प्लेटो
फिदरस ने अपने भाषण की शुरुआत कुछ इस तरह की दलीलों के साथ की - प्रेम एक महान देवता है। वह देवताओं और मानव -जाति के लिए समान रूप से विलक्षण है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण उसका जन्म है।
उसने कहा – इस देवता की पूजा प्राचीनतम काल से हो रही है, क्योंकि प्रेम न किसी से पैदा हुआ है और न गद्य या पद्य में ऐसा कोई उल्लेख मिलता है कि प्रेम के कोई माता-पिता थे। यद्यपि हीसियद ने साफ़-साफ़ लिखा है कि पहले अव्यवस्था आयी और उसके बाद:
अव्यवस्था के गर्भ से विराट वक्ष-स्थल वाली
पृथ्वी का जन्म हुआ –
जो हम सब का अक्षय आधार है
और उसके बाद प्रेम .....
एक्युसिलौस हीसियद से सहमत है। उसका भी विचार है कि अव्यवस्था के बाद पृथ्वी और प्रेम की उत्पत्ति हुई। पार्मेन्दीज़ ने भी सर्जनात्मक शक्ति के बारे में लिखा है:
उसने सभी देवताओं में सबसे पहले प्रेम की रचना की।
इस तरह हम देखते हैं कि प्रेम की प्राचीनता सब मानते हैं। सच तो यह है कि वह हमारे सर्वोपरि कल्याण का प्राचीनतम स्रोत है। कम से कम मैं यह मानता हूँ कि आदमी के लिए इससे बड़ा कोई वरदान नहीं है कि वह एक उदार प्रेमी बने । इसी तरह एक प्रेमी के लिए प्रियतम से बढ़कर कोई नहीं है। यदि कोई बेहतर ज़िन्दगी जीना चाहता है तो प्रेम के सिवा न तो ख़ानदान, न विशेषाधिकार, न संपत्ति और न कोई और वस्तु उसका पथ-प्रदर्शन कर सकती है। मैं ऐसे प्रेम की बड़ाई किन शब्दों में करूं! जो कुछ भी द्वेषपूर्ण है उसके प्रति अवज्ञा रखना प्रेम है और जो भी शुभ और कल्याणकारी है, उसका अनुसरण करना प्रेम है। इसके बिना न तो कोई नगर, न उसके नागरिक किसी महान या श्रेष्ठ कार्य को अंजाम दे सकते हैं। प्रेमी के बारे में मैं यह कहना चाहता हूँ कि यदि उसे कोई घृणित काम करते हुए देख ले तो इस बात को वह भले सहन कर ले कि देखने वाला उसका पिता, मित्र या कोई और है, वह यह क़तई सहन नहीं कर सकता कि उसका प्रियतम उसे किसी नीच कर्म में लिप्त पाए। प्रियतम पर भी यही बात लागू होती है – यदि उसके प्रेमी उसे किसी अशोभनीय स्थिति में देख लें तो उसकी शर्मिन्दगी और भी कष्टकर हो जाती है।
यदि कोई नगर या सेना प्रेमी युगलों से बनी हो तो जो भी द्वेषपूर्ण है उसका परित्याग करके तथा एक दूसरे की उत्कृष्टता का अनुकरण करके ऐसे प्रेमी-युगल उस राष्ट्र के लिए अनमोल साबित होंगे। ऐसे प्रेमी-युगल एकजुट होकर पूरी दुनिया जीत सकते हैं। कोई भी प्रेमी यह नहीं चाहेगा कि उसका प्रियतम उसे रण में हारकर शस्त्र छोड़कर भागता हुआ देखे। इसके बदले वह हजार बार मृत्यु का वरण करना पसंद करेगा। कोई भी प्रेमी इतना कायर नहीं होगा कि वह अपने प्रियतम को छोड़कर भाग जाए या ख़तरे की घड़ी में उसकी मदद न करे, क्योंकि प्रेम की मौजूदगी कापुरुषों के ह्रदय में भी वीरता की उसी ज्वाला को को जलाती है जो जन्मजात वीरों में जलती रहती है। जैसे होमर ने यह लिखा है कि देवता ने नायक के ह्रदय में शक्ति का संचार किया, वैसे ही हमें यह समझना चाहिए कि प्रेम की शक्ति भी प्रेमी के ह्रदय को इसी प्रकार प्रभावित करती है।
यह भी सच है कि यह प्यार ही है जो एक आदमी को दूसरे के लिए अपनी जान देने के लिए प्रेरित करता है। यह बात न केवल पुरुषों पर लागू होती है, बल्कि स्त्रियों पर भी, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण हम यूनानियों के लिए एल्सेस्तिस है जो अपने पति के लिए अपनी जान देने के लिए तैयार थी- जबकि उसके सास-ससुर का अपने बेटे के प्रति प्यार, एल्सेस्तिस के प्रेम की तुलना में इतना तुच्छ था कि वे अपने बेटे के लिए पराये लग रहे थे और बेटे से उनका केवल नाम का सम्बन्ध रह गया था। एल्सेस्तिस के बलिदान को न केवल मानव-जाति ने सराहा है, बल्कि देवताओं की नज़र में भी उसका प्रेम और बलिदान इतना ऊँचा है कि उसे यह वरदान मिला है कि उसकी आत्मा अधोलोक की स्तिक्स नदी की गहराइयों से बाहर निकलकर एक बार फिर अवतरित होगी। अनेक श्रेष्ठ कार्य करने वाली कुछ गिनी- चुनी आत्माओं को ही अब तक यह वरदान मिला है।
इस प्रकार देवलोक में भी प्रेम के जुनून और दृढ़ता के लिए एक अनोखा सम्मान है। देवताओं ने आर्फियस को हेदीज़ से खाली हाथ वापस लौटाया और उसे केवल उस स्त्री की छाया का दर्शन करवाया जिसे खोजते हुए वह वहाँ तक पहुँचा था। देवताओं ने इसकी इजाज़त नहीं दी कि वह युरिदिसि को अपने साथ वापस ले जाए, क्योंकि उन्होंने उसके प्यार में वह शिद्दत नहीं देखी, जो एल्सेस्तिस में थी, जिसने अपने प्रियतम के लिए जान दे दी थी। आर्फियस में उस तरह का साहस नहीं था। वह तो अपनी जान बचाते हुए, दाँवपेंच के सहारे ज़िन्दा हेदीज़ में आ गया था। यही वजह थी कि उसे देवताओं ने शाप दिया कि वह स्त्रियों के हाथों मारा जाए।
थेतिस के पुत्र अकिलीज़ की नियति कितनी अलग थी! उसे देवताओं ने दिव्य द्वीप में भेजा, क्योंकि अपनी माँ से यह जानने पर भी कि यदि वह हेक्टर को मारेगा तो वह भी मारा जाएगा और यदि वह हेक्टर को जिन्दा छोड़ देगा तो वह पूरी आयु बिताकर अपने घर में अंतिम सांस लेगा, उसने अधिक वीरतापूर्ण विकल्प का चुनाव किया और अपने प्रेमी पत्रोक्लस को बचाने गया, उसकी मौत का बदला लिया और न केवल अपने दोस्त की खातिर मृत्यु का वरण किया बल्कि मृत्यु में भी मित्र के साथ रहा। चूँकि उसका प्रेमी उसके लिए जान से भी प्यारा था, इसीलिए देवताओं ने उसे अभूतपूर्व गौरव का पात्र माना।
मेरा तो विचार है कि ईस्किलस ने इन दोनों का रिश्ता ही बदल दिया है, जब उसने पत्रोक्लस को अकिलीज़ का प्रेमी नहीं बल्कि प्रियतम बताया है, जबकि हम जानते हैं अकिलीज पत्रोक्लस या अन्य नायकों से अधिक ख़ूबसूरत था। उसकी तो मसें भी नहीं भीगी थीं और होमर ने भी कहा है, वह उम्र में पत्रोक्लस से छोटा था। मैं इस पहलू का ख़ास तौर पर ज़िक्र इसलिए कर रहा हूँ, क्योंकि वैसे तो देवता प्यार से जन्मी हर प्रकार की वीरता का सम्मान करते हैं, लेकिन वे प्रेमी के प्रेम को देखकर जितने हर्षित होते हैं उससे भी अधिक वे प्रियतम के समर्पण से प्रभावित होते हैं, क्योंकि प्रेमी तो प्रेम की प्रेरणा के कारण प्रियतम की तुलना में हमेशा देवताओं के करीब होते ही हैं। इसीलिए मैं समझता हूँ देवताओं ने अकिलीज़ को एल्सेस्तिस से भी ऊँचा दर्जा दिया और उसे दिव्य द्वीप भेज दिया।
तो, दोस्तो, संक्षेप में मेरा विषय यह है कि प्रेम सबसे पुराना और महानतम देवता है। वह आदमी को हर तरह की अच्छाइयों और ख़ुशियों की सौगात देता है- इस लोक में और परलोक में भी।
जहाँ तक अरिस्तोदेमस को याद था, फिदरस का यही भाषण था। इसके बाद अनेक भाषण हुए, जो उसे ठीक-ठीक याद नहीं थे। इसलिए उसने सीधे पासेनियस की चर्चा की, जिसका भाषण कुछ इस प्रकार था।
प्रिय फिदरस, यदि प्यार की केवल विरुदावली ही गानी है तो मुझे लगता है अब तक का सिलसिला कुछ ख़ास कामयाब नहीं हो रहा है। यदि प्यार एक ही तरह का होता तब तो यह ठीक था, लेकिन दुर्भाग्य से यह सच नहीं है। हमें पहले यह तय कर लेना चाहिए कि हम किस तरह के प्यार की महिमा का बखान करेंगे। पहले मैं उस प्यार को परिभाषित करना चाहता हूँ, जिसके प्रति हमें आदर प्रकट करना है। बाद में उसके देवत्व के अनुरूप उसकी विरुदावली गाने का प्रयास करूंगा।
