चेखव
ज़िले के एक्ज़ामिनिंग मजिस्ट्रेट और डॉक्टर सिरन्या ग्राम में हुई एक मौत की तहक़ीक़ात करने जा रहे थे। राह में वे बर्फ़ की आँधी में फँस गये और बहुत देर तक गोल-गोल चक्कर काटने के बाद अंधेरा होने पर ही गाँव पहुँचे, जबकि उन्होंने सोचा था कि वे दोपहर तक वहाँ पहुँच जाएंगे। उन्होंने जेम्स्त्वो (ज़िला परिषद) के विश्रामगृह में रात बिताने का निश्चय किया। इसी विश्रामगृह में जेम्स्त्वो के बीमा एजेंट लेस्नित्स्की की लाश रखी गयी थी। लेस्नित्स्की तीन दिन पहले सिरन्या आया था। उसने विश्रामगृह में समोवार (रूसी चाय बनाने की केतली) मंगवाया था और उसके बाद अपने आप को गोली मार ली थी। इस घटना ने सबको अचम्भे में डाल दिया था। यह देखते हुए कि उसने बड़े अजीब तरीक़े से अपनी जीवन लीला समाप्त की थी——- उसने अपना टिफ़िन खोलकर मेज़ पर खाना परोसा था, उसके सामने समोवार था और इस हालत में उसने अपने आप को गोली मारी थी —- इस बात से अनेक लोगों को यह संदेह हो गया था कि यह हत्या का मामला हो सकता है। इसलिए तहक़ीक़ात ज़रूरी हो गयी ।
विश्रामगृह के बाहरी कमरे में डॉक्टर और एक्ज़ामिनिंग मजिस्ट्रेट ने अपने ऊपर और अपने जूतों पर पड़ी बर्फ़ झाड़ी। गाँव का बूढ़ा सिपाही इल्या लोशादिन एक टिन की लालटेन लिए खड़ा था। हवा में पराफिन की तेज़ गन्ध थी।
“तुम कौन?” डॉक्टर ने पूछा।
“शिपाही…” सिपाही ने जवाब दिया।
वह जब डाकघर में रसीदों पर दस्तखत करता था तो ‘सिपाही’ को ‘शिपाही’ लिखता था।
“और गवाह कहाँ हैं?”
“हुज़ूर, वे ज़रूर चाय पीने गये होंगे।”
दायीं तरफ़ बैठक था, जिसका उपयोग बाहर से आनेवाले यात्री करते थे। बायीं तरफ़ रसोई थी, जिसमें एक बड़ा चूल्हा था और तख़्तों के नीचे छुपे हुए शेल्फ़ थे। डॉक्टर और एक्ज़ामिनिंग मजिस्ट्रेट और उनके पीछे-पीछे अपने सिर से ऊपर लालटेन उठाये हुए सिपाही बैठक में आ गये। यहाँ फ़र्श पर मेज़ के पायों के निकट सफ़ेद चादर से ढकी एक लम्बी लाश पड़ी थी। लालटेन की धुँधली रोशनी में भी वे स्पष्ट रूप से देख सकते थे कि सफ़ेद चादर में लिपटी लाश और उसकी बग़ल में नये रबड़ के जूते और आसपास की सारी चीज़ें भयावह लग रही हैं—— अन्धेरी दीवारें, सन्नाटा, रबड़ के जूते और स्थिर, निष्पन्द लाश। मेज़ पर समोवार था, जो तब से ठंडा पड़ा हुआ था और उसके पास कुछ डिब्बाबंद सामान थे, शायद खाद्य सामग्री थी।
“जेम्स्त्वो के विश्रामगृह में अपने आप को गोली मार लेना, कितनी ग़ैर-ज़िम्मेदाराना हरकत है!” डॉक्टर ने कहा, “यदि किसी को अपने भेजे में गोली उतारनी ही है, तो उसे यह काम अपने घर पर करना चाहिए।”
वह जिस हाल में था, उसी हाल में— अपनी टोपी, फ़र कोट और फ़ेल्ट ओवरबूट पहने हुए ही एक बेंच पर धँस गया; एक्ज़ामिनिंग मजिस्ट्रेट उसके सामने बैठ गया।
“हिस्टीरिया और दिमाग़ी फ़ितूर के शिकार ये लोग बड़े ख़ुदगर्ज़ होते हैं।” डॉक्टर आवेश में बड़बड़ा रहा था, “ यदि कोई ऐसा आदमी आपके साथ आपके कमरे में हो और आप सो रहे हैं तो वह अख़बार फड़फड़ाएगा; यदि वह आपके साथ डिनर ले रहा है तो आपकी मौजूदगी का कोई ख़याल किये बग़ैर अपनी बीवी से लड़ बैठेगा; और जब उसे अपने आप को गोली मार लेने का मन करेगा तो वह एक गाँव में आकर जेम्स्त्वो के विश्रामगृह में ख़ुदकुशी करेगा, ताकि वह हर किसी को ज़्यादा से ज़्यादा परेशान कर सके। हर हाल में ये लोग अपने सिवा किसी के बारे में नहीं सोचते हैं। यही वजह है कि पुरानी पीढ़ी के लोग स्नायु रोग से पीड़ित इस ज़माने को इतना नापसन्द करते हैं।”
“पुरानी पीढ़ी के लोग तो न जाने कितनी चीज़ों को नापसन्द करते हैं,” एक्ज़ामिनिंग मजिस्ट्रेट ने उबासी लेते हुए कहा, “आपको उन्हें बताना चाहिए कि ख़ुदकुशी के मामले में पहले की तुलना में आज क्या फ़र्क़ आया है। पहले कुलीन कहलाने वाले लोग अपने आप को इसलिए गोली मारते थे, क्योंकि वे सरकारी धन का ग़बन करते थे; लेकिन आज लोग ख़ुदकुशी इसलिए करते हैं क्योंकि वे ज़िन्दगी से बेज़ार हैं, निराश हैं। …….. कौन सी स्थिति बेहतर है?”
“ज़िन्दगी से बेज़ार, निराश.. लेकिन आपको यह बात तो माननी ही होगी कि यह आदमी कहीं और जाकर मर सकता था।”
“कितनी परेशानी है हुज़ूर!” सिपाही ने कहा, “कितनी परेशानी! लोग सचमुच डरे हुए हैं। वे तीन रातों से सोए नहीं हैं। बच्चे रोते रहते हैं। गायों को दुहना है, लेकिन औरतें गोशाला नहीं जातीं। वे डरती हैं कि अन्धेरे में उन्हें ये साहब दिख जाएंगे। बेशक औरतें जाहिल होती हैं, लेकिन कुछ मर्द भी तो डरे हुए हैं। अन्धेरा होते ही कोई भी इधर से अकेला नहीं गुज़रता। सब झुंड बनाकर चलते हैं। गवाह भी……”
डॉ. स्तार्त्चेन्को अधेड़ उम्र के सज्जन थे। उनकी आँखों पर चश्मा था और दाढ़ी काली थी। एक्ज़ामिनिंग मजिस्ट्रेट लाइज़िन एक गोरा-चिट्टा युवक था। उसे दो वर्ष पहले ही डिग्री मिली थी और अभी भी अधिकारी के बजाय एक विद्यार्थी लगता था। दोनों चुप हो गये और कुछ सोचने लगे। उन्हें इस बात से खीझ हो रही थी कि वे यहाँ देर से पहुँचे। अब उन्हें सुबह तक इन्तज़ार करना होगा और यहीं पर रात बितानी होगी, जबकि अभी छह भी नहीं बजे हैं। उन्हें अब एक लम्बी शाम, अन्धेरी रात, ऊब, कष्टदायक बिस्तर, कीट-पतंगे और सुबह की सर्दी झेलनी है। विश्रामगृह की चिमनी और लॉफ्ट से बर्फ़ के तूफ़ान की हू-हू की आवाज सुनते हुए दोनों सोच रहे थे कि उन्होंने जिस तरह की ज़िन्दगी का सपना देखा था, उसकी तुलना में यह सब कितना अलग है। वे अपने समसामयिकों से कितनी दूर हैं, जो अभी शहर की रौशन गलियों में चहलक़दमी कर रहे होंगे और मौसम की ओर उनका ध्यान भी नहीं गया होगा या थियेटर जाने की तैयारी कर रहे होंगे या अपनी स्टडी में किसी पुस्तक का रसास्वादन कर रहे होंगे। उन्हें लग रहा था कि सेंट पीटर्सबर्ग के नेव्स्की प्रोस्पेक्ट में या मास्को में पेत्रोव्का मार्ग पर एक बार चहलक़दमी करने के लिए, कोई मधुर संगीत सुनने के लिए, या एक-आध घंटे किसी अच्छे रेस्तराँ में बैठने के लिए वे क्या कुछ न्योछावर नहीं कर सकते हैं।
“हू-हू-हू-हू!” लॉफ़्ट से तूफ़ान की आवाज आ रही थी। बाहर किसी चीज़ के गिरने या टूटने की खड़खड़ाती ज़ोरदार आवाज आयी, शायद विश्रामगृह का साइनबोर्ड टूटकर गिर गया था।
“हू-हू-हू-हू!”
