प्लेटो
सुकरात ने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच अपना स्थान ग्रहण किया। केवल एरिस्तोफनीज़ ताली नहीं बजा रहा था, क्योंकि सुकरात ने उसके सिद्धांतों की ओर जो इशारा किया था उसका वह जवाब देना चाहता था। ठीक इसी समय बाहरी दरवाजे पर दस्तक हुई और गली में से बाँसुरी बजाने की आवाज और हर्षोल्लास का शोर सुनाई दिया।
जाओ, देखो कौन है, अगाथोन ने नौकरों से कहा, यदि हमारा कोई ख़ास दोस्त हो तो उन्हें सादर अन्दर ले आओ, लेकिन यदि कोई और हो, तो कहना दावत ख़त्म हो चुकी है और पीने-पिलाने के लिए कुछ भी नहीं बचा है।
कुछ देर बाद बरामदे से एल्सिबायदीज़ के चिल्लाने की आवाज आई। जाहिर था वह नशे में चूर था और पूछ रहा था कि अगाथोन कहाँ है, उससे मिलना जरूरी है। बांसुरी बजाने वाली लड़की और उसकी झुण्ड के अन्य सदस्यों ने एल्सिबायदीज़ को अन्दर आने में मदद की। वह दरवाजे पर खड़ा था, ढेर सारे रिबन डाले हुए और अपने माथे पर लाल और नीले फूलों की माला बाँधे हुए। उसने सबको इस तरह संबोधित किया।
नमस्कार दोस्तो, उसने कहा, मैंने पहले ही काफ़ी चढ़ा रखी है, इसलिए यदि आप चाहते हैं कि मैं इस दावत में शरीक न होऊं तो आपके एक इशारे से मैं चला जाऊँगा, बस केवल यह माला मैं अगाथोन के मस्तक पर बाँधना चाहता हूँ। कल मैं ऐसा नहीं कर सका, इसलिए आज मैं यहाँ आया हूँ। मैं यह माला सबसे बुद्धिमान, रूपवान और सबसे.... खैर मैं तो उसे सिरमौर बनाने ही जा रहा हूँ। मुझे मालूम है कि आप सब मुझ पर हँस रहे हैं, क्योंकि मैं नशे में हूँ। हँसिए — मैं बुरा नहीं मानता, लेकिन मैं इतने नशे में नहीं हूँ कि मुझे इसका भी होश नहीं है कि मैं क्या कह रहा हूँ। आप इससे इन्कार नहीं कर सकते कि जो मैं कह रहा हूँ वह सच है। आपका क्या ख़्याल है सज्जनो? मैं अन्दर आऊं या नहीं? क्या हम सब मिलकर थोड़ी पी सकते हैं?
इसपर सबने हँसकर उसका स्वागत किया और उसे अपने बीच बैठने के लिए कहा। अगाथोन ने स्वागत की अन्य औपचारिकताएं पूरी कीं। जब लोग उसे अन्दर लाने लगे, उसने अपने माथे पर से रिबन हटाना शुरू किया ताकि वह जैसे ही अगाथोन के करीब आये तो माला उसके सिर पर बाँध सके। ऐसा हुआ कि माला से उसकी आँखें ढँक गयीं और सुकरात पर उसकी नज़र नहीं पड़ी, हालाँकि वह सुकरात और अगाथोन के बीच में आकर उसी गद्दे पर बैठा था-क्योंकि जैसे ही वह अन्दर आया सुकरात ने अपनी बगल में उसके लिए जगह बना ली थी। इस तरह वह अगाथोन का हालचाल पूछते हुए बैठा और उसके सिर पर अपना रिबन बाँधने लगा।
अगाथोन ने अपने नौकरों से कहा, एल्सिबायदीज़ के जूते उतारो, ताकि हम तीनों आराम से बैठ सकें।
अच्छा, एल्सिबायदीज़ ने कहा, लेकिन, एक पल रुको, यह तीसरा कौन है?
और जब उसने पलटकर देखा कि वह कौन है तो वह अपनी सीट से लगभग उछलते हुए चीख उठा, अरे मेरी तो शामत आई है! तुम फिर सुकरात! फिर से वही खेल? छुपछुप कर इंतज़ार करना और मेरे ऊपर उस समय धावा बोलना, जब मुझे सपने में भी गुमान न हो? और आज रात आख़िर हो क्या रहा है? यहाँ पर क्यों बैठे हो? एरिस्तोफनीज़ या दूसरे मज़ाक़िया लोगों की बगल में बैठने के बदले इस कमरे में सबसे सुन्दर युवक की बगल में बैठने का क्या मतलब ?
