Wednesday, August 4, 2021

फिदरस (भाग प्रथम)

 प्लेटो 



सुकरात: फिदरस, मेरे दोस्त, तुम कहाँ से आ रहे हो और कहाँ जा रहे हो?

 

फिदरस: सुकरात, मैं सेफालस के सुपुत्र लाइसियस के साथ था और पूरी लम्बी सुबह उसके साथ बिताने के बाद अब मैं नगर की चहारदीवारी से बाहर टहलने जा रहा हूँ। हम दोनों के मित्र एक्यूमीनस की सलाह पर मैं खुले रास्तों पर ही टहलता हूँ। उसने मुझे बताया है कि स्तम्भावली के बीच में टहलने के बजाय खुली हवा में टहलना अधिक स्फूर्तिदायक है।

 

सुकरात: हाँ, उसका कहना सही है, लेकिन, क्या लाइसियस शहर में है?

 

फिदरस: हाँ, वह एपिक्रेटस के पास ठहरा हुआ है, ओलिम्पियन ज्यूस के मन्दिर के निकट उसी मकान में जिसमें मोरिकस रहा करता था।

 

सुकरात: अच्छा, तो तुम्हारा समय कैसे कटा? ज़रूर लाइसियस ने अपनी अनगिनत रचनाएँ सुनाकर तुम्हें चमत्कृत किया होगा!

 

फिदरस: मैं तुम्हें बताऊंगा। यदि तुम्हें फ़ुरसत हो तो मेरे साथ चलो और सुनो।

 

सुकरात: क्यों नहीं? तुम्हें मालूम होना चाहिए कि तुमने और लाइसियस ने अपना समय कैसे बिताया, यह सुनना मेरे लिए पिन्दार के शब्दों में ‘सबसे बड़ा कर्म’ है।

 

फिदरस: तो चलो।

 

सुकरात: तुम भी बताते चलो।

 

फिदरस: दरअसल विषय तुम्हारे अनुकूल है, सुकरात, क्योंकि हम जिस चर्चा में मशगूल थे, उसे प्यार की चर्चा कहा जा सकता है। तुम्हें मालूम होगा कि लाइसियस ने वर्णन किया है कि किस प्रकार एक सुन्दर नवयुवक को प्रेमजाल में फँसाया गया, लेकिनध्यान देने वाली बात यह है कि उस व्यक्ति द्वारा नहीं जो उससे प्यार करता था, बल्कि उस व्यक्ति द्वारा जो उसे प्यार नहीं करता था। लाइसियस का कहना है कि नवयुवक को अपने प्रेमी के प्रति नहीं बल्कि उसके प्रति समर्पण करना चाहिए जो उससे प्रेम नहीं करता है।

 

सुकरात: बहुत ख़ूब! मेरी तो इच्छा है कि लाइसियस यह भी कहे कि समर्पण ग़रीब के प्रति हो न कि अमीर के प्रति,बुज़ुर्ग के प्रति हो न कि युवा के प्रति और मोटे तौर पर मेरे जैसे साधारण जन के प्रति हो। यह कितना आकर्षक जनतांत्रिक सिद्धान्त हो जाएगा! मैं यह सब सुनने के लिए इतना उत्सुक हूँ कि तुम यदि टहलते हुए चहारदीवारी से आगे मेगारा तक भी चले जाओ तो मैं क़सम खाता हूँ कि मैं  तुम्हारा साथ नहीं छोड़ूंगा। 

 

फिदरस: भले आदमी, तुम्हारा मतलब क्या है? क्या तुम मुझ जैसे नौसिखुए से यह आस लगा बैठे हो कि मैं आज के सबसे क़ाबिल लेखक की रचना को, जिसे उसने फ़ुरसत के पलों में रचा है और जिसकी रचना में उसे हफ़्तों लग गए हैं,उस लेखक की शान में बट्टा लगाए बिना दोहरा पाऊंगा? यह तो मेरी क़ाबलियत के बाहर की बात है, हालाँकि यदि मुझमें इस तरह की क़ाबलियत होती तो किसी भी धन-दौलत के बजाय अधिक ख़ुशी मिलती।

 

सुकरात: मैं अपने फिदरस को जानता हूँ। सच में मैं उसे उसी तरह पहचानता हूँ, जैसे अपने आपको। मुझे पूरा यक़ीन है कि हमारे फिदरस ने लाइसियस के भाषण को केवल एक बार नहीं सुना है; उसने उसे बार-बार दुहराने के लिए कहा होगा। इसके बाद भी वह संतुष्ट नहीं हुआ होगा। अन्त में उसने उससे पाण्डुलिपि ले ली होगी और उस हिस्से को बार-बार पढ़ा होगा जो उसके मन को विशेष रूप से भाया होगा। इस तरह वह पूरी सुबह पाण्डुलिपि के साथ बैठा रहा होगा, और जब पढ़ते-पढ़ते थक गया होगा तब टहलने के लिए बाहर निकला होगा। मुझे यक़ीन है कि यदि भाषण ज़्यादा लम्बा नहीं होगा तो उसने उसे कंठस्थ भी कर लिया होगा और वह निर्जन प्रदेश की ओर इसलिए जा रहा है ताकि वह अकेले में भाषण का अभ्यास कर सके। ऐन मौक़े पर उसकी संगति में एक ऐसा शख़्स आ टपका है, जिसे भाषण सुनने का जुनून है और इस शख़्स को देखकर उसे ख़ुशी हुई है कि चलो कोई उसके पागलपन में साझेदार मिला है। और इसलिए उसने उसे अपने साथ चलने का न्यौता दिया है।  लेकिन जब इस कद्रदाँ ने उससे भाषण सुनाने का अनुरोध किया तो वह बहाने बनाने लगा, यह जताने की कोशिश करने लगा जैसे उसे भाषण सुनाने की इच्छा ही न हो, जबकि सच यह है कि वह आख़िरकार भाषण सुनायेगा ही भले ही श्रोता कितना भी अनिच्छुक हो। इसलिए श्रीमान् फिदरस से प्रार्थना है कि वह सीधे भाषण सुनाना शुरू करे क्योंकि उसे हर हालत में देर-सबेर यही करना है। 