दोस्तो, आप सब इस बात से सहमत होंगे कि प्यार न होता तो एफ्रदायती जैसी देवी का कोई वजूद नहीं होता। यदि उस नाम की केवल एक देवी होती तो हम मानते कि प्यार की केवल एक क़िस्म होती है, लेकिन इस प्रकार की दो देवियाँ है और इसलिए प्यार भी दो तरह का होता होगा। इस बात से कोई इन्कार नहीं करेगा कि इस नाम से दो देवियाँ हैं- एक बड़ी, जो किसी माँ के गर्भ से नहीं बल्कि सीधे स्वर्ग से अवतरित हुई थी। हम इसे युरेनियन यानी स्वर्ग की एफ्रदायती कहते हैं। दूसरी, उससे छोटी, ज़्यूस और दायोनी की बेटी है, जिसे हम पेन्देमस यानी पार्थिव एफ्रदायती कहते हैं। यही वजह है कि प्यार को पार्थिव या स्वर्गिक समझना चाहिए, जो इस बात पर निर्भर करेगा कि उस पर किस देवी का साया है। हर देवता हमारी श्रद्धा का अधिकारी है, इसलिए इस समय हमारा फ़र्ज़ बनता है कि इन दोनों देवियों की विशेषताओं का बखान किया जाए।
यह कहा जा सकता है कि कोई भी काम अपने आप में अच्छा या बुरा नहीं होता। हम अभी जो कर रहे हैं उसी का उदाहरण लें। न तो पीने में, न संगीत में, न वार्तालाप में अपने आप में कोई गुण है। यदि कोई काम अच्छी तरह, सलीके से किया जाए तो वह अच्छा है; यदि उसे बुरी तरह किया जाए तो वह बुरा है। प्यार पर भी यही बात लागू होती है। प्रेम अपने आप में प्रशंसनीय या श्रेष्ठ नहीं है, वह तभी श्रेष्ठ है जब वह हमें उत्कृष्ट प्रेम करने के लिए प्रेरित करे।
तो, दोस्तो, पार्थिव एफ्रदायती से प्रेरित प्यार सचमुच पार्थिव ही है। यह प्यार पूरी मनमानी करता है।असभ्य लोगों की वासनाएं इसी से नियंत्रित होती हैं, क्योंकि एक तो यह कि उनमें लड़के और लड़कियों दोनों की ओर आकर्षण होता है; दूसरी बात यह कि वे चाहे किसी को भी प्यार करें उनका आकर्षण शरीर के प्रति होता है, आत्मा के प्रति नहीं। अंतिम बात यह है कि उनकी पसंद छिछली होती है। वे केवल भोग-विलास के बारे में सोचते हैं और उन्हें इसकी परवाह नहीं रहती कि उनका मिलन उच्च कोटि का है या निम्न कोटि का। उन्हें जहाँ ख़ुशी मिलती है, वहाँ जाते हैं, चाहे वह जगह अच्छी हो या बुरी। यह छोटी एफ्रदायती का प्यार है जिसकी प्रकृति स्त्री और पुरुष की मिली-जुली प्रकृति से बनी है।
इसके विपरीत स्वर्गिक प्यार है जिसका स्रोत वह देवी है, जिसमें कुछ भी स्त्रैण नहीं है। इस देवी में पूरी तरह पुरुष के गुण हैं। दोनों देवियों में वह बड़ी है और वह हर प्रकार की कुरुचि से पूर्णतया मुक्त है। यही वजह है कि जो लोग इस दूसरे क़िस्म के प्यार से प्रेरित होते हैं वे पुरुष की ओर आकृष्ट होते हैं, ख़ासकर ऐसे पुरुष की ओर जो प्रतिभाशाली हो। युवा प्रेमियों में भी आप ऐसे प्रेमियों की पहचान कर सकते हैं जो पूरी तरह स्वर्गिक प्रेम से प्रभावित हैं, क्योंकि ऐसे व्यक्तियों को तब तक कोई युवक प्रिय नहीं लगता, जब तक उसमें प्रतिभा के पहले संकेत न दिखें, जो अक्सर किशोरावस्था के पदार्पण के साथ दिखने लगते हैं। मेरा विचार है कि जो व्यक्ति इस अवस्था के युवक से प्रेम करता है वह वस्तुतः उसके साथ अपना पूरा समय, अपनी पूरी ज़िंदगी बांटने के लिए तैयार रहता है। ऐसा व्यक्ति किसी युवक के भोलेपन और नादानी का फ़ायदा नहीं उठायेगा और न उसे ठुकराकर हँसते हुए किसी नए प्यार की ओर मुड़ जाएगा।
लेकिन, दोस्तो, कभी-कभी मैं यह सोचता हूँ कि ऐसा कोई क़ानून होना चाहिए, जिसमें कम उम्र के लड़कों से प्यार करने की मनाही हो। इससे लोग एक अनजान भवितव्य के पीछे समय और श्रम बर्बाद करने से बचेंगे, क्योंकि किसी भी बच्चे का भविष्य कौन जानता है? कौन जानता है कि वह देह और आत्मा से सन्मार्ग पर चलेगा या कुमार्ग पर? यह सच है कि सिद्धान्तों पर चलनेवाले लोग अपना नियम ख़ुद बनाते हैं, लेकिन पार्थिव प्यार के अनुयायियों को क़ानूनी रूप से बाध्य किया जाना चाहिए कि वे संयम बरतें – ठीक वैसे ही जैसे हम यथासंभव अपनी बीवी-बेटियों को उनकी कुदृष्टि से बचाते हैं। उनके व्यभिचार के कारण प्यार का नाम इतना कलंकित हुआ है कि कुछ लोग यह मानने लगे हैं कि किसी प्रेमी की प्रेम-याचना को क़बूल करना निन्दनीय है। यदि किसी के मन में प्यार के संबंध में ऐसी धारणा है, तो अवश्य ही उसके सामने ऐसे पार्थिव प्रेमियों और उनके अशिष्ट आचरण का उदाहरण रहा होगा, क्योंकि जो आचरण शिष्टता और परम्परा के अनुरूप होगा, वह कभी निन्दनीय नहीं हो
सकता।
दोस्तो, मैं एक और बात की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ। यूनान के दूसरे राज्यों में प्यार सम्बन्धी क़ानून इतने सरल और सुपरिभाषित हैं कि उन्हें आसानी से समझा जा सकता है, जबकि इस सम्बन्ध में हमारी ( एथेन्स की ) संहिता अत्यंत जटिल है। उदाहरण के लिए, एलिस और बोएसिया जैसे राज्यों में, जहाँ लोग स्वभावत: मुखर नहीं हैं, यह निश्चित नियम बनाया गया है कि प्रेमी को मनोवांछित पाने का हक़ है। कोई भी, चाहे वह बूढ़ा हो या जवान, इसे ग़लत नहीं मानता है। मेरा अनुमान है कि शायद इसके पीछे उनका यह स्वार्थ है कि उन्हें युवा प्रियतमों की कृपा पाने के लिए गिडगिडाना न पड़े, क्योंकि ऐसे प्रेमियों के लिए प्रेम याचना करना दुष्कर कार्य है, जो स्वभाव से चुप्पा होते हैं।
दूसरी ओर आयोनिया और पौर्वात्य शासन के अधीन आने वाले अनेक देशों में प्रेमी की प्रेम-याचना को स्वीकार करना निन्दनीय माना जाता है। दरअसल, पूरब का आदमी न केवल प्यार को बुरा मानता है, बल्कि दर्शन और खेलकूद को भी कुछ अच्छा नहीं समझता। यह उस तानाशाही व्यवस्था का परिणाम है जिसके अधीन वहां के लोगों को जीना पड़ता है, क्योंकि मेरा यह मानना है कि इन देशों के शासक यह नहीं चाहते कि प्रजा उच्च चिंतन करे या लोगों में गहरी दोस्ती या भाईचारा हो। प्यार ही तो दोस्ती और भाईचारे के मूल में है। जिन लोगों ने यहाँ एथेन्स में बलपूर्वक सत्ता पर अधिकार जमाया था उन्होंने भी कटु अनुभव से यही सीखा था, क्योंकि अरिस्तोजितोन के प्रेम और हर्मोदियस की मैत्री की ताकत से ही उनकी सत्ता का अवसान हुआ।
इसलिए जहाँ भी क़ानून में यह व्यवस्था हो कि प्रेम-याचना स्वीकार करना ग़लत है, वहां आप निःसंकोच मान सकते हैं कि इसके लिए दोषी क़ानून के निर्माता ही हैं— यानी, इसके पीछे शासकों का अत्याचार और प्रजा की दासता है। दूसरी ओर, जहाँ भी प्रेम-याचना को बेहिचक स्वीकार करने की स्पष्ट व्यवस्था है , वहां आप क़ानून निर्माताओं की मानसिक अकर्मण्यता को दोष दे सकते हैं।
लेकिन दोस्तो, एथेन्स में हमारे पास अधिक सराहनीय संहिता है-एक ऐसी संहिता, जिसे, जैसा कि मैं पहले कह रहा था, समझना उतना आसान नहीं है। उदाहरण के लिए हम ज़रा अपने इस सिद्धान्त वाक्य पर विचार करें
कि छुप- छुप कर प्यार करने के बजाय प्रकट रूप से प्यार करना बेहतर है, ख़ासकर तब, जब आपका दिल ऐसे व्यक्ति पर आया हो जो यशस्वी और गुणी हो, भले ही उसका शारीरिक सौन्दर्य उतना लुभावना न हो। और यह भी सोचिए कि हम किस तरह आशिक की हौसला अफजाई करते हैं, यह कभी नहीं सोचते कि वह कुछ भी ग़लत कर रहा है, उसकी जीत की हम इज़्ज़त करते हैं और उसकी हार पर शर्मसार होते हैं। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि क़ानून आशिक़ के प्रति कितनी नरमी का रुख़ अपनाता है। दरअसल उसके ऐसे व्यवहार के लिए भी बड़ाई की जाती है, जिसपर किसी अन्य परिस्थिति में कड़ी आपत्ति की जाती।