अगाथोन, सुकरात ने कहा, तुम्हें तो मेरी रक्षा करनी पड़ेगी। तुम जानते हो एल्सिबायदीज़ से प्यार करना बड़े जोखिम का खेल है। जबसे मैं इसके प्यार में पड़ा हूँ तबसे यही हो रहा है: यदि मैं किसी को भी देखूं, जो थोडा-सा भी आकर्षक हो या मैं उससे दो बोल बोल लूं- तो तुरंत ईर्ष्या से वह जल भुन जाता है और मुझे न जाने क्या-क्या कहकर संबोधित करता है और इस तरह का सलूक करता है जैसे वह मेरी जान ले लेगा। इसलिए इस पर नज़र रखना कहीं यह मुझे चोट न पहुंचाए। यदि इसको अपना दोस्त बना सको तो अच्छी बात है, लेकिन यदि ऐसा नहीं कर सको और यह खूँखार हो जाए, तो तुम्हें सचमुच मुझे बचाना होगा - क्योंकि यह अपने प्यार में किसी भी हद तक जा सकता है।
तुमसे प्यार और तुमसे दोस्ती? एल्सिबायदीज़ ने कहा, कभी नहीं! मैं जल्द ही तुमसे बदला लूँगा, लेकिन अभी तो पहले- अगाथोन, उन रिबनों में से थोड़े मुझे वापस कर सकते हो? मैं सुकरात के मस्तक पर भी माला बाँधना चाहता हूँ - एक ऐसा मस्तक जो अत्यंत असाधारण है। मैं यह नहीं चाहता कि वह कहे कि मैंने अगाथोन के लिए माला बनायी, उसके लिए नहीं - जबकि उसकी बातें और उसकी जिंदगी के किस्से भी उसी तरह पूरी दुनिया पर हावी हैं जैसे पिछले दिनों तुम्हारे शब्द हावी थे।
ऐसा कहकर उसने सुकरात के मस्तक पर रिबन बाँधा और अपनी सीट पर बैठ गया।
और अब सज्जनो, गद्दे पर आराम करते हुए उसने कहा, मुझे ऐसा लगता है कि आप सब नशे में तो बिलकुल नहीं हैं। मेरे विचार में यह उचित नहीं है। चलिए, थोड़ी ले ली जाए। आप सब ने वादा किया था कि हम सब थोड़ी मदिरा लेंगे। मैं यह कहना चाहूँगा कि जब तक आपको थोड़ा नशा न हो जाए तब तक इस बैठक का मुखिया मुझसे बेहतर कोई नहीं होगा। अगाथोन. उन्हें कोई अच्छा पेय लाने को कहो। नहीं,नहीं, कोई बात नहीं, उसने कहा, उस ठंढे सुरापात्र को इधर लाओ।
उसने उस सुरापात्र को भरा और उससे पहला पेय अपने लिए ढाला और फिर उसने उसे सुकरात के लिए भरने के लिए कहा। उसने साथ-साथ यह भी कहा- इस सुरापान से इस शख्स में कोई बदलाव नहीं आएगा। सुकरात को चाहे जितनी पिला दो, उस पर नशा चढ़ता ही नहीं है।
इस बीच नौकर ने सुकरात के लिए सुरापात्र भर दिया था और सुकरात ने भी उससे अपने लिए एक पेय ढाला।
इसी समय एरिक्ज़िमेकस ने टोका- क्या यह सब ऐसे ही किया जाता है, एल्सिबायदीज़? क्या सुरापान के पहले कोई अच्छी बात नहीं कही जाएगी ? क्या हम सब वैसे ही सुरा गटक लें जैसे असभ्य पियक्कड़ लोग करते हैं?
अच्छा, तो एरिक्ज़िमेकस भी है यहाँ पर? एल्सिबायदीज़ ने कहा, श्रेष्ठ और संजीदा पिता की श्रेष्ठ और संजीदा संतान! कैसे हो, एरिक्ज़िमेकस !
बहुत अच्छा!, एरिक्ज़िमेकस ने कहा, तो तुम क्या कहते हो?
तुम क्या कहते हो? एल्सिबायदीज़ ने पलटकर कहा, हमें तो तुमसे आदेश लेना है। ऐसा कहा गया है कि "अच्छा चिकित्सक पूरी दुनिया से बड़ा होता है।" इसलिए तुम जो कहोगे वह शिरोधार्य होगा।
तो सुनो, एरिक्ज़िमेकस ने कहा, तुम्हारे आने के पहले हमने तय किया था कि हम सब बाएं से दायें बारी-बारी से प्रेम के सम्मान में अपना सर्वोत्तम भाषण प्रस्तुत करेंगे। हम सब अपना-अपना भाषण दे चुके हैं। अब चूंकि तुमने बिना भाषण दिए सुरापान किया है इसलिए बेहतर होगा कि अब तुम भी भाषण दे डालो। भाषण दे चुकने के बाद तुम अपनी मरज़ी से सुकरात को कुछ करने के लिए कह सकते हो और सुकरात भी अपनी दायीं तरफ बैठे व्यक्ति को कुछ करने के लिए कह सकता है और फिर इसी तरह सब लोग क्रम से अपनी दायीं तरफ बैठे व्यक्ति को कुछ करने के लिए कह सकते हैं।
यह तो बहुत अच्छा विचार है, एरिक्ज़िमेकस, एल्सिबायदीज़ ने कहा, लेकिन तुम जानते हो मेरे जैसे नशे में धुत आदमी से ऐसी उम्मीद रखना उचित नहीं है कि वह आप जैसे अनपिये और पूरी तरह होश में बैठे लोगों से बराबरी कर सकेगा। दूसरी बात यह है, मेरे प्रिय एरिक्ज़िमेकस, अभी-अभी सुकरात जो कुछ कह रहा था, उसके एक भी शब्द पर यकीन नहीं करना। असलियत ठीक उलटी है। मैं यदि उसके सिवा किसी और के बारे में, चाहे वह देवता हो या आदमी, कुछ भी अच्छा कहूँ तो मेरी ख़ैर नहीं।
चुप भी करो, सुकरात ने कहा।
तुम इससे इन्कार नहीं सकते, एल्सिबायदीज़ ने कहा, ईश्वर जानता है मैं तुम्हारे सामने आज तक किसी और की तारीफ नहीं कर पाया।
यह तो एक अच्छा विचार है, एरिक्ज़िमेकस ने कहा, क्यों न तुम हमलोगों के सामने सुकरात की विरुदावली सुनाओ?
क्या सचमुच तुम ऐसा चाहते हो? एल्सिबायदीज़ ने पूछा, क्या मुझे ऐसा करना चाहिए, एरिक्ज़िमेकस? क्या मैं सचमुच उसका बखान करूँ और अपना बदला लूँ?
देखो, सुकरात ने विरोध किया, आख़िर तुम्हारा इरादा क्या है? विरुदावली के बहाने मेरी खिल्ली तो नहीं उडाना चाहते?
मैं तो केवल सच बताने जा रहा हूँ -- शायद इससे तुम्हें ऐतराज़ न हो?