 

फिदरस: निस्सन्देह मेरे लिए यही उचित है कि मुझसे जो बन पड़े तुम्हें सुना दूँ, क्योंकि तुम मुझसे कोई भाषण सुने बिना मुझे बख़्शोगे नहीं।

 

सुकरात: वाह मेरे दोस्त! लेकिन पहले मुझे वह चीज़ दिखाओ जिसे तुमने अपने लबादे के भीतर बायें हाथ से पकड़ा है। ऐसा लगता है वही मूल भाषण है। यदि यह सच है तो यक़ीन करो कि मैं तुम्हें चाहे कितना भी प्यार करूँ, तुम्हें अपनी वक्तृत्व कला का अभ्यास अपने ऊपर करने दूँऐसी मेरी कोई ख़ास इच्छा नहीं है, तब, जबकि ख़ुद लाइसियस यहाँ मौजूद है। लाओ, मुझे दिखाओ।

 

फिदरस: अब बस भी करो सुकरात! तुमने तो मेरी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। कहाँ सोचा था कि तुमपर अपना जादू चलाऊंगा ! खैर, बताओ, इसे पढ़ने के लिए कहाँ बैठा जाए?

 

सुकरात: यहाँ से मुड़कर इलिसस नदी के साथ-साथ चलते हैं। तुम्हें कोई शांत जगह मिले तो वहाँ हम दोनों बैठ सकते हैं।

 

फिदरस: यह तो संयोग है कि मैं आज नंगे पैर हूँ। तुम तो हमेशा ऐसे ही रहते हो। इससे नदी की धारा में उतरने में सुविधा होगी। है ना? अभी गरमी की दुपहरी में  नदी कितनी मनोरम लग रही है!

 

सुकरात: तो आगे-आगे चलो और बैठने की कोई जगह खोजो।

 

फिदरस: वह देखो, उस ऊँचे पेड़ को देख रहे हो?

 

सुकरात: हाँ।

फिदरसः वहाँ थोड़ी छाँव है और हल्की हवा भी। बैठने के लिए और यदि तबीयत हो तो लेटने के लिए भी दूब है।

 

सुकरात: तो चलो।

 

फिदरस: सुकरात, एक बात बताओ। क्या यहीं किसी जगह पर,लोग कहते हैं, बोरियस ने ओरिथिया को नदी से पकड़ लिया था?

 

सुकरात: हाँ, कथा तो यही है।

 

फिदरसः क्या सचमुच यही वह जगह है? पानी कितना निर्मल है! नदी किनारे लड़कियों के खेलने के लिए भी उपयुक्त जगह है।

 

सुकरात:  नहीं, यहाँ से लगभग चौथाई मील आगे है वह जगह, जहाँ तुम अगरा की पवित्र भूमि के लिए नदी पार करते हो। वहीं पर निकट में शायद बोरियस को समर्पित वेदी- स्थल भी है।

 

फिदरस: मैंने कभी देखा नहीं। लेकिन सुकरात, क्या तुम मानते हो कि वह कहानी सच्ची है? 

 