फ़र्ज़ कीजिए , कोई आदमी किसी से धन या पद या कोई अधिकार चाहता है और इसलिए वह इस तरह का आचरण करता है जैसे कोई आशिक़ अपने माशूक़ के साथ करता है, यानी वह गिड़गिड़ाता है, कसमें खाता है, याचना करता है, दरवाजे पर लेट जाता है - संक्षेप में ऐसे दासत्व का प्रदर्शन करता है जो किसी ग़ुलाम के लिए भी अशोभनीय हो। न केवल उसके दोस्त बल्कि उसके दुश्मन भी उसे ऐसा करने से मना करेंगे, क्योंकि उसके दोस्त उसके आचरण से शर्मिंदा होंगे, जबकि उसके दुश्मन उसपर चापलूसी और चाटुकारिता का आरोप लगायेंगे।
लेकिन यदि कोई आशिक़ इस तरह का आचरण करे तो लोग उसकी बडाई ही करते हैं। क़ानून की नज़र में भी ऐसे प्रेमी का आचरण एक गौरवपूर्ण उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अपनाया गया साधन माना जाता है। सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि लोग यह मानते हैं कि आशिक़ यदि कसम तोड़ दे तो देवता उसे माफ़ कर देते हैं, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि प्रेमियों द्वारा कसमें तोड़ने के लिए ही दी जाती हैं। इस तरह, दोस्तो, हम देखते हैं कि हमारे एथेन्स की संहिता में न केवल आदमी बल्कि देवता भी आशिक़ की तरफ़दारी करते हैं।
ऐसी स्थिति में हर किसी को यह उम्मीद होगी कि और कहीं नहीं तो कम से कम यहाँ प्यार करना और अपने प्रेमी के प्रति सदय रहना सराहनीय माना जाता होगा। लेकिन असलियत में होता यह है कि जब किसी पिता को यह पता चलता है कि कोई उसके पुत्र का दीवाना है तो वह अपने पुत्र पर एक पहरेदार बिठा देता है, जिसे यह सख़्त हिदायत दी जाती है कि उसे आशिक़ से न मिलने दिया जाए।
यदि उस किशोर के हमउम्र दोस्तों को ऐसी भनक मिले कि
उसका कोई आशिक़ है तो वे उसे न जाने क्या-क्या कहकर चिढ़ाते हैं। बड़े-बुजुर्ग भी उन्हें न तो ऐसा करने से रोकते हैं और न उन्हें डाँटते हैं। यदि बात केवल इतनी होती तो कोई भी यही समझेगा कि हम एथेन्स निवासी प्रेमी के प्रति समर्पण की बात को बिलकुल नापसंद करते हैं।
लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि इस विरोधाभास को समझने के लिए हमें यह बात याद रखनी होगी कि किसी भी कार्य का नैतिक मूल्य हर स्थिति में एक जैसा नहीं रहता। हम सब इस बात से सहमत हैं कि प्यार अपने आप में न तो अच्छा है और न बुरा, उसकी अच्छाई और बुराई इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी प्रेरणा से लोग किस तरह का आचरण करते हैं। एक बुरे प्रेमी की बुराई को प्रश्रय देना ग़लत है, लेकिन एक अच्छे प्रेमी की अच्छाई को बढ़ावा देना श्रेयस्कर है। बुरा प्रेमी वह है, जो पार्थिव प्रेम का पुजारी है, जिसे आत्मा के बजाय देह की तृष्णा है। ऐसे आदमी का ह्रदय उस वस्तु पर अटका हुआ है जो परिवर्तनशील है और इसलिए उसका हृदय भी अस्थिर है। सौन्दर्य के पहले प्रस्फुटन के कुछ दिनों के बाद जैसे ही उस शरीर का सौन्दर्य फीका पड़ने लगता है, ऐसा प्रेमी अपने सारे लुभावने वादों और कसमों को तोड़कर 'अपने पंख समेट कर उड़ जाता है'। लेकिन जिस प्रेमी के ह्रदय पर नैतिक सौन्दर्य की गहरी छाप है, वह ताज़िन्दगी वफ़ादार रहेगा, क्योंकि उसने उसे अंगीकार किया है, जिसका सौन्दर्य कभी फीका नहीं पड़ता।
एथेन्सके कानून में साफ़-साफ़ फ़र्क़ किया गया है कि किस तरह के प्रेमी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए और किसकी उपेक्षा की जानी चाहिए।इसलिए इस क़ानून में यह व्यवस्थाहै कि किन मामलों में आगे बढ़ना चाहिए और किन मामलों में पीछे हटना चाहिए। इस क़ानून में आशिक़ों और माशूक़ों की दो श्रेणियों में फ़र्क़ करने के लिए अनेक कसौटियांऔर निकष दिए गए हैं। हमारी संहिता कहती है कि प्रेम याचना को तुरंत स्वीकार करना अनैतिक है- याचना और स्वीकृति के बीच कुछ समय का अंतराल होना चाहिए, क्योंकि यह आम तौर पर सभी मानते हैं कि समय ही सबसे बड़ी कसौटी है। संहिता में यह भी कहा गया है कि धन के लोभ से या राजनीतिक कारणों से या दुर्व्यवहार के डर से समर्पण करना अनैतिक है। संक्षेप में, यदि प्रियतम धन-दौलत या पद से होने वाले लाभ की ओर उपेक्षा प्रदर्शित नहीं करता है, तो उस प्रेम को अनैतिक माना जाएगा, क्योंकि इस तरह की स्वार्थपरक भावनाओं के पीछे कोई स्थायित्व या चिरंतनता नहीं रहती और इनके आधार पर कभी भी उच्च स्तर की मैत्री नहीं हो सकती।
यदि कोई युवक हमारी शालीनता की धारणाओं पर चोट पहुँचाए बिना अपने प्रेमी की प्रेम याचना स्वीकार करना चाहता है तो उसके सामने एक ही विकल्प है। यह माना जाता है कि जैसे प्रेमी का अपने प्रियतम के प्रति स्वेच्छा से किया गया समर्पण न तो निंदनीय है और न वह कोई अपराध है, उसी तरह स्वेच्छा से किये गए समर्पण का एक और रूप भी निर्दोष माना जाता है। यह वह समर्पण है जो गुणों की ख़ातिर किया जाता है। है। इसलिए , दोस्तो, यदि कोई व्यक्ति किसी के प्रति इसलिए समर्पण करता है, क्योंकि उसे विश्वास है कि ऐसा करने से उसके विवेक में या किसी अन्य गुण में वृद्धि होगी तो हम मानते है कि इस प्रकार की स्वैच्छिक दासता न तो निंदनीय है और न घृणित ही।
इसलिए यह तय करने से पहले कि किसी युवक का अपने प्रेमी के प्रति समर्पण सही है या गलत, हमें दो क़ानूनों को मिलाकर देखना चाहिए। एक क़ानून वह जो नवयुवकों के प्यार से सम्बंधित है और दूसरा वह जो बुद्धि-विवेक और अन्य गुणों की साधना से सम्बंधित है। जब किसी प्रेमी और उसके प्रियतम का मिलन इस प्रकार का हो कि दोनों अपने-अपने ख़ास क़ानून का पालन कर रहे हों- प्रियतम की वफ़ादारी के कारण प्रेमी ने स्वेच्छा से विधिसम्मत तरीके से अपने आप को प्रियतम के अधीन कर लिया हो और इसके बदले प्रियतम भी प्रेमी को विधिसम्मत तरीके से अपनी सेवा समर्पित कर रहा हो, क्योंकि वह जानता है कि प्रेमी उसे बुद्धिमान और गुणवान बनाने में मदद कर रहा है - एक अपने विवेक और गुणों की दौलत दूसरे के साथ बांट रहा हो और दूसरा अपने मित्र से अच्छी शिक्षा पा रहा हो - जब ऐसा हो, जब दोनों क़ानूनों का साथ-साथ पालन हो रहा हो, तभी और केवल तभी प्रेमी के लिए उचित होगा कि वह अपनी इच्छा का अनुसरण करे।
इस प्रकार की अपेक्षा रखने पर यदि निराश भी होना पड़े तो इसमें कोई शर्म की बात नहीं है, लेकिन अन्य प्रकार की अपेक्षाएं, चाहे वे पूरी हों या नहीं हों वस्तुतः निन्द्य हैं। फ़र्ज़ कीजिए एक ऐसा युवक है जो अपने प्रेमी की बात इसलिए मानता है क्योंकि वह धनी है और उससे उसे धन मिलने की आशा है। यदि उसे बाद में पता चले कि उसके साथ धोखा हुआ है और दरअसल उसका प्रेमी दो कौड़ी का आदमी है, तब भी उसकी मूल अपेक्षा ही ग़लत थी, क्योंकि उसने यह सिद्ध कर दिया कि वह इस प्रकार का आदमी है, जो पैसे के लिए किसी भी हद तक जा सकता है और यह कोई गौरव की बात नहीं है। लेकिन फ़र्ज़ कीजिए उसने प्रेमी के प्रति समर्पण इसलिए किया है क्योंकि उसे अपने प्रेमी के गुणों में विश्वास था और उसकी संगति में रहकर अपने गुणों में विकास करना चाहता था, और बाद में यदि उसे पता चले कि उसके साथ धोखा हुआ है और उसका प्रेमी लम्पट और आवारा है, तब भी उसकी भूल में भी एक ऊंचाई होगी, क्योकि उसने इस बात से यह सिद्ध कर दिया है कि वह ऐसा व्यक्ति है जो गुण विकास के लिए कुछ भी कर सकता है। और, सज्जनो, इससे अधिक प्रशंसनीय बात क्या हो सकती है! इसलिए, निष्कर्ष के तौर पर मैं यह कह सकता हूँ गुणों की ख़ातिर प्रेमी की बात मानने में कोई बुराई नहीं है।