नहीं, सुकरात ने कहा, तुम सच बता सकते हो। मैं तो यहाँ तक कहूँगा कि तुम्हें सच बताना ही चाहिए।
तो मैं शुरू करता हूँ, एल्सिबायदीज़ ने कहा, लेकिन एक शर्त है। यदि मैं कोई ऐसी बात कहूँ जो पूरा सच न हो तो तुम मुझे उसी समय टोक देना और कहना कि मैं झूठा हूँ । दूसरी ओर तुम्हें इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि तुम्हारे बारे में जो भी मेरे दिमाग में आएगा मैं कहता चला जाऊंगा और शायद एक बात से दूसरी बात में कोई तारतम्य न हो। मेरे जैसे नशे में चूर शख्स से तुम यह उम्मीद नहीं रख सकते कि वह तुम्हारे सनकीपन का बिलकुल साफ़-साफ़ और सिलसिलेवार ब्योरा देगा।
तो, सज्जनो, मैं सुकरात की विरुदावली एक उपमा के साथ आरम्भ करना चाहता हूँ। मैं जानता हूँ कि वह यह सोचेगा कि मैं उसका मज़ाक़ उड़ा रहा हूँ, लेकिन मैं यह उपमा इसलिए नहीं दे रहा हूँ क्योंकि यह हास्यजनक है, बल्कि इसलिए क्योंकि यह सटीक है। सुकरात को देखकर मुझे सबसे ज्यादा वनदेवता (साइलिनस) की उन छोटी-छोटी मूर्तियों की याद आती है जिन्हें आपने मूर्तिकारों की छोटी दुकानों पर देखा होगा। आप समझ गए होंगे मैं किसकी बात कर रहा हूँ— उन मूर्तियों के हाथों में बांसुरी रहती है और जब आप उन्हें बीचोबीच खोलते हैं तो उनके पेट से देवताओं की छोटी-छोटी मूर्तियाँ निकलती हैं।
इसके अलावा , सुकरात को देखकर मुझे मार्सियस सेतिर की भी याद आती है।
मुझे पूरा यक़ीन है सुकरात कि तुम इस बात से इन्कार नहीं कर सकते कि तुम्हारा चेहरा उनके जैसा ही है, लेकिन समानता कहीं अधिक गहरी है, जो मैं बताने जा रहा हूँ। तुम सेतिर की तरह ही ढीठ हो, क्या यह सच नहीं है? यदि तुम इन्कार करते हो तो मैं इसे साबित करने के लिए गवाह पेश कर सकता हूँ। और क्या तुम भी बांसुरी नहीं बजाते? मैं तो यह मानता हूँ कि तुम मार्सियस से भी बेहतर बांसुरी वादक हो। उसे तो मानवों को वश में करने के लिए बांसुरी को होठों से लगाना पड़ता था। आज भी यदि कोई मार्सियस द्वारा बजाए गए धुन को बजाए तो वही प्रभाव होगा। ओलिम्पस में बजाये जाने वाले रागों में ऐसा कोई सुर नहीं था जो मार्सियस ने नहीं सीखा था। उन धुनों को जो भी बजाएगा, चाहे वह संगीत प्रवीण हो या राह चलते बांसुरी बजानेवाली कोई लड़की हो, उन धुनों की जादुई शक्ति बरकरार रहेगी। अपने देवत्व के कारण इन धुनों के प्रभाव से यह पता चलता है कि हममें से कौन देवत्व की दीक्षा लेने के लिए उपयुक्त है।
तुममें और मार्सियस में, सुकरात, केवल एक ही फ़र्क़ है — तुम बिना किसी वाद्य-यंत्र के जादुई प्रभाव डालते हो- केवल कुछ मामूली शब्दों के सहारे, वे भी बिना किसी कवित्व के। किसी और को बोलते हुए जब हम सुनते हैं तो वह चाहे कितना ही प्रभावी वक्ता क्यों न हो हम उसकी परवाह नहीं करते, लेकिन जब हम तुम्हें सुनते हैं या जब कोई और तुम्हारे शब्दों को दोहरा रहा होता है, चाहे वह इसे कितने भी बेढंगे तरीक़े से करे, और सुननेवाला व्यक्ति पुरुष हो या स्त्री हो या बच्चा हो, हम सब पूरी तरह सम्मोहित हो जाते हैं और अन्दर तक हिल जाते हैं। जहाँ तक मेरी बात है, सज्जनो, यदि मुझे यह डर नहीं होता कि आप कहीं यह न समझें कि मैं नशे के उन्माद में प्रलाप कर रहा हूँ, तो मैं शपथ लेकर कहता कि सुकरात के शब्दों का मेरे ऊपर कितना असाधारण प्रभाव पड़ा है- और आज भी पड़ता है। मैं जैसे ही उसे बोलते हुए सुनता हूँ, ऐसा लगता है जैसे मैं एक अलौकिक रोष से दग्ध हो गया हूँ -यह रोष कोरिबेंत (पुरानी ग्रीक देवी सिबली के पुजारी) के रोष से भी बढ़कर है। मैं डर जाता हूँ और मेरी आँखों में आंसू आ जाते हैं—और ऐसा केवल मेरे साथ नहीं, बल्कि अनेक लोगों के साथ होता है।
मैंने पेरिक्लीज़ को सुना है। मैंने और भी अनेक महान वक्ताओं को सुना है। वे सब वाक्पटु थे, लेकिन उन्होंने कभी भी मेरे ऊपर वैसा प्रभाव नहीं छोड़ा- उन्होंने कभी भी मेरी अंतरात्मा को झकझोरा नहीं और न मेरे ऊपर यह प्रभाव छोड़ा कि मुझे यह अहसास हो कि मैं अधम लोगों में भी सबसे अधम हूँ। यह जो आज के युग का मार्सियस है, इसने अक्सर मेरी दिमागी हालत ऐसी कर दी है कि मुझे महसूस हुआ है कि मैं अब उस तरह की ज़िन्दगी नहीं जी सकता, जैसा मैं जी रहा हूँ। सुकरात, तुम इससे इन्कार नहीं कर सकते कि यह सच है। मुझे पूरा यक़ीन है कि यदि मैं इस क्षण भी इसकी बातें सुनूं, तो मुझे फिर वैसा ही अहसास होगा। इस अहसास पर मेरा कोई वश नहीं है। यह अहसास मुझे यह क़बूल करने के लिए मजबूर करता है कि मैं जब रात दिन राजनीति में आपादमस्तक डूबा रहता हूँ, तब मेरे जीवन में ऐसी अनेक बातें उपेक्षित रह जाती हैं, जिनपर ध्यान देना ज़रूरी है। इसलिए मैं इसकी बातें सुनता ही नहीं- जैसे कि यह कोई सायरन हो- और जितनी जल्दी हो सके मैं इससे दूर भागता हूँ क्योंकि मुझे डर है कि यदि यह मुझे बैठकर सुनाता रहा तो मैं पागल हो जाऊँगा।
एक और अहसास, जो मैंने किसी दूसरे के साथ महसूस नहीं किया। आपको भी यक़ीन नहीं होगा कि मैं इस तरह के अहसास के क़ाबिल भी हूँ- शर्मिंदगी का अहसास। पूरी दुनिया में सुकरात एक अकेला आदमी है जो मुझे शर्मिंदा होने पर मजबूर करता है। इस अहसास से बचने का कोई उपाय नहीं है क्योंकि मैं जानता हूँ मुझे वही करना चाहिए जो वह कह रहा है, लेकिन उसकी नज़रों से दूर होते ही मैं इसकी बिलकुल परवाह नहीं करता कि मैं भीड़ के साथ-साथ चलने के लिए क्या-क्या करता हूँ। इसीलिए एक भगोड़े गुलाम की तरह मैं उससे दूर-दूर भागता हूँ और जहाँ तक बन पड़े उसके पास नहीं फटकता, लेकिन फिर जब अगली बार उससे भेंट होती है तो मुझे याद आता है कि पिछली मुलाक़ात में मैं क्या-क्या मानने के लिए मजबूर हुआ था और यह सोचते ही मैं शर्मिंदा हो जाता हूँ। कभी-कभी सोचता हूँ इसके मर जाने की खबर सुनूँ तो मुझे सच में ख़ुशी होगी, लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि यदि सचमुच इसकी मृत्यु हो गयी तो मुझे असह्य दुःख होगा- इसलिए आप ही बताएँ ऐसी हालत में आदमी क्या करे?
