प्लेटो
अगथोन करतल ध्वनि के बीच अपने स्थान पर बैठ गया, अरिस्तोदेमस ने बताया, हम सबको ऐसा लगा जैसे उसने अपने ओजपूर्ण भाषण से प्रेम देवता के साथ-साथ अपने को भी गौरवान्वित किया है।
तब सुकरात एरिक्ज़िमेकस की ओर मुड़ा और बोला, तो एरिक्ज़िमेकस तुम मेरे भय पर हँस रहे थे, लेकिन अब तुम देख सकते हो मेरा भय सही साबित हुआ। अगथोन ने अभी जो विस्मयकारी भाषण दिया उसके बाद मेरे पास कहने के लिए क्या बचता है?
एरिक्ज़िमेकस ने कहा, जहाँ तक अगथोन के भाषण के बारे में तुम्हारी भविष्यवाणी थी वह सही निकली, परन्तु जहाँ तक तुम्हारी अपनी कठिनाई की बात है उसपर मैं कैसे विश्वास करूँ?
महाशयो, सुकरात ने विरोध किया, इस प्रकार की ओजपूर्ण वक्तृता सुनने के बाद मैं या कोई भी कैसे जान सकता है कि वह क्या बोले? यह सच है कि भाषण की शुरुआत असाधारण नहीं थी, लेकिन जैसे-जैसे वह समापन की ओर बढ़ा तो अपने शब्दों के जादू से उसने हम सबको बांध लिया। निजी तौर पर जब मैंने इसकी तुलना उस भाषा से की, जिसकी आशा मैं अपने आप से रख सकता हूँ और जो मेरी सामर्थ्य के अनुसार मेरी सर्वोत्तम भाषा होगी, तो मैं सोचकर इतना डर गया कि मैंने यहाँ से छुपकर निकल भागना चाहा। इसके अलावा, उसके भाषण ने मुझे बार-बार वक्तृत्व कला के धनी गार्जियस की इतनी याद दिलायी कि मैं अडिसियस और उसके इस डर के बारे में सोचने लगा कि अधोलोक से प्रेतों के बीच से मिद्यूज़ा उठ खड़ी होगी और जब अगथोन अपने भाषण के अन्त तक पहुँचा तो मुझे ऐसा लगा जैसे उसकी गार्जियस जैसी वक्तृत्व कला में मिद्यूज़ा के सिर की शक्ति है, जो मुझे पत्थर की तरह गूंगा बना देगी।
और तब मुझे यह बात समझ में आई कि आपकी इस विरुदावली में सम्मिलित होने के लिए हामी भरना कितनी बड़ी मूर्खता थी। इससे भी बुरी बात यह थी कि मैं इस क्षेत्र में विशेष ज्ञान का दावा कर रहा था, जबकि सच यह है कि कोई भी विरुदावली कैसे कही जाए इसके बारे में मुझे रत्ती भर भी ज्ञान नहीं है। मैंने अपनी नादानी में यह सोचा था कि वक्ता को पहले अपने विषय से सम्बंधित तथ्यों के बारे में बताना चाहिए और उसके बाद उनमें से सबसे आकर्षक विशेषताओं का चयन कर उन्हें सर्वोत्तम तरीके से पेश करना चाहिए। मैं मन ही मन मियाँ मिट्ठू बन रहा था कि मेरा भाषण अत्यंत सफल होगा, क्योंकि मैं तथ्य जानता हूँ। लेकिन ऐसा लगता है विरुदावली में वे सफल होते हैं जिन्हें सच से कोई लेना-देना नहीं रहता- बल्कि वे अपनी बात, भले ही वह झूठों का पुलिंदा हो और विषय से पूरी तरह असम्बद्ध हो, जोशोखरोश के साथ कहते जाते हैं।
इसलिए मैं यह मानता हूँ कि प्रेम देवता की प्रशंसा करने के बजाय हमने शायद उनकी चापलूसी में क़सीदे पढ़ने का काम अपने ऊपर ले लिया है और इसीलिए आप सबके मन में जो भी पहली बात आयी आपने उसे कहा। आपने उसे सर्वोत्तम और सर्वगुणसंपन्न कहा और हर अच्छी और ख़ूबसूरत चीज़ का श्रेय भी उसी को दे दिया। यह सच है कि जो इस क्षेत्र में नए हैं वे आपकी प्रशस्ति शैली के सौन्दर्य और भव्यता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते, लेकिन जो जानकार हैं वे इतनी आसानी से भुलावे में नहीं आयेंगे।
तो, दोस्तो, मैं यह दोहराना चाहूँगा कि पूरा प्रकरण ही एक ग़लतफ़हमी था और मैं अपने अज्ञान के कारण ही इसमें शामिल होने के लिए राज़ी हुआ। यूरिपिदीज़ के हिपोलितस की तरह मैं विरोध करना चाहूँगा कि मेरे अधरों ने ही वचन दिया था, मेरी आत्मा ने नहीं। इसी के साथ बात समाप्त होती है। मैं आपकी विरुदावली से अपना सम्बन्ध तोड़ता हूँ, क्योंकि यदि मैं कोशिश भी करूँ तो कुछ नहीं कर पाऊँगा। हाँ, यदि आप प्रेम के सम्बन्ध में सत्य जानना चाहते हैं तो कुछ कहने में मुझे आपत्ति नहीं है, लेकिन मैं जो भी कहूँगा अपने अंदाज़ में कहूँगा क्योंकि अब इस उम्र में आकर आपका अनुकरण करते हुए मैं अपनी हँसी उड़ाना नहीं चाहता। आपकी धमाकेदार शैली आपको शोभा देती है, मेरे लिए तो वह हास्यास्पद होगी। तो, फिदरस तुम फ़ैसला करो। क्या तुम ऐसे वक्ता को सुनना पसंद करोगे, जिसे केवल इस बात की परवाह है कि वह जो बोले सही बोले और जिसे अपनी शैली की कोई चिंता न हो?
इस पर फिदरस और दूसरे लोगों ने उसे कहा कि वह जिस तरह का भाषण देना चाहता है वैसा ही भाषण दे।
तो ठीक है, उसने कहा, लेकिन शुरू करने से पहले एक और बात। क्या हमारे अध्यक्ष महोदय को कोई आपत्ति होगी यदि मैं अगथोन से कुछ सीधे-सादे प्रश्न पूछूं? क्योंकि मैं अपना भाषण शुरू करने से पहले निश्चिन्त हो जाना चाहता हूँ कि हम सब एक ही दिशा की ओर बढ़ रहे हैं।
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जो भी पूछना चाहो पूछो, फिदरस ने कहा, मुझे कोई ऐतराज़ नहीं।
इसपर सुकरात ने जो कुछ कहा, जहाँ तक अरिस्तोदेमस को याद था, उसका वर्णन नीचे दिया जा रहा है।
मेरे प्रिय अगथोन, मैं यह मानता हूँ कि तुमने अपने भाषण के आरम्भ में जो बात कही वह बिलकुल मौजूं थी। तुम्हारा यह कहना बिलकुल सही था कि पहले प्रेम देवता के स्वाभाव से परिचय कराया जाना चाहिए और फिर उसके कार्यों के बारे में बताया जाना चाहिए। तुम्हारी भूमिका सचमुच प्रशंसनीय थी, लेकिन प्रेम के सम्बन्ध में तुम्हारे अपूर्व वर्णन को सुनने के बाद एक छोटी सी बात है जिसे मैं सही-सही नहीं समझ पाया। मुझे बताओ, क्या तुम मानते हो कि प्रेम की प्रकृति ऐसी है कि वह किसी न किसी का प्रेम होगा या क्या ऐसा भी हो सकता है कि प्रेम तो हो लेकिन किसी का न हो? मेरा मतलब यह नहीं है कि क्या वह माँ का प्रेम है या पिता का प्रेम है? यह एक मूर्खतापूर्ण सवाल है, लेकिन मान लो मैं तुमसे यह पूछूं कि क्या एक पिता को पिता के रूप में किसी न किसी का पिता होना चाहिए तो इसका एकमात्र सही उत्तर यही हो सकता है कि किसी पुत्र या पुत्री का पिता ही पिता हो सकता है। क्या मैं सही हूँ?