स्वर्गिक एफ्रदायती का प्यार ऐसा ही है। वह अपने आप में पवित्र है और नगर और नागरिकों के लिए समान रूप से मूल्यवान है, क्योंकि वह प्रेमी और प्रियतम दोनों को अपने नैतिक हित की ओर ध्यान देने के लिए बाध्य करता है। बाक़ी सारे लोग तो पार्थिव एफ्रदायती के अनुयायी हैं। और, फिदरस, बिना किसी पूर्वतैयारी के प्यार के विषय पर मैं इतना ही कहूँगा।
पासेनियस के भाषण के बाद एरिस्तोफनीज़ की बारी थी, लेकिन अरिस्तोदेमस ने मुझे बताया कि शायद अधिक मात्रा में भोजन करने के कारण उसे इतने जोरों से हिचकी आ रही थी कि वह भाषण शुरू करने की स्थिति में नहीं था। उसने अपनी बग़ल में बैठे चिकित्सक, एरिक्ज़िमेकस से कहा कि या तो तुम मेरी हिचकी का इलाज करो या हिचकी थमने तक मेरे बदले तुम भाषण दो।
एरिक्ज़िमेकस ने कहा, मैं दोनों कर सकता हूँ। अभी मैं आप के बदले बोलता हूँ और जब आप ठीक हो जाएं तब आपमेरे बदले बोलें। इस बीच आप थोड़ी देर अपनी साँस रोककर रखें। यदि इससे हिचकी न थमे तो थोड़ा पानी लेकर गरारा करें। यदि हिचकी तब भी न जाए, तो किसी चीज से अपने
नथुने गुदगुदाएँ और छींकें। दो-तीन बार छींकने के बाद बुरी से बुरी हिचकी भी थम जाएगी।
ठीक है, एरिस्तोफनीज़ ने कहा, तुम अपना भाषण दो। मैं इस बीच तुम्हारे बताए नुसख़े आज़माता हूँ।
सज्जनो, एरिक्ज़िमेकस ने अपना भाषण आरम्भ करते हुए कहा, पासेनियस ने शुरुआत तो बहुत अच्छी की थी, लेकिन अपनी बात पूरी किये बिना वह अचानक रुक गया। मैं उसकी दलील को अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश करूंगा। मैं यह मानता हूँ कि दो तरह के प्यार की परिभाषा देकर उसने एक उपयोगी अंतर की चर्चा की है, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि चिकित्सा विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि मानव आत्मा को मानवीय सौन्दर्य की ओर आकृष्ट करने के अलावा प्यार के और भी अनेक उद्देश्य और विषय हैं। प्यार के प्रभाव को जीव-जगत और वनस्पति-जगत में- मैं तो यहाँ तक कहूंगा कि सृष्टि के हर रूप में - देखा जा सकता है। प्यार की महान, आश्चर्यजनक और सर्वव्यापी शक्ति की मौजूदगी हर गतिविधि में है- चाहे वह गतिविधि आध्यात्मिक हो या सांसारिक।
अपने पेशे की इज़्ज़त करते हुए मैं चिकित्सा-शास्त्र सम्बन्धी पहलू की पहले चर्चा करूंगा। मैं आपको बताना चाहूँगा कि हमारी देह की प्रकृति में प्यार का दोहरा स्वरूप अन्तर्निहित है, क्योंकि हम सब जानते हैं कि शारीरिक स्वास्थ्य और रोग दो भिन्न और विषम स्थितियां हैं और विषम विषम से जुड़ा रहता है। स्वस्थ शरीर की इच्छाएँ अलग होती हैं और रुग्ण शरीर की इच्छाएँ अलग। मैं पासेनियस की इस बात का समर्थन करता हूँ कि गुणी व्यक्ति के सामने समर्पण करना उचित है, लेकिन दुष्ट व्यक्ति के सामने समर्पण अनुचित है। इसी तरह शरीर के मामले में भी ऐसी इच्छाओं की तुष्टि उचित और आवश्यक है, जो उस खास स्थिति में सही और स्वस्थ हों। इसी को हम चिकित्सा कला कहते हैं। इसके विपरीत, ऐसी इच्छाओं की पूर्ति गलत है जो बुरी और मनहूस हैं। यदि कोई चिकित्सा के पेशे में नाम कमाना चाहता है तो उसे ऐसी इच्छापूर्ति को कतई बढ़ावा नहीं देना चाहिए। चिकित्सा विज्ञान वह विज्ञान है जिसमें आहार, पोषण और निकासी के सम्बन्ध में देह की प्रीति या इच्छा का वर्णन रहता है। इन इच्छाओं में क्या हानिकर हैं और क्या लाभदायक -इसकी पहचान जिसे हो, सही अर्थों में वही चिकित्सक है। यदि वह एक इच्छा को दूसरी इच्छा से बदल सके या यदि कोई महत्वपूर्ण इच्छा विद्यमान न हो तो उस इच्छा को उत्पन्न कर सके अथवा यदि आवश्यक हो तो किसी विद्यमान इच्छा को हटा सके तो हम ऐसे व्यक्ति को कुशल चिकित्सक कहेंगे।
अतः, सज्जनो, चिकित्सक वही है जो देह के परस्पर विरोधी तत्वों में सामंजस्य बैठाने में और उनमें परस्पर प्रीति उत्पन्न करने में सफल हो। जैसा कि हम सब जानते हैं कि सबसे अधिक विरोधी तत्व वे हैं जो आपस में विपरीत हैं- सर्दी और गर्मी, मीठा और खट्टा, गीला और सूखा, आदि। यदि हम अपने कवियों पर विश्वास करें, जैसा कि मैं करता हूँ, तो इन विपरीत तत्वों में प्रीति और संधि उत्पन्न करने के कौशल के कारण ही हमारे यशस्वी पूर्वज अस्क्लीपियस चिकित्सा-विज्ञान के जन्मदाता बन सके।
सज्जनो, इस कारण से मैं यह मानता हूँ कि चिकित्सा-विज्ञान केवल प्रेम देवता के निर्देशों का अनुसरण करता है- ठीक वैसे ही जैसे जिम्नास्टिक और कृषि कलाएँ । कोई भी यह देख सकता है कि संगीत पर भी यह बात लागू होती है। हेराक्लाइतस के इस गूढ़ कथन में इस बात की ओर इशारा किया गया है कि "जो अपने आप से संघर्षरत हैं, वही एक सूत्र में भी बँधे हैं— जैसे धनुष या वीणा का सामंजस्य।" यह सच है कि यह कहना बेतुका लगता है कि सामंजस्य आपस में संघर्षरत है या सामंजस्य उन तत्वों से बना है जो अभी भी परस्पर विरोधी हैं, लेकिन शायद उनका आशय यह था कि उच्च स्वर (ट्रेबल) और मन्द्र स्वर (बेस) के बीच के विरोध को सुलझा कर सामंजस्य उत्पन्न करना ही संगीत कला है। जब तक ट्रेबल और बेस के बीच विवाद है, तब तक उनमें सामंजस्य उत्पन्न नहीं हो सकता, क्योंकि सामंजस्य सुलह है और सुलह एक प्रकार की सहानुभूति है और परस्पर विरोधी चीजों के बीच तब तक सहानुभूति असंभव है जबतक उनके बीच विवाद जारी रहे। दूसरी ओर कुछ विवाद ऐसे होते हैं जिनमें सुलह करना असंभव नहीं है। ऐसे विवाद में ही हम सामंजस्य उत्पन्न कर सकते हैं। उदाहरण के लिए हम तेज और धीमे के बीच के अंतर को सुलझा कर लय और ताल पैदा करते हैं। जैसा कि हमने देखा, चिकित्सा कला देह में विरोधी इच्छाओं के बीच सुलह पैदा करती है, वैसे ही दूसरे प्रकार का सामंजस्य संगीत कला के कारण उत्पन्न होता है, जो परस्पर प्यार और सहानुभूति की जन्मदात्री है। इस तरह संगीत का वर्णन भी प्यार या इच्छाओं के विज्ञान के रूप में किया जा सकता है- सामंजस्य और लय के सन्दर्भ में।
लयबद्ध और सामंजस्यपूर्ण एकता में प्यार के सिद्धांत को पहचानना आसान है - प्यार की द्वैत स्थिति के सम्बन्ध में यहाँ कोई प्रश्न नहीं उठा है। परन्तु, जब हम मानवीय व्यापार में लय और सामंजस्य लागू करते हैं- उदाहरण के लिए किसी गीत की रचना में या पहले से रचे हुए गीत के सुर-ताल और राग-रागिनी की सही अदायगी दूसरों को सिखाने में -तब हमारे समक्ष जो कठिनाई आती है उसे कोई पारंगत व्यक्ति ही हल कर सकता है। इससे हम एक बार फिर अपने पिछले निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि संयमी व्यक्ति की इच्छा मानना उचित है और असंयमी व्यक्ति की इच्छा भी उस हद तक मानना उचित है जिससे वह सामान्य हो सके। दोस्तो, हमें इस प्रकार के प्रेम को अपनाना चाहिए क्योंकि ऐसा प्रेम सुशोभन और स्वर्गिक है। वह स्वर्ग की देवी यूरेनिया से उत्पन्न हुआ है, जबकि दूसरा, पार्थिव प्रेम, अनेक गीतों की देवी पोलिहिम्निया से जन्मा है। इस देवी की संगति में हम जो भी करें हमें सतर्क रहना चाहिए कि इस देवी से मिले आनंद में अतिरेक की बुराई न जोड़ें - ठीक वैसे ही जैसे हमारे पेशे में हमारा एक प्रमुख दायित्व यह है कि खानपान के आनंद को संतुलित रखा जाए ताकि हम भोजन रसास्वाद बिना किसी पीड़ा या बेचैनी के ले सकें। इसलिए संगीत में,