सुकरातः यदि मैं इस कथा पर विश्वास न करूँ तो इसे आज की प्रचलित धारणा के अनुरूप ही माना जाएगा, क्योंकि विज्ञान के अनुयायियों का यही मत है। मैं स्वयं इस कथा की एक वैज्ञानिक व्याख्या दे सकता हूँ कि कैसे वह लड़की फरमेकिया (झरने के पास रहने वाली अप्सरा) के साथ खेलते हुए बोरियस (उत्तर दिशा से बहने वाली हवा) के एक झोंके से चट्टान से नीचे गिर गयी और इस तरह मरने के कारण लोगों ने कहा कि उसे बोरियस ने पकड़ लिया । इस कहानी का एक और रूपांतर मिलता है जिसमें यह घटना एअरोपेगस (एथेंस में एक्रोपोलिस के पश्चिमोत्तर दिशा में स्थित चट्टान) में घटी बतायी गयी है। मेरा यह विचार है, फिदरस, कि निस्सन्देह ऐसे सिद्धान्त आकर्षक लगते हैं, लेकिन ये सिद्धान्त उन चतुर और परिश्रमी लोगों की खोज हैं जिनके सौभाग्य  से मुझे कोई ईर्ष्या नहीं है। इसका सीधा-सादा कारण यह है कि यदि हम उनकी इस व्याख्या को मान भी लें तो उन्हें बताना होगा कि अश्व-मानवों, किमेरा, गोरगोन और पेगासस के पीछे या दंतकथाओं के अन्य दैत्यों के पीछे कैसी सच्चाई है। यदि हमारा अविश्वासी मित्र अपने अधकचरे विज्ञान के आधार पर हर मिथक को स्वाभाविकता के धरातल पर उतारना चाहता है, तो उसे बहुत समय देना पड़ेगा। निश्चय ही मेरे पास इस कारोबार के लिए समय नहीं है। मैं तुम्हें इसका कारण बताना चाहूंगा, मेरे दोस्त। डेल्फाइ में उत्कीर्ण आदेश है कि “अपने आप को जानो” लेकिन  मैं अभी तक अपने आपको नहीं जान पाया हूँ। जब तक मेरा यह अज्ञान दूर नहीं होता,तब तक बाहरी बातों के बारे में खोज करना हास्यास्पद लगता है। इसलिए मैं ऐसी बातों के पीछे परेशान नहीं होता और उनके बारे में जो भी वर्तमान विश्वास हैं, उन्हें मान लेता हूँ। मैं इसकी जगह, जैसा कि मैंने अभी कहा, अपने बारे में ही जानना चाहता हूँ कि क्या मैं अत्यधिक जटिल आदमी हूँ और टाइफोन से भी अधिक घमण्ड में चूर रहता हूँ या मैं एक सीधा-सादा, विनम्र इंसान हूँ, जिसे ईश्वर ने टाइफोन की तुलना में शांत स्वभाव दिया है? बहरहाल, क्या यही वह पेड़ है जिसके लिए हम इतनी देर से चल रहे हैं?

 

फिदरसः हाँ। 

 

सुकरात: वाह, कितना मनोरम विश्राम-स्थल है! यह दूर तक फैली शाखाओं वाला प्लेन वृक्ष और एग्नोस की ऊँची शाखाओं की छाया। यह तो पूरी तरह फूलों से लदा है और इसलिए यह जगह कितनी सुवासित हो गयी है! प्लेन वृक्ष के नीचे बहती यह नदी कितनी आकर्षक है और इसका पानी पाँवों को कितनी ठंडक पहुँचा रहा है! छोटी-बड़ी मूर्तियों को देखकर ऐसा लगता है, जैसे यह स्थल अकेलस और कुछ अप्सराओं के लिए समर्पित है। हवा ताज़ा और सुखद है और झिंगुरों का ग्रीष्मकालीन कर्णकटु संगीत भी चारों तरफ़ गूँज रहा है। सबसे अधिक आनंददायक तो यह घास है जो इतनी घनी है कि इस पर आराम से अपना सिर टिकाकर इस हल्की ढलवाँ जगह पर लेटा जा सकता है। सच में, मेरे प्रिय फिदरस, तुम इस अनजान पथिक के बेहतरीन पथ-प्रदर्शक हो।

 

फिदरस: और तुम, मेरे सर्वोत्तम मित्र, सबसे बड़े अजूबे हो! तुम्हें अभी कोई देखता तो यही सोचता कि किसी देशवासी को नहीं, बल्कि किसी अजनबी को आसपास का इलाक़ा दिखाया जा रहा है। तुम तो शहर की सीमा लाँघते ही नहीं,यहाँ तक कि चहारदीवारी के बाहर तुम पाँव भी नहीं रखते। 

 

सुकरात: माफ़ करना, मेरे दोस्त, मैं तो विद्या-प्रेमी हूँ। पेड़-पौधे और बियाबान मुझे क्या सिखाएंगे, जबकि नगरवासियों से मैं कुछ--कुछ सीख लेता हूँ। लेकिन तुमने मुझे नगर से बाहर निकालने का एक तरीक़ा ढूँढ़ निकाला है। किसी भूखे-प्यासे पशु के सामने एक गाजर या हरे चारे का एक टुकड़ा डुलाते हए उसे कहीं भी ले जाया जा सकता है। इसी तरह भाषण सुनाने का प्रलोभन देकर तुम अट्टिका के चारों ओर या जहाँ तुम्हारी मर्ज़ी हो, वहाँ मुझे ले जा सकते हो। ख़ैर,अब, चूँकि हम दोनों यहाँ पहुँच चुके हैं, मैं थोड़ी देर लेटना चाहूंगा। तुम भी बैठकर या लेटकर पढ़ना शुरू कर सकते हो।

 