हाँ,हाँ,क्यों नहीं, अगथोन ने कहा।
क्या माँ के सम्बन्ध में भी हम यही बात कह सकते है?
हाँ।
अच्छा! अब यदि तुम एक-दो और प्रश्नों का उत्तर दे सको तो मैं सोचता हूँ कि तुम्हें यह बात समझ में आ जाएगी कि मेरा आशय क्या है? मान लो मैं तुमसे यह पूछूं कि भाई के सम्बन्ध में तुम क्या कहोगे? उसे भी किसी का भाई होना चाहिए या नहीं?
अवश्य। उसे किसी का भाई होना चाहिए।
तुम्हारा तात्पर्य यह है कि उसे किसी भाई या बहन का भाई होना चाहिए?
बिलकुल, अगथोन ने कहा।
तो, सुकरात ने अपनी बात जारी रखी, मैं यह चाहता हूँ कि तुम प्रेम को भी इसी नज़र से देखो। क्या प्रेम किसी चीज़ का है या किसी भी चीज़ का नहीं?
स्वाभाविक तौर पर प्रेम किसी चीज़ का होगा।
और अब, सुकरात ने कहा, इसे ध्यान में रखते हुए कि प्रेम किसी चीज़ का प्रेम है, मुझे यह बताओ, कि जिस चीज़ के लिए उसे प्यार है क्या उसके लिए वह तड़पता है या नहीं?
अवश्य उसके लिए तड़पता है।
और जिस चीज़ के लिए उसे प्यार है और जिसके लिए वह तड़पता है, क्या उसे उसने पा लिया है या उसके पास वह नहीं है?
शायद वह उसके पास नहीं है।
तो क्या यह संभव नहीं है, सुकरात ने कहा, या क्या यह सच नहीं है कि हर चीज़ उस चीज़ के लिए तड़पती है जो उसके पास नहीं है और कोई भी चीज़ उस चीज़ के लिए नहीं तड़पती जो उसके पास है? मुझे ऐसा लगता है अगथोन, यह बात उतनी ही सच है जितनी कोई बात हो सकती है। क्या तुम ऐसा नहीं सोचते?
हाँ, मुझे लगता है यह बात सही है।
बहुत खूब! अब मुझे बताओ कि क्या यह संभव है कि एक विशालकाय आदमी विशालकाय बनना चाहे या एक शक्तिशाली आदमी शक्तिशाली बनाना चाहे?
नहीं, यदि अभी-अभी हम जिस निष्कर्ष पर पहुंचे थे, वह ठीक था।
बिलकुल, क्योंकि दोनो में उस खास गुण की कमी नहीं है।
ठीक।
क्योंकि, सुकरात ने आगे कहा, यदि शक्तिशाली आदमी शक्ति चाहे या तेज़ दौड़नेवाला तेज़ी चाहे या स्वस्थ आदमी स्वास्थ्य चाहे तो ऐसे मामलों में यह कहा जा सकता है कि ये लोग वही चाहते हैं जो उनके पास है। मैं ऐसे मामले की कल्पना करने का प्रयास कर रहा हूँ ताकि हम आश्वस्त हो सकें कि हम सही दिशा में अग्रसर हैं। तो, अगथोन, यदि ऐसे लोगों के बारे में हम ठहरकर सोचें तो हम पाएंगे कि वे चाहें या न चाहें यदि उनके पास कोई ख़ूबी है तो वे उसी ख़ूबी को पाना क्यों चाहेंगे? यदि हम किसी को यह कहते सुनें कि "मैं स्वस्थ हूँ और स्वस्थ होना चाहता हूँ, धनी हूँ और धनी होना चाहता हूँ और असल में मैं वही होना चाहता हूँ जो हूँ" तो ऐसे आदमी से हमारा यह कहना ग़लत नहीं होगा कि "भाई, तुम्हारे पास तो पहले से ही धन है, स्वास्थ्य है और शक्ति है; तुम यह चाहते हो कि तुम्हारे पास आगे भी यह सब रहे, क्योंकि इस क्षण तो तुम चाहो या न चाहो ये सब तुम्हारे पास हैं। क्या ऐसा नहीं लगता कि जब तुम कहते हो कि तुम अभी भी यही सब चाहते हो तो तुम्हारा असल में मतलब यह है कि जो कुछ तुम्हारे पास अभी है उसे तुम आगे भी रखना चाहते हो? मेरे प्रिय अगथोन, क्या तुम नहीं सोचते उसके पास हमारी बात से सहमत होने के सिवा और कोई चारा नहीं है?
बिलकुल, वह जरूर सहमत होगा, अगथोन ने कहा।
तो, सुकरात ने आगे कहा, किसी चीज़ को सदा के लिए अपने पास रखने की इच्छा के सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है कि आप ऐसी चीज से प्यार करते हैं जो अभी आपके पास नहीं है।
निश्चित रूप से।
इसलिए, किसी को भी यदि किसी चाहत का अहसास हो तो वह चाहत ऐसी चीज़ के लिए है जो उसके पास नहीं है। उसके प्यार या उसकी इच्छा का आधार वह है जो वह नहीं है या जो उसके पास नहीं है, यानी जिसका उसमें अभाव है।
बिलकुल
और अब, सुकरात ने कहा, क्या हम इन दो निष्कर्षों से सहमत हैं? पहला कि प्रेम हमेशा किसी चीज़ का प्रेम है और दूसरा, वह चीज़ वह है जिसका उसमें अभाव है।
सहमत, अगथोन ने कहा।
चलो, अब तक तो ठीक है, सुकरात ने कहा, और अब, क्या तुम्हें याद है अभी तुमने अपने भाषण में प्रेम का क्या आधार बताया? मैं तुम्हारी याददाश्त को तरोताज़ा करना चाहूँगा। तुमने कुछ इस प्रकार कहा- देवता सौन्दर्य के प्रति प्रेम के कारण कार्य करते हैं, क्योंकि यह सच है कि कुरूपता के प्रति प्रेम जैसी कोई चीज़ नहीं है। क्या तुमने यही कहा था न?
हाँ, अगथोन ने कहा।
निस्संदेह तुमने जो कहा सही कहा, सुकरात ने कहा, और यदि ऐसा है तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रेम सौन्दर्य का प्रेम है, कुरूपता का नहीं।
हाँ।
और क्या हम इस बात से सहमत नहीं हुए है कि प्रेम हमेशा उस चीज के लिए होता है जो उसके पास नहीं है और जिसका उसमें अभाव है?
हाँ।
तो इसका अर्थ यह हुआ कि प्रेम के पास सौन्दर्य नहीं है, उसमें सौन्दर्य का
अभाव है?
हाँ, इसका अर्थ तो यही हुआ।
तो तुम क्या यह कहना चाहोगे कि जिसमें सौन्दर्य नहीं है वह स्वयं सुन्दर हो सकता है?
नहीं, कतई नहीं।
और यदि ऐसा है तो तुम क्या अब भी मानते हो कि प्रेम सुन्दर है ?