“आपकी जैसी मर्ज़ी हो करें, लेकिन मेरा यहाँ ठहरने का क़तई इरादा नहीं है,” स्तार्त्चेन्को ने बेंच से उठते हुए कहा। “अभी छह भी नहीं बजे हैं। इतनी जल्दी तो सोया नहीं जा सकता। मैं चलता हूँ। वॉन ताउनित्ज़ यहाँ से थोड़ी दूर पर ही रहता है। सिरन्या से बस दो-चार मील का रास्ता होगा। मैं उससे मिलने चलता हूँ और मैं शाम वहीं बिताऊंगा। सिपाही, ज़रा दौड़कर मेरे कोचवान को बोलो कि वह घोड़ों को बग्घी से न हटाए। और आप क्या करने वाले हैं?” उसने लाइज़िन से पूछा।
“पता नहीं; शायद मैं सो जाऊँ।”
डॉक्टर अपना फ़र कोट पहनकर बाहर चला गया। लाइज़िन ने सुना कि वह कोचवान से बातें कर रहा है। इसके बाद ठंड में अकड़े घोड़ों के काँपने से घंटियों के बजने की आवाज सुनाई दी। वह बग्घी में सवार होकर चला गया।
“हुज़ूर, इस कमरे में रात बिताना ठीक नहीं होगा।” सिपाही ने कहा, “दूसरे कमरे में आइए। कमरा साफ़ नहीं है, लेकिन एक रात के लिए बुरा नहीं है। मैं किसी किसान से एक समोवार मांगकर लाता हूँ और उसे गर्म कर देता हूँ। आपके लिए थोड़ा पुआल भी बिछा देता हूँ और उसके बाद आप आराम से सोने जाएँ हुज़ूर। ईश्वर आपकी रक्षा करे!”
कुछ देर बाद एक्ज़ामिनिंग मजिस्ट्रेट रसोई में बैठकर चाय पी रहा था और सिपाही लोशादिन दरवाज़े पर खड़े होकर बातें कर रहा था। वह लगभग साठ वर्ष का ठिगने क़द का, बहुत दुबला-पतला, झुकी कमर वाला बूढ़ा था। उसके चेहरे और पनीली आँखों में भोलेपन की एक सहज मुस्कुराहट थी। बीच-बीच में वह अपने ओठों से चटखारे लेता था, मानो कोई मिठाई चूस रहा हो। वह भेड़ के चमड़ों से बना एक छोटा कोट और फ़ेल्ट के ऊँचे बूट पहने हुए था। उसके हाथ में हमेशा एक लाठी रहती थी। एक्ज़ामिनिंग मजिस्ट्रेट की कच्ची उम्र को देखकर उसके अन्दर ममत्व जग गया था और इसलिए वह उससे अधिक अपनेपन के साथ बातें कर रहा था।
“एल्डर (गाँवों के समूह का प्रधान) ने आदेश दिया था कि जब पुलिस अधीक्षक या एक्ज़ामिनिंग मजिस्ट्रेट आएँ तो उन्हें ख़बर दी जाए,” उसने कहा, “इसलिए मैं सोचता हूँ मुझे चलना चाहिए। ……वोलोस्ट (एल्डर का कार्यालय) यहाँ से लगभग तीन मील दूर है। बर्फ का तूफ़ान तो डरा रहा है।…. क्या पता आधी रात तक भी पहुँच पाएँ या नहीं। हवा तो जैसे दहाड़ रही है।”
“मुझे एल्डर की ज़रूरत नहीं है,” लाइज़िन ने कहा। “यहाँ उनके लिए करने को कुछ नहीं है।”
उसने उस बूढ़े को कुतूहल की नज़र से देखा और पूछा:
“दादा, मुझे बताओ, तुम कितने वर्षों से सिपाही हो ?”
"कितने? क्यों, यही तीस बरस। जहाँ तक मुझे याद है आज़ादी (दास कृषकों की आज़ादी) के पाँच साल बाद से ही मैं सिपाही बनकर चक्कर काट रहा हूँ। उस दिन से मैं बिला नागा बाहर निकलता हूँ। दूसरों को छुट्टियाँ मिलती हैं, लेकिन मुझे हर रोज़ निकलना है। जब ईस्टर आता है और गिरजाघर में घंटियाँ बजती हैं और क्राइस्ट जी उठते हैं, तब भी मैं अपना थैला उठाये ख़ज़ाना, डाकघर, पुलिस सुपरिन्टेंडेंट के घर, गाँव के कैप्टन, टैक्स इन्सपेक्टर, नगरपालिका कार्यालय, कुलीन वर्ग, किसान, ओर्थोडाक्स ईसाई- सबके पास जाता हूँ। मैं पार्सल,नोटिस,टैक्स के काग़ज़ात, ख़त, किस्म क़िस्म के फ़ार्म, सर्कुलर लेकर जाता हूँ। हाँ साहब, आजकल न जाने कितने क़िस्म के फ़ार्म हैं—-लाल,पीले और सफ़ेद फ़ार्म । हरेक भद्र पुरुष या पादरी या अच्छी हैसियत वाले किसान को एक साल में दर्जनों फार्मों में आँकड़े भरने पड़ते हैं कि उसने कितना बोया है और कितना काटा, कितने बीघे में जौ है, कितने में ओट्स हैं, कितना पुआल है, मौसम कैसा है, कितनी क़िस्म के कीट-पतंगे हैं,वग़ैरह वग़ैरह । यह सच है कि आप जो चाहे लिख सकते हैं, यह केवल खानापूर्ति है, लेकिन इस काम के लिए किसी को जाना पड़ता है, नोटिस बाँटनी पड़ती है और बाद में फिर जाकर भरे हुए फ़ार्मों को इकट्ठा करना पड़ता है। मिसाल के तौर पर हम यदि इसी मामले की बात करें तो इस महाशय की चीर-फाड़ करने की क्या ज़रूरत है? आप हुज़ूर अच्छी तरह जानते हैं कि यह महज़ एक बेवक़ूफ़ी है, आप केवल अपने हाथ गन्दे करेंगे, लेकिन इसके बावजूद आपको कष्ट दिया गया है; आप यहाँ आए हैं, क्योंकि यही कायदा है, आपके पास इसके सिवा कोई चारा नहीं है। तीस वर्षों से मैं क़ायदे के अनुसार चक्कर काट रहा हूँ। गरमी के मौसम में तो ठीक है, हवा गर्म और शुष्क रहती है, लेकिन जाड़े और पतझड़ में कितनी तकलीफ़ होती है! कभी-कभी तो मैं डूबते-डूबते बचा हूँ और कभी बर्फ़ की आँधी में लगभग जम चुका हूँ। मेरे साथ हर तरह की दुर्घटनाएँ घटी हैं- एक बार जंगल में लुटेरे मेरे पीछे पड़ गये और मेरा थैला छीन लिया; मुझे लोगों ने पीटा भी है और मुझे अदालत में भी हाज़िर होना पड़ा है।”
“किस आरोप में?”