इस मनमोहक वादक (सेतिर) का यह असर मुझ पर और मेरे जैसे अनेक लोगों पर होता है। मैं यह भी दिखाना चाहूँगा कि मेरी उपमा दूसरे रूपों में भी कितनी सही है और यह आदमी कितनी असाधारण शक्ति का स्वामी है। मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि आपमें से कोई भी इस आदमी की असलियत नहीं जानता है। जब मैंने अपना मुंह खोला ही है तो इसका पूरा परदाफ़ाश करूँगा। मिसाल के लिए आपने देखा होगा कि सुकरात सुदर्शन व्यक्तित्वों की ओर किस तरह आकृष्ट होता है और किस तरह हमेशा उनके साथ रहना चाहता है और उन्हें एकटक घूरता रहता है। वह हमेशा ऐसे पेश आता है जैसे वह बिलकुल अनजान और कोरा हो-- क्या बिलकुल साइलिनस की तरह नहीं? बिलकुल! लेकिन क्या आप यह नहीं देखते कि यह सब मात्र दिखावा है, ठीक उन मूर्तियों की तरह जिनके बारे में कुछ देर पहले मैं चर्चा कर रहा था। लेकिन दोस्तो और पियक्कड़ मित्रो, मुझ पर भरोसा करें कि यदि उन मूर्तियों की तरह सुकरात को खोलें तो आपको अपनी आँखों पर विश्वास नहीं होगा कि उसमें कितनी गंभीरता और संयम है। सच तो यह है कि उसके लिए सुन्दर चेहरे का कोई महत्व नहीं है- असल में आपको ख़्याल भी नहीं होगा कि वह उसे कितना तुच्छ समझता है—धन, मान, यश, प्रतिष्ठा, जिनके पीछे पूरी दुनिया पागल है, सुकरात की नजर में महत्वहीन हैं। वह इन सब की बिलकुल परवाह नहीं करता है- असल में वह हम सबकी भी कोई परवाह नहीं करता। मैं सच कह रहा हूँ वह अपनी जिंदगी में व्यंग्य का एक महीन खेल खेल रहा है और अपनी आस्तीन चढ़ाये पूरी दुनिया पर हँस रहा है।
मैं नहीं जानता कि किसी व्यक्ति ने सुकरात के भीतर उस समय झाँका है, जब वह गंभीर हो और उसके भीतर छोटी-छोटी मूर्तियों को देखा हो। मैंने एक बार देखा है। वे मूर्तियाँ इतनी देवतुल्य, सुनहली, सुन्दर और मनमोहक थीं कि मेरे पास इसके सिवा कोई चारा न था कि मैं वही करूँ जो वह कहे। मैं यह सोचकर अपने आप मियाँ मिट्ठू बना फिरता था कि मेरे सौन्दर्य के करिश्मे से वह अभिभूत है और इसे मैं अपना असाधारण सौभाग्य समझता था। मैं सोचता था कि मैं उसे थोड़ी-सी ढील दूंगा तो न जाने वह मुझे क्या-क्या कहने लगेगा। यह सच है कि मुझे अपने करिश्मे पर बहुत भरोसा था। इसलिए, भलीभांति विचार करने के बाद, एक दिन अपने साथ अपने नौकर को नहीं ले गया और अकेले ही सुकरात से मिलने गया। आप याद रखें कि मैं केवल सच कहूँगा और सच के सिवा कुछ नहीं कहूँगा - इसलिए आपको मेरी बातें ध्यान से सुननी चाहिए। यदि मैं झूठ बोलने लगूं तो सुकरात मुझे अवश्य रोके।
तो सज्जनो, जैसा कि मैं कह रहा था, मैं उससे मिलने गया और जब हम दोनों एकांत में थे तो मुझे पूरी आशा थी कि अब वह मुझसे वैसी ही मीठी-मीठी और अटपटी बातें करेगा जैसा प्रेमी अपने प्रियतम को एकांत में पाकर करते हैं- मुझे यह ख़याल ही काफी लुभावना लग रहा था। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वह सदा की तरह उसी प्रकार की बातें करता रहा जैसा कि वह करता है और जब उसके जाने का समय आया तो उसने मुझ से विदा ली।
तब मैंने सुझाव दिया कि हम दोनों जिमनाजियम चलें और साथ-साथ थोड़ा व्यायाम करें। मैंने सोचा कि जिमनाजियम में कुछ न कुछ अवश्य होगा। और क्या आप यक़ीन करेंगे कि हमने साथ-साथ व्यायाम किया, बार-बार आपस में गुत्थम-गुत्था हुए, हमारे आसपास कोई नहीं था, फिर भी मुझे कोई सफलता नहीं मिली। मुझे अहसास हो गया कि अब इस दिशा में आगे बढ़ने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है, लेकिन चूंकि मैं यह खेल शुरू कर चुका था, इसलिए जब तक मैं पूरी तरह आश्वस्त न हो जाऊं कि मेरे प्रति उसका क्या रवैया है, मैं अपनी कोशिश छोड़ने वाला नहीं था। मैंने उसपर सीधा वार करने का निश्चय किया। मैंने उसे रात्रिभोज पर आमंत्रित किया, मानो प्रेमी वह नहीं, मैं हूँ और मैं ही प्रेम याचना करनेवाला हूँ। उसे इसके लिए राजी करना आसान नहीं था, लेकिन आख़िरकार वह मेरे घर आने के लिए तैयार हो गया।
पहली बार जब वह आया तो उसने सोचा कि रात्रिभोज के बाद उसे तुरंत वापस चला जाना चाहिए और मैं भी संकोचवश उसे रोक नहीं पाया। लेकिन अगली बार मैंने रात्रिभोज के बाद कुछ इस तरह बात आगे बढ़ायी कि वह देर रात तक बातें करता रहा और जब उसने कहा कि अब उसे जाना चाहिए, तो मैंने कहा कि बहुत देर हो चुकी है, इसलिए बेहतर होगा कि वह मेरे साथ ही आज रात रुक जाए। और इस प्रकार, जहाँ पर रात्रिभोज के लिए वह बैठा था, उसी जगह के पास मेरे बिस्तर से सटकर उसका बिस्तर लगाया गया और इस तरह हम दोनों एक कमरे में अकेले रह गये।