इसपर अगथोन केवल यह कह सका- मेरे प्रिय सुकरात, मुझे लगता है कि मुझे यह पता नहीं था कि मैं क्या कह रहा था।
चिंता मत करो, सुकरात ने कहा, तुम्हारा भाषण बहुत अच्छा था। बस एक और बात पूछना चाहूँगा। शायद तुम यह मानते हो कि जो शुभ है वह सुन्दर भी है।
हाँ।
तो, यदि प्रेम में सौन्दर्य का अभाव है और शुभ और सुन्दर एक ही बात है तो प्रेम में शुभ का भी अभाव होना चाहिए।
हाँ, सुकरात, तुम सचमुच लाजवाब कर देते हो।
नहीं, अगाथोन, सुकरात नहीं बल्कि तुम्हें सत्य लाजवाब कर रहा है। और अब तुम्हें परेशान नहीं करूँगा। तुम चैन की साँस ले सकते हो, क्योंकि अब मैं कुछ ऐसे ज्ञान की चर्चा करना चाहता हूँ, जिसे मैंने वर्षों पहले मंतिनियाई स्त्री दायोतिमा से सीखा था- जो इस विद्या में और ऐसी ही अनेक विद्याओं में पारंगत थी। दायोतिमा ही थी जिसने किसी यज्ञ के समय एथेन्स में आनेवाली महामारी को दस वर्षों के लिए आगे बढ़ा दिया था। उसीने मुझे प्रेम का दर्शन समझाया था। अगथोन और मैं अभी-अभी जिस निष्कर्ष पर पहुंचे, मैं दायोतिमा की शिक्षा को उससे जोड़ने की कोशिश करूँगा- बिना उसके सहयोग के जहाँ तक संभव हो सके। अगथोन की तरह ही मैं पहले यह बताऊंगा कि प्रेम कौन है और क्या है और उसके बाद उसके कार्य बताऊंगा। मैं सोचता हूँ सबसे आसान तरीक़ा यह होगा कि सवाल और जवाब के माध्यम से सत्य का अन्वेषण करने की दायोतिमा की शैली अपनायी जाए। मैं दायोतिमा को वही सब सुना रहा था जो कुछ देर पहले अगथोन कह रहा था कि कैसे प्रेम एक महान देवता है और कैसे वह सौन्दर्य का प्रेम है। उसने उन्हीं तर्कों से मुझे पराजित किया जिनसे मैंने अभी अगथोन के सामने साबित किया कि प्रेम न तो सुन्दर है और न शुभ।
इसके बाद मैंने पूछा, प्रिय दायोतिमा, क्या तुम मुझे यह यक़ीन दिलाने की कोशिश कर रही हो कि प्रेम बुरा है और कुरूप है?
ईश्वर मुझे क्षमा करे, उसने कहा, क्या तुम सचमुच मानते हो कि यदि कोई चीज़ सुन्दर न हो तो कुरूप ही होगी?
हाँ, क्यों नहीं?
और यदि कोई विद्वान नहीं है तो वह मूर्ख ही होगा? क्या तुमने उस स्थिति के बारे में कभी नहीं सुना है जो दो स्थितियों के बीच की स्थिति है?
जैसे?
क्या तुम नहीं जानते, उसने पूछा, कि किसी चीज के बारे में कोई सही राय रखता हो लेकिन उसका कारण नहीं बता पाता हो, तो न तो उसे सच्चा ज्ञान कहेंगे- क्योंकि बिना कारण जाने ज्ञान कैसा— और उसे अज्ञान भी नहीं कहेंगे क्योंकि उसे अज्ञान कैसे कहा जाए जब वह सही है? इसलिए क्या हम यह नहीं मानें की सही राय ज्ञान और अज्ञान के बीच की स्थिति है?
हाँ, मैंने माना, यह बिलकुल सच है।
इसलिए,उसने कहा, इस बात पर तुम क्यों जोर देते हो कि जो सुन्दर नहीं है, वह कुरूप है और जो अच्छा नहीं है वह बुरा है? इसलिए, हम प्रेम की बात करें तो तुम इस बात से सहमत होने के लिए बाध्य हो गए हो कि प्रेम न तो अच्छा है और न सुन्दर है, लेकिन यह कोई कारण नहीं है कि हम सोचें कि वह बुरा और कुरूप ही होगा। सच्चाई यह है कि वह इन दोनों स्थितियों के बीच में है।
लेकिन इसके बावजूद, मैंने कहा, लोग आम तौर पर यह मानते हैं कि वह एक महान देवता है।
यह इस बात पर निर्भर करता है, उसने कहा, तुम्हारे ‘आम तौर पर’ का क्या मतलब है। तुम इसमें उन लोगों को शामिल करते हो जो इसके बारे में कुछ नहीं जानते या उनको शामिल करते हो जो इसके बारे में जानते हैं?
मेरा मतलब सबसे था।
इसपर वह हंस पड़ी और बोली-तब क्या तुम बता सकते हो कि लोग इस बात से कैसे सहमत हो सकते हैं कि वह महान देवता है जबकि लोग यह भी मानते हैं कि वह कोई देवता है ही नहीं?
तुम्हारा मतलब किन लोगों से है? मैंने पूछा।
एक तो तुम ही और दूसरी मैं।
क्या कह रही हो?
हाँ, बात बिलकुल आसान है, उसने कहा, मुझे बताओ, क्या तुम यह नहीं कहोगे कि सभी देवता सुखी और सुन्दर हैं? या तुम यह कहना चाहते हो उनमें से कोई-कोई न तो सुखी है और न सुन्दर है?
नहीं-नहीं ऐसा मैं नहीं कहूँगा, मैंने कहा।
और क्या तुम उन लोगों को सुखी नहीं मानते जिनके पास सौन्दर्य भी है और शुभ भी?
बिलकुल।
और फिर तुम अभी-अभी सहमत हुए कि प्रेम में इन गुणों का अभाव है और इसलिए वह इन गुणों के लिए आतुर रहता है।
हाँ, मैंने माना था।
तो यदि उसमें शुभ और सौन्दर्य का कोई अंश नहीं है तो वह कैसे देवता हो सकता है?
शायद वह देवता नहीं हो सकता, मैंने माना।
और अब, उसने कहा, क्या मैंने यह साबित नहीं कर दिया कि तुम एक ऐसे आदमी हो जो प्रेम के देवत्व में विश्वास नहीं करता?
हाँ, लेकिन तब वह क्या है, मैंने पूछा, कोई मर्त्य?
नहीं, बिलकुल नहीं।
तब?
जैसा कि मैंने तुम्हें पहले ही कहा- वह मृत्यु और अमरत्व के बीच में है।
इसका क्या मतलब है, दायोतिमा?