“जालसाज़ी के आरोप में।”
“मतलब?”
“हुआ यह कि क्लर्क ह्रिसान्फ ग्रिगोरियेव ने ठेकेदार को कुछ तख़्ते बेचे थे, जो किसी और आदमी के थे। दरअसल, उसने उसे धोखा दिया था। मुझे इस मामले में फँसा दिया गया। क्लर्क ने मुझे वोदका लाने के लिए शराबख़ाने भेजा था, लेकिन उसने मुझे कोई पैसा नहीं दिया था—- एक ग्लास वोदका भी नहीं। लेकिन अपनी ग़रीबी के कारण——मेरा मतलब है मैं जो फटेहाल दिखता हूँ, उसके कारण ——-मैं ऐसा आदमी नहीं था या मेरी ऐसी हैसियत नहीं थी कि मुझपर या मेरी बातों पर भरोसा किया जाता। हम दोनों पर मुकदमा चला। उसे क़ैद हुई, लेकिन ऊपर वाले का लाख-लाख शुक्र है कि मुझे हर आरोप से बरी कर दिया गया। आप जानते हैं कचहरी में उन्होंने इस बारे में एक नोटिस पढ़कर सुनायी। उस समय अदालत में सबके सब वर्दी में थे। हुज़ूर मेरा काम ऐसा है कि जिसे इसकी आदत नहीं है उसके लिए बहुत भारी पड़ेगा, लेकिन मेरी लिए तो अब यह कुछ भी नहीं है। सच तो यह है कि जिस दिन मैं चलता नहीं उस दिन मेरे पाँवों में दर्द रहता है। घर पर तो मेरी दुर्दशा बढ़ जाती है। घर पर रहो तो वोलोस्ट ऑफ़िस के क्लर्क के लिए स्टोव गर्म करना पड़ता है, उसके लिए पानी ढोकर लाना पड़ता है, उसके जूते साफ़ करने पड़ते हैं।”
“तुम्हारा वेतन क्या है?” लाइज़िन ने पूछा।
“साल के चौरासी रूबल।”
“इसके अलावा बीच-बीच में छोटी-मोटी कमाई होती होगी। है ना?”
“छोटी-मोटी कमाई? नहीं साहब! आजकल भले लोग बख़्शीश कहाँ देते हैं? आजकल लोग बड़े कड़क मिज़ाज हो गये हैं। उन्हें हर बात बुरी लगती है। यदि उनके लिए नोटिस ले जाओ तो वे नाराज़ हो जाते हैं। यदि उनके सम्मान में अपना हैट हटाओ तो भी बुरा मानते हैं। ‘तुम ग़लत दरवाज़े पर आए हो।’ वे कहते हैं। ‘तुम पियक्कड़ हो।’ ‘तुमसे प्याज़ की बू आती है। तुम उज्जड़ गँवार हो।’ वग़ैरह वग़ैरह। कुछ लोग ज़रूर रहमदिल होते हैं; लेकिन उनसे भी क्या मिलता है? वे लोग हँसी ठट्ठा करते हैं और आपको न जाने क्या-क्या कहकर पुकारते हैं। मिसाल के तौर पर, एक श्रीमान अल्तुहिन हैं। नेकदिल इन्सान हैं। आप उन्हें देखेंगे तो आपको लगेगा कि वे बहुत संजीदा हैं और उनका दिमाग दुरुस्त है, लेकिन जैसे ही उनकी नज़र मुझ पर पड़ती है तो वे चीख़ने-चिल्लाने लगते हैं और उन्हें ख़ुद पता नहीं रहता है कि वे क्या कहना चाहते हैं। वे तो मुझे न जाने किस नाम से पुकारते हैं। उन्होंने मुझे कहा, ‘तुम……………. हो।’ ” सिपाही ने बुदबुदाकर कुछ शब्द कहा, लेकिन इतने धीमे स्वर में कि कुछ समझना मुश्किल था।
“क्या?” लाइज़िन ने पूछा। “फिर बोलो।”
“ ‘प्रशासन’” सिपाही ने ऊँचे स्वर में दुहराया। “ वे मुझे पिछले छह सालों से इसी नाम से पुकारते हैं, ‘अबे ओ प्रशासन!’ लेकिन मैं बुरा नहीं मानता; ठीक है, उनकी मर्ज़ी, जो चाहे पुकारें। ईश्वर उनका भला करे! कभी-कभी कोई महिला एक ग्लास वोदका और खाने के लिए किसी पकवान का टुकड़ा भेज देती है और मैं उनकी सेहत की दुआ करते हुए पी लेता हूँ। लेकिन किसान ज़्यादा देते हैं। किसानों के दिल में दया रहती है और खुदा का ख़ौफ़ रहता है। उनमें से कोई रोटी का एक टुकड़ा देगा, तो कोई दूसरा थोड़ा सूप देगा और कोई तीसरा साथ में कुछ पीने का भी इन्तज़ाम कर देगा। गाँव के प्रधान तो सराय में ले जाकर चाय भी पिलाते हैं। यहाँ भी सारे गवाह चाय पीने गये हैं। ‘लोशादिन’ उन्होंने कहा, ‘तुम यहाँ ठहरो और हमारा इन्तज़ार करो।’ और उनमें से हर एक ने मुझे एक कोपेक दिया। आप समझ गये होंगे कि वे डरे हुए हैं, क्योंकि उन्हें ऐसी वारदातों का कोई अनुभव नहीं है। कल उन्होंने मुझे पन्द्रह कोपेक दिये थे और पीने के लिए भी दिया था।”
“और तुम? क्या तुम्हें डर नहीं लगता?”