अब तक मैंने जो कुछ भी कहा है उसे दोहराने में मुझे कोई शर्म नहीं आ रही है, लेकिन अब जो मैं कहने जा रहा हूँ आपने वैसा कभी नहीं सुना होगा। हमारे यहाँ एक कहावत है — “शराबी और बच्चे सच बोलते हैं।" वैसे भी, जब मैंने सुकरात की विरुदावली आरम्भ कर ही दी है तो इस बात को छुपाना उचित नहीं होगा कि सुकरात ने मेरे प्रति कैसी हेकड़ी दिखाई थी। लोग कहते हैं कि जब किसी को साँप ने डँसा हो तो उसे किसी से यह नहीं बताना चाहिए कि उसे कैसा महसूस हो रहा है, सिवा उस व्यक्ति को जो इस पीड़ा से गुजर चुका हो, क्योंकि और कोई उसके दर्द को नहीं समझ सकेगा। मैं ठीक ऐसा ही महसूस करता हूँ- फर्क सिर्फ इतना है कि मुझे जिस चीज ने डँसा है वह साँप से भी ज़्यादा जहरीला है। दरअसल मुझे जो दंश मिला है वह सर्वाधिक पीड़ादायक है। मेरा दिल,दिमाग, या उसे जो भी कहें सुकरात के दर्शन से डँसा गया है, जो एक साँप की तरह किसी भी होनहार युवक से लिपट जाता है और उसपर अपनी मनमानी चलाता है। सज्जनो, जब मैं अपने चारों ओर देखता हूँ तो मेरी नज़र फिदरस, अगाथोन, एरिक्ज़िमेकस, पासेनियस, अरिस्तोदेमस और एरिस्तोफनीज़ पर पड़ती है। ये सब और इनके अलावा और भी जो मौजूद हैं और सुकरात भी- इन सबने इस दार्शनिक जूनून का, इस पवित्र रोष का स्वाद चखा है; इसलिए आपको कहने में मुझे संकोच नहीं हो रहा है क्योंकि मैं जानता हूँ सुकरात के प्रति मैंने जो आचरण किया और जो मैं अब कहने जा रहा हूँ उसे आप सही-सही समझ पाएंगे। लेकिन नौकरों को अपने कान बंद कर लेने चाहिए और उन्हें भी जिनमें भदेस या जंगली बनने की थोड़ी भी प्रवृत्ति हो।
तो, सज्जनो, जब रोशनी बुझ गयी और नौकर वहां से चले गए, तो मैंने निश्चय किया कि अब और भूमिका नहीं बांधनी है, उसे साफ़-साफ़ अपनी मंशा बतानी है।
इसलिए मैंने उसे धीरे से छूकर पूछा- क्या तुम सो रहे हो, सुकरात?
नहीं, नहीं तो, उसने कहा।
क्या तुम जानते हो मैं क्या सोच रहा हूँ?
क्या?
यही कि, मैंने कहा, तुम मेरे अकेले प्रेमी हो जो सचमुच मेरे लायक है। एक ही कमी है कि तुम बेहद संकोची हो। मेरा विचार है कि मेरे पास या मेरे दोस्तों के पास जो कुछ भी है उनमें से चाहे जो भी तुम चाहो उससे इन्कार करना मूर्खता होगी। मेरी एक ही ख़्वाहिश है कि मैं अपने आप को सर्वोत्कृष्ट बनाऊं और मैं यह जानता हूँ कि दूसरों की अपेक्षा तुम इसमें मेरी सबसे अधिक मदद कर सकते हो। मुझे पूरा यक़ीन है कि यदि मैं ऐसे शुभचिंतक की मर्जी न मानूँ तो अच्छे भले लोगों के सामने अपने आप को सही साबित करना कठिन होगा।
उसने मेरी पूरी बात सुनी और इसके बाद अपनी व्यंग्य भरी सरलता में कहा, मेरे प्रिय एल्सिबायदीज़, मुझे संदेह नहीं कि जो कुछ तुमने कहा है उसमें गूढ़ार्थ छिपा हुआ है, क्योंकि यदि तुम्हारा यह सोचना सही है कि मेरे अन्दर कोई ऐसी शक्ति है जो तुम्हें एक बेहतर इंसान बनाएगी, तो उस स्थिति में मैं तुम्हें असाधारण रूप से ख़ूबसूरत दिखता और तुम्हारा अपना आकर्षण उसके आगे छिप जाता। यदि तुमने जो ख़ूबसूरती मुझमें देखी है उसे अपनी ख़ूबसूरती के बदले पाना चाहते हो तो तुम्हें यह कहना चाहता हूँ कि तुम असीमित लाभ वाला सौदा करना चाहते हो। तुम एक आभासी सौन्दर्य देकर असली सौन्दर्य पाना चाहते हो- जैसे दायोमीदि और ग्लाकस ने सोने के बदले काँसा दिया था। लेकिन मेरे मित्र तुम्हें सचमुच सावधान रहना चाहिए- क्या पता तुम ग़लती कर रहे हो और मुझमें कोई क़ाबिलीयत न हो! मन की आँखें तभी साफ-साफ देख पाती हैं जब बाहरी आँखें धुंधली हो जाती हैं -लेकिन तुम्हारी आँखें तो अभी काफी तेज हैं।
इसपर मैंने कहा, मैंने तुम्हें वही बताया है जो मैं महसूस करता हूँ। अब यह तुम्हीं तय करो कि हम दोनों के लिए क्या अच्छा है।
यह बात ठीक लगती है, उसने कहा, एक दिन हम दोनों को इस पर विचार करना चाहिए और जो भी हम दोनों के लिए अच्छा हो- चाहे इस विषय में या किसी अन्य विषय में- हमें वही करना चाहिए।