एक बहुत ही शक्तिशाली रूह और तुम जानते हो रूहें देवता और आदमी के बीच की कड़ी हैं।
और इन रूहों की शक्ति क्या है? मैंने पूछा।
वे स्वर्ग और धरती के बीच आने-जाने वाली संदेशवाहिका और दुभाषिये हैं, जो हमारी प्रार्थना और विनती के साथ ऊपर उड़कर जाती हैं और स्वर्गिक उत्तर और आदेश लेकर नीचे उतरती हैं और चूँकि वे दो लोकों के बीच में हैं इसलिए वे दोनों लोकों को एक सूत्र में बांधती हैं और उन्हें सम्पूर्णता प्रदान करती हैं। वे भविष्य-कथन, यज्ञ, दीक्षा, तंत्र-मंत्र, जादू- टोने का माध्यम बनती हैं। देवता मनुष्यों से सीधे नहीं घुलते- मिलते, इसलिए मानवों का देवताओं से संपर्क, जाग्रत या सुषुप्त, दोनों अवस्थाओं में रूहों के माध्यम से ही होता है। जो व्यक्ति इन मामलों में पारंगत होता है, उसके बारे में कहा जाता है कि उनके पास रूहानी शक्ति है, जो मानव की यांत्रिक शक्तियों के विपरीत है, क्योंकि मानव पार्थिव कलाओं में ही प्रवीण होता है। ऐसी अनेक रूहें हैं और उनके अनेक प्रकार हैं। प्रेम उन्हीं में से एक है।
तो उसके माता-पिता कौन थे? मैंने पूछा।
मैं तुम्हें बताती हूँ, उसने कहा, हालाँकि यह एक लम्बी दास्तान है। एफ्रदायती के जन्म के दिन देवता आनंदोत्सव मना रहे थे। उनमें पुरुषार्थ देवता भी था जो शिल्प देवता का पुत्र है। सभी देवताओं ने रात्रिभोज किया। इसी समय द्वार पर भीख मांगने आवश्यकता आई, क्योंकि उसने भीतर से हर्षोल्लास की आती आवाजों को सुना था। अब ऐसा हुआ कि पुरुषार्थ ने स्वर्गिक अमृत छक कर पिया था- यह उस समय की बात है जब सुरा का अविष्कार नहीं हुआ था- और वह ज़्यूस के बाग़ में टहलने के बाद वहीँ एक स्थान पर गहरी नींद सो गया था। आवश्यकता ने सोचा, यदि उसे पुरुषार्थ से एक संतान मिल जाए तो उसकी दरिद्रता समाप्त हो जाएगी। यह सोचकर वह सोए पुरुषार्थ के पास लेट गयी। थोडी ही देर में वह प्रेम शय्या पर थी। इस प्रकार प्रेम काम की देवी, एफ्रदायती, का अनुगामी और अनुचर है, क्योंकि उसका जन्म उसी दिन हुआ जिस दिन वह जन्मी थी और यह भी सच है कि प्रेम का जन्म सौन्दर्य के प्रेम के उद्देश्य से हुआ क्योंकि एफ्रदायती सुन्दर है।
चूँकि प्रेम पुरुषार्थ और आवश्यकता का पुत्र है, इसलिए उसकी किस्मत है कि वह हमेशा ज़रूरतमंद है। और न ही वह नाज़ुक और आकर्षक है, जैसा कि हम सब मानते हैं, बल्कि वह कटु और शुष्क है; नंगे पाँव, बेघर, कभी नंगी जमीन पर, दहलीज पर और कभी- कभी खुले आसमान को निहारते हुए सड़कों पर सोता है और अपनी माँ से मिली दरिद्रता को भोगता है, लेकिन सुन्दर और शुभ को हासिल करने में वह अपने पिता से मिले पुरुषार्थ का इस्तेमाल करता है, क्योंकि वह चतुर शिकारी है, कला-कौशल में निपुण है, एक साथ जिज्ञासु भी है और ज्ञान से भरपूर भी, आजीवन सत्य की खोज में रहता है और जादूगरी, सम्मोहन और वशीकरण में माहिर है।
वह न तो मर्त्य है न अमर्त्य, क्योंकि यदि उसके साथ सब कुछ ठीक-ठाक चले तो वह जीवंत और प्रफुल्लित रहता है, लेकिन एक दिन के भीतर ही वह मौत के कगार पर पहुँच जाता है। अपने पिता से मिले स्वभाव के कारण वह फिर जी उठता है। जो भी वह उपलब्ध करता है वह उतनी ही तेजी से हाथ से निकल भी जाता है। इसलिए प्रेम कभी भी आवश्यकता से पूरी तरह मुक्त नहीं है और अक्सर ज्ञान और अज्ञान के बीच दोलायमान रहता है। तुम्हें यह समझना चाहिए कि कोई भी देवता सत्य की खोज नहीं करता। वे ज्ञान भी नहीं चाहते, क्योंकि वे ज्ञानी हैं-आखिर ज्ञानी ज्ञान की खोज क्यों करेंगे, जबकि वह चीज उनके पास ही है? और यह भी सच है कि जो मूर्ख हैं वे भी सत्य की खोज नहीं करते और न ज्ञानी बनना चाहते हैं। उनकी स्थिति इसलिए भी दयनीय है कि न तो उनके पास सौन्दर्य है, न अच्छाई और न कोई प्रतिभा। उनके पास जो कुछ है, उससे वे संतुष्ट हैं और उनके मन में उन गुणों की कोई कामना नहीं जगती जिनकी कमी उन्होंने कभी भी महसूस नहीं की है।
तब दायोतिमा, मैंने पूछा, मुझे बताओ कि ये सत्य की खोज करनेवाले कौन हैं जो न तो ज्ञानी हैं, न मूर्ख?
अरे, दायोतिमा ने जवाब दिया, अब तक जो मैं कह रही थी उसके बाद तो इसका जवाब कोई भी नौसिखुआ दे सकता है। सत्य की खोज करनेवाले वे हैं जो ज्ञानी और मूर्ख के बीच हैं और उनमें से एक प्रेम है। ज्ञान का सम्बन्ध जीवन की सुन्दरतम चीज़ों से है और प्रेम भी सौन्दर्य का प्रेम है। इससे सिद्ध होता है कि प्रेम ज्ञान का प्रेमी है और इस कारण वह ज्ञान और अज्ञान के बीच में स्थित है- जिसके लिए कसूरवार उसके माता-पिता ही हैं, क्योंकि पिता ज्ञान और पुरुषार्थ से भरपूर था, जबकि माँ में दो में से एक भी गुण नहीं था।
और मेरे प्रिय सुकरात,प्रेम की यही प्रकृति है, लेकिन प्रेम के बारे में तुम्हारे जो विचार हैं, उनसे मैं पूरी तरह अचम्भे में भी नहीं हूँ, क्योंकि तुमने जो कुछ कहा उससे ऐसा लगता है जैसे तुम प्रेम को प्रियतम समझते हो प्रेमी नहीं। इसीलिए तुमने प्रेम को अत्यंत खूबसूरत माना है, क्योंकि प्रियतम खूबसूरत, परिपूर्ण, सुकुमार और ऐश्वर्य्वान होता है-जबकि प्रेमी बिलकुल अलग होता है, जैसा कि मैंने अभी वर्णन किया है।
चलिए, महोदया, मैंने मान लिया, मैंने कहा, आप सही हैं। तब, मानवता के लिए ऐसे प्रेम से क्या लाभ?
मैं अब इसी विषय पर आने वाली थी, उसने कहा। प्रेम की प्रकृति और उसकी उत्पत्ति के बारे में बहुत चर्चा हुई। तुम्हारा यह सोचना सही था कि प्रेम उसका प्रेमी है जो सुन्दर है। लेकिन यदि कोई तुमसे पूछे कि सौन्दर्य के प्रेम का मतलब क्या है? या दूसरी तरह से तुम्हें कोई पूछे कि सौन्दर्य प्रेमी आखिर चाहता क्या है?
वह सौन्दर्य को अपना बनाना चाहता है, मैंने कहा।
बहुत अच्छा, उसने कहा, लेकिन तुम्हारे इस जवाब से एक और सवाल उठता है। सौन्दर्य को अपना बनाकर आखिर उसे क्या मिलेगा?
मुझे मानना पड़ा कि इसका मैं तत्क्षण जवाब नहीं दे सकता था।
तो, उसने कहा, मान लो कि सौन्दर्य की जगह कोई तुमसे अच्छाई के बारे में पूछे। सुकरात, मैं तुमसे पूछती हूँ, जो अच्छाई का प्रेमी है, वह क्या चाहता है?
वह अच्छाई को आत्मसात् करना चाहता है।
अच्छाई को आत्मसात् करके उसे क्या मिलेगा?