“लगता है, हुज़ूर; लेकिन यह तो मेरी ड्यूटी है, मैं इससे कैसे भाग पाऊँगा? पिछली गर्मी में मैं एक अपराधी को शहर ले जा रहा था, रास्ते में वह मुझ पर ही पिल पड़ा। उसने मेरी कितनी पिटाई की! मेरे चारों ओर केवल खेत-मैदान और जंगल थे- मैं उससे कैसे बचता? यहाँ भी यही बात है। मैं श्रीमान लेनित्सकी को तब से जानता हूँ जब उनकी बड़ी इज़्ज़त हुआ करती थी। मैं उनके माता-पिता को भी जानता हूँ । मैं नेदोश्चोतोवा गाँव का रहने वाला हूँ। उनकी ज़मीन मेरी ज़मीन से एक फ़र्लांग से भी कम दूरी पर है। श्रीमान लेस्नित्स्की की एक बहन थी, जो ख़ुदा से डरने वाली रहमदिल महिला थी। ईश्वर अपनी दासी यूल्या की आत्मा को अपने पास रखे, चिर काल तक उसकी स्मृति बनी रहे! उसने शादी नहीं की थी और मरते समय अपनी सारी जायदाद बाँट दी। उसने तीन सौ एकड़ ज़मीन मोनास्ट्री के लिए और छह सौ एकड़ ज़मीन नेदोश्त्चोतोवा गाँव के किसानों के कम्यून के लिए रखा, ताकि लोग उसकी आत्मा का पुण्य स्मरण करें, लेकिन लेस्नित्स्की के बड़े भाई ने वसीयत छुपा दी, लोग कहते हैं कि उसने उसे चूल्हे में जला दिया और सारी ज़मीन हथिया ली। बेशक उसने यह सब अपने फ़ायदे के लिए किया होगा, लेकिन, ऐसी भी क्या जल्दी है भाई, इस दुनिया में बेईमानी के सहारे बहुत दूर तक नहीं जा पाओगे । इसके बाद बीस सालों तक उसने पाप- स्वीकार नहीं किया । वह चर्च जाता ही नहीं था, और बिना पछतावा किये मर गया। वह बहुत मोटा था। मुटापे के कारण ही वह फट गया। इसके बाद उसका क़र्ज़ा चुकाने के लिए छोटे मालिक सेर्योज़ा (लेस्नित्स्की) के पास जो भी था,वह छिन गया। उसने अपनी पढ़ाई भी पूरी नहीं की थी। ग्रामीण परिषद के अध्यक्ष, जो सेर्योज़ा के चाचा थे, ने सोचा, “मैं उसे एजेंट के रूप में ले सकता हूँ। वह लोगों से बीमा की किश्तें तो वसूल कर ही सकता है। यह कोई मुश्किल काम नहीं है।” और सेर्योज़ा युवा था, स्वाभिमानी था। वह बेहतर ज़िन्दगी जीना चाहता था, उच्चतर जीवनशैली और अधिक आज़ादी वाली ज़िन्दगी । यह सच है कि एक टूटी-फूटी पुरानी बग्घी में ज़िले भर हिचकोले खाना और किसानों से बहस मुहाबिसा करना उसकी नज़र में घटिया काम ही था। वह चलते समय हमेशा नीचे ज़मीन पर नज़र टिकाए रहता था। हमेशा नीची नज़र और चुप रहना। यदि उसके कान के पास ज़ोरों से उसका नाम पुकारो, “सेर्ज़े सेर्जेयिच!” तब भी वह केवल एक बार चारों ओर देख कर “हाँ?” बोलेगा और फिर ज़मीन घूरने लगेगा। और अब आप देख रहे हैं कि उसने अपने आपको ही ख़त्म कर लिया है। हुज़ूर यह सब कितना बेमानी लगता है, कितना ग़लत है। हे परम दयालु ईश्वर, इन बातों का क्या अर्थ है! आपका बाप अमीर है और आप ग़रीब हैं; बेशक यह दुख देने वाली बात है, लेकिन आपको इस पर सोचना होगा। मैं भी अच्छी ज़िन्दगी जीता था; हुज़ूर, मेरे पास दो घोड़े थे, तीन गायें थीं, बीस भेड़ें थीं; लेकिन समय बदला और मेरे पास एक फटे-पुराने थैले के सिवा कुछ नहीं है और वह भी मेरी नहीं, सरकारी सम्पत्ति है। और सच कहा जाए तो हमारे नेदोश्तचोतोवा में सबसे बुरी हालत मेरे घर की ही है। मेकी के चार नौकर थे, अब मेकी ख़ुद नौकर है। पेत्राक के पास चार मज़दूर थे, और अब पेत्राक ख़ुद मज़दूर है।”
“तुम गरीब कैसे बन गये?” एक्जामिनिंग मजिस्ट्रेट ने पूछा।
“मेरे बेटे भारी पियक्कड़ थे। मैं बता नहीं सकता कि वे किस तरह पीते थे, आपको यक़ीन नहीं होगा।”
लाइज़िन सुन रहा था और सोच रहा था कि वह, लाइज़िन, देर-सबेर मास्को पहुँच जाएगा, लेकिन यह बूढ़ा सदा के लिए यहीं रहेगा और लगातार चलता रहेगा। और ज़िन्दगी में न जाने कितनी बार उसकी भेंट इस तरह के दीन- जर्जर बूढ़ों से होगी, जिन्हें वह कोई महत्व नहीं देगा, लेकिन जिनकी आत्मा में पन्द्रह कोपेक और वोदका की ग्लासों के साथ- साथ यह गहरा विश्वास भी बैठा हुआ है कि आप बेईमानी के सहारे ज़िन्दगी नहीं जी सकते।
इसके बाद उसे लगा जैसे बूढ़े की बातें सुनते- सुनते वह थक गया है। उसने उसे कहा कि वह उसके बिस्तर के लिए थोड़ी पुआल ले आए । मुसाफ़िरों के कमरे में एक लोहे का पलंग था, रज़ाई और तकिया भी था। वह उस पलंग को अपने कमरे में लगाने के लिए कह सकता था, लेकिन पिछले तीन दिनों से मृतक उस पलंग के पास ही पड़ा हुआ था ( और शायद मरने के ठीक पहले उसपर बैठा होगा) और इसलिए अब उस पलंग पर सोना अरुचिकर लग रहा था....
“अभी केवल साढ़े सात बजे हैं,” लाइज़िन ने अपनी घड़ी देखकर सोचा, “यह सब कितना भयावह है!”
उसे नींद नहीं आ रही थी, लेकिन समय काटने के लिए कोई और काम नहीं था, इसलिए वह बिस्तर पर लेट गया और एक लिहाफ़ ओढ़ लिया। लोशादिन कई बार कमरे के अंदर-बाहर आता-जाता रहा। वह चाय की कप-प्लेटें हटा रहा था, अपने ओठों से सिसकारी भर रहा था, कराह रहा था, और मेज़ के चारों ओर अपने पैरों से धम-धम कर रहा था। आख़िरकार वह अपनी छोटी लालटेन लेकर बाहर चला गया। उसके लम्बे झुके बदन और सफ़ेद बालों वाले सिर को पीछे से देखते हुए लाइज़िन ने सोचा:
“किसी ओपेरा के जादूगर जैसा लग रहा है।”
अन्धेरा हो चुका था। बादलों के पीछे चाँद होगा, क्योंकि खिड़कियाँ और खिड़कियों के फ़्रेम पर जमी बर्फ़ साफ़-साफ़ दिख रही थी।
“हू-हू-हू” आँधी गा रही थी, “हू-हू-हू!”
“पवित्र सन्तो” दुछत्ती से कोई औरत पुकार रही थी या “पवित्तर सन…तो” जैसा सुनाई दे रहा था।
"बू-बूट!” बाहर दीवार से कोई चीज़ टकराई “ट्रा!”