फिदरस: तो लो सुनो।

तुम जानते हो कि तुम्हारे साथ मेरा कैसा सम्बन्ध है (मैं तुम्हारा प्रेमी नहीं हूँ)। मैंने तुम्हें बताया है कि यह सम्बन्ध हम दोनों के लिए फ़ायदेमंद है। अब मैं यह कहना चाहता हूँ कि यदि मैं तुमसे कोई मांग करूँ तो केवल इस आधार पर इन्कार मत करो कि मैं तुम्हारा प्रेमी नहीं हूँ। जो प्रेमी हैं, उनका लगाव जब कम होने लगता है, तो उन्हें पछतावा होता है कि प्रेम के आवेश में आकर उन्होंने अपने प्रियपात्र पर अपना सर्वस्व लुटाया है; परन्तु जो प्रेमी नहीं हैं, उनके जीवन में बीते दिनों के लिए कोई पछतावा नहीं रहता। चूँकि वे बन्धनों से मुक्त हैं, वे उतना ही लुटाते हैं जितनी उनकी क्षमता है और जो उनके निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए आवश्यक है। इसके अलावा, जो प्रेमी हैं वे अपने जुनून से होने वाले हानि- लाभ का हिसाब रखने लगते हैं और जब उन्हें यह लगता है कि उन्होंने प्रेम के ख़ातिर कुछ ज़्यादा  ही क़ुर्बानी दी है, तो वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उन्होंने प्रियपात्र के प्रेम का पूरा मूल्य पहले ही चुका दिया है। इसके विपरीत जो प्रेमी नहीं हैं, वे यह नहीं कह सकते कि इस सम्बन्ध के कारण उन्होंने अपने निजी कामकाज की उपेक्षा की या अतीत में इस कारण उन्हें बहुत नुक़सान पहुँचा है। वे यह भी शिकायत नहीं कर सकते कि इस सम्बन्ध के लिए उन्हें अपने निकट सम्बन्धियों से कलह करना पड़ा है। वे इन सारी परेशानियों से मुक्त रहकर अपनी सारी ऊर्जा दूसरे पक्ष को सन्तुष्ट करने वाले आचरण पर केन्द्रित करते हैं।

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि प्रेमी का ऊँचा मूल्य इसलिए आँका जाना चाहिए क्योंकि वह दावा करता है कि वह प्रियपात्र के प्रति विशेष रूप से सदय है और उसे वचन और कर्म से संतुष्ट करने के लिए किसी को भी नाराज़ करने के लिए तैयार रहता है। लेकिन यदि यह सच है तो ज़ाहिर है वह आज के प्रियपात्र की तुलना में कल के नये प्रियपात्र के प्रति अधिक समर्पित होगा और यदि नया प्रियपात्र चाहेगा तो प्रेमी पुराने प्रियपात्र को चोट भी पहुँचाने से हिचकेगा नहीं।

 

और, सच में देखा जाए तो एक ऐसे व्यक्ति पर अपनी अमूल्य सम्पदा क्यों न्योछावर की जाए जो ऐसे रोग से पीड़ित है जिससे मुक्ति दिलाने की कोशिश कोई जानकार भी नहीं करेगा? क्या यह सच नहीं है कि प्रेमी स्वयं स्वीकार करता है कि वह स्वस्थ नहीं है, बल्कि बीमार है? वह जानता है कि वह बेवक़ूफ़ी कर रहा है, लेकिन वह अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रख सकता। यदि ऐसा है तो जब वह होश में आएगा तो क्या दीवानगी के दौर में लिये गये फ़ैसलों को सही मानेगा?

और ज़रा इस पहलू पर भी ग़ौर करो। यदि तुम एक से अधिक प्रेमियों के बीच सर्वोत्तम प्रेमी को चुनना चाहो, तो तुम कुछ लोगों के बीच ही चुनाव कर पाओगे, क्योंकि प्रेमियों की संख्या सीमित होती है; जबकि प्रेमियों को छोड़कर व्यापक जन समुदाय के बीच से अपने लिए सबसे योग्य व्यक्ति चुनना हो तो तुम्हारे चुनाव का दायरा व्यापक होगा। इस व्यापक क्षेत्र से चुनने के कारण तुम्हारे लिए अपनी मित्रता के योग्य व्यक्ति पाने की बेहतर संभावना होगी।

हो सकता है कि तुम्हारे मन में स्थापित मान्यताओं के प्रति सम्मान हो और इसलिए तुम डरते हो कि लोग हम दोनों के सम्बन्ध के बारे में जानेंगे तो तुम्हारी बदनामी होगी। यदि ऐसा है तो प्रेमी से इस सम्बन्ध में अधिक ख़तरा है, क्योंकि वह मानता है कि सब लोग उसके बारे में अच्छी राय रखते हैं और इसलिए वह अपनी तारीफ़ करते थकता नहीं है। वह तुम्हारे साथ सम्बन्ध के बारे में बढ़ चढ़ कर बात करेगा और पात्र-कुपात्र सबके सामने अपनी कामयाबी का ढिंढोरा पीटकर गौरवान्वित महसूस करेगा; जबकि दूसरे प्रकार का व्यक्ति (जो प्रेमी नहीं है ) अपने आप पर नियंत्रण रखता है और दूसरों की नज़र में चमकने के बजाय अच्छा काम करना पसंद करता है।

इसके अलावा यह भी सच है कि प्रेमी की ख्याति दूर-दूर तक फैलती ही है। लोग उसे हमेशा अपने प्रियपात्र के साथ देखते हैं और यह भी देखते हैं कि उसे और किसी बात की परवाह नहीं है। जब लोग प्रेमी युगल को आपस में बात करते देखते हैं तो वे उस प्रेम की वास्तविक या सम्भावित परिणति का अनुमान लगा लेते हैं, जबकि दूसरे प्रकार के सम्बन्ध को कोई बुरी नज़र से नहीं देखता, क्योंकि लोग मानते हैं कि लोग मित्रता या अन्य प्रयोजन से आपस में बातचीत करेंगे ही।