अब मैंने महसूस किया कि तीर निशाने पर लगा है। इसलिए मैं अपने बिस्तर से उठा और उसे एक भी शब्द कहने का मौका दिए बिना अपना लबादा उसे ओढ़ाते हुए- क्योंकि यह जाड़े की रात थी- उसके बदरंग जर्जर लबादे के भीतर घुस गया और उसे अपनी बाँहों में लेते हुए इस देवतुल्य और असाधारण आदमी के साथ पूरी रात सोया रहा-तुम इससे तो इन्कार नहीं कर सकते सुकरात! और इसके बाद मेरे युवा सौन्दर्य पर, जिसपर मुझे सचमुच नाज़ था, हँसने और उसका मज़ाक़ उड़ाने की इसने धृष्टता की और अत्यन्त घृणित उद्दंडता का परिचय दिया। आप जूरी के सदस्य- क्योंकि आप जूरी ही हैं जो सुकरात पर उद्दंडता के आरोप की जाँच कर रहे हैं- आप यक़ीन करें या न करें, जब मैं अगली सुबह उठा तो मैं सुकरात के साथ उसी प्रकार सोकर उठा जैसे कोई अपने पिता या बड़े भाई के साथ सोकर उठता है।
आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उसके बाद मुझे कैसा लगा होगा। एक ओर तो स्वभावतः मैंने अपमानित अनुभव किया, तो दूसरी ओर इस शख़्स के आत्मनियंत्रण और मानसिक दृढ़ता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका, जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। इसलिए, उससे नाराज़ होकर उसकी संगति से दूर न जा सका, लेकिन उसे आकर्षित करने का भी मेरे पास कोई उपाय नहीं बचा। मैं अच्छी तरह जानता था कि धन का प्रलोभन देकर उसे पाना उतना ही कठिन है, जितना भाले से अजेक्स को घायल करना और जिस एक आकर्षण का भरोसा था वह पहले ही नाकाम हो चुका था। इसलिए मैं पूरी तरह विवश होकर इस आदमी से ऐसा पराभूत हुआ, जैसा मैं पहले कभी नहीं हुआ था।
आपको मालूम होना चाहिए कि इस घटना के बाद ही हम दोनों को युद्ध में पोतिदिया भेजा गया था, जहाँ हम दोनों साथ-साथ बैठकर भोजन किया करते थे। पहली बात तो यह बताना चाहूँगा कि उस अभियान में जो भी मुश्किलें आयीं, उन्हें मेरी अपेक्षा या किसी की भी अपेक्षा सुकरात ने अधिक अच्छी तरह सामना किया। जब-जब हमारी रसद की लाइन कट जाती थी- जो कि युद्ध में अक्सर होता रहता है- तो केवल सुकरात के चहरे पर कोई शिकन नहीं होती थी। इसके विपरीत जब खुराक की कोई कमी नहीं रहती तो ऐसा लगता था जैसे सुकरात को ही सबसे अधिक भोजन में आनंद आता था। हालाँकि, आमतौर पर वह मद्यपान नहीं करता था, लेकिन यदि कभी हमलोग उसपर जोर डालते थे तो वह पीने में भी हमारी छुट्टी कर देता था। लेकिन सबसे अनोखी बात यह थी कि आज तक किसी ने भी सुकरात को नशे में नहीं देखा है। मुझे पूरा यक़ीन है कि आज की दावत ख़त्म होने के पहले सुकरात अपनी इस ख़ासियत को फिर सिद्ध करेगा।
इसके बाद उसने जिस तरह से जाड़े की ठिठुरती ठण्ड का सामना किया वह और भी प्रभावशाली था, क्योंकि उस प्रदेश में कँपाने वाली सर्दी पड़ती है। एक समय तो सर्दी इतनी ज़्यादा थी कि हम सब हमेशा कमरों के भीतर रहते थे और यदि कभी बाहर जाना पड़ा तो हम अपनी आँखों के सिवा शरीर के हर हिस्से को पूरी तरह ढँक लेते थे और अपने जूतों के ऊपर भी फेल्ट के टुकडे और भेड़ों की छालें बाँध लेते थे, लेकिन सुकरात हमेशा उसी पुराने कोट में बाहर निकलता था, जिसे वह सब दिन पहनता था। बर्फ़ पर नंगे पाँव चलते हुए भी उसके चेहरे पर वैसी घबराहट नहीं रहती थी, जैसी जूते पहनकर बर्फ़ पर चलते हुए हमलोगों के चेहरों पर रहा करती थी। हालत यह हो गयी थी कि कुछ लोग उसे संदेह की नज़र से देखने लगे थे और उसकी सहन-शक्ति को दरअसल अपना अपमान समझने लगे थे।
खैर, इस प्रसंग पर इतना क़ाफ़ी है। अब मैं अपने इस वीर नायक का उसी अभियान के दौरान एक और कारनामा बताना चाहूँगा। एक दिन ये सूर्योदय के समय किसी समस्या पर विचार करने लगे और एक ही जगह पर विचार में डूबे खड़े रहे। जब इन्हें कोई समाधान नहीं मिला तो इन्होंने हार नहीं मानी और पूर्ववत् सोचते हुए वहीं डँटे रहे। वक्त गुजरता रहा और जब दोपहर हुई तो पूरी फौज का ध्यान इस ओर गया कि यह क्या हो रहा है। स्वाभाविक है कि सब आश्चर्यचकित होकर एक दूसरे को कहने लगे कि कैसे सुकरात पौ फटने के बाद से ही एक ही जगह विचारमग्न खड़ा है। आख़िर रात हुई और कुछ आयोनियावासी रात का भोजन करने के बाद अपने बिस्तर लेकर घर के बाहर आ गए-क्योंकि ये गर्मियों के दिन थे- खुली हवा में गर्मी कम लगती थी, लेकिन उनके बाहर आने का एक और कारण था कि वे देखना चाहते थे कि क्या सुकरात रात भर उसी जगह खड़ा रहेगा। जी हाँ, सुकरात सुबह होने तक वहीँ खड़ा रहा और सूर्योदय होने पर सूर्य देवता की आराधना करने के बाद ही उस जगह से हटा।