चिकित्सा में और धार्मिक या सांसारिक हर गतिविधि में हमें दो प्रकार के प्यार में फ़र्क़ करने का हर संभव प्रयास करना चाहिए, क्योंकि आप उनमें उनमें दोनों प्रकार के प्यार की मौजूदगी पाएँगे।
इसी तरह हम वार्षिक ऋतुओं में भी इन दो तत्वों को पाते हैं। जब प्यार एक नियंत्रक शक्ति के रूप में उन विरोधी तत्वों को एक सूत्र में बांधता है, जिनकी हमने चर्चा की- गर्मी और सर्दी, भीगा और सूखा- और एक सुव्यवस्थित सामंजस्य में उन्हें मिश्रित करता है तो उससे मानव-जाति, जीव-जगत और वनस्पति जगत सबके लिए स्वास्थ्य और प्राचुर्य का प्रादुर्भाव होता है और सब कुछ वैसे ही होता है जैसे होना चाहिए। परन्तु जब ऋतुओं पर दूसरे प्रकार के प्यार का असर होता है, तब सब ओर अनिष्ट और तबाही देखी जा सकती है। जानवरों और फ़सलों में हर प्रकार का रोग और महामारी फैलती है- कभी ओला, कभी पाला, कभी चित्ती- और ये सब प्यार की इस विराट व्यवस्था में जहाँ कहीं भी असंयम और लिप्सा है उसी का परिणाम है, जिसकी पुष्टि सितारों की गति और ऋतु-परिवर्तन का अध्ययन करने वाले ज्योतिर्विद करते हैं।
इसके अलावा, पूजा और उपासना के प्रत्येक अनुष्ठान- अर्थात् देवता और मनुष्य के बीच संवाद के प्रत्येक माध्यम - का एकमात्र उद्देश्य प्रेम का संरक्षण या शुद्धीकरण है। देवता के प्रति अवज्ञा का मुख्य कारण यह है कि हम जो कुछ भी करते हैं उसमें अधिक संयमित प्रेम का निर्वाह नहीं करते या उसका सम्मान नहीं करते, चाहे वह माता-पिता के प्रति हमारा उनके जीवित रहते या उनके दिवंगत हो जाने के बाद का आचरण हो या देवता के प्रति हमारी निष्ठा हो। जो देवताओं के रहस्यों के जानकार हैं वे हमारी प्रेम भावना का मार्गदर्शन करते हैं, उसे स्वस्थ बनाते हैं। वे मानवीय प्रेम के उन सिद्धांतों पर जोर देते हैं, जिनसे शिष्टाचार और आदर की भावना प्रेरित होती है, जो वस्तुतः देवता और मनुष्य के बीच सुलह के स्रोत हैं।
इसलिए, दोस्तो, प्यार की परिपूर्ण शक्ति विविध और अंतहीन है, लेकिन सबसे सशक्त वह प्यार है जिसका न्यायसम्मत और संयमित उपभोग स्वर्ग या पृथ्वी दोनों जगह "शुभ" की ओर ले जाता है। वही प्यार हमें हर प्रकार का आनंद देता है और उसी के माध्यम से हम सामाजिक सुख और यहाँ तक कि अपने अधिष्ठाता देवताओं की मैत्री के योग्य बनते हैं।
दोस्तो, यदि प्यार की इस विरुदावली में मुझसे कुछ बातें छूट गयी हैं तो आपको यक़ीन दिलाना चाहूँगा कि ऐसा जानबूझकर नहीं किया गया है। अब, एरिस्तोफनीज़, मेरी कमी पूरी करने का काम आपका है, बशर्ते आप कुछ अलग ढंग की विरुदावली न गाना चाहें। कुछ भी हो, देखें आप क्या कहना चाहते हैं - अब तो आपकी हिचकी भी थम गयी है।
इस पर, जैसा कि अरिस्तोदेमस ने मुझे बताया, ऐरिस्तोफनीज़ बोला, शुक्रिया, मैं बेहतर हूँ, लेकिन आख़िर मुझे छींक का ही सहारा लेना पड़ा- जिससे मैं यह सोचने पर मजबूर हुआ एरिक्ज़िमेकस, कि किस तरह देह सम्बन्धी तुम्हारे सुव्यवस्थित सिद्धांत में इस शोर और उत्तेजना के भयावह संयोग को स्थान मिला है। लेकिन इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि जैसे ही मैं छींका मेरी हिचकी बंद हो गयी।
एरिक्ज़िमेकस ने कहा- एरिस्तोफनीज़, ध्यान दें, अपना भाषण शुरू करने से पहले ही लोगों को हँसने पर मजबूर न करें। यदि आपके भाषण को धैर्यपूर्वक सुनने के बजाय हम आपके घटिया चुटकलों का ही इंतज़ार करने लगें तो दोष आपका ही होगा।
एरिस्तोफनीज़ हँस पड़ा। उसने कहा, तुम ठीक कह रहे हो, एरिक्ज़िमेकस, मैं अपनी बात वापस लेता हूँ। लेकिन मेरे प्रति ज्यादा सख़्ती नहीं बरतना। मुझे इसकी परवाह नहीं है कि मैं जो कुछ कहने जा रहा हूँ उसपर लोग हँसेंगे। ऐसा हो तो और भी अच्छा। आख़िर एक विनोदी कवि से लोग हास्य की ही अपेक्षा रखते हैं। लेकिन मुझे डर है कि मेरा भाषण पूरी तरह बेतुका न हो जाए।
एरिक्ज़िमेकस ने कहा- एरिस्तोफनीज़, मुझे पता है, आप व्यंग्यवाण बरसा कर नौ दो ग्यारह हो जाते हैं। लेकिन आप यह बात नहीं भूलें कि जो कुछ आप कहेंगे उसका इस्तेमाल आपके ख़िलाफ़ भी हो सकता है- लेकिन, फिर भी, कौन जानता है? शायद मैं आपको एक चेतावनी देकर छोड़ दूं।
तो,एरिक्ज़िमेकस, एरिस्तोफनीज़ ने अपना भाषण आरम्भ करते हुए कहा, जैसा कि तुमने कहा था मैं तुमसे और पासेनियस से बिलकुल अलग दिशा की ओर जाना चाहता हूँ। मुझे पूरा यक़ीन है कि मानव-जाति को प्यार की शक्ति का कभी अंदाज़ा नहीं रहा है, क्योंकि यदि मानव उसे उस रूप में जानता जिस रूप में वह वास्तव में है तो हमारे सबसे बड़े मंदिर और वेदी प्रेम देवता के नाम में होते और सबसे अनुपम बलिदान उसके सम्मान में दिए जाते और हमने आज की तरह उसे पूरी तरह उपेक्षित नहीं रखा होता। सभी देवताओं में हमारी सेवा का सबसे बड़ा हक़दार वही है, क्योंकि बाकी सभी देवताओं की तुलना में वह आदमी का सर्वाधिक क़रीबी दोस्त है; वह हमारा सबसे बड़ा पक्षधर है और वही हमें उन रोगों से चंगा करता है जिनसे राहत मिलने से आदमी के लिए सर्वोच्च आनंद का द्वार खुलता है। इसलिए, दोस्तो, मैं प्यार की शक्ति से आपका परिचय कराने का पूरा प्रयास करूँगा और आप अपनी बारी में इस कार्य को और आगे बढाएँ।
सबसे पहले मैं आदमी की असली प्रकृति का वर्णन करना चाहूँगा और उसमें जो परिवर्तन आए हैं, उसके बारे में बताना चाहूँगा— क्योंकि आदिकाल में हम वैसे नहीं थे जैसे आज हैं। मानव-जाति पहले तीन रूपों में बँटी थी- यानी, आज की तरह पुरुष और स्त्री नामक दो जातियों के आलावा एक तीसरी जाति भी थी, जिसमें पुरुष और स्त्री दोनों की विशेषताएँ थीं, जिनके लिए हमारी भाषा में आज भी नाम है, हालाँकि उस जीव को हम भूल चुके हैं।आज "उभयलिंगी" शब्द का प्रयोग हम हिक़ारत से करते हैं, फिर भी यह सच है कि उन दिनों एक स्त्री-पुरुष हुआ करता था, जो आधा पुरुष और आधा नारी था।
दूसरी बात यह है, दोस्तो, कि ये जीव गोलाकार थे। इनकी पीठ और पार्श्व गोल थे, चार बांहें और चार पैर थे, दो चेहरे थे जो एक बेलनाकार गर्दन पर रखे सर के दो तरफ़ थे— एक चेहरे का मुख एक ओर और दूसरे का दूसरी ओर- चार कान थे और गुप्तांगों और अन्य अंगों के भी दो-दो समूह थे। वे हमारी तरह ही सीधे खड़े होकर चलते थे, लेकिन जब वे दौड़ लगाते थे तो वे अपने पैरों पर गोल-गोल घूमते हुए किसी पहिये से बंधे हुए मसखरों जैसे लगते थे।
यदि उनकी बांहों को मिलाकर गिनें तो उनके आठ पैर थे, इसलिए आप कल्पना कर सकते हैं वे कितनी तेज गति से एक गेंद की तरह लुढ़कते हुए सरपट भागते चले जाते थे। मैं आपको बता सकता हूँ कि इन तीन
इन तीन लिंगों की उत्पत्ति कैसे हुई। पुरुष सूर्य से उत्पन्न हुए थे, जबकि स्त्री पृथ्वी से उत्पन्न हुई थी। उभयलिंगी चन्द्रमा से आए थे, जिसमें दोनों लिंगों के गुण हैं। वे गोल थे और गोल-गोल चलते थे, क्योंकि उन्हें यह स्वभाव अपने जनक से मिला था। और, दोस्तो, वे इतने शक्तिशाली और ऊर्जावान थे और इतने दम्भी भी कि उन्होंने होमर के एफिअल्तेस और ओटस की तरह सचमुच स्वर्ग का आरोहण करने और देवताओं पर आक्रमण करने की भी चेष्टा की ।
इस घटना के बाद ज़्यूस ने अन्य देवताओं के साथ राय-मशविरा किया कि इस सम्बन्ध में क्या किया जाए। देवताओं ने अपने आपको थोड़ी नाज़ुक स्थिति में पाया। कभी उन्होंने दैत्यों पर वज्र-प्रहार करके उन्हें नष्ट कर दिया था, लेकिन वे इस तरह उनका संहार करना नहीं चाहते थे, क्योंकि इससे उन्हें जो पूजा-अर्चना, बलि आदि मिलती थी उनसे वे सदा के लिए वंचित हो जाते। दूसरी ओर उन्हें वे पूरी तरह अपने हाथों से बाहर भी जाने देना नहीं चाहते थे। आख़िरकार बहुत देर तक माथापच्ची करने के बाद ज़्यूस ने सबके सामने एक समाधान रखा।