इस बात पर भी ग़ौर करो। शायद तुम यह सोचकर दुखी हो कि दोस्ती अधिक दिनों तक टिकती नहीं है; दोस्तों में अन्य कारणों से होने वाले झगड़ों से दोनों पक्षों को हानि होती है, लेकिन सर्वस्व समर्पण के बाद यदि अलगाव हुआ तो तुम्हें ही गहरी चोट लगेगी। ऐसी बात है तो तुम्हें प्रेमी से ही अधिक डरना चाहिए, क्योंकि वह छोटी-छोटी बातों पर भी नाराज़ हो जाता है और यह सोचता है कि पूरे मामले में उसे ही चोट पहुँची है। यही कारण है कि वह अपने प्रियपात्र को किसी और से मिलने-जुलने नहीं देता है, क्योंकि उसे यह डर रहता है कि कोई धनी प्रतिद्वन्द्वी उससे अधिक धन ख़र्च कर सकता है या कोई सुसंस्कृत व्यक्ति अपनी प्रतिभा से उसे पीछे छोड़ सकता है। वह हमेशा उन लोगों से दूर-दूर रहने की कोशिश करता है, जिनके पास अन्य मामलों में उससे अधिक प्रतिभा है। इस तरह दूसरे प्रतिद्वन्द्वियों से तुम्हें दूर रखकर वह दुनिया में तुम्हें मित्रविहीन कर देता है। यदि इसके विपरीत तुम अपना हित समझकर अपने प्रेमी की तुलना में अधिक समझदारी दिखाने लगो तो उससे बार-बार कलह होगा। दूसरी तरफ़, जो प्रेमी नहीं है, लेकिन जिसने अपने गुणों के बल पर तुमसे वांछित प्रतिदान पाया है, वह उन लोगों से ईर्ष्या नहीं करेगा जो तुम्हारी संगति के लिए उत्सुक हैं, बल्कि उन लोगों को नापसन्द करेगा जो तुम्हारी संगति से बचते हैं। वह जानता है कि तुम्हारी संगति चाहने वाले लोग उसे भी पसन्द करते हैं, जबकि संगति से बचने वाले लोग उसे भी हेय दृष्टि से देखते हैं। इस सबका यह परिणाम होता है कि ऐसे व्यक्ति का जिससे सम्बन्ध होता वह इस सम्बन्ध के कारण दुश्मन के बजाय दोस्त ही अधिक बनाता है। 

इस पहलू पर भी विचार करो। अक्सर प्रेमी तुम्हारा स्वभाव जाने बिना या तुम्हारे समग्र व्यक्तित्व से परिचित हुए बिना तुम्हें अपने अधिकार में ले लेना चाहता है और इसलिए यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि जब उसकी चाहत कमज़ोर हो जाएगी तब भी वह तुम्हारा मित्र बना रहना चाहेगा, जबकि प्रेम से इतर मित्रता के मामले में , चूँकि मित्रता वर्तमान सम्बन्ध से पहले से ही चली आ रही है इसलिए वर्तमान प्रगाढ़ता के कारण मित्रता कम नहीं होगी बल्कि इनकी मधुर याद रहेगी और यह उम्मीद रहेगी कि भविष्य में और प्रगाढ़ता बढ़ सकती है। 

अब इस बात पर ग़ौर करो। तुम्हारी भलाई इसमें है कि तुम प्रेमी के बजाय मेरी बात मानो, क्योंकि तुम जो भी कहोगे तुम्हारा प्रेमी तुम्हारी हाँ में हाँ मिलायेगा या ऐसे काम करने के लिए भी तैयार रहेगा जो ग़लत है। इसकी वजह यह है कि उसे डर है कि तुम नाराज़ हो जाओगे । दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि उसका विवेक उसके जुनून से प्रभावित हो गया हो। प्रेम का प्रभाव यही देखा गया है कि बुरे दिनों में प्रेमियों को उन बातों से भी भीषण कष्ट होता है, जिनसे आम तौर पर कोई कष्ट नहीं होना चाहिए और अच्छे दिनों में ऐसी बातें भी अच्छी लगती हैं, जिनसे उन्हें कोई ख़ुशी नहीं होनी चाहिए। यह देखते हुए उचित यह होगा कि प्रेमियों पर तरस आना चाहिए न कि उनकी बड़ाई की जानी चाहिए। इसके विपरीत यदि तुम मेरी बात मानो तो तुम यह देखोगे कि मेरा तुमसे मिलना-जुलना तुम्हारी तत्काल ख़ुशी के लिए नहीं है, बल्कि तुम्हारे भावी लाभ के लिए है, क्योंकि मैं स्वयं अपना स्वामी हूँ, प्रेम का दास नहीं। मैं छोटी-छोटी बातों को लेकर कटु दुश्मनी नहीं पालता। इसके विपरीत मैं भारी ग़लती होने पर ही प्रभावित होता हूँ और वह भी धीरे-धीरे, बहुत हल्की नाराज़गी के साथ। गर कुछ ग़ैर-इरादतन हुआ है तो उसे मैं माफ़ कर देता हूँ और यदि कुछ जानबूझकर किया गया है तो उसे छुपाने की कोशिश करता हूँ। ये सब अमिट मैत्री के लक्षण हैं। यदि तुम्हारी ऐसी धारणा हो कि केवल प्रेमी के साथ ही पक्की दोस्ती हो सकती है, तो तुम्हें इस बात पर ग़ौर करना चाहिए कि इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि हमलोगों को अपने माँ-बाप या अपनी सन्तान को कोई महत्व नहीं देना चाहिए और न यह मानना चाहिए कि हमारे पास कोई विश्वसनीय दोस्त है। ये सम्बन्ध हमें अपनी काम भावना की वजह से नहीं मिले हैं, बल्कि ये बिल्कुल अलग प्रकार की भावनाओं और आचरण की देन हैं।