एक्जामिनिंग मजिस्ट्रेट ने ध्यान से सुना: ऊपर कोई औरत नहीं थी, यह तेज हवा का शोर था। ठंड बढ़ रही थी। उसने लिहाफ़ के ऊपर अपना फ़र कोट डाल लिया। थोड़ी गर्मी महसूस करते हुए उसने सोचा कि उसने अपने लिए जिस तरह की ज़िन्दगी की कल्पना की थी उससे यह सब—- आँधी, झोपड़ी, बूढ़ा और बग़ल के कमरे में पड़ी लाश—- कितना अलग, कितना घटिया, तुच्छ और उबाऊ है। यदि इस शख़्स ने मास्को या उसके आस-पास किसी जगह पर ख़ुदकुशी की होती और यदि वह वहाँ तहक़ीक़ात करने जाता, तो वह एक रोचक और महत्वपूर्ण बात होती, तब शायद वह लाश के बग़ल वाले कमरे में सोने से भी डरता। यहाँ, मास्को से लगभग हज़ार मील दूर, सारी चीज़ें कुछ अलग ही रोशनी में दिखती हैं; जैसे यह ज़िन्दगी न हो, जैसे लोग-बाग आदमजात न हों, जैसे उनका अस्तित्व बक़ौल लोशादिन केवल “किसी क़ायदे के अनुसार” हो। जैसे ही वह, लाइज़िन, सिरन्या से वापस जाएगा, वह यह सब भूल जाएगा। उसकी स्मृति में इन घटनाओं का हल्का चिह्न भी नहीं बचेगा । मातृभूमि, असली रूस तो मास्को है, पीटर्सबर्ग है; और वह जहाँ है वह तो प्रान्त है, उपनिवेश है। यदि कोई यह ख़्वाब देखता है कि वह किसी क्षेत्र में मशहूर होगा, कोई अग्रणी भूमिका निभाएगा; मसलन बड़े महत्वपूर्ण मामलों में एक्जामिनिंग मजिस्ट्रेट के रूप में या किसी सर्किट कोर्ट में प्रोसेक्यूटर के रूप में या समाज के सर्वेसर्वा के रूप में तो हर बार आदमी मास्को को ही ध्यान में रखते हुए सोचता है। जीना है तो मास्को में। यहाँ आदमी किसी बात की परवाह नहीं करता; लोग अपनी तुच्छ स्थिति से आसानी से समझौता कर लेते हैं; उन्हें अपनी ज़िन्दगी से केवल एक ही अपेक्षा रह जाती कि जल्द से जल्द यहाँ से कूच किया जाए। और लाइज़िन मन ही मन मास्को की गलियों में घूमने लगा। मन ही मन चिर परिचित घरों में गया, अपने दोस्तों और क़रीबियों से मिला। और यह सोचकर उसके दिल में एक मीठी टीस उठी कि वह अभी केवल छब्बीस साल का है और अगर अगले पाँच या दस साल में यहाँ से नाता तोड़कर मास्को जाने में कामयाब हो गया तो यह नहीं माना जाएगा कि बहुत देर हो गयी है, क्योंकि तब भी उसके सामने पूरी ज़िन्दगी पड़ी होगी। और जब वह धीरे-धीरे अचेतन में जाने लगा उसके विचार गड्डमड्ड होने लगे । उसने देखा कि मास्को के कोर्ट के लम्बे गलियारे में वह कोई भाषण दे रहा है। उसने अपनी बहनों को देखा। आर्केस्ट्रा भी था, जो पता नहीं क्यों “हू-हू-हू…” कर रहा था।
“हू-त्रा, हू—हू”। की फिर आवाज आयी।
और अचानक उसे याद आया कि कैसे एक दिन जब वह ग्रामीण परिषद के छोटे दफ़्तर में बुक-कीपर से बातें कर रहा था, तो एक काले बालों और गहरी अंधेरी आँखों वाला दुबला- पतला पिलपिला आदमी अन्दर आया था। उसकी आँखों में कुछ अनमना-सा भाव था, जैसा कि अक्सर ऐसे लोगों में देखा जाता है, जो डिनर के बाद देर तक सोये रह जाते हैं। इस भाव के कारण ही उसका नाज़ुक और मेधावी व्यक्तित्व प्रभाव नहीं छोड़ रहा था। उसने ऊँचे बूट पहन रखे थे, जो उसपर अच्छा नहीं लग रहा था, बल्कि उसके व्यक्तित्व को और बेढंगा बना रहा था। बुक-कीपर ने उनका परिचय दिया: “ये हमारे बीमा एजेंट हैं।”
“तो वह आदमी लेस्नित्स्की था,...यही आदमी” लाइज़िन ने अब सोचा।
उसे लेस्नित्स्की की मधुर आवाज़, उसके चलने का ढंग याद आया और अचानक उसे ऐसा लगा जैसे कोई उसके निकट चल रहा है, जैसे लेस्नित्स्की के कदमों की चाप सुनाई दे रही हो।
अचानक उसे ज़ोरों से डर लगा, उसका माथा ठंडा हो गया।
“कौन है?” उसने डरी आवाज़ में पुकारा ।
“शिपाही!”
“क्या चाहिए?”
“हुज़ूर मैं आपसे पूछने आया हूँ कि आपने आज शाम कहा कि आप एल्डर को यहाँ बुलाना नहीं चाहते, लेकिन मुझे लगता है इससे वे नाराज़ हो जाएँगे। उन्होंने मुझे बुलाया था। क्या मैं जाऊँ?”
“बहुत हो गया। तुम मुझे परेशान कर रहे हो।” लाइज़िन ने झुंझला कर कहा, और फिर से लिहाफ़ ओढ़कर सो गया।
“हुज़ूर, वे नाराज़ होंगे... मैं जाता हूँ । आप आराम कीजिए।” और लोशादिन बाहर चला गया।
रास्ते से खाँसने और लोगों के फुसफुसाने की आवाज़ आ रही थी। शायद गवाह लौट आये हैं।
“इन बेचारों को कल सुबह जल्दी छोड़ देंगे...” एक्जामिनिंग मजिस्ट्रेट ने सोचा, “पौ फटते ही पूछताछ शुरू कर देंगे।”
उसपर फिर तन्द्रा जनित विस्मृति छाने लगी। लेकिन अचानक फिर कुछ कदमों की आहट सुनाई दी, हल्की नहीं, तेज-तेज। दरवाज़ा बन्द करने की आवाज़, कुछ लोगों के बोलने और माचिस की तीली रगड़ने की आवाज़..
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“क्या आप सो रहे हैं? सो रहे हैं?” डॉ. स्तार्तचेन्को हड़बड़ी और बेताबी में पूछ रहे थे और एक के बाद एक माचिस की तीली जलाते जा रहे थे; उनके कपड़े बर्फ़ से गीले हो गये थे और उनके साथ-साथ बर्फीली हवा का झोंका अन्दर आ गया था। “आप सो रहे हैं? उठिए! वॉन ताउनित्ज़ के घर चलना है। उन्होंने आपके लिए अपने घोड़े भेजे हैं। चलिए-चलिए। वहाँ आप को कम से कम रात का खाना मिलेगा और आदमी की तरह सो पाएँगे । मैं ख़ुद आपके लिए आया हूँ । घोड़े लाजवाब हैं। हम बीस मिनट में पहुँच जाएँगे ।”
“अभी कितना बज रहा है?”
“सवा दस”
लाइज़िन को नींद आ रही थी, फिर भी अनिच्छा से उसने फ़ेल्ट ओवरबूट, फ़र के अस्तर वाला कोट, कैप और कनटोप पहना और डॉक्टर के साथ बाहर निकल गया। बहुत तेज बर्फ़बारी नहीं थी, लेकिन हड्डियों को ठिठुराने वाली तेज हवा चल रही थी, जिससे बर्फ़ के बादल सड़क पर इतनी तेज़ी से भाग रहे थे, मानो वे हवा से डरकर भाग रहे हों। बाड़ों के नीचे और दरवाज़ों पर बर्फ़ जमा हो चुकी थी। डॉक्टर और एक्जामिनिंग मजिस्ट्रेट स्लेज़ में बैठे, कोचवान ने स्लेज़ के कवर के बटन बन्द किये। दोनों को गर्मी का अहसास हुआ।
“चलो!”
उनका स्लेज़ गाँव से होकर गुजरा। एक्ज़ामिनिंग मजिस्ट्रेट ने बर्फ़ पर घोड़े के खुरों के निशानों को देखते हुए सोचा, “जैसे पंखों से चिह्नित किया है (पुश्किन के काव्य की एक पंक्ति)” । सभी झोपड़ों में रोशनी थी, जैसे किसी बड़े त्योहार की तैयारी हो। किसान अब तक सोने नहीं गये थे क्योंकि उन्हें मुर्दे का डर था। कोचवान भी चुप था, कुछ मनहूसियत की हद तक, शायद जेम्स्त्वो के विश्रामगृह पर इन्तज़ार करना उसे नहीं भाया था। वह भी अभी मृतक के बारे में ही सोच रहा था ।
“वॉन ताउनित्ज़ के घर सब लोग मेरे ऊपर पिल पड़े” स्तार्त्चेन्को ने कहा, “जब उन्होंने सुना कि आपको झोपड़े में अकेले रात बितानी होगी। उन्होंने मुझे पूछा कि मैं आपको साथ क्यों नहीं लाया?”
गाँव से बाहर निकलते ही, मोड़ पर कोचवान अचानक ज़ोरों से चिल्लाया: “अबे रास्ते से हट!”