मुझे लगता है, उन्होंने कहा, मेरे पास एक उपाय है जो इन लोगों को पूरी तरह नष्ट करने के बजाय इन्हें कमज़ोर बनाएगा और इससे वे गड़बड़ी पैदा नहीं कर पायेंगे। मैं चाहता हूँ कि इन लोगों को दो हिस्सों में विभक्त कर दिया जाए। इससे एक पंथ दो काज सिद्ध होगा, क्योंकि हर हिस्सा पहले की अपेक्षा आधा मज़बूत रह जाएगा और उनकी संख्या भी दुगुनी हो जाएगी जिससे हमें ही लाभ होगा। वे अपने दो पैरों पर सीधे चल पायेंगे और यदि, ज़्यूस ने कहा, उन्होंने इसके बाद भी मुझे परेशान किया तो हम उन्हें और विभक्त कर देंगे। तब उन्हें एक ही पाँव पर फुदकना होगा।
ऐसा कहकर ज़्यूस ने उन्हें आधा-आधा काट दिया- जैसे सेव का अचार बनाने के लिए हम उन्हें दो टुकड़ों में काटते हैं या धागे से अंडे के दो टुकड़े करते हैं। जब दोनों अर्धांश तैयार हो गए तो ज़्यूस ने अपोलो से कहा कि वह आधी बची गर्दन सहित चेहरे को उस ओर मोड़ दे जिस ओर से शरीर को काटा गया है- ताकि वे अपने ज़ख़्म को देखकर डर से चुप हो जाएँ - और उसके बाद उन्हें पूरी तरह चंगा कर दे। अपोलो उनके चेहरे को पीछे से मोड़कर सामने की ओर लाया और चारों तरफ से त्वचा को खींचते हुए उसने उस जगह फैलाया जिसे आज हम पेट कहते हैं- उन थैलों की तरह जिन्हें हम रस्सी से कसते हैं- और बाकी बचे एक छेद को उन्होंने इस तरह बाँधा कि वह नाभि कहलाया। जहाँ-तहां सलवटें पड़ गयी थीं, उन्हें उसने दूर किया। छाती की त्वचा को उसने ऐसे औज़ार से चिकना किया जिसका इस्तेमाल मोची अपने चमड़े को चिकना बनाने में करते हैं। फिर भी उसने पेट और नाभि के आस-पास कुछ गड्ढे छोड़ दिए ताकि हमें याद रहे कि बरसों पहले हम किस यातना से गुजरे थे।
जब उन्हें दो भागों में बांटने का काम पूरा हो गया तो प्रत्येक अर्धांश में अपने दूसरे अर्धांश के प्रति इतनी उत्कंठा बढ़ गयी कि वे साथ-साथ दौड़ पड़े। एक दूसरे की गर्दन में बांहें डाले उनकी एकमात्र इच्छा यही थी कि वे आपस में मिलकर एक हो जाएँ। उनकी इच्छा इतनी बलवती थी कि वे भूख और काहिली से मरने लगे क्योंकि उनमें से कोई भी एक दूसरे के बिना कुछ भी करने के लिए तैयार नहीं था। यदि एक अर्धांश की मृत्यु के बाद दूसरा अर्धांश अकेला छूट जाता था, तो वह बेचैन होकर इधर-उधर इस आशा में भटकता रहता था कि उसे अकेली कोई अर्ध-नारी, या जिसे हम आज पूरी नारी कहते हैं, मिल जाए या अर्ध-पुरुष मिल जाए। इस प्रकार यह जाति विलुप्त होने लगी।
सौभाग्य से ज़्यूस को उनकी हालत पर तरस आया और उन्होंने उनके लिए एक नयी योजना बनाई। उनके गुप्तांगों को पीछे से आगे की ओर लाया गया, क्योंकि आरम्भ में उनके गुप्तांग बाहर की ओर थे, जो अब उनकी पीठ वाला हिस्सा था- उन दिनों गर्भधारण के लिए वे एक दूसरे के ऊपर नहीं, बल्कि टिड्डों की तरह धरती पर लेटते थे।
लेकिन अब, जैसा कि मैंने कहा, ज़्यूस उनके गुप्तांगों को पीछे से सामने लाये और उन्हें आपस में प्रजनन करने के लिए कहा- पुरुष स्त्री के समागम द्वारा।
इसके पीछे विचार था कि यदि कोई पुरुष स्त्री से समागम करेगा तो गर्भधारण होगा और जाति विलुप्त नहीं होगी। यदि किसी पुरुष का पुरुष के साथ समागम होगा तो कम से कम उसे ऐसी संतुष्टि मिलेगी जिससे वह जीवन के रोजमर्रा कामों में दिलचस्पी ले सकेगा। तो, दोस्तो, आप देख सकते हैं कि हमारा एक दूसरे के प्रति जो जन्मजात प्यार है वह कितना प्राचीन है और कैसे यह प्यार हमारे प्राचीन स्वभाव को फिर से स्थापित करना चाहता है और कैसे वह दो को मिलाकर एक बनाना चाहता है और आदमी-आदमी के बीच की दूरी को पाटना चाहता है।
और इसलिए दोस्तो, जैसे बच्चे एक सिक्के को बीच से काटकर दो सिक्के बना लेते हैं और उन्हें निशानी के लिए अपने पास रखते हैं, ठीक वैसे ही हम अर्धांश में बँटे हैं और हर अर्धांश उस अर्धांश की खोज में है जो पूरी तरह उसके अनुरूप हो। जो पुरुष उभयलिंगी का अंश है वह स्वभावतः नारी की ओर आकृष्ट होगा- जैसे कि परस्त्रीगामी। इसी तरह जो नारी पुरुषों के पीछे भागती है -वह भी उभयलिंगी का अंश है- जैसे कि बेवफ़ा बीवी। परन्तु जो नारी मूलतः नारी की ही अर्धांश है, वह पुरुषों के बजाय नारी की ओर आकृष्ट होगी - जैसे कि स्त्री समलिंगी, जबकि जो पुरुष पुरुष के ही अर्धांश हैं वे पुरुषों के अनुगामी हैं और पूरी किशोरावस्था के दौरान अन्य युवकों के साथ दोस्ती करने, उनके साथ लेटने और उन्हें बांहों में भरने में उन्हें जो आनंद मिलता है, वह उनके पुरुषत्व को ही प्रकट करता है। देश के युवकों में इनसे ही सबसे अधिक आशा है, क्योंकि सबसे बलिष्ठ देहयष्टि इन्हीं की है।
मैं जानता हूँ कि कुछ लोग उन्हें बेशर्म कहते हैं, परन्तु यह उनकी ग़लती है। वे बेशर्मी के कारण ऐसे आनंद की खोज में नहीं हैं, बल्कि साहस, धैर्य और पौरुष के कारण। ये ऐसे गुण हैं जिनकी खोज वे अपने प्रेमियों में करते हैं और जिनकी वे सराहना करते है। यह इस बात से भी साबित होता है कि बाद में केवल वे ही सार्वजनिक जीवन में असली पुरुषार्थ का प्रदर्शन करते हैं। और, इसलिए जब वे बड़े हो जाते हैं तो वे अपना प्यार नवयुवकों पर न्योछावर करते हैं। विवाह और संतानोत्पत्ति में उनका स्वाभाविक आकर्षण नहीं रहता है। वस्तुतः वे केवल सामाजिक रीति का सम्मान करने के लिए विवाह करते हैं, क्योंकि यदि उनका वश चले तो वे तुरंत वैवाहिक जीवन से तौबा कर लें और अपना जीवन एक दूसरे के साथ बिताएं।
तो,दोस्तो, ऐसा पुरुष आशिक़मिज़ाज होता है। वह युवकों से प्यार करता है और हमेशा उनके साथ रहना चाहता है। जब ऐसा युवक प्रेमी - या यों कहेंकि कोई भी प्रेमी - इतना सौभाग्यशाली हो कि उसे दूसरा अर्धांश मिल जाए, तो वे दोनों स्नेह,मैत्री और प्रेम की भावना से इतने सराबोर रहते हैं,कि वे एक दूसरे को अपनी नज़रों से एक पल भी ओझल होने देना नहीं चाहते। ऐसे मिलन की ख़ातिर पुरुष अपना जीवन एक दूसरे के साथ बिताना चाहते हैं, हालाँकि यदि उनसे पूछा जाए कि वे एक दूसरे से क्या चाहते हैं तो उनके लिए जवाब देना आसान नहीं होगा। यह सच है कि वे एक दूसरे की संगति में इतने आनंदित रहते हैं कि केवल ऐन्द्रिक सुख ही इसका कारण नहीं हो सकता। सच तो यह है कि दोनों की आत्माओं में किसी और चीज़ की ही प्यास है- कोई ऐसी चीज़ जिसका वे नाम नहीं बता सकते और जिसका कभी पहेलियों और सूक्तियों में ही आभास मिलता है।
अब कल्पना कीजिए कि हिफीस्तस अपनी औजार-पेटी के साथ आये और एक दूसरे के साथ अगल-बगल लेटे प्रेमी-युगलों से पूछे कि मेरे प्यारे प्राणियो, मुझे बताओ कि तुम एक दूसरे से सचमुच क्या चाहते हो?
फ़र्ज़ कीजिए कि प्रेमी युगल कुछ भी न बता सकें और हिफीस्तस उनसे कहे कि क्यों न तुम दोनों को एक साथ जोड़कर तुम्हें एक बना दिया जाए ताकि दिन-रात तुम दोनों एक दूसरे के साथ रहो और कभी एक दूसरे से जुदा न हो। यदि तुम दोनों ऐसा चाहते हो तो मेरे लिए यह करना आसान है। मैं तुम दोनों को जोड़ दूंगा और तुम दोनों एक साथ जिंदगी जी सकते हो और अधोलोक में भी युगबद्ध रह सकते हो। तो,कहो, क्या कहते हो? क्या मैं यही करूँ? और यदि मैं ऐसा करूँ तो क्या तुमलोग ख़ुश रहोगे?