अब आप ज़रूर जानना चाहेंगे कि जंग के दौरान सुकरात ने कैसा प्रदर्शन किया। आपको जानना भी चाहिए। एक मुठभेड़ के बाद शासन ने मुझे सम्मानित किया, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उस मुठभेड़ में सुकरात ने अकेले अपने दम पर मेरी जान बचायी थी। मैं घायल हो गया था, लेकिन सुकरात मेरे पास से नहीं हटा और मुझे बख़्तर समेत उठाकर ले आया। जैसा कि तुम्हें पता है, सुकरात, मैं शासन में सीधे ऊपर तक गया और उन्हें बताया कि सम्मान के हक़दार तुम हो- तुम न तो इससे इन्कार कर सकते हो न इसका दोष मुझ पर डाल सकते हो। लेकिन जो सत्ता में थे उनका विचार था कि सम्मान मुझे ही दिया जाए- मेरी पारिवारिक पहुँच के कारण और इसी तरह के दूसरे कारणों से। और सच तो यह है कि उनसे भी अधिक तुम चाहते थे कि तुम्हारे बदले मुझे ही सम्मान मिले।
और,सज्जनो,आपने इन्हें तब देखा होता जब हमलोग देलियम से पराजित होकर वापस लौट रहे थे। मैं घुड़सवार फ़ौज में था और सुकरात मोरचे पर था। हमारे सैनिक भयानक अफरातफरी में पीछे हट रहे थे। सुकरात लेकिस के साथ पीछे हट रहा था। उसी समय मेरी नजर उन पर पड़ी। मैंने उन्हें पुकारकर कहा कि वे घबराएँ नहीं और भरोसा दिया कि मैं उनके साथ हूँ। इस बार पोतिदिया के युद्ध की अपेक्षा अधिक अच्छी तरह सुकरात को देखने का मौका मिला, क्योंकि घोड़े पर सवार होने के कारण मैं उतना भयभीत नहीं था।मैंने अच्छी तरह देखा कि सुकरात लेकिस की तुलना में किस क़दर शांत था और किस तरह वह – यदि, एरिस्तोफनीज़, तुम्हारे शब्दों का सहारा लूं, तो --"तनी गर्दन और अगल-बगल तिरछी नज़र डालते हुए" जा रहा था जैसा कि वह यहाँ एथेंस में चलता है। उसकी तिरछी नज़र चाहे वह दोस्तों पर पड़े या दुश्मनों पर, समान रूप से तटस्थ रहती है। मैं आधे मील दूर से भी यह देख सकता था कि यदि किसी ने उसे छेड़ा तो वह आसानी से उससे छूट नहीं पायेगा। परिणाम यह हुआ कि वह और लेकिस वहां से सुरक्षित निकल आये। आम तौर पर यह देखा गया है कि मोरचे पर यदि आप इस तरह का व्यवहार करते हैं तो आप सुरक्षित रहते हैं। शत्रु उनके पीछे पड़ते हैं जिनका एकमात्र उद्देश्य वहां से भागना होता है।
इस तरह सुकरात के बारे में और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है-अनगिनत अनोखी बातें और सारी की सारी उसकी प्रशंसा में। इसमें कोई संदेह नहीं कि उसकी मामूली ख़ासियतों के बारे में भी बहुत कुछ कहा जा सकता है, लेकिन निजी तौर पर मैं यह मानता हूँ कि उसके सम्बन्ध में सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि वह बिलकुल अनोखा है- उसके जैसा कोई नहीं है और मुझे पूरा यक़ीन है कि न कभी उसके जैसा कोई हुआ होगा। आप अकिलीज़ की थोड़ी समानता ब्रसिदास जैसों में पा सकते हैं; आप नेस्टर और अन्तेनर की तुलना पेरिक्लीज़ से कर सकते हैं। इतिहास में ऐसे कई समान्तर उदहारण मिलते हैं, लेकिन कभी भी आपको सुकरात जैसा नहीं मिलेगा और न उसके जैसे विचार मिलेंगे- न तो इस युग में न अतीत में- बशर्ते आप मेरी नक़ल करते हुए उसकी और उसके विचारों की तुलना मानवों से नहीं बल्कि साइलेनी और सेतिर से करें।
इस बात से मुझे याद आया कि मुझे यह बात आरम्भ में ही स्पष्ट करनी चाहिए थी कि सुकरात के तर्क ठीक उन्हीं साइलेनियों की तरह होते हैं जिन्हें मध्य में खोला जा सकता है। यदि आप सुकरात को पहली बार सुन रहे हैं तो आप पाएंगे कि उसके तर्क बिलकुल हास्यास्पद हैं- वह अपने तर्कों को ऐसे शब्दों का जामा पहनाता है, जिनकी आशा केवल एक असह्य सेतिर से ही की जा सकती है। वह लद्दू गधों, लुहारों, मोचियों और चर्मकारों की बातें करता है। ऐसा लगता है वह हमेशा वही पुरानी बात उसी पुराने ढंग से कह रहा है। यदि कोई उसकी शैली का अभ्यस्त न हो और उसके मंतव्य को तत्काल भाँपने में असफल हो तो उसकी बातें निरी बकवास लगेंगी। लेकिन यदि आप सुकरात के तर्कों को खोलते हैं और उनके निहितार्थ को समझने कि सच्ची कोशिश करते हैं तो आप पाएंगे कि इस दुनिया में केवल सुकरात के तर्क में ही सच्चाई है। ऐसा कोई नहीं है जिसकी बातें इतनी देवतुल्य हैं या जिनमें मानवीय गुणों की पराकाष्ठा है और जो सच्ची श्रेष्ठता की खोज करनेवाले सत्यान्वेषकों के लिए पूरी तरह सहायक हैं।
तो,सज्जनो,यही मेरी सुकरात की विरुदावली है, जिसमें थोड़ी शिकायतें भी हैं कि कैसे उसने मेरे साथ बुरा सलूक किया। ऐसा बर्ताव झेलनेवालों में मैं अकेला नहीं हूँ -चार्मिदीज़ भी है,युथिदेमस भी है, और भी बहुतेरे हैं। उसने सबको मूर्ख बनाया है, मानो वह आशिक नहीं माशूक हो। अब, अगाथोन, यह सब मैं तुम्हारे भले के लिए कह रहा हूँ, ताकि तुम्हें मालूम हो कि तुम्हें उससे कैसी उम्मीद रखनी है। तुम हमारे दुर्भाग्य से सबक लोगे और तब तक इंतज़ार नहीं करोगे कि पुरानी कहावत के मूर्ख की तरह तभी सीखोगे जब खुद ग़लती करोगे।
