Wednesday, August 4, 2021

फिदरस (भाग तृतीय)

 प्लेटो 


सुकरात: जिस युवक से मैं बात कर रहा था, वह कहाँ है? उसे एक बार फिर मुझे सुनना होगा और प्रेमी के बजाय प्रेम न करने वाले का अनुरोध मानने के पहले उसे यह जानना होगा कि मैं क्या कह रहा हूँ।

 

फिदरस: वह युवक यहीं है, तुम्हारे निकट, तुम जहाँ भी उसे चाहो।


सुकरात: तो प्रिय युवक, तुम्हें यह ज्ञात होना चाहिए कि पिछला सम्भाषण माइरहिनस के निवासी पाइथोक्लेस के पुत्र फिदरस द्वारा दिया गया था, जबकि जो सम्भाषण अब मैं सुनाने जा रहा हूँ वह हिमेरा के निवासी यूफेमस के पुत्र स्टेसिकोरस द्वारा रचा गया है। सम्भाषण इस प्रकार है:


‘यह कहना मिथ्या है’ कि जब प्रेम करने वाला हो तो उसके बजाय प्रेम न करने वाले का अनुरोध इसलिए माना जाए, क्योंकि प्रेमी पागल होते हैं और प्रेम न करने वाले स्वस्थ और निरोग होते हैं। ऐसा कहना सही होता यदि यह एक अटल सत्य होता कि पागलपन एक बुरी बात है, लेकिन वास्तविकता यह है कि पागलपन के माध्यम से, विशेषतः ईश्वर प्रदत्त पागलपन के माध्यम से महानतम अनुग्रह प्राप्त होते हैं। डेल्फाई की भविष्यद्रष्टा और डोडोना की पुजारिनों ने उन्माद के दौर में जो ऊँचाई प्राप्त की, उसके प्रति यूनान के राज्य और नागरिक कितने कृतज्ञ हैं! जब उनपर उन्माद का दौर नहीं रहता था तो वे कुछ भी नहीं कर पाती थीं। सिविल और अन्य जादूगरनियों ने ईश्वर प्रेरित भविष्य-दर्शन के कारण अनेक बार अनेक लोगों का भविष्य बताकर उनका पथ-प्रदर्शन किया है। उनके बारे में जो जग-ज़ाहिर सत्य है, उसे मैं दोहराना नहीं चाहता।मैं केवल यह कहना चाहता हूँ कि प्राचीन काल में जिन्होंने वस्तुओं के नाम दिए हैं, वे पागलपन या उन्माद को शर्म या कलंक की बात नहीं मानते थे; अन्यथा  वे भविष्य जानने वाली महानतम कला को पागलपन से नहीं जोड़ते और उसे वर्तमान नाम नहीं देते। नहीं, वे यह मानते थे कि दैवी कृपा से पागलपन एक अनमोल वरदान है। इसलिए उन्होंने इस कला को ‘मैनिक’ कहा, जबकि आज के लोग, जिन्हें मूल्यों की पहचान नहीं है, एक अतिरिक्त अक्षर जोड़कर उसे ‘मैंटिक’ कहने लगें हैं। यह इस बात से भी प्रमाणित होता है कि उन्होंने उस कला को जिसमें लोग चिड़ियों और अन्य संकेतों के माध्यम से भविष्यवाणी करते थे ‘ओइनोइस्टिक’ का नाम दिया है, जिसकी व्युत्पत्ति बताती है कि भविष्यद्रष्टा को  भविष्य की सूचना पूर्णतया अपने मानवीय चिन्तन से प्राप्त होती थी ।तुम समझ सकते हो कि यह प्राचीन साक्ष्य किस ओर संकेत करता है। उन्होंने मात्र शकुन-अपशकुन बताने वाले के बजाय दैवी प्रेरणा से भविष्य दर्शन करने वालों की कला को नाम और वास्तविकता दोनों दृष्टि से उच्चतम माना था। दूसरी बात यह है कि जब कुछ परिवार किसी प्राचीन अपराध या पाप के कारण गम्भीर व्याधि और दुर्भाग्य की चपेट में आ जाते हैं, तो उनके बीच भी उन्माद प्रकट हुआ है और उन्माद के दौरान उन्हें यह ज्ञात हुआ है कि किस प्रकार की पूजा-अर्चना के माध्यम से शुद्धीकरण किया जा सकता है और वर्तमान और भावी ख़तरे से बचा जा सकता है। इस प्रकार जिस व्यक्ति पर पागलपन या उन्माद आता था, उसे उसके माध्यम से अपने कष्टों से मुक्ति मिलती थी।