दोस्तो, मुझे पूरा यक़ीन है कि धरती पर कोई भी प्रेमी ऐसे प्रस्ताव को नहीं ठुकराएगा, क्योंकि इससे बेहतर सौभाग्य की वे कल्पना नहीं कर सकते। दरअसल, उन्हें ऐसा लगेगा जैसे वे अब तक इसी दिन का इन्तज़ार कर रहे थे- अपने प्रियतम के साथ पूरी तरह एक हो जाने के लिए।
इसलिए चारों ओर यह जो गहमागहमी है, वह हमारी उस मूल अवस्था का स्मृति-चिह्न है, जब हम सम्पूर्ण थे। आज हम उसी पुरातन सम्पूर्णता की तलाश कर रहे होते हैं जब हम कहते है कि हम प्यार करते हैं, क्योंकि मैं यह दोहराना चाहूँगा कि एक समय था जब हम एक थे, लेकिन आज अपने पापों के कारण ईश्वर ने हमें बिखेर दिया है, ठीक वैसे ही जैसे स्पार्टावासियों ने आर्केदियावासियों को छिन्न-भिन्न कर दिया था। और, दोस्तो, इस डर की हर वजह मौजूद है कि यदि हमने देवताओं की उपासना की ओर ध्यान नहीं दिया तो वे हमें एक बार फिर दो और टुकड़ों में बाँट देंगे और तब हम कब्र पर पड़े पत्थरों पर उकेरी टूटीफूटी आकृतियों की तरह
अधकटी नाक के साथ घूमते फिरते नज़र आएँगे।
इसलिए हम सब का यह कर्तव्य है कि हम अपने दोस्तों में श्रद्धा और भक्ति की भावना भरें, क्योंकि तभी हम अपनी रक्षा कर पाएंगे और प्रेम देवता की वाहिनी में अपना नाम लिखाकर और उनकी पताका के नीचे कदमताल करते हुए एक स्वर्गिक एकात्मता प्राप्त कर सकेंगे।
प्यार का कभी भी प्रतिरोध नहीं करना चाहिए- जैसा कि हम करते हैं, जब देवता हमसे नाराज़ हो जाते हैं। लेकिन यदि हम मैत्री और संधि में प्रेम के प्रति प्रतिबद्ध रहें तो हम उन कुछ सौभाग्यशाली लोगों में होंगे जो इन आख़िरी दिनों में अपने अर्धांश से मिलेंगे। अब, मैं इस पर एरिक्ज़िमेकस की कोई अभद्र टिपण्णी सुनना नहीं चाहता। मेरा आशय पासेनियस और अगथोन से नहीं है, हालाँकि जहाँ तक मुझे मालूम है इन दोनों की गिनती सौभाग्यशाली लोगों में हो सकती है और दोनों पुरुष के अर्द्धांश हो सकते हैं। परन्तु मैं यह कहने की कोशिश कर रहा हूँ कि पूरी मानव-जाति, जिसमें पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियाँ भी शामिल हैं, की ख़ुशी हमारे प्रेम की पूर्णता में ही है और हर व्यक्ति अपने सही साथी को पाकर ही अपनी खंडित प्रकृति का उपचार कर सकता है। यदि यह मशविरा केवल पूर्णता की आदर्श स्थिति के लिए ही उपयुक्त हो तो मौजूदा स्थिति में हमें वह करना चाहिए जो दूसरा सर्वोत्तम विकल्प है -यानी हमें उनपर अपना प्यार न्योछावर करना चाहिए जो हमारी प्रकृति के अधिक अनुकूल हों।
इसलिए मेरे विचार में प्रेम ऐसा देवता है जिसके प्रताप से यह सब संभव हुआ है। वह हमारे लिए स्तुत्य है, क्योंकि वही हमें अपने सच्चे सम्बन्ध की ओर ले जाने का अनमोल कार्य कर रहा है। वह हमारे लिए भविष्य की इस महती आशा का द्वार खोल रहा है कि यदि हम देवताओं की अर्चना में चूक न करें तो वह हमारा उपचार करेगा और हमें अपनी मौलिक अवस्था में ले जाएगा और हमें आनंद और स्वस्ति से भर देगा।
तो एरिक्ज़िमेकस, यही मेरी प्यार की स्तुति है - जो तुम्हारी स्तुति से उतनी ही अलग है जितनी हो सकती थी। मैं एक बार फिर तुमसे कहना चाहूँगा कि मेरी स्तुति का उपहास करना छोड़ दो और बाकी बचे महानुभावों से सुनो कि वे क्या कहते हैं। मैं तो देख रहा हूँ अगथोन और सुकरात को छोड़कर कोई और बचा भी नहीं है।
जैसी आपकी मर्ज़ी, एरिक्ज़िमेकस ने कहा, उपहास की कोई बात नहीं है। मुझे आपका भाषण बहुत अच्छा लगा। दरअसल,यदि मुझे यह मालूम नहीं रहता कि सुकरात और अगथोन, दोनों प्यार के सम्बन्ध में कितने अधिकारपूर्वक बोल सकते हैं, तो मुझे सचमुच आश्चर्य होता कि इतनी परिपूर्ण और विविधाताभरी वक्तृता के बाद उनके पास कहने के लिए क्या रह जाएगा। लेकिन, हम जानते हैं कि ये दोनों कैसे हैं और हमें इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे इस चुनौती में खरे उतरेंगे।
इस पर सुकरात ने कहा, एरिक्ज़िमेकस, तुम्हारे लिए यह सब कहना आसान है, क्योंकि अभी-अभी तुमने क्या खूब प्रदर्शन किया है, लेकिन यदि तुम मेरी जगह होते- और खासकर जब अगथोन बोलना समाप्त करेगा- तब तुम भी उसी प्रकार आशंकित हो जाते जैसे मैं हो गया हूँ।
परन्तु, सुकरात, अगथोन ने कहा, यह कहकर कि श्रोताओं को मुझसे कितनी बड़ी आशा है, तुम मुझे डराने की कोशिश कर रहे हो।
मेरे प्रिय अगथोन, सुकरात ने कहा, क्या मुझे यह याद नहीं है कि उस दिन तुम अभिनेताओं के साथ कितनी निश्चिन्तता और गरिमा के साथ मंच पर आए और कैसे तुमने दर्शकों के विशाल समुदाय की नज़रों से नज़र मिलाकर देखा और फिर भी तुम कितने शांत और प्रतिभा-प्रदर्शन के लिए पूरी तरह तैयार दिख रहे थे! इसके बाद क्या मैं इस बात पर यक़ीन करूँ कि तुम दो-तीन दोस्तों को देखकर फीके पड़ जाओगे?
लेकिन सुकरात, अगथोन ने विरोध किया, यह मत सोचो कि मुझे नाटकों का इतना शौक है कि मैं यह बात भूल जाऊँगा कि समझदार आदमी के लिए मूर्खों की भारी भीड़ के बजाय दो-चार बुद्धिमान व्यक्तियों की राय का ज्यादा महत्त्व है।
नहीं,नहीं, सुकरात ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा, मैं ऐसी ग़लती कभी नहीं कर सकता, प्रिय अगथोन, कि मैं यह मानूँ कि तुम्हारे विचार अनपढ़ लोगों के विचार जैसे हैं। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि जिसे तुम सचमुच बौद्धिक संगति मानते हो, उनके बीच जाने पर तुम भीड़ के बजाय उनकी प्रतिक्रिया से अधिक प्रभावित होगे। लेकिन हम यह दावा नहीं कर सकते कि हम तुम्हारे बौद्धिक अल्पसंख्यक हैं, क्योंकि कल हमलोग भी वहीँ थे, उसी भीड़ के अंश थे। लेकिन एक बात बताओ, यदि तुम किसी ऐसे समूह के बीच होते जिनके फैसले की तुम क़द्र करते तो क्या यह बात तुम्हें बुरी लगती कि वे तुम्हें कुछ ऐसा करते देखें जिसे तुम अशोभनीय समझते हो? क्या मैं सही हूँ?
बिलकुल, अगथोन ने कहा।
और, सुकरात ने कहा, यदि भीड़ ने तुम्हें उतना ही अशोभनीय कार्य करते देखा तो क्या तुम्हें बुरा नहीं लगेगा?
यहाँ पर फिदरस ने उन्हें टोका। मेरे प्रिय अगथोन, उसने कहा, यदि तुम सुकरात के सवालों का इसी तरह जवाब देते गये तो हमारे वाद-विवाद का क्या होगा? सुकरात को कोई ऐसा मिल जाए, जिसके साथ वह तर्क-वितर्क कर सके- खासकर यदि वह व्यक्ति सुदर्शन भी हो तो वह हमारे वाद-विवाद की थोड़ी भी परवाह नहीं करेगा। सुकरात के तर्कों को सुनने में मुझे भी आनंद मिलता है, लेकिन अध्यक्ष होने के नाते मेरा यह फ़र्ज़ है कि मैं इस बात पर जोर दूं कि हर आदमी पहले अपना भाषण दे। इसलिए मैं तुम दोनों से विनती करता हूँ कि पहले देवता के प्रति अपनी श्रद्धांजलि प्रस्तुत करो, उसके बाद जितनी मरज़ी हो तर्क-वितर्क करना।
फिदरस सही कह रहा है, अगथोन ने कहा, मैं बोलने के लिए पूरी तरह तैयार हूँ। सुकरात से तर्क-वितर्क किसी और भी दिन हो सकता है।
अपना भाषण आरम्भ करने के पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि यह भाषण किस प्रकार का होना चाहिए। मेरे विचार में अब तक हमें जिन वक्ताओं को सुनने का अवसर मिला है, उन्होंने प्यार की अच्छाइयों के लिए मानव-जाति को बधाई देने में ही इस तरह पूरी शक्ति लगा दी है कि वे देवता का गुणगान करना बिलकुल भूल गए। उन्होंने हमारे दैवी संरक्षक के स्वभाव का भी वर्णन नहीं किया। होना तो यह चाहिए था कि यदि हम किसी की बड़ाई करना चाहें, चाहे वह कोई भी हो और बड़ाई कैसी भी हो, तो उसका केवल एक ही तरीका है कि जिसकी बड़ाई हम करने जा रहे हैं, उसके स्वभाव
का बखान करें और उसके बाद उसके सुकर्मों के बारे में बताएँ। इसलिए दोस्तो, प्यारके सम्बन्ध में भी हमारा कर्तव्य है कि पहले हम बताएँ कि वह क्या है और बाद में इसका बखान करें कि वह क्या देता है।
इसलिए मैं यह कहते हुए अपना भाषण आरम्भ करता हूँ कि सभी देवता धन्य हैं, लेकिन पूरे आदर के साथ कहा जाए तो प्रेम देवता सबसे धन्य है, क्योंकि वह सबसे प्रिय और सर्वोत्तम है। मैंने उसे सबसे प्रिय इसलिए कहा है, क्योंकि फिदरस ,पहली बात तो यह है कि वह देवताओं में वह सबसे छोटा, सबसे युवा है, जो इस बात से सिद्ध होता है कि वह काल के विध्वंस से दूर-दूर भागता है। काल की गति अत्यंत प्रखर है- खासकर हम मर्त्य प्राणियों के लिए तो वह अत्यंत वेगवान है, लेकिन प्यार का जन्म वार्धक्य के शत्रु के रूप में हुआ है और इसलिए वह बुढ़ापे के लक्षण से दूर रहता है। वह हमेशा युवजनों की संगति चाहता है, क्योंकि वह स्वयं युवा है।
फिदरस के भाषण की अधिकतर बातों से मैं सहमत हूँ, लेकिन उसके इस विचार से असहमत हूँ कि प्रेम क्रोनस और आइएपितस से भी पुराना है। नहीं दोस्तो, मैं इस बात को दोहराता हूँ कि प्रेम अपने चिरंतन यौवन में सभी देवताओं से युवा है। जहाँ तक देवताओं की उन पुरानी कथाओं का सम्बंध है जिन्हें हमने हीसियद और पार्मेंदीज़ में पढ़ा है, हम दावे के साथ कह सकते हैं कि वे सारी कथाएँ यदि सच में विश्वसनीय हैं तो वे प्रेम से नहीं बल्कि आवश्यकता से उत्पन्न हुई हैं। क्योंकि यदि उन देवताओं के बीच प्रेम की मौजूदगी होती तो न तो उन्होंने एक दूसरे को क़ैद किया होता और न बधिया किया होता; उन्होंने हिंसा का बिलकुल सहारा नहीं लिया होता और वे आपस में उसी तरह शांति और मैत्री के साथ रहते, जैसा कि वे आज रहते हैं और जैसा कि वे उस समय से रह रहे हैं जबसे प्रेम उनका स्वर्गिक स्वामी बन गया है।
इससे यह स्पष्ट है कि वह युवा है और न केवल युवा, बल्कि सुकुमार है - इतना सुकुमार कि केवल होमर ही उसका वर्णन कर सकता है। क्या वह होमर ही नहीं था जिसने एते के बारे में लिखा है कि वह देव तुल्य थी और नाज़ुक भी- नाज़ुक पैरों वाली। वह कहता है-
उसके पैर इतने नाज़ुक हैं कि उन्हें वह धरती पर नहीं रखती,
बल्कि पंजों के बल लोगों के सिरों पर चलती है।
आप सहमत होंगे कि कठोर के बजाय कोमल पसंद करना सुकुमारिता की निशानी है। यही तर्क प्रेम की सुकुमारिता को भी दर्शाएगा, क्योंकि वह कभी भी जमीन पर नहीं चलता और न तो हमारे सिर पर- क्योंकि हमारे सिर भी तो बहुत कोमल नहीं हैं- बल्कि सम्पूर्ण प्रकृति में जो सबसे कोमल है, वह वहीँ रहता है और वहीँ चलता है। उसने देवताओं और मनुष्यों के स्वभाव में और उनके ह्रदय में अपना डेरा डाल रखा है - लेकिन बिना सोचे-विचारे नहीं, क्योंकि वह जिस ह्रदय में प्रवेश करता है यदि वह कठोर हो तो वह तुरंत वहां से उड़कर किसी कोमल ह्रदय में जा बसता है। इसलिए न केवल कोमल से कोमलतर स्थानों पर पदचाप रखनेवाला बल्कि कोमलतम स्थानों पर विराजमान प्रेम अत्यंत सुकुमार है।
इस तरह हम देखते है कि प्रेम पहले तो युवा है और फिर दुनिया में सबसे नाज़ुक है। तीसरी बात यह है दोस्तो, कि वह अत्यंत मुलायम और लचीला है, क्योंकि यदि उसमें थोड़ी भी अनम्यता होती तो वह हमें इतने अनंत चक्करों में कैसे डाल पाता और कैसे हमारे दिलों में चोरी-छुपे प्रवेश करता और उसी तरह अपनी मरज़ी से जब चाहे चला जाता!