एल्सिबायदीज़ जब अपना भाषण समाप्त कर अपने आसन पर बैठा तो उसकी साफ़गोई पर सब देर तक हँसते रहे- ख़ासकर इसलिए क्योंकि ऐसा लग रहा था जैसे वह अभी भी सुकरात के प्रेम में है। सुकरात ने कहा, एल्सिबायदीज़, मैं नहीं मानता कि तुम उतने नशे में हो जितने का तुम ढोंग कर रहे हो, क्योंकि यदि ऐसा होता तो तुम अपनी बातों को चालाकी से मोड़ देने में और असली मुद्दे को छिपाने में सफल नहीं होते। तुम्हारी असली मंशा, जिसका हल्का आभास तुमने अपने भाषण के अंत में दिया, मेरे और अगाथोन के बीच मनमुटाव पैदा करने का है ताकि मैं आशिक के रूप में और वह माशूक के रूप में तुम्हारे ही होकर रहें- किसी और के नहीं। लेकिन तुम मुझे बरगलाने में सफल नहीं होगे। मैं समझ गया कि सेतिर और साइलेनी की बातें करके तुम कहाँ पहुँचना चाहते हो। मुझे आशा है, मेरे प्रिय अगाथोन, यह अपनी मंशा में सफल नहीं होगा और तुम सावधान रहोगे कि कोई तीसरा हम दोनों के बीच न आ जाए।
शायद तुम सही हो, सुकरात, अगाथोन ने कहा, तुमने नहीं देखा वह किस तरह हम दोनों के बीच आकर बैठ गया ताकि वह हम दोनों को दूर-दूर रख सके। लेकिन मैं अब तुम्हारी बगल में आकर बैठता हूँ, ताकि वह अपने इरादे में सफल न हो।
हाँ,हाँ, सुकरात ने कहा, तुम दूसरी तरफ से आकर मेरी बगल में बैठो।
हे ईश्वर! एल्सिबायदीज़ चिल्लाया, देखो मुझे क्या-क्या सहना पड़ता है। यह तो मुझे यहाँ से भगाने पर ही तुला है। ठीक है, सुकरात, तुम अगाथोन को कम से कम बीच में तो बैठने दो।
बिलकुल नहीं, सुकरात ने कहा, ऐसा मैं कभी नहीं होने दूंगा। तुमने तो मेरी बड़ाई कर ली, अब मुझे अपने दायें बैठे व्यक्ति की बड़ाई करनी है। यदि अगाथोन तुम्हारी बगल में बैठा, तो पहले उसे मेरी बड़ाई करनी होगी, उसके बाद मुझे मौका मिलेगा। इसलिए भले आदमी बनो और इस लड़के को तंग करना बंद करो। मैं जो उसकी बड़ाई करने जा रहा हूँ, इस कारण तुम उससे जलो मत, क्योंकि मैं उसकी प्रशंसा करने के लिए अधीर हो रहा हूँ।
वाह! अगाथोन ने कहा, तुम यहाँ और देर तक पकड़कर नहीं रख सकते, एल्सिबायदीज़। सुकरात के मुँह से प्रशंसा के बोल सुनने के लिए मैं अपनी जगह जरूर बदलूँगा।
हर बार यही होता है, एल्सिबायदीज़ ने क्षुब्ध होकर कहा, जब सुकरात आसपास हो तो किसी और को खूबसूरती के पास फटकने का मौका नहीं मिलता। देखो उसने अगाथोन को अपनी बगल में बैठाने के लिए कितनी आसानी से बहाना ढूँढ़ लिया।
और तब, जैसे ही अगाथोन सुकरात की बगल में बैठने के लिए अपने आसन से उठ रहा था, उसी समय अचानक मौज-मजा करनेवालों की एक पूरी टोली दरवाजे पर आ गयी और दरवाजे को खुला देख कर, क्योंकि उसी समय कोई बाहर निकल रहा था, वे अन्दर आकर दावत में शरीक हो गए। उनके बैठते ही पूरा माहौल शोर-शराबे में बदल गया, शिष्टता और व्यवस्था ख़त्म हो गयी और सबने छक कर सुरापान किया। इसी समय एरिक्ज़िमेकस और फिदरस और कुछ दूसरे लोग उठकर जाने लगे, जैसा कि अरिस्तोदेमस ने मुझे बताया, और उसे भी नींद आ गयी।
वह कुछ देर सोया रहा। यह जाड़े का समय था , जब रातें लम्बी होती हैं। वह जब उठा, तब पौ फटनेवाली थी और मुर्गे बांग दे रहे थे। उसने देखा कि बाकी लोग या तो जा चुके थे या सो रहे थे। केवल अगाथोन, एरिस्तोफनीज़ और सुकरात अभी भी जगे थे और एक बहुत बड़े पात्र से बारी-बारी से सुरापान कर रहे थे। सुकरात उनके साथ बहस कर रहा था-वैसे अरिस्तोदेमस को अधिक याद नहीं था, क्योंकि एक तो उसने शुरू का हिस्सा सुना नहीं था, दूसरे उसकी नींद भी पूरी तरह टूटी नहीं थी। लेकिन सुकरात की बातों का सार यही था कि वह उन्हें यह मानने के लिए बाध्य कर रहा था कि एक ही आदमी सुखांत और दुखांत दोनों नाटक लिख सकता है- और दुखांत कवि हास्य कवि भी हो सकता है।
सुकरात अपने तर्क को साबित करने में सफल हो गया था, लेकिन बाकी दोनों उसकी बातों पर गौर करने की हालत में नहीं थे। वे सर हिलाकर हामी भर रहे थे और पहले एरिस्तोफनीज़ को नींद आ गयी और ठीक पौ फटने के समय अगाथोन भी सो गया। इसके बाद सुकरात ने उन्हें आराम से सोने देने के लिए जगह बनायी और वहां से उठकर बाहर चला गया। अरिस्तोदेमस भी उसके पीछे-पीछे गया। इसके बाद सुकरात लायसियम में नहाने गया, और पूरा दिन पहले की तरह बिताकर शाम होने पर अपने घर आराम करने चला गया।
अनुवाद: राजीव
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