम उठाते समय वह “सहृदय और उदार निकोलाई सर्जेयिच और उससे भी अधिक अन्ना अन्द्रेयेव्ना” की सहायता पर पूरी तरह आश्रित हैं। उन्होंने उन दोनों से अनुरोध किया था कि वे इस नन्हे बिगड़ैल साहबज़ादे को अपने घर में पनाह दें, हो सके तो उसे प्यार दें, उसे तौर-तरीक़े सिखाएँ और सबसे अधिक “उसके हृदय में जीवनचर्या के लिए आवश्यक उदात्त सिद्धान्तों के प्रति आकर्षण पैदा कर” उसके चरित्र के छिछलेपन को दूर करें। स्वभावतः निकोलाई सर्जेयिच ने यह ज़िम्मेदारी बड़े उत्साह के साथ निभायी। नन्हे प्रिंस का स्वागत उन्होंने इस तरह किया जैसे वह उनका पुत्र हो। जल्द ही निकोलाई सर्जेयिच उससे उसी तरह प्यार करने लगे जैसे वे अपनी बेटी नताशा से करते थे।
यहाँ तक कि बाद में भी, जब निकोलाई सर्जेयिच और लड़के के पिता के बीच पूरी तरह से अलगाव हो गया, अपने प्यारे अल्योशा (निकोलाई सर्जेयिच प्रिंस अलेक्सी पेत्रोविच को इसी नाम से पुकारते थे) की बात करते समय निकोलाई सर्जेयिच के चेहरे पर चमक आ जाती थी। वह सचमुच बहुत प्यारा लड़का था; सुन्दर, सुकुमार और नाज़ुक। वह लड़कियों की तरह घबराता था, हालाँकि इसके साथ-साथ वह ख़ुशमिज़ाज और निश्छल स्वभाव का था। उसकी उदार आत्मा में उच्चतम भावनाओं का स्थान था और उसे एक प्यार करने वाला, सच्चा और कृतज्ञ हृदय मिला था।
वह पूरे परिवार का आदर्श बन गया था। हालाँकि वह उन्नीस वर्ष का ही था, उसे सर्वगुणसम्पन्न कहा जा सकता है। यह विश्वास करना कठिन था कि उसका पिता, जिनके बारे में लोगों का कहना था कि उन्हें अपने बेटे से बेहद प्यार था, किस प्रकार उसे अपने से दूर कर सके। ऐसी चर्चा थी कि पीटर्सबर्ग में उसका समय आवारागर्दी में बीता था और सरकारी सेवा न स्वीकार कर उसने अपने पिता को नाराज़ किया था। निकोलाई सर्जेयिच ने अल्योशा से इस सिलसिले में कोई सवाल-जवाब नहीं किया, क्योंकि प्रिंस ने अपने बेटे के निर्वासन के सम्बन्ध में अपने पत्र में कुछ भी स्पष्ट रूप से नहीं लिखा था। कुछ अफ़वाहें ज़रूर थीं, शायद अल्योशा ने कुछ अक्षम्य ग़लतियाँ की थीं, किसी महिला के साथ किसी साज़िश में वह शरीक था, किसी द्वंद्व युद्ध की भी चर्चा थी, जुए में ज़बरदस्त हार की भी बातें थीं। यहाँ तक कि लोग यह भी कहते थे कि उसने दूसरे लोगों का भी पैसा लुटाया था। लेकिन यह भी अफ़वाह थी कि प्रिंस ने अपने बेटे को बिना किसी अपराध के ही निर्वासित कर दिया था, सिर्फ़ कुछ निजी अभिप्राय से। निकोलाई सर्जेयिच लोगों की इस धारणा से क़तई सहमत नहीं थे, ख़ासकर यह देखते हुए कि अल्योशा को अपने पिता से असाधारण लगाव था, जिनके बारे में अपने बचपन और कैशोर्य के दौरान उसने कुछ भी नहीं जाना था। वह अपने पिता का ज़िक्र अत्यन्त उत्साह और प्रशंसा के स्वर में करता था। ज़ाहिर था कि वह अपने पिता के व्यक्तित्व से पूरी तरह प्रभावित था। अल्योशा कभी-कभी एक काउण्टेस के बारे में बताता था जिससे पिता और पुत्र दोनों का सम्बन्ध था और वह यह भी बताता था कि उसने किस तरह अपने पिता का पत्ता काट दिया था, जिससे वे बहुत नाराज़ हो गये थे। वह हमेशा इस कहानी को बहुत मज़े लेकर हँसते हुए एक बच्चे जैसी सादगी के साथ बयान करता था, लेकिन निकोलाई सर्जेयिच उसे तुरन्त रोक देते थे। अल्योशा ने इस ख़बर की भी पुष्टि की कि उसका पिता विवाह करना चाहता था।