इस सवाल का तो मैं बेहतर जवाब दे सकता हूँ, मैंने कहा। उसे ख़ुशी मिलेगी।
ठीक, उसने कहा, क्योंकि जो ख़ुश हैं वे उसी हद तक ख़ुश हैं जिस हद तक उनमें अच्छाई है। और चूंकि यह पूछना जरूरी नहीं है कि लोग ख़ुश क्यों रहना चाहते हैं, इसलिए मेरे विचार में तुम्हारा उत्तर परिपूर्ण है।
बिलकुल, मैं सहमत हूँ।
यह चाहत, उसने कहा, यह प्रेम - क्या पूरी मानवता के लिए सच है ? तुम्हारा क्या विचार है, यह जो अच्छाई को आत्मसात् करने की इच्छा है, क्या हम सब में है?
हाँ, मैंने कहा, इस सम्बन्ध में हम सब एक जैसे हैं।
तो सुकरात, यदि हम कहें कि हर एक आदमी हमेशा एक ही चीज़ को प्यार करता है तो क्या हर आदमी प्यार में है? या इसका मतलब यह है कि हम में से कुछ लोग प्यार में है और कुछ लोग प्यार में नहीं है?
इस बारे में मैं थोडा असमंजस में हूँ, मैंने कहा।
इसमें असमंजस की कोई बात नहीं, उसने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा। दरअसल हम प्रेम का नाम उस चीज़ को देते आ रहे हैं जो केवल उसका एक पहलू है। हम इस तरह की ग़लती दूसरे नामों के साथ भी करते हैं।
जैसे?
जैसे, कविता। तुम मानोगे कि सही अर्थों में देखा जाए तो कविता एक ही प्रकार की नहीं होती। कविता का अर्थ है-जो नहीं है उसे अस्तित्व में लाना और इसलिए हर कलात्मक रचना कविता है और हर कलाकार कवि है।
सच।
लेकिन फिर भी, उसने कहा, हम सभी कलाकारों को कवि नहीं कहते। नहीं कहते न? हम विभिन्न कलाओं को विभिन्न नाम देते हैं और केवल एक कला को, जिसमें संगीत और छंद है, वह नाम देते हैं जो सभी कलाओं को मिलना चाहिए। हम केवल उस कला को कविता कहते हैं और उस कलाकर्मी को कवि कहते हैं।
सही।
प्यार के साथ भी ऐसा ही है, क्योंकि प्यार की मशहूर मोहक शक्ति में ख़ुशी और अच्छाई की हर चाहत शामिल है। इसके बावजूद व्यवसाय,खेलकूद, दर्शन आदि विभिन्न क्षेत्रों में यदि हम इस चाहत के अधीन हैं तो यह कभी नहीं कहा जाता है कि हम प्यार में पड़ गए हैं और हम प्रेमी हैं, जबकि जो आदमी प्यार के अनेक रूपों में से केवल एक रूप के प्रति समर्पित है तो उसे वह नाम दिया जाता है जिसे सबको दिया जाना चाहिए।
हाँ, मैंने कहा, तुम शायद सही हो।
मैं जानती हूँ, उसने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, कुछ लोग यह कहते हैं कि प्रेमी वे हैं जो अपने अर्द्धांश की खोज में हैं, लेकिन मेरा विचार यह है, सुकरात, कि प्रेम न तो अर्द्धांश, न पूर्णांश खोजता है, बल्कि वह केवल अच्छाई चाहता है, क्योंकि लोग अपने हाथ और पाँव भी काट कर फेंक देंगे, यदि उन्हें यक़ीन हो जाए कि ये अंग उनके लिए बुरे हैं। मैं तो यह सोचती हूँ हम अपने सामान को भी उसी हद तक महत्त्व देते हैं जिस हद तक हम कह सकते हैं कि अच्छा हमारे पास है और बुरा दूसरों के पास। या तुम इससे असहमत हो?
अरे नहीं! मैंने कहा।
तो क्या हम बिना किसी लाग-लपेट के यह कह सकते हैं कि लोग अच्छाई के प्रेमी हैं?
हाँ, मैंने कहा, हम कह सकते हैं।
और क्या हम यह भी कह सकते हैं कि लोग अच्छाई इसलिए चाहते हैं ताकि उसे अपना बना सकें?
हाँ, कह सकते हैं।
और न केवल उसे अपना बनाना चाहते हैं बल्कि उसे सदा के लिए अपना बनाना चाहते हैं?
हाँ।
थोड़े में कहें तो यह कि प्रेम अच्छाई को सदा के लिए अपना बनाना चाहता है।
हाँ, मैंने कहा, यह बिलकुल सही है।
यदि ऐसी बात है तो प्रेम के अनुयायियों को किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए? किस खास क्षेत्र में तत्परता और प्रयास प्यार के नाम से जाना जाएगा? दरअसल प्यार करने का मतलब क्या है? क्या सुकरात तुम मुझे बता सकते हो?
मेरी प्रिय दायोतिमा, मैंने कहा, यदि मैं यह बता सकता तो मैं इस विषय में तुम्हारी गहरी पैठ से इतना प्रभावित नहीं होता और तुम्हारे पास इसी सवाल का जवाब जानने बार-बार न आता।
तो मैं तुम्हें बताती हूँ, उसने कहा, प्यार करना देह और आत्मा दोनों में सौन्दर्य को जन्म देना है।
मुझे लगता है, मैंने कहा, मेरी कमजोर समझ के लिए यह बात बहुत गहरी है।
तो मैं और आसान लहजे में बताने की कोशिश करती हूँ। हम सब, सुकरात, देह में और आत्मा में अति उर्वर हैं। जब हम एक खास उम्र में पहुचते हैं, तो प्रकृति हमें संतानोत्पत्ति के लिए प्रेरित करती है। और हमें कुरूपता उत्तेजित नहीं करती, केवल सौन्दर्य उत्तेजित करता है। हम जानते हैं कि गर्भाधान तब होता है जब पुरुष और स्त्री का समागम होता है, लेकिन मानव -प्रजनन में एक देवत्व है, उसकी नश्वरता के बीच एक अमरत्व है, जो किसी प्रकार के बेसुरेपन,कलह, मनमुटाव से असंगत है। कुरूपता देवत्व के साथ नहीं चल सकती, जबकि सौन्दर्य का देवत्व के साथ पूर्ण सामंजस्य है। इसलिए प्रजनन के क्षेत्र में सौन्दर्य ही नियति और प्रसव पीड़ा दोनों की अधिष्ठात्री है और जब प्रजनन क्षमता सौन्दर्य के निकट आती है तो वह प्रसन्न और द्रवित हो जाती है और इसलिए शीघ्र गर्भाधान हो जाता है। लेकिन प्रजनन क्षमता का सामना कुरूपता से होता है तो उसपर मानो मनहूसियत छा जाती है और उससे विमुख होकर अपने आप में सिकुड़ जाती है और सेज पर नहीं जाती और अपने दुःख से परेशान रहती है। इसलिए जब प्रजननक्षम के पास शिशु की सम्भावना हो तो वह सुन्दर रूप देखकर आश्चर्यजनक रूप से उत्प्रेरित होता है, क्योंकि वह जानता है कि सौन्दर्य का आश्रय ही उसके कष्ट का निवारण है। इसलिए सुकरात तुम यह देख सकते हो कि प्रेम हूबहू सौन्दर्य की चाहत नहीं है, जैसा कि तुम कह रहे थे।
तो, फिर यह क्या है?