उन्हें एक आदमी की झलक दिखी: वह घुटनों तक बर्फ़ में खड़ा था। वह सड़क के किनारे हो गया और घोड़ों को घूरता रहा। एक्ज़ामिनिंग मजिस्ट्रेट ने उसके हाथ में हुक वाली लाठी देखी। उसकी नज़र उसकी दाढ़ी और उसके थैले पर गयी, और उसे लगा वह लोशादिन है। उसे यह भी लगा जैसे वह मुस्कुरा रहा है। बस एक झलक और वह अदृश्य हो गया ।
सड़क पहले जंगल के किनारे-किनारे चल रही थी, फिर एक चौड़े मैदान की बग़ल से जिसे हाल ही जंगल साफ़ कर बनाया गया था। इस मैदान में उन्हें जगह-जगह पुराने देवदार के पेड़ दिखे, कहीं-कहीं भोजपत्र वृक्षों के गुल्म थे और कहीं बलूत के नये पेड़ अकेले खड़े थे। शीघ्र ही ये सब बर्फ़ के बादलों में छुप गये। कोचवान ने कहा कि उसे अब भी जंगल दिख रहा है, लेकिन एक्ज़ामिनिंग मजिस्ट्रेट को स्लेज़ खींचने में मदद के लिए लगाये अतिरिक्त घोड़े के सिवा कुछ नहीं दिख रहा था। उनकी पीठों पर तेज हवा का झोंका महसूस हो रहा था।
अचानक घोड़े रुक गये।
“अब क्या हुआ?” स्तार्त्चेन्को ने चिढ़ते हुए पूछा।
कोचवान बिना कुछ बोले गाड़ी से नीचे उतर गया और स्लेज़ के चारों ओर गोल-गोल घूमने लगा। वह बड़ा घेरा बनाता जा रहा था और स्लेज़ से दूर होते जा रहा था। आख़िरकार वह वापस आया और स्लेज़ को दायीं दिशा की ओर घुमाने लगा।
“तुम रास्ते से नीचे उतर आये थे?” स्तार्त्चेन्को ने पूछा
“कोई बात नहीं...”
इसके बाद एक छोटा गाँव मिला, जिसमें एक भी बत्ती नहीं जल रही थी। फिर जंगल और मैदान। एक बार फिर वे रास्ता भटक गये और कोचवान गाड़ी से नीचे उतरा और स्लेज़ के चारों ओर गोल-गोल नाचा। इसके बाद स्लेज़ एक अन्धेरे मार्ग से जाने लगा और काफ़ी तेज दौड़ने लगा । स्लेज़ में जुते अतिरिक्त घोड़े की खुर बार-बार स्लेज से टकरा रही थी। पेड़ों से डरावनी आवाज़ आ रही थी। कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था, मानो वे अन्तरिक्ष में उड़ रहे हों। अचानक किसी द्वार से और खिड़कियों से आती हुई तेज रोशनी से उनकी आँखें चौंधिया गयीं और इसी के साथ उन्हें कुत्तों की भलमनसाहत भरी लम्बी भूँक सुनाई दी। वे अपनी मंज़िल पर पहुँच गये थे।
जब वे नीचे अपने फ़र कोट और फ़ेल्ट बूट उतार रहे थे, ऊपर पियानो पर “अन पेतित वेरे द क्लिको” (वाल्ट्ज़ नृत्य के लिए एक धुन) बज रहा था और उसकी धुन पर थिरकते हुए बच्चों का पदताल सुना जा सकता था। अन्दर जाते ही उन्हें एक सुखद उष्णता का अहसास हुआ और पुरानी हवेलियों के कमरों में पायी जाने वाली एक विशेष सुगन्ध ने उन्हें घेर लिया। बाहर का मौसम चाहे जैसा भी हो, इन कमरों में ज़िन्दगी हमेशा गर्म, स्वच्छ और आरामदायक होती है।
“वाह! क्या ख़ूब!” वॉन ताउनित्ज़ ने एक्ज़ामिनिंग मजिस्ट्रेट से गर्मजोशी के साथ हाथ मिलाते हुए कहा। वह गलमुच्छे वाला भारी भरकम डील-डौल का आदमी था। उसकी गर्दन अस्वाभाविक रूप से मोटी थी। “वाह! क्या ख़ूब! आपका बहुत स्वागत है। मिलकर बहुत ख़ुशी हुई। आप जानते हैं, हम दोनों सहकर्मी रहे हैं, कुछ हद तक। कभी मैं डिप्टी प्रोसिक्यूटर था, लेकिन थोड़े ही दिनों के लिए, बस केवल दो साल तक। बाद में मैं यहाँ चला आया। इस जायदाद की देखभाल करने। और यहाँ मैं बूढ़ा हो गया हूँ —- बूढ़ा खूसट। आपका बहुत स्वागत है।” वह बोलते जा रहा था, हालाँकि वह प्रयास कर रहा था कि उसकी आवाज़ बहुत ऊँची न हो। वह मेहमानों के साथ सीढ़ियों से ऊपरी मंज़िल जा रहा था। “मेरी बीवी नहीं है, वे परलोक सिधार गई हैं। आइये, मैं आपको अपनी बेटियों से मिलाता हूँ।” फिर मुड़ते हुए उन्होंने सीढ़ियों से नीचे की ओर कड़कती गूँजती आवाज़ में कहा, “इग्नात को कह दो कल सुबह आठ बजे स्लेज़ तैयार रखे ।”
बैठक में उसकी चार बेटियाँ और उनकी चचेरी बहन अपने बच्चों के साथ मौजूद थीं। चारों बेटियाँ युवा और खूबसूरत थीं और चारों ने स्लेटी रंग की पोशाकें पहन रखी थीं और उनके बाल भी एक ही स्टाइल में सँवारे गये थे। उनकी चचेरी बहन भी युवा और आकर्षक लग रही थी। स्तार्त्चेन्को उन्हें पहले से ही जानता था। वहाँ आते ही वह उनसे अनुरोध करने लगा कि वे कुछ गाकर सुनाएँ। उनमें से दो ने यह बताने में काफ़ी वक़्त लगाया कि उन्हें गाना नहीं आता और वे बजाना भी नहीं जानतीं। आख़िरकार उनकी चचेरी बहन पियानो के सामने बैठी और काँपती आवाज़ में उन्होंने गाना शुरू किया । उन्होंने “द क्वीन ऑफ स्पेड्स” से एक युगल गीत गाया। एक बार फिर “अन पेतित वेरे द क्लिको” धुन बजायी गयी और बच्चे उसपर थिरकने लगे। स्तार्त्चेन्को भी थिरकने लगा। सब लोग हँसने लगे ।
इसके बाद बच्चों ने गुड नाइट कहा और सोने चले गये। एक्ज़ामिनिंग मजिस्ट्रेट हँसता रहा, क्वाड्रिल नाचा, फ़्लर्ट किया और सोचता रहा कि क्या वह ख़्वाब देख रहा है? उसकी आँखों के सामने जेम्स्त्वो झोंपड़े का रसोईघर, कोने में पड़ी हुई पुआल, झींगुरों की सरसराहट, दरिद्रता और बेबसी का वातावरण, गवाहों के स्वर, हवा, बर्फ की आन्धी, राह भटक जाने का ख़तरा और उसके बाद अचानक यह बेहतरीन रौशन कमरा, पियानो की धुन, खूबसूरत लड़कियाँ, घुंघराले बालों वाले बच्चे, सुखद मनभावन हँसी। ऐसा रूपान्तरण जैसे कोई परी कथा हो। और यह बात बिल्कुल अविश्वसनीय लगती है कि यह बदलाव केवल दो मील की दूरी पर और केवल एक घंटे में सम्भव था। लेकिन कुछ अटपटे विचारों के कारण वह खुश नहीं हो पा रहा था। वह बार-बार सोच रहा था कि यहाँ जो कुछ है, वह ज़िन्दगी नहीं है, बल्कि ज़िन्दगी की छोटी-मोटी कतरनें हैं। यहाँ सबकुछ महज़ एक संयोग है, इससे कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। उसे दरअसल उन लड़कियों से हमदर्दी हो रही थी कि इनकी ज़िन्दगी भी इस सुदूर उपेक्षित प्रदेश में बीत जायेगी जो संस्कृति और चहल-पहल के केन्द्र से कितनी दूर है। उस केन्द्र में कुछ भी संयोग से घटित नहीं होता, बल्कि हर चीज़ तर्कसंगत और क़ानून के अनुसार होती है। उदाहरण के लिए वहाँ प्रत्येक आत्महत्या की व्याख्या की जा सकती है कि वह क्यों हुई और समाज की वर्तमान स्थिति में उसका क्या महत्व है। उसे लगा जैसे उसके चारों ओर जो ज़िन्दगी है वह उसकी समझ से परे है और यदि उसके लिए इसका कोई अर्थ नहीं है तो इसके अस्तित्व को भी नकारा जा सकता है।
रात के खाने पर लेस्नित्स्की की चर्चा छिड़ गयी ।
“वह अपने पीछे पत्नी और एक बच्चा छोड़ गया है,” स्तार्तचेन्को ने कहा , “मेरा वश चलता तो मैं स्नायु रोग से पीड़ित लोगों को और जिनका भी स्नायु तंत्र कमजोर है, उनको शादी करने से मना कर देता। ऐसे लोगों को अपने जैसे लोगों की तायदाद बढ़ाने का हक़ नहीं होना चाहिये । दुनिया में स्नायु रोगग्रस्त और अपंग बच्चों को लाना अपराध है।”
“वह बहुत ही अभागा नौजवान था,” वॉन ताउनित्ज़ ने धीरे से आह भरते हुए और अपना सिर हिलाते हुए कहा। “अपनी ज़िन्दगी को, अपनी युवा ज़िन्दगी को इस तरह ख़त्म करने का निर्णय लेने के पहले न जाने उसे कितनी पीड़ा हुई होगी। इस तरह की दुर्घटना किसी भी परिवार में हो सकती है और यह कितनी भयावह बात है! ये चीजें बेहद असहनीय होती हैं.....”