वह निर्वासन का एक साल पूरा कर चुका था। निश्चित अन्तराल पर वह अपने पिता को पूरी गम्भीरता से आदर के साथ पत्र लिखा करता था। आख़िरकार वह वस्सिलयेवस्को में इतना रम गया कि जब गरमियों में उसका पिता वहाँ आया ( निकोलाई सर्जेयिच को इसकी पूर्वसूचना दी गयी थी )तो निर्वासित पुत्र ने अपने पिता से यह अनुनय किया कि उसे वस्सिलयेवस्को में यथासम्भव और अधिक दिन रहने की अनुमति दी जाए, क्योंकि उसे लगता है वह ग्रामांचल के जीवन के लिए ही बना है। अल्योशा के मन के सभी आवेगों और अभिरुचियों के पीछे उसका अत्यधिक व्यग्र और आसानी से प्रभावित होने वाला स्वभाव था। वह खुले दिल का था, लेकिन उसमें ठहराव नहीं था और वह हर बाह्य घटना से तुरन्त प्रभावित हो जाता था। ऐसा लगता था जैसे उसमें स्वतन्त्र इच्छाशक्ति का पूर्णतया अभाव है।
प्रिंस ने अपने पुत्र का अनुरोध सुना, लेकिन ऐसे जैसे उसपर उसे भरोसा न हो।
निकोलाई सर्जेयिच अपने पुराने ‘मित्र’ को पहचान नहीं पा रहे थे। प्रिंस वाल्कोवस्की में अद्भुत परिवर्तन आ गया था। अचानक वे निकोलाई सर्जेयिच के कामकाज में दोष निकालने लगे। जब जागीर के बही खातों पर बातचीत होने लगी तो प्रिंस के व्यवहार में असाधारण लालच, कंजूसी और अविश्वास देखकर सरल हृदय वाले निकोलाई सर्जेयिच को बहुत आघात पहुँचा। बहुत देर तक उन्हें अपने आँख -कान पर ही भरोसा नहीं हो रहा था।
चौदह वर्ष पहले प्रिंस जब पहली बार वहाँ आए थे तब जो उनका व्यवहार था, इस बार उसके ठीक विपरीत आचरण कर रहे थे। इस बार प्रिंस सभी पड़ोसियों से मेल-जोल बढ़ा रहे थे, बेशक उन सभी से जिनसे कोई काम निकल सकता था।
निकोलाई सर्जेयिच के घर वे एक बार भी नहीं आए और उनसे ऐसा बर्ताव किया जैसे वे उनके मातहत हों। अचानक एक दिन अनहोनी हो गयी। बिना किसी स्पष्ट कारण के प्रिंस और निकोलाई सर्जेयिच के बीच तीखी झड़प हो गयी। दोनों तरफ़ से अपमानजनक बातें कही गयीं। निकोलाई सर्जेयिच ने वास्सिलयेव्स्को छोड़ दिया, लेकिन झगड़ा यहीं समाप्त नहीं हुआ। पूरे ग्रामांचल में यह प्रवाद फैल गया कि निकोलाई सर्जेयिच ने नन्हे प्रिंस के भोलेपन का लाभ उठाकर अपना उल्लू सीधा करने की कोशिश की है; कि उनकी बेटी नताशा (जो उस समय सत्रह साल की थी) बीस वर्षीय युवक को अपने प्रेमजाल में फँसा रही थी; कि माता पिता ने इस सम्बन्ध को बढ़ावा दिया है, हालाँकि ज़ाहिर तौर पर उन्होंने यह दर्शाया है कि उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है; कि चालाक और सिद्धान्तहीन नताशा ने उस नौजवान पर जादू डाला है और उसे एक साल से पड़ोस के अच्छे परिवारों की किसी भी लड़की से मिलने नहीं दिया है, जबकि पड़ोसी जमीन्दारों के प्रतिष्ठित ख़ानदानों में अनेक ऐसी लड़कियाँ थीं।
ऐसा दावा किया जा रहा था कि प्रेमी युगल ने वास्सिलयेव्स्को से पन्द्रह वर्स्ट दूर ग्रिगोरयेवो ग्राम में विवाह करने की योजना बनाई है, जिसके बारे में नताशा के माता-पिता जानते हैं और वे अपनी पुत्री को वाहियात सलाह-मशविरे देकर हौसला अफ़्जाई भी कर रहे हैं , लेकिन बाहर से यह दिखावा कर रहे हैं कि उन्हें इस सम्बन्ध में कुछ भी पता नहीं है। सच तो यह है कि इस विषय पर पास-पड़ोस के पुरुषों और स्त्रियों ने इतना अपवाद फैला रखा था कि मैं उनसे पन्ने पर पन्ने रंग सकता