इसके अलावा, यदि हम यह मानें कि हमें उनपर कृपा करनी चाहिए जो हम पर अधिक जोर डालने में सफल होते हैं, तब हमें अन्य मामलों में भी उनका ध्यान नहीं रखना चाहिए जो उसके सर्वाधिक उपयुक्त पात्र हैं, बल्कि उनका जो सर्वाधिक दरिद्र हैं, क्योंकि उनका दुख बड़ा है इसलिए उनका दुख दूर करने पर वे हमारे प्रति अधिक कृतज्ञ होंगे। लेकिन इसका आगामी परिणाम भी देखो। जब हम अपने घर में दावत देंगे, तो वहाँ आमन्त्रित करने के लिए सही व्यक्ति हमारे दोस्त नहीं होंगे, बल्कि भिखारी और ऐसे लोग होंगे, जिन्हें अच्छे भोजन की ज़रूरत है। हम उन्हें अधिक भाएंगे, वे हमें चारों ओर से घेर लेंगे, हमारे दरवाज़ों पर मजमा लगाएंगे और हमें ढेरों आशिष देंगे। नहीं, सही तरीक़ा निश्चय ही यह है कि कृपा उनपर नहीं की जाए जो सर्वाधिक आग्रह करते हैं, बल्कि उनपर जो उसका सर्वाधिक प्रतिदान करने में सक्षम है —- केवल भिखारियों पर नहीं , बल्कि जो पात्र हैं, उनपर नहीं जो तुम्हारे युवा सौन्दर्य के पिपासु हैं, बल्कि उनपर जो एक वयस पार कर लेने के बाद भी तुम्हारे साथ अपनी धन-सम्पदा बाँटने को तैयार रहेंगे; उनपर नहीं जो तुमसे अपनी कामना-पूर्ति के बाद पूरी दुनिया को बताकर आत्म-प्रचार करेंगे, बल्कि उनपर जो एक अटूट और विनम्र मौन धारण किये रहेंगे; उनपर नहीं जो अपने जुनून के कमज़ोर पड़ने पर तुम्हारी ख़िलाफ़त करने का बहाना ढूढ़ेंगे, बल्कि उनपर जो तुम्हारे सौन्दर्य के ढल जाने पर इस अवसर का उपयोग अपनी अच्छाई का प्रदर्शन करने में करेंगे। 

इसलिए मैंने जो कुछ कहा उसे ध्यान में रखो और इस बात पर विचार करो कि प्रेमियों के आचरण की उनके मित्र और सम्बन्धी आलोचना करते हैं, जबकि जो प्रेमी नहीं हैं उनके परिवार का कोई भी सदस्य यह ताना नहीं देता है कि उसने परिवार के हितों के विरुद्ध आचरण किया है।

शायद तुम यह सोचते हो कि मैं तुमसे यह सिफ़ारिश कर रहा हूँ कि तुम इस तरह के सभी लोगों पर अपनी कृपा की बारिश करो। नहीं , मैं यह नहीं सोचता कि कोई प्रेमी भी तुमसे यह अनुरोध करेगा कि तुम सभी प्रेमियों पर सदय रहो। पहली बात तो यह है कि इस प्रकार की कृपा पाने वाला व्यक्ति अधिक कृतज्ञ नहीं होगा और दूसरी बात यह है कि यदि तुम अपने सम्बन्ध गोपन रखना चाहते हो, तो तुम्हारे लिए यह काम कठिन हो जाएगा। ज़रूरी यह है कि इस सम्बन्ध से किसी को हानि न हो, बल्कि दोनों को लाभ हो।

और अब मैं यह मानता हूँ कि जो अपेक्षित था, वह मैंने कह दिया। यदि तुम्हारी दृष्टि में कोई पहलू छूट गया हो या तुम कुछ और सुनना चाहते हो तो मुझे बताओ।

सुकरात, इस भाषण के बारे में तुम क्या सोचते हो? क्या यह अद्भुत नहीं है? ख़ासकर, भाषा की दृष्टि से?

 

सुकरात: सच में अद्भुत है, मेरे दोस्त। मुझे बहुत आनन्द आया। और मेरे आनन्द की वजह तुम थे फिदरस। मैं देख रहा था पढ़ते समय उन शब्दों से तुम्हें कितनी ख़ुशी मिल रही थी। मैं जानता हूँ इन मामलों में तुम्हारी समझ मुझसे बेहतर है। मैंने तुम्हारा अनुकरण किया और इसलिए अपने भाव-विभोर मित्र की ख़ुशी में शामिल हो गया।

 

फिदरस: क्या तुम इसका मज़ाक़ उड़ा रहे हो?

 

सुकरात: क्या तुम सोचते हो मैं मज़ाक़ कर रहा हूँ और गम्भीर नहीं हूँ?

 

फिदरस: नहीं, सुकरात! सच में एक दोस्त की तरह बताओ कि क्या यूनान में कोई और है, जो इसी विषय पर इससे अधिक सुन्दर और सर्वांगीण भाषण दे सके?