उन्माद की एक तीसरी कोटि भी है जो हमें काव्य-कला की प्रेरणा देने वाली देवी से मिलती है। इस कोटि का उन्माद किसी सुकुमार निर्मल आत्मा पर हावी होता है और उसे विशेषतः गीति-काव्य के माध्यम से भावनापूर्ण अभिव्यक्ति करने के लिए प्रेरित करता है। ऐसा कवि अक्सर प्राचीन काल में घटित वीरतापूर्ण घटनाओं का बखान करता है , ताकि परवर्ती पीढ़ियों को प्रेरणा मिले। यदि कोई कवि यह सोचे कि वह इस दैवी प्रेरणा से प्राप्त उन्माद के बिना ही केवल काव्य- कौशल के सहारे कवि बन जाएगा, तो उसे निराशा हाथ लगेगी, क्योंकि उन्माद में लिखी कविता के सामने केवल काव्य-कौशल और चतुराई से लिखी कविता का कोई स्थान नहीं है।


तो दैवी प्रेरणा से प्राप्त उन्माद की उपलब्धियों की यही कहानी है, हालाँकि मैंने इसे पूरे विस्तार से बखान नहीं किया है। अत: हमें इस आधार पर कोई डर या भय नहीं होना चाहिए। हमें उस तर्क से प्रभावित नहीं होना चाहिए, जो हमें डराकर भावनाप्रधान व्यक्तियों से मित्रता करने से रोकता है और विचारप्रधान व्यक्तियों की संगति का समर्थन करता है। यह तर्क तभी मान्य होगा जब वह यह भी साबित कर पाएगा कि प्यार कोई ईश्वरीय सौग़ात नहीं है जो प्रेमी और प्रियपात्र दोनों के कल्याण के लिए भेजा जाता है। हमें ठीक इसके विपरीत यह साबित करना है कि प्रेम का पागलपन देवताओं से उपहार के रूप में प्राप्त होता है और उसमें मानव के लिए सर्वोत्कृष्ट वरदान छुपा हुआ है। इसके पक्ष में हम जो प्रमाण देंगे उससे, जो अपने आप को विद्वान समझते हैं, भले न सहमत हों, बुद्धिमान और विवेकशील अवश्य प्रभावित होंगे। 

इस सम्बन्ध में सत्य की खोज करने के लिए हमारा पहला क़दम यह होगा कि आत्मा का दैवी और मानवीय स्वभाव, उसके अनुभव और उसके क्रिया-कलाप समझे जाएँ।


तो हमारा प्रमाण इस प्रकार आरम्भ होता है।


सभी आत्माएँ अमर हैं, क्योंकि जो सर्वदा गतिमान रहता है, वह अमर है, लेकिन जो दूसरों में गति प्रेरित करते हुए स्वयं किसी और से गति प्राप्त करता है, उसकी गति रुक सकती है और इसलिए उसका जीवन रुक सकता है। केवल वह जो स्वयं-प्रेरित है, अपनी गति कभी नहीं छोड़ता, क्योंकि वह अपनी प्रकृति नहीं छोड़ सकता है। यह स्वयं-प्रेरित आत्मा ही सभी गतिमान चीज़ों का स्रोत है और सभी चीज़ों की गति का प्रथम सिद्धान्त है। अब प्रथम सिद्धान्त किसी और से उत्पन्न नहीं हो सकता, क्योंकि जो भी उत्पन्न होगा वह प्रथम सिद्धान्त से ही उत्पन्न होगा; स्वयं प्रथम सिद्धान्त किसी और से उत्पन्न हो तो वह प्रथम सिद्धान्त नहीं रह जाएगा। चूँकि यह उत्पन्न नहीं होता , इसलिए इसका नाश भी नहीं होगा; क्योंकि यदि प्रथम सिद्धान्त का विनाश हो जाए, तो उससे कुछ भी उत्पन्न नहीं होगा, न कोई चीज़ प्रथम सिद्धान्त को पुनः अस्तित्व में ला पायेगी, क्योंकि किसी भी अस्तित्व के लिए प्रथम सिद्धान्