सभी लड़कियाँ चुपचाप सुन रही थीं और बहुत संजीदा होकर अपने पिता को देख रही थीं। लाइज़िन को लगा उसे भी कुछ कहना चाहिए, लेकिन क्या, नहीं सोच पाया। उसने केवल यह कहा:
“हाँ, ख़ुदकुशी दुर्भाग्यपूर्ण घटना है।”
वह एक गर्म कमरे में, नरम बिस्तर पर सोने गया। बिस्तर पर रज़ाई थी और रज़ाई के नीचे पतली सफ़ेद चादरें थीं, लेकिन न जाने क्यों उसे आराम महसूस नहीं हो रहा था, शायद इसलिए, क्योंकि बग़ल के कमरे में डॉक्टर और वॉन ताउनित्ज़ देर तक बातें करते रहे और छत पर और स्टोव से हवा वैसे ही “हू.....हू...” करते हुए शोर मचा रही थी, जैसे जेम्स्त्वो के झोंपड़े में उसने सुना था।
वॉन ताउनित्ज़ की बीवी दो वर्ष पहले स्वर्ग सिधार चुकी थीं, लेकिन अभी भी उस क्षति से वे समझौता नहीं कर पाये थे। चाहे बात किसी विषय पर हो, वे अपनी बीवी की चर्चा ज़रूर करते। वे कभी प्रोसिक्यूटर थे, इसका कोई चिन्ह उनके व्यक्तित्व में नहीं रह गया था।
“क्या यह मुमकिन है कि मेरी भी किसी दिन यही हालत हो?” लाइज़िन ने लगभग अर्धनिद्रा में सोचा। वह अब भी दीवार के उस पार से आती अपने मेज़बान की धीमी शोकाकुल आवाज़ सुन सकता था।
एक्ज़ामिनिंग मजिस्ट्रेट को गहरी नींद नहीं आयी। उसे गर्मी और बेचैनी महसूस हो रही थी। नींद में उसे ऐसा लग रहा था, जैसे वह वॉन ताउनित्ज़ के नरम साफ बिस्तर पर नहीं बल्कि जेम्स्त्वो के पुआल पर ही सोया हुआ है और गवाहों की दबी सहमी फुसफुसाहट सुन रहा है। उसे लगा जैसे लेस्नित्सकी ठीक उसकी बग़ल में है, पन्द्रह कदम दूर नहीं। सपने में भी उसे याद आया कि कैसे काले बालों वाला, क्षीणकाय बीमा एजेंट धूल भरी ऊँची बूटों को पहन कर बुक-कीपर के दफ़्तर में आया था। “ये हमारे बीमा एजेंट हैं....”
फिर उसने यह सपना देखा कि लेस्नित्सकी और सिपाही लोशादिन खुले आसमान के नीचे बर्फ की आँधी में साथ-साथ एक दूसरे को सहारा देते हुए जा रहे हैं। बर्फ की आँधी उनके सिरों के पास गोल-गोल चक्र बना रही है, तेज हवा उन्हें पीछे से धकेल रही है, लेकिन वे आगे बढ़ते ही जा रहे हैं। वे गा रहे हैं: हम नहीं थमते, हम नहीं रुकते, आगे बढ़ते जाएंगे.... ।
बूढ़ा ऐसे दिख रहा था, जैसे वह किसी ओपेरा में जादूगर हो और दोनों ऐसे गा रहे थे, जैसे वे किसी रंगमंच पर हों:
“हम नहीं थमते, हम नहीं रुकते, आगे बढ़ते जाएंगे!....आप को गर्मी मिली, रोशनी मिली, आराम मिला, लेकिन हम तो आँधी तूफान में, भारी बर्फ़बारी में भी चलते रहेंगे... हमें क्या मालूम आराम क्या है, हमें क्या मालूम आनन्द क्या है। हम तो इस ज़िन्दगी का सारा बोझ उठाते हैं, अपना भी और आपका भी.......हू..हू....हू! हम नहीं थमते, हम नहीं रुकते...”