 

सुकरात: क्या? क्या तुमसे और मुझसे यह अपेक्षा है कि हम भाषण की प्रशंसा न केवल लेखक की प्रांजल शैली,  सटीक अभिव्यक्ति और निरन्तर परिष्कृत शब्दावली के प्रयोग के आधार पर करें, बल्कि हम इस बात की भी प्रशंसा करें कि लेखक ने वही कहा है जो उसे कहना चाहिए था? यदि ऐसा है तो केवल तुम्हारी ओर से यह बात मानी जा सकती है; क्योंकि मेरी कमज़ोर बुद्धि इस भाषण को नहीं समझ पायी। मैं इस रचना को केवल वाक्चातुर्य के रूप में देख रहा था और इस रूप में मुझे नहीं लगा कि लाइसियस को भी यह रचना सन्तुष्ट कर पायेगी। शायद तुम मुझसे सहमत नहीं होगे, फिदरस, लेकिन मुझे सचमुच ऐसा लगा जैसे वह एक ही बात बार-बार दोहरा रहा है। हो सकता है कि वह एक ही विषय पर विस्तारपूर्वक लिखने में माहिर न हो या शायद ऐसे विषयों में उसकी कोई रुचि न हो। वस्तुतः यह भाषण एक ही बात को दो बार अलग-अलग शब्दों में समान सफलता के साथ व्यक्त करने की उसकी प्रतिभा को दर्शाता है और इस अर्थ में यह अद्भुत प्रदर्शन है।

 

फिदरस: नहीं, सुकरात, नहीं, यह सच नहीं है! इस भाषण की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें विषय के किसी भी महत्वपूर्ण पहलू को नज़रअंदाज़ नहीं किया गया है। लेखक ने जितने सर्वांगीण रूप से अपनी बात रखी है, उससे बेहतर प्रदर्शन करना या उससे अधिक तुष्टिदायक भाषण देना किसी और के वश की बात नहीं है।

 

सुकरात: तुम इस क़दर आगे बढ़ते जाओगे तो तुमसे सहमत रहना संभव नहीं होगा। यदि विनम्रतावश मैं हाँ में हाँ मिलाता जाऊँ, तो इसी विषय पर अतीत में लिखने और बोलने वाले बुद्धिमान स्त्री-पुरुषों की दृष्टि में मैं ग़लत सिद्ध होऊंगा। 

 

फिदरस: तुम्हारा संकेत किन लोगों की ओर है? इससे बेहतर भाषण तुमने कहाँ सुना है?

 

सुकरात: मैं तत्काल तो नहीं बता सकता, लेकिन मुझे यक़ीन है कि मैंने इससे बेहतर बातें सुनी हैं, शायद सुन्दरी सैप्फो से या बुद्धिमंत अनेक्रेओन से या किसी गद्य लेखक से। तुम पूछ सकते हो कि मैं यह बात किस आधार पर कह रहा हूँ। बात यह है श्रीमान कि मेरे हृदय के भीतर कुछ उफन रहा है, जिससे मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि मैं कुछ अलग, कुछ बेहतर बोल सकता हूँ। मुझे भलीभाँति ज्ञात है कि मेरे मन में कोई मौलिक बात उत्पन्न हो, ऐसा हो नहीं सकता, क्योंकि मैं अपना अज्ञान जानता हूँ; इसलिए मुझे ऐसा लगता है कि ज़रूर यह बात किसी बाह्य स्रोत से मेरे कानों के माध्यम से मुझमें उँडेली गयी होगी, जैसे किसी बर्तन में कोई चीज़ ढाली जाती है, हालाँकि अपनी मूर्खता के कारण मैं वाक़ई भूल गया हूँ कि मैंने यह सब किनसे और कैसे सुना है।

 

फिदरस: क्या ख़ूब! तुम तो मुझे प्रशंसा करने के लिए बाध्य कर रहे हो। मेरे  ज़िद करने पर भी यदि तुम यह नहीं बताते हो कि तुमने किससे और कहाँ सुना है, तो कोई बात नहीं, बशर्ते तुमने जो कहा उसपर अमल करो। तुमने कहा है कि तुम इस पुस्तक के भाषण से बेहतर भाषण सुनाओगे, जो इस भाषण की तुलना में छोटा नहीं होगा और उसमें इस भाषण से कुछ भी लिया नहीं गया होगा। मैं 

नौ आर्कन (प्राचीन एथेंस के नौ मजिस्ट्रेट ) की तरह वचन देता हूँ कि मैं सोने की आदमकद मूर्ति बनाऊंगा —— न केवल अपनी, बल्कि तुम्हारी भी।

 

सुकरात: तुम कितने सदय हो, फिदरस और तुममें स्वर्ण युग जैसी सरलता है, जो तुम समझे कि मेरे कहने का आशय यह था कि लाइसियस पूरी तरह निशाने से चूक गया है और यह कि किसी अन्य भाषण में लाइसियस के भाषण की कोई बात नहीं आएगी। यह बात तो किसी घटिया लेखक पर भी लागू नहीं हो सकती। जहाँ तक इस भाषण के विषय का सम्बन्ध है तो क्या तुम नहीं सोचते कि यदि कोई यह दलील दे कि प्रेमी की तुलना में उस व्यक्ति को तरजीह दी जानी चाहिए जो प्रेमी नहीं है तो उसे एक की बुद्धि की तारीफ़ करनी होगी और दूसरे की मूर्खता का मज़ाक़ उड़ाना होगा? क्या वह इस महत्वपूर्ण मुद्दे को नज़रअंदाज़ कर नयी बात कह सकेगा? नहीं, हमें ऐसी दलील देने की इजाज़त देनी होगी और वक्ता को इन दलीलों का सहारा लेने के लिए माफ़ करना होगा। इस क्षेत्र में मौलिकता की बड़ाई नहीं होती है , बल्कि बात कैसे कही गयी है,  उसका क्रम क्या है, इसकी तारीफ़ होती है। हाँ, जहाँ तक गौण मुद्दों का सम्बन्ध है, जहाँ नयी बात कहना कठिन है, वहाँ हमें कथन शैली और मौलिकता, दोनों की तारीफ़ करनी चाहिए।