हूँ। लेकिन ध्यान देने वाली यह बात थी कि प्रिंस को इन सबका पूरा यक़ीन था और वस्तुतः वास्सिलयेव्स्को आने का यही कारण था, क्योंकि उन्हें यहाँ से एक गुमनाम ख़त मिला था। निकोलाई सर्जेयिच को जो लोग जानते थे वे उनपर लगे किसी भी आरोप पर यक़ीन नहीं कर सकते थे, लेकिन जैसा कि हमेशा होता है, सभी उत्तेजित थे, सभी बातें कर रहे थे और हालाँकि वे कहते थे कि उन्हें इन बातों पर यक़ीन नहीं है, वे अपने सिर हिलाते थे…… और सारा दोष निकोलाई सर्जेयिच पर मढ़ देते थे। निकोलाई सर्जेयिच अपवाद फैलाने वालों के समक्ष अपनी बेटी का बचाव करना अपने स्वाभिमान के विरुद्ध समझते थे। उन्होंने अन्ना एन्द्रेयेव्ना को सख़्ती से हिदायत दी थी कि वे पड़ोसियों को इस सम्बन्ध में किसी भी तरह की सफ़ाई न दें। नताशा स्वयं, जिसकी इस तरह निन्दा हो रही थी, इन आरोपों और अपवादों से पूरे एक साल बाद तक अनजान बनी हुई थी। माता-पिता ने सावधानीपूर्वक उससे सारी कहानी छुपायी थी और वह एक बारह वर्ष की बच्ची की तरह प्रसन्न और निश्छल बनी हुई थी। प्रिंस और निकोलाई सर्जेयिच के बीच मतभेद बढ़ता चला गया। आग में घी डालने वाले लोगों की कमी नहीं थी। झूठी निन्दा करनेवाले और झूठी गवाही देनेवाले सामने आ गये और वे प्रिंस को यह यक़ीन दिलाने में कामयाब हो गये कि वास्सिलयेव्स्को के स्टुअर्ड के रूप में निकोलाई सर्जेयिच ने जो लम्बा समय बिताया है उसके दौरान वे पूरी तरह से ईमानदार रहे हों ऐसा नहीं कहा जा सकता। उन्हें यह भी यक़ीन दिलाया गया कि तीन वर्ष पहले निकोलाई सर्जेयिच ने बग़ीचे की बिक्री में बारह हज़ार रूबल का घपला किया है; इसका अकाट्य प्रमाण अदालत में पेश किया जा सकता है, क्योंकि प्रिंस से उन्हें बिक्री के लिए कोई क़ानूनी अधिकारपत्र नहीं मिला था, उन्होंने बेचने का निर्णय स्वयं लिया था और प्रिंस को बाद में बताया था कि बेचना क्यों ज़रूरी था और बिक्री में जितनी रक़म मिली थी, उससे काफ़ी कम रक़म उन्होंने प्रिंस को दी थी। बेशक ये सारे मिथ्या आरोप थे, जिनका झूठ बाद में साबित हुआ, लेकिन प्रिंस ने उस समय सारे इल्ज़ामात को सही माना और गवाहों की मौजूदगी में निकोलाई सर्जेयिच को चोर कहा। निकोलाई सर्जेयिच भी अपने पर क़ाबू नहीं रख सके और उन्होंने प्रिंस को उतने ही अपमानजनक नाम से पुकारा। एक असह्य और अप्रिय स्थिति उत्पन्न हो गयी। आनन-फ़ानन में मुकदमेबाजी भी शुरू हो गयी। निकोलाई सर्जेयिच कुछ दस्तावेज पेश नहीं कर पाये। उन्हें मुक़दमा लड़ने का कोई अनुभव नहीं था, न उनका कोई शक्तिशाली सरपरस्त ही था। वे मुक़दमे में पिछड़ने लगे। उनकी सम्पत्ति ज़ब्त की गयी। परेशान होकर उन्होंने तय किया कि वे सारा कामकाज छोड़कर पीटर्सबर्ग जायेंगे और अपना मुकदमा ख़ुद लड़ेंगे। उन्होंने प्रान्त का काम एक अनुभवी एजेन्ट के ज़िम्मे सुपुर्द कर दिया। प्रिंस को यह बात शीघ्र ही समझ में आ गयी होगी कि निकोलाई सर्जेयिच पर आरोप लगाकर उन्होंने ग़लती की है, लेकिन दोनों तरफ़ से इतना अधिक अनादर- अपमान हुआ था कि मेल मिलाप की कोई बात ही नहीं बन सकती थी। प्रिंस ग़ुस्से में थे और वह अपने पुराने स्टुअर्ड को सबक़ सिखाना चाहते थे, यानी उसके मुँह का आख़िरी निवाला भी छीन लेना चाहते थे ।
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