लाइज़िन जग गया और बिस्तर पर बैठ गया। कितने बेसिर-पैर का फ़ालतू सपना था? और उसने यह क्यों देखा कि सिपाही और एजेंट साथ-साथ हैं? क्या बकवास है! और अब, जबकि लाइज़िन का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था और वह बिस्तर पर बैठकर अपने हाथों से अपना सर थामे हुए था, उसे ऐसा लगा जैसे बीमा एजेंट और सिपाही की ज़िन्दगियों में सचमुच एक समानता थी। क्या वे एक दूसरे को सम्भालते हुए नहीं जा रहे हैं? उनके बीच कोई अदृश्य लेकिन महत्वपूर्ण और आवश्यक सम्बन्ध है, और न केवल उन दोनों के बीच बल्कि उनमें और वॉन ताउनित्ज़ के बीच भी, या यों कहा जाए कि सभी मानवों के बीच। इस जीवन में, सुदूरवर्ती मरुस्थल में भी, कुछ भी ऐसा घटित नहीं होता, जिसे केवल एक संयोग या दुर्घटना माना जाएगा। सब चीजों के पीछे कोई एक महान विचार है, हर जगह एक ही आत्मा, एक ही महत् उद्देश्य है, जिसे समझने के लिए केवल विचार या तर्क पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसा लगता है, इसके लिए जीवन को समझनेवाली एक गहरी अन्तर्दृष्टि होनी चाहिए जो ज़ाहिर है सभी मनुष्यों के पास नहीं है। और वह अभागा आदमी, जो टूट गया, जिसने अपने आपको ही नष्ट कर दिया- “स्नायु रोग ग्रस्त”-जैसा कि डॉक्टर ने कहा— और वह बूढ़ा किसान जो अपनी ज़िन्दगी का हर दिन एक आदमी से दूसरे आदमी तक चलने में बिताता है, मात्र एक संयोग या दुर्घटना उनके लिए है, जो अपनी ज़िन्दगी को भी मात्र एक दुर्घटना मानते हैं, लेकिन जो अपनी ज़िन्दगी को एक बड़ी पूर्णता का अंश मानते हैं उनके लिए ये ज़िन्दगियाँ एक अद्भुत विवेकपूर्ण महाजीव के अंश हैं। लाइज़िन ने ऐसा सोचा, और यह एक ऐसा विचार था, जो बहुत दिनों से उसकी आत्मा में छुपा हुआ था और अब उसकी चेतना में स्पष्ट रूप से उभर कर आया था।
वह लेट गया और उसपर फिर नींद हावी होने लगी। फिर वे दोनों साथ जा रहे थे और गा रहे थे: “ हम नहीं थमते, हम नहीं रुकते ...........हम ज़िन्दगी से वह लेते हैं जो सबसे कठिन है, जो सबसे कड़वा है और हम आपके लिए वह छोड़ते हैं जो आसान है और आनन्ददायक है; और खाने की मेज़ पर आप निष्ठुरता से और समझदारी से चर्चा कर सकते हैं कि हमें दुख क्यों है, हम क्यों मिट रहे हैं और हम आपकी तरह सुखी और सन्तुष्ट क्यों नहीं हैं।”
वे जो गा रहे थे, उसके मन में वे बातें पहले भी रही थीं, लेकिन वे उसके अन्य विचारों के पीछे छुप सी गयी थीं और कुहरे वाले मौसम में दूर से आनेवाली रोशनी की तरह वे कभी-कभार ही टिमटिमाती थीं। और उसे लगा जैसे यह ख़ुदकुशी और उस सिपाही की पीड़ा उसके अन्त:करण पर बोझ की तरह है; यह मान लेना कि जीवन में जो भी कठिनतम और मनहूसियत से भरा हुआ है, उसका बोझ ये लोग उठाएँगे, क्योंकि यही इनकी नियति है- यह सोच कितनी भयावह है! एक ओर यह मानना और दूसरी ओर अपने लिए ऐसी ज़िन्दगी की ख़्वाहिश रखना जिसमें रोशनी ही रोशनी हो, सुखी और संतुष्ट लोगों के बीच उठना-बैठना हो, और निरन्तर इसी तरह के सपने देखते रहने का अर्थ यही है कि श्रम और चिन्ता के बोझ में दबे और लोग ख़ुदकुशी करने के लिए मजबूर हो जाएँगे या ऐसे कमजोर और वंचित लोगों की संख्या और बढ़ेगी, जिनके बारे में लोग खाने की मेज़ पर चिड़चिड़ाहट और मज़ाक़ के लहजे में कभी-कभार चर्चा कर लेंगे, लेकिन उनकी मदद के लिए कोई कदम नहीं उठाएंगे ..........और फिर:
“ हम नहीं थमते, हम नहीं रुकते....” जैसे कोई हथौड़े से उसकी कनपटी पर बार-बार प्रहार कर रहा हो।
वह किसी खटके के कारण सुबह जल्दी ही जग गया । उसे तेज सरदर्द हो रहा था। बग़ल के कमरे में वॉन ताउनित्ज डॉक्टर से ऊँची आवाज़ में कह रहा था:
“अभी आप का जाना असम्भव है। देखिए बाहर क्या नज़ारा है। बहस मत कीजिए, बेहतर होगा आप कोचवान से पूछ लें। वह ऐसे मौसम में किसी क़ीमत पर भी आप को नहीं ले जाएगा ।”
“ लेकिन हमें तो केवल दो मील दूर जाना है।” डॉक्टर ने याचना के स्वर में कहा।
“ यदि आधा मील दूर हो तब भी आप नहीं जा सकते। गेट से निकलते ही आप सीधे नरक में जाएँगे। एक मिनट में आप रास्ते से भटक जाएँगे । आप चाहे कुछ भी कहें मैं आपलोगों को नहीं जाने दूँगा।”
“शाम होते-होते तूफ़ान का ज़ोर कम पड़ जाएगा ।” स्टोव गर्म करने वाले किसान ने कहा।
और बग़ल के कमरे में डॉक्टर रूस के कठिन मौसम और रूसी चरित्र पर उसके प्रभाव की चर्चा करने लगा, कि कैसे लम्बी सर्दी में लोगों की आवाजाही बन्द हो जाती है और इससे लोगों के बौद्धिक विकास में बाधा पड़ती है। लाइज़िन इन विचारों को सुनकर बेचैन हो रहा था। उसने खिड़की से बाहर देखा। बाड़े पर बर्फ़ जम रही थी। बाहर जो भी विस्तार दिख रहा था उसपर जैसे सफ़ेद चादर बिछी हुई थी। पेड़ मजबूर होकर अपने सिर कभी दायें और कभी बायें झुका रहे थे। लाइज़िन तूफ़ान की हू..हू.. करती आवाज और चीजों के आपस में टकराने से होने वाली आवाज़ को सुनते हुए सोच रहा था:
“इन सब से क्या सीख ली जा सकती है? यह आँधी है और सच इतना ही है.....”
दोपहर में उन्होंने लंच लिया और घर में ही निरुद्देश्य टहलते रहे; वे खिड़कियों के पास जाकर खड़े हो गये।
“और लेस्नित्सकी वहाँ पड़ा हुआ है,” लाइज़िन ने गोल-गोल चक्र बनाती बर्फ की आँधी को देखते हुए सोचा। “लेस्नित्स्की वहीं पड़ा हुआ है, गवाह भी इन्तज़ार कर रहे हैं......।”
वे मौसम की बातें करते रहे। उन्होंने कहा कि बर्फ की आँधी आम तौर पर दो दिन-रात तक ही टिकती है, कभी-कभार ही ऐसा होता है इससे अधिक समय तक तूफ़ान चलता रहे। छह बजे उन्होंने डिनर लिया, उसके बाद ताश खेला, गाये, नाचे; अन्त में रात का खाना खाया। इस तरह दिन कटा और वे सोने चले गये।
रात में, सुबह से काफ़ी पहले तूफ़ान शान्त हो गया। सुबह उठकर जब उन्होंने खिड़की से बाहर देखा तो विलो के पेड़ अपनी कमजोर झुकी हुई शाख़ों के साथ पूरी तरह स्थिर दिख रहे थे। प्रकृति शान्त और निष्पन्द थी, जैसे वह अपनी स्वेच्छाचारिता के लिए, पगलाई रातों के लिए, अपने जुनून को खुली छूट देने के लिए शर्मिंदा हो। स्लेज़ में जुते घोड़े सुबह पाँच बजे से मुख्य द्वार पर इन्तज़ार कर रहे थे। जब सुबह का पूरा उजाला हो गया, तब डॉक्टर और एक्जामिनिंग मजिस्ट्रेट ने अपने फ़र कोट और फ़ेल्ट बूट पहने, अपने मेज़बान को अलविदा कहा और बाहर निकल आए।
कोचवान की बग़ल में एक जाना-पहचाना चेहरा था-सिपाही इल्या लोशादिन, अपने कन्धे पर पुराना लेदर बैग लटकाए हुए, बग़ैर टोपी के,बर्फ़ से भीगे हुए। उसका चेहरा लाल हो गया था और पसीने से तरबतर था। जो फुटमैन मेहमानों की मदद करने और उनके पैर ढँकने आया था, उसने उसे बहुत कठोरता से देखा और कहा:
“तू यहाँ क्यों खड़ा है? दूर हट शैतान!”
“हुज़ूर, लोग परेशान हैं,” लोशादिन ने कहा। एक निर्दोष मुस्कुराहट उसके पूरे चेहरे पर फैल गयी थी। ज़ाहिर था कि उसे उन लोगों को देखकर ख़ुशी हो रही थी, जिनका न जाने कब से वह इन्तज़ार कर रहा था। “लोग बहुत बेचैन हो गये हैं। बच्चे रो रहे हैं...उन्हें लगा, हुज़ूर कि आप दोनों वापस शहर लौट गये हैं। हुज़ूर, मालिक हमलोगों पर दया करें...!”
डॉक्टर और एक्ज़ामिनिंग मजिस्ट्रेट ने कुछ नहीं कहा । वे स्लेज़ में बैठ गये और सिरन्या के लिए रवाना हो गये।
अनुवाद: राजीव
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