उसका सौन्दर्य, जिसके पीछे दुनिया दीवानी है, उसके लचीलेपन और सुडौलपने के कारण ही है, क्योंकि प्रेम और कुरूपता कभी भी एक साथ शांतिपूर्वक नहीं रह सकते। फूलों के बीच जीवन बिताने के कारण उसमें रंगों की छटा है, क्योंकि प्रेम कभी भी ऐसी देह या आत्मा या किसी भी स्थल पर निवास नहीं करेगा , जहाँ प्रस्फुटित होने के लिए कोई कली न हो या जहाँ फूल खिल कर मुरझा गए हों। जो जगह फूलों से भरी हो और हवा में सुगंध हो, वहीँ वह विराजता है क्योंकि ऐसी जगहों पर देर-देर तक रहना उसे पसंद है।
मैं प्यार की ख़ूबसूरती के बारे में और कुछ नहीं कहूँगा - हालाँकि कहने को काफ़ी-कुछ बचा है। हमें अब प्रेम की नैतिक ऊँचाई पर विचार करना चाहिए - ख़ासकर इस बात पर विचार करना चाहिए कि वह न तो किसी देवता या आदमी से आहत होता है या उन्हें आहत करता है, क्योंकि प्यार चाहे किसी भी दौर से गुजरे, वह हिंसा से अछूता है और न तो वह अपना जादू चलाने के लिए बल-प्रयोग करता है। दुनिया किसी दबाव में आकर नहीं बल्कि ख़ुशी-ख़ुशी उसका अनुसरण करती है और जैसा कि हम जानते हैं आपसी सौहार्द्र में की गयी संधि को क़ानून की सर्वोच्च सत्ता भी न्यायोचित और सर्वोपरि मानती है।
प्रेम में नेकी के साथ-साथ भरपूर संयम भी है। मैं मानता हूँ कि यह बात सर्वविदित है कि संयम की परिभाषा उस शक्ति के रूप में की गयी है जो हमारी ख़ुशी और हमारी वासना को नियंत्रित करती है। हमारी कोई भी ख़ुशी या वासना प्रेम से अधिक प्रबल नहीं है। इसलिए यदि हमारी ख़ुशियाँ और वासनाएं प्रेम से कमजोर हैं तो प्रेम उनपर हावी रहेगा और उनका स्वामी बनेगा। इसीलिए हमारी ख़ुशियों और वासनाओं कोनियंत्रित करनेवाले प्रेम को संयम भी कहा जा सकता है।
जहाँ तक उसके बल का सम्बन्ध है, कवि ने अपने गीत में कहा है कि '' उसकी ताक़त के सामने ऐरीज़ भी नहीं टिक सका।" क्योंकि कथा इस प्रकार है कि ऐरीज़ ने प्रेम को बंदी नहीं बनाया, बल्कि प्रेम ने - एफ्रदायती के प्रेम ने - ऐरीज़ को बंदी बनाया था। बंदी बनानेवाला बंदी से ताक़तवर है और इसलिए सबसे ताक़तवर माने जानेवाले पर विजय हासिल कर प्रेम ने सिद्ध कर दिया कि वही सबसेअधिक बलवान है।
तो, दोस्तो, प्रेम की अच्छाई, उसके संयम और उसकी वीरता के सम्बन्ध में मैंने यह सब कहा। जहाँ तक उसकी प्रतिभा का सम्बन्ध है, मैं इस सम्बन्ध में समुचित न्याय नहीं कर पाऊंगा, फिर भी जो कुछ मुझसे संभव हो पा रहा है- वह कह रहा हूँ। यदि एरिक्ज़िमेकस की तरह मैं भी अपनी कला को महिमामंडित करना चाहूँ तो सबसे पहले मैं यह कहूँगा कि प्रेम अपने आपमें इतना बड़ा ईश्वरीय कवि है कि वह दूसरों के ह्रदय में भी कवित्व जागृत करता है, क्योंकि चाहे हम किसी भी मिटटी के बने हों, प्रेम के स्पर्श से हम सब कवि बन जाते हैं। इससेबड़ा प्रमाण और क्या होगा कि प्रेम एक ऐसा कवि है जो हर सर्जनात्मक कला में प्रवीण है, क्योंकि जो चीज आपके पास न हो आप उसके दाता नहीं बन सकते और यदि आप किसी कला में प्रवीण न हों तो आप उसे दूसरों को सिखा नहीं सकते।
इस बात से कौन इन्कार कर सकता है कि जिस सर्जनात्मक शक्ति के कारण सभी जीवों का जन्म और पालन-पोषण होता है वह प्रेम की ही प्रतिभा है। क्या हम यह नहीं देखते कि हर कला और हर शिल्प में यदि कलाकार और शिल्पकार इस देवता के मार्गदर्शन में कार्य करता है तो उसे महान ख्याति मिलती है, जबकि जिन पर प्रेम का प्रभाव नहीं रहता वे गुमनाम अँधेरे में खो जाते हैं। प्यार और चाहत के कारण ही अपोलो ने धनुर्विद्या, चिकित्सा और ज्योतिष की कला को जन्म दिया- और इसलिए अपोलो भी प्रेम का पुजारी था। इसी तरह म्यूज़ ने कला को जन्म दिया, हिफीस्तस ने लुहारी और पेलस ने करघे को जन्म दिया। स्वयं ज़्यूस ने देवताओं और मानव जाति पर शासन करने की कला सीखी। इस प्रकार देवताओं के कार्यों के पीछे जो प्रेरणा काम कर रही थी, वह प्रेम ही था - प्रेम यानी सौन्दर्य का प्रेम - क्योंकि जैसा कि हम जानते हैं प्रेम किसी प्रकार की कुरूपता के साथ समझौता नहीं करता। जैसा कि मैंने पहले ही चर्चा की, हमें यह बताया गया है कि आरम्भ में देवताओं के बीच अनेक प्रकार की अजीबोग़रीब और डरावनी घटनाएँ घटी थीं क्योंकि उन दिनों उनपर आवश्यकता का राज था, लेकिन इस युवा देवता के जन्म के बाद , प्रेम- जो भी मनोहर, रमणीय और प्रीतिकर है उसका प्रेम- देवताओं और मानवजाति पर समस्त प्रकार के वरदानों की वर्षा कर रहा है।
इसलिए, फिदरस, मैं मानता हूँ कि प्रेम न केवल अपने आप में अनुपम और सर्वोत्तम है, बल्कि अपने आसपास के सभी गुणों का रचयिता भी वही है। मैं अपनी बात पद्य में कहने के लिए उत्प्रेरित हो रहा हूँ कि कैसे प्रेम-
इस धरा पर शांति लाता है
ऐसी शांति- जैसे सांसें थम गयी हों,
जैसे कोई अंतर्मन की गहरी बेचैनी पर थपकियाँ दे रहा हो।
और यह हवाओं को शांत करता है
और हमें राहत पहुँचाने और हमारी पीड़ा पर मरहम लगाने के लिए
हमें नींद की सौगात देता है।
प्रेम ही है जो दुराव की जगह मैत्री लाता है; वही हमें ऐसी मित्रतापूर्ण गोष्ठियों में एकत्रित करता है। वही दावत में, नृत्य में और वेदी पर विराजमान है। वह लोगों को अदब सिखाता है और उनके भीतर से निष्ठुरता हटाता है। वह दया और करुणा बांटता है, विद्वेष नहीं। वह मिलनसार और शिष्ट है। उसे बुद्धिमानों की सराहना और देवताओं की बड़ाई मिली है। वह उसकी निराशा है जिसके पास वह नहीं है और उसकी ख़ुशी जिसके पास वह है। वह नज़ाक़त , सुकुमारिता, सुरुचि और सौष्ठव का, चाहत और लालसा का जनक है; अच्छाई की ओर सजग लेकिन बुराई से उदासीन, वह श्रम में या भय में, सुरापान में या संवाद में हमारा कर्णधार और सहायक है, हमारा मार्गदर्शक और रक्षक है; वह स्वर्ग और पृथ्वी दोनों का दिव्यतम आभूषण है और अन्त में मैं यह कहना चाहूँगा कि वह श्रेष्ठतम पथप्रदर्शक और सुदर्शन है। हम सबको उसका अनुसरण करना चाहिए और मर्त्य और अमर्त्य दोनों के हृदयों को चमत्कृत करनेवाले प्रेम के स्वर्गिक गान के साथ सुर में सुर मिलाकर हमें उसका जयघोष करना चाहिए। यही, मेरे प्रिय फिदरस, उसने कहा, मेरा भाषण है। प्रेम देवता के प्रति मेरा यही अर्पण है। मैंने एक साथ रोचक और शिक्षाप्रद बने रहने की पूरी कोशिश की है।
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