यह सौन्दर्य की चाहत नहीं है, बल्कि यह सौन्दर्य के कारण होने वाले गर्भाधान और संतानोत्पत्ति के प्रति तीव्र आकर्षण है।
हाँ, निस्संदेह तुम सही हो।
बिलकुल, मैं सही हूँ, उसने कहा। और संतानोत्पत्ति के लिए इतनी चाहत क्यों है? क्योंकि हमारी मरणशीलता के बीच यही एक अमर और शाश्वत तत्व है। चूंकि हम इस बात से सहमत हैं कि प्रेमी अच्छाई को सदा के लिए अपनाना चाहता है, इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि उसे अमरत्व की भी चाहत होगी- यानी प्रेम अमरत्व की चाहत है।
और इस तरह दायोतिमा से कई बार मिलकर मैंने उसकी प्रेम की व्याख्या से यह सब सीखा।
और फिर एक दिन उसने पूछा, सुकरात, यह तो बताओ, इतनी चाहत और इतने प्रेम का क्या कारण हो सकता है? क्या तुमने यह नहीं देखा है कि यह जो प्रजनन की नैसर्गिक वृत्ति है वह पशु-पक्षियों पर कितना असाधारण प्रभाव छोड़ती है और वे किस तरह पहले समागम करने के लिए और फिर बच्चों की सुरक्षा के लिए बेचैन रहते हैं और किस तरह कमजोर से कमजोर प्राणी भी अपने बच्चों की रक्षा करने के लिए अत्यंत शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी से भी भिड़ जाता है और अपनी जान तक दे देता है और किस तरह अपने बच्चों को जिन्दा रखने के लिए भूख-प्यास और हर प्रकार का कष्ट सहने के लिए तैयार रहता है? आदमी के सम्बन्ध में तुम यह कह सकते हो कि यह सब उसकी विवेक-बुद्धि के कारण है, लेकिन पशु-पक्षियों पर प्रेम के ऐसे विलक्षण प्रभाव का क्या कारण हो सकता है? तुम्हारा क्या ख़्याल है, सुकरात?
मुझे फिर अपने अज्ञान को स्वीकार करना पड़ा।
मैं नहीं समझ नहीं पाती, उसने कहा, यदि इतनी-सी बात समझना तुम्हारे लिए कठिन हो रहा है तो तुम किस तरह प्रेम के दर्शन में पारंगत होने की आशा रखते हो?
लेकिन मेरी प्रिय दायोतिमा, मैंने विरोध किया, मैं पहले ही कह चुका हूँ कि मैं तुमसे सीखना चाहता हूँ, क्योंकि मुझे पता है मैं कितना बड़ा अज्ञानी हूँ! मेरे मन में तुम्हारे प्रति कृतज्ञता से भी बढ़कर भावना रहेगी यदि तुम न केवल इसका कारण, बल्कि प्रेम के सभी प्रभावों का कारण बता सको।
ठीक है, उसने कहा, इसे समझना आसान है, यदि प्रेम के उद्देश्य के सम्बन्ध में हम दोनों जिस बात पर सहमत हुए थे उसे हम ध्यान में रखें। यहाँ भी यह सिद्धांत लागू होता है कि जो मर्त्य हैं वे अमरत्व चाहते हैं -और अमरत्व पाने का इसके सिवा और क्या तरीका हो सकता है कि प्रजनन किया जाए ताकि पुरानी पीढ़ी की जगह लेने के लिए हमेशा नयी पीढ़ी तैयार रहे?
हम किसी एक व्यक्ति को तब तक एक व्यक्ति समझते हैं, जब तक उसी रूप में उसका अस्तित्व बना रहता है और इसलिए हम यह मान लेते है कि व्यक्ति बचपन से लेकर बुढ़ापे तक वही व्यक्ति बना रहता है, परन्तु हम उस व्यक्ति को भले ही एक नाम से पुकारें लेकिन उसका कतरा-कतरा बदलता जाता है। हर दिन वह एक नया आदमी बनता है और पुराने आदमी का अस्तित्व समाप्त होते जाता है, जो उसके बाल, उसकी मज्जा, उसकी हड्डियों, उसके खून और उसकी देह के सभी अंगों से दिखता है- और न केवल उसकी देह, बल्कि उसकी आत्मा भी बदलती जाती है। न तो उसकी चाल-ढाल, न उसका स्वभाव, न उसके विचार, न उसकी इच्छाएँ, न उसके सुख-दुःख और न उसके डर-भय जिन्दगी भर एक जैसे बने रहते हैं, बल्कि उनमें से कुछ बढ़ जाते है और कुछ गायब हो जाते हैं।
यह सिद्धांत मानव ज्ञान पर और भी अधिक सटीकता के साथ लागू है, क्योंकि हम जो कुछ भी जानते हैं, उनमें से किसी ज्ञान में वृद्धि होती है तो कोई-कोई ज्ञान विलुप्त हो जाता है। इस तरह ज्ञान की दृष्टि से भी हमारी स्थिति हमेशा एक जैसी नहीं रहती, बल्कि यह सिद्धांत ज्ञान के हर क्षेत्र पर लागू होता है। जब हम कहते हैं कि हम अध्ययन कर रहे हैं, उसके पीछे असली अहसास यह है कि हमारा ज्ञान धीरी-धीरे घट रहा है। हम भूल जाते हैं क्योंकि हमारा ज्ञान नष्ट हो जाता है और विस्मृत ज्ञान की जगह नए ज्ञान को स्थान देने के लिए हमें अध्ययन करना पड़ता है, ताकि हमारे ज्ञान की स्थिति कम से कम वैसी रहे जैसी पहले थी।
इसी तरीके से हर मरणशील प्राणी अपने आप को चिरंतन बनाता है। वह ईश्वर की तरह अनंतकाल तक एक जैसा बना नहीं रह सकता। वह केवल अपनी जाति में अनुपयुक्त हो जाने के कारण होने वाले रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए एक नयी जिंदगी छोड़ सकता है। यही वह तरीका है, मेरे प्रिय सुकरात, जिसके माध्यम से यह शरीर और उसके साथ- साथ नश्वर कहलानेवाली सारी चीजें शाश्वत तत्व में साझीदार बनती हैं, और कोई तरीका नहीं है। इसीलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि हर प्राणी अपनी संतान को सर्वोपरि महत्त्व देता है, क्योंकि पूरी सृष्टि ही इस प्रेम से, अमरत्व के प्रति इस जूनून से आविष्ट है।
बहुत खूब दायोतिमा, उसकी बात पूरी होने पर मैंने कहा, तुम्हारा तर्क लाजवाब है, लेकिन क्या तुम सही भी हो?
बिलकुल सही हूँ, उसने अत्यंत अधिकारपूर्ण लहजे में कहा, अपने आसपास के लोगों की महत्वाकांक्षा के बारे में सोचो। हालाँकि , पहली नज़र में तुम्हें ऐसा लग सकता है कि इससे मेरा तर्क कमजोर पड़ता है, फिर भी तुम यह समझ जाओगे कि मैं कितनी सही हूँ, यदि तुम इस बात को ध्यान में रखो कि यश का आकर्षण ही मनुष्य के लिए सबसे बड़ी प्रेरणा है और उसके मन में सदा यह विचार रहता है कि "यशस्वियों की अमर सूची में उसकी चिरंतन चर्चा हो।''
यश की ख़ातिर वे बड़ा से बड़ा ख़तरा उठाते हैं, यहाँ तक कि ऐसे ख़तरे वे अपने बच्चों के लिए भी नहीं उठाते। वे यश के लिए पानी की तरह पैसा बहाने, हाड़तोड़ मेहनत करने और यदि ज़रूरत पड़े तो मरने के लिए भी तैयार रहते हैं।
उसने अपनी बात आगे जारी रखते हुए कहा-क्या तुम सोचते हो अलसेस्तिस ने अद्मेतस को बचाने के लिए अपनी जान दी होती या अकिलीज़ ने पत्रोक्लस के प्रति प्यार के कारण मृत्यु का वरण किया होता या एथेंस के रजा कोद्रस ने अपनी रानी की संतान को बचाने के लिए बलिदान दिया होता यदि उन्हें यह आशा नहीं होती कि "उन्हें वीरता के लिए अमरपद प्राप्त होगा"? नहीं, सुकरात,नहीं। हममें से हर एक में, चाहे वह कोई भी काम क्यों न करे, अंतहीन यश की चाहत है। हम सब अनुपम गौरव चाहते हैं। आदमी जितना श्रेष्ठ होगा, उसकी महत्त्वाकांक्षा भी उतनी ही बड़ी होगी, क्योंकि ऐसा आदमी चिर शाश्वत के प्रेम में बंधा हुआ है।
और इसलिए, उसने आगे कहा, जिनकी सृजन-क्षमता देह से जुडी है वे प्रेम के लिए स्त्री की ओर आकृष्ट होते हैं और इस आशा में एक परिवार का पालन-पोषण करते हैं कि ' युगों-युगों तक, चिर काल तक' उनकी याद बनी रहेगी। लेकिन जिनकी सृजन-क्षमता देह के बजाय आत्मा की है- ऐसे लोग भी कम नहीं हैं, सुकरात,- वे रूहानी चीजों को धारण करते हैं और उन्हें जन्म देते हैं। तुम पूछते हो वे क्या हैं? वे हैं ज्ञान,बुद्धि,प्रज्ञा और उनके सहोदर गुण। हर कवि और हर कलाकार, जिन्हें हम सर्जनात्मक कहते हैं, उनकी शरण में जाता है।
उसने आगे कहा, सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान वह है जो समाज में व्यवस्था कायम करता है, जिसे हम न्याय और नियम का नाम देते हैं। यदि कोई आदमी देवत्व के इतने करीब हो कि बचपन से ही वह इन गुणों से भरा हुआ हो तो बड़ा होकर उसकी पहली महत्त्वाकांक्षा कुछ कर गुजरने की होती है। यह निश्चित है कि वह भी सृजन के लिए सौन्दर्य की खोज में जाएगा- कुरूपता की खोज में नहीं। इसीलिए उसकी सृजनात्मक प्रकृति अनगढ़ देह के बजाय सुगठित देह की ओर आकृष्ट होती है और यदि उस देह में एक ऐसी आत्मा हो जो एक साथ सुन्दर, श्रेष्ठ और अनुकूल हो तो ऐसी संगति पाकर वह फूला न समाता है। ऐसे श्रोता के साथ गुणों की चर्चा करना उसके लिए आसान होगा। वह उसके साथ इस विषय पर बात कर सकेगा कि मानवीय अच्छाई क्या है, एक गुणी व्यक्ति को किस प्रकार का जीवन जीना चाहिए- संक्षेप में वह दूसरे को शिक्षित करने का कार्य अपने हाथ में ले सकता है।
मेरा विश्वास है कि इतने सौन्दर्य के साथ निरंतर साहचर्य के कारण और जब मित्र साथ हो और जब वह आँखों से ओझल हो, दोनों स्थितियों में उसके बारे में सोचने के कारण वह उस बोझ से मुक्त हो जाएगा जिसका भार वह इतने वर्षों से ढो रहा है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वह और उसका मित्र अपनी मैत्री को प्रगाढ़ बनाने में एक दूसरे की मदद करेंगे। इस तरह उनका बंधन और अटूट होता जाएगा, उनकी आपसी भागीदारी और घनिष्ठ हो जाएगी, उस स्थिति से भी अधिक जो साथ-साथ संतान का पालन-पोषण करने से आती है, क्योंकि उन्होंने जिसे जन्म दिया है, वह मानव संतति की अपेक्षा अधिक सुन्दर और कम नश्वर है।
मैं तुम्हें पूछती हूँ यदि कोई होमर, हीसियद और अपने महानतम कवियों के बारे में सोचे तो मानव प्रजनन की अपेक्षा इस प्रकार के पितृत्व का चुनाव कौन नहीं करना चाहेगा? आनेवाले युगों में उनकी रचनाओं को मिलने वाली प्रशस्ति पर उनका जो अधिकार है उससे किसे ईर्ष्या नहीं होगी?
या लाइकर्गस के बारे में सोचो, उसने आगे कहा, उसने कानून के रूप में अपनी कैसी संतति अपने पीछे छोड़ी है- ऐसा कानून जिसने स्पार्टा को बचाया और शायद पूरे यूनान को ही बचाया। सोलोन की कीर्ति के बारे में सोचो, जो एथेंस के कानून का जनक है या उन नामों के बारे में सोचो जो यूनान के नगरों में और समुद्र पार के देशों में भी याद किये जाते हैं, क्योंकि उन्होंने पूरी दुनिया की नजरों के सामने श्रेष्ठ कार्य किये हैं और अनेक गुणों को जन्म दिया है। यह सोचो कि उनके अमर कर्तृत्व की याद में कितने स्मारक बनाए गए हैं और इसके बाद मुझे बताओ कि कोई ऐसा है जिसके मर्त्य बच्चों ने इतना यश दिया है?
तो, मेरे प्रिय सुकरात, मुझे संदेह नहीं है कि तुम्हें प्रेम के इन आरंभिक रहस्यों की दीक्षा दी जा सकती है, लेकिन मैं यह नहीं जानती कि जब रहस्य पर से आख़िरी पर्दा हटेगा तब तुम उस स्थिति को समझ पाओगे या नहीं, क्योंकि तुम्हें यह मालूम होना चाहिए कि अभी हम पूर्णता की निचली पायदान पर ही हैं।
लेकिन फ़िक्र मत करो, उसने कहा, मैं हर संभव कोशिश करुँगी कि तुम इसे समझ सको। जो मैं कह रही हूँ उसपर पूरा ध्यान दो।
यदि, उसने कहना शुरू किया, इस दीक्षा के पात्र को अपने प्रयासों में सफल होना है, तो देह के सौन्दर्य के प्रति समर्पित होने का कार्य बहुत जल्द आरम्भ करना होगा। सबसे पहले, यदि उसका गुरु उसे सही-सही सीख देता है, तो वह पहले एक देह के सौन्दर्य के प्रेम में डूबेगा, ताकि उसका आकर्षण श्रेष्ठ संवाद को जन्म दे। इसके बाद उसे इस बात पर विचार करना चाहिए कि कैसे एक देह का सौन्दर्य किसी अन्य देह के सौन्दर्य से जुड़ा हुआ है। जब वह देखेगा कि यदि उसे रूप के सौन्दर्य में डूबना है तो इस बात से इन्कार करना बेवकूफी होगी कि प्रत्येक देह का सौन्दर्य एक समान है। इस मुकाम पर पहुँचने के बाद उसे हर सुन्दर देह का प्रेमी बनने के लिए तैयार रहना चाहिए और केवल एक के प्रति अपने आकर्षण को कम महत्त्व का मानना चाहिए।
इसके बाद उसे यह समझना चाहिए कि देह का सौन्दर्य आत्मा के सौन्दर्य के सामने कुछ भी नहीं है, ताकि जब उसका साक्षात्कार आत्मिक सौन्दर्य से हो, भले ही वह सौन्दर्य किसी आकर्षक रूप के आवरण में नहीं हो, तब भी उसे उसमें इतना सौन्दर्य दिखेगा कि वह उसके आकर्षण में बंध जाएगा। इससे उसके मन में ऐसे संवाद सुनने के लिए तड़प उठेगी जो उसके स्वभाव को उत्कृष्ट बनाएगा। इसके बाद वह कानून और संस्थाओं के सौन्दर्य पर विचार करने के लिए प्रेरित होगा। जब वह पाएगा कि हर प्रकार का सौन्दर्य लगभग हर दूसरे प्रकार के सौन्दर्य के समान है तो वह इस निष्कर्ष पर पहुँचेगा कि देह का सौन्दर्य उतने महत्त्व का नहीं है।
इसके बाद उसका ध्यान संस्थाओं से हटकर विज्ञान की और जाएगा ताकि वह हर प्रकार के ज्ञान के सौन्दर्य को समझ सके। इस प्रकार सौन्दर्य के व्यापक परिदृश्य को देखने पर किसी एक युवक या किसी एक आदमी या एक संस्था के वैयक्तिक सौन्दर्य के प्रति दासतापूर्ण, संकुचित भक्ति से बच जाएगा और सौन्दर्य के इस खुले संसार को देखते हुए उसे चिंतन-मनन में सर्वोत्कृष्ट संवाद और सर्वोच्च विचारों के बीज मिलेंगे, जिनसे उच्च दर्शन उत्पन्न होगा और इस तरह विविध प्रकार के ज्ञान से परिपुष्ट होकर उसे एक इकलौते ज्ञान, सौन्दर्य के ज्ञान का साक्षात्कार होगा, जिसकी चर्चा मैं अब करने जा रही हूँ।
अब, उसने कहा, तुम मेरी बातों को और भी ध्यान से सुनो।
जिसने प्रेम के इस रहस्य को इस हद तक समझ लिया है और सौन्दर्य के विभिन्न रूपों का एक के बाद एक दर्शन कर लिया है, वह अंतिम सत्य के निकट आ रहा है। अब सुकरात, उसे वह आश्चर्यजनक दृष्टि मिलेगी जो उस सौन्दर्य की आत्मा है जिसके लिए उसने इतने दिनों से परिश्रम किया है। यह एक शाश्वत सौन्दर्य है, जो न आता है न जाता है, न खिलता है न मुरझाता है, क्योंकि यह सौन्दर्य हर एक के लिए, हर स्थान के लिए, हर समय के लिए, हर रीति से , हर उपासक के लिए एक समान है।
सौन्दर्य की उसकी दृष्टि न तो एक चेहरे का रूप लेगी और न तो हाथों का या हाड़मांस से बनी किसी चीज का। यह सौन्दर्य न तो शब्द होगा न ज्ञान, न ऐसी कोई चीज जो किसी अन्य चीज के आश्रय में हो, जैसे कि जीव-जंतु या पृथ्वी या आसमान या कोई अन्य चीज। यह सौन्दर्य स्वयंभू है, स्वतंत्र है और शाश्वत रूप से अकेला है जबकि हर सुन्दर चीज इसी का अंश लेगी और वह अंश, छोटा हो या बड़ा हो, सौन्दर्य न तो कम होगा और न ज्यादा, बल्कि हमेशा एक समान पूर्ण बना रहेगा।
इस प्रकार युवा सौन्दर्य के प्रति समर्पण से आरम्भ करके जब उपासक इस मुकाम पर पहुंचता है कि उसकी आतंरिक दृष्टि में सार्वभौमिक सौन्दर्य अवतरित हो जाता है तो वह अंतिम सत्य के बिलकुल करीब है। यही राह है, एक अकेली राह है जिससे उसे आगे बढ़ना चाहिए या इसी राह से उसे प्रेम देवता के मंदिर के गर्भगृह की ओर लाया जाना चाहिए। वैयक्तिक सौन्दर्य से आरम्भ कर सार्वभौमिक सौन्दर्य की खोज में उसे लगातार स्वर्गिक सोपान पर एक के बाद एक कदम बढ़ाते जाना होगा-- अर्थात एक देह से दो, फिर दो से हर सुन्दर देह, दैहिक सौन्दर्य से संस्थाओं के सौन्दर्य की ओर, संस्थाओं से विद्या की ओर और हर प्रकार की विद्या से उस विशेष ज्ञान की ओर जिसका सम्बन्ध और किसी से नहीं बल्कि स्वयं सुन्दर से है- और इस प्रकार उसे यह ज्ञान होता है कि सौन्दर्य क्या है।
मेरे प्रिय सुकरात, दायोतिमा ने कहा, यदि आदमी की जिंदगी जीने लायक है तो इन्हीं क्षणों में, जब वह सौन्दर्य की आत्मा को समझता है। यदि तुमने इस रहस्य के दर्शन एक बार कर लिये तो तुम्हें कभी भी स्वर्णाभूषण या वस्त्रों का सौन्दर्य या सुन्दर किशोरों का सौन्दर्य नहीं लुभाएगा; तुम ऐसे सौन्दर्य की कोई परवाह नहीं करोगे, सुकरात, जो पहले तुम्हारे जैसे अनेक लोगों में ऐसी चाहत पैदा करता था कि तुम हमेशा ऐसे सौन्दर्य के पास बने रहना चाहते थे, तुम उसपर से अपनी नज़र भी नहीं हटाना चाहते थे, यहाँ तक कि तुम जब तक ऐसे सौन्दर्य के पास थे तब तक खाने-पीने जैसी जीवन की स्थूल आवश्यकताएं भी भूल जाते थे।
लेकिन यदि किसी आदमी का ऐसा सौभाग्य हो कि वह सौन्दर्य की आत्मा के दर्शन कर सके- उसके अक्षत, अछूते रूप को देख सके, जिसपर क्षणभंगुरता की कोई छाया न हो- और यदि मैं कहूँ कि किसी आदमी का ऐसा सौभाग्य हो कि वह ऐसे स्वर्गिक सौन्दर्यके रू-ब-रू हो सके तो, उसने मुझे पूछा, क्या तुम ऐसे आदमी की जिंदगी को स्पृहणीय नहीं समझोगे—एक ऐसी ज़िन्दगी जिसकी दृष्टि के सामने यह सौन्दर्य लोक खुला हुआ है और जिसने अपने चिंतन-मनन में उसके निरंतर दर्शन किये हैं और दीर्घ काल तक ऐसा करते हुए उसने उस सौन्दर्य को अपनी आत्मा का अंग बना लिया है?
और यह याद रखो, उसने कहा, जब दृश्य सौन्दर्य के माध्यम से वह असली सौन्दर्य का साक्षात्कार करता है, तभी वह सच्चे गुण से, न कि आभासी गुण से, अनुप्राणित होगा, क्योंकि असली गुण ही आदमी को प्रेरित करता है, बनावटी गुण नहीं। जब वह इस परिपूर्ण गुण को अपने में उत्पन्न करेगा और उसे विकसित करेगा तभी वह देवबंधु कहलाएगा और यदि आदमी के भाग्य में अमरत्व है तो ऐसे आदमी को ही अमरत्व मिलेगा।
तो फिदरस, सज्जनो, यही दायोतिमा का दर्शन है जिसका मैं क़ायल हूँ। मैं दूसरों में भी यही विश्वास पैदा करना चाहता हूँ। यदि हमें प्रेम के इस उपहार को अपना बनाना है, तो हम जैसे मर्त्यों के लिए प्रेम से बड़ा सहायक पूरी दुनिया में और कोई नहीं है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि हर आदमी को प्रेम देवता की पूजा करनी चाहिए। इसीलिए मैं स्वयं प्रेम के सभी तत्वों की पूजा करता हूँ और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए कहता हूँ। मैं पूरी जिंदगी प्रेम के पराक्रम के प्रति यथाशक्ति श्रद्धांजलि अर्पित करता रहूँगा। इसे, फिदरस, तुम प्रेम की मेरी विरुदावली कह सकते हो और यदि नहीं तो इसे जो चाहो नाम दे सकते हो।
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