 

फिदरस: मैं सहमत हूँ। तुम जो कह रहे हो वह ठीक लग रहा है। मैं ऐसा करता हूँ कि मैं तुम्हें यह मान लेने की इजाज़त देता हूँ कि प्रेमी, ग़ैर-प्रेमियोंकी तुलना में मानसिक रूप से असन्तुलित होते हैं। इस बात को छोड़कर अन्य बातों में यदि तुम इस भाषण की तुलना में अधिक उच्च स्तर का भाषण देने में सफल हो जाते हो, तो ओलम्पिया में सिप्सेलिड्स की वेदी की बग़ल में तुम्हारी प्रतिमा पक्की ।

 

 

सुकरात: लगता है मैंने तुम्हारे प्रिय लाइसियस की आलोचना करके तुम्हें नाराज़ कर दिया है। क्या तुम सोचते हो मैं संजीदा हूँ? कहीं तुमने यह तो नहीं मान लिया है कि मैं उसकी चतुराई का जवाब और अधिक अलंकारिक रचना पेश करके दूंगा?

 

फिदरस: जहाँ तक इसका सवाल है, मेरे दोस्त, मैंने तुम्हें वहाँ पकड़ा है जहाँ मैं तुम पर भारी पड़ सकता हूँ। तुम्हें भाषण देना होगा, नहीं तो हम दोनों भौंडे नटों की तरह एक दूसरे की बातों का मज़ाक़ उड़ाते रह जाएंगे। इसलिए मैं तुम्हें सावधान करता हूँ। जानबूझकर मुझे यह कहने के लिए विवश मत करो कि “क्या मैं  अपने सुकरात को नहीं जानता? यदि नहीं, तो मैं अपनी पहचान ही भूल गया हूँ।” या “वह बोलना चाहता था, लेकिन नख़रा कर रहा था।” नहीं, हम दोनों इस जगह से तबतक नहीं हिलेंगे जबतक तुम वह भाषण न दे दो जो तुमने माना है कि तुम्हारे अन्दर कुलबुला रहा है। हमलोग सुनसान जगह पर हैं, मैं तुमसे अधिक मज़बूत और युवा हूँ और ‘इसलिए मेरे हुक्म को हल्के मत लो’ तुम्हारा मुँह खुलवाने के लिए मुझे बलप्रयोग करने पर बाध्य मत करो।

 

सुकरात: लेकिन मेरे प्यारे अच्छे फिदरस, जिस विषय पर एक कुशल लेखक ने पहले ही रचना की है उस विषय पर मेरे जैसे नौसिखुए को कुछ अलग करने की कोशिश करना अपना ही मज़ाक़ उड़ाना होगा।

 

फिदरस: देखो, मैं अब यह सब दिखावा बर्दाश्त नहीं करूंगा, क्योंकि मुझे पूरा यक़ीन है कि मैं कुछ ऐसा कह सकता हूँ जो तुम्हें बोलने के लिए मजबूर कर देगा।

 

सुकरात: तो तुम वैसी बात मत बोलो।

 

फिदरस: लेकिन मैं बोलूंगा, अभी और यहाँ और जो मैं कहने जा रहा हूँ वह एक क़सम है। मैं क़सम खाता हूँ…. किसकी? किस देवता की? क्यों नहीं इस प्लेन वृक्ष की ? तो मैं क़सम खाता हूँ कि यदि तुमने इस वृक्ष की मौजूदगी में अपना भाषण नहीं सुनाया, तो मैं कभी भी कोई भाषण नहीं दूंगा और न किसी लेखक की रचना सुनाऊंगा।

 

सुकरात: यह तो गुण्डागर्दी है। एक भाषणप्रेमी को अपनी बात मनवाने का अच्छा तरीक़ा ढूँढे निकाला है।

 

फिदरस: फिर यह सब आनाकानी क्यों?

 

सुकरात: तुम्हारी क़सम की ख़ातिर मैं अपनी हार मानता हूँ, क्योंकि मैं ऐसे मनोरंजन के बिना कैसे जी सकता हूँ!

 

फिदरस: ठीक है, तो शुरू करो।

 

सुकरातः ठीक है, लेकिन तुम जानते हो मैं क्या करने वाला हूँ?

 

फिदरस: क्या?


सुकरात: शुरू करने के पहले मैं अपना सर ढक लूंगा। इसके बाद मैं एकदम तेज़ गति से अपना भाषण बोल दूंगा, ताकि तुम्हें देखकर शर्म से बीच में ही भाषण न छोड़ दूँ।

 

फिदरस: तुम चाहे जो करो, लेकिन तुम्हें भाषण देना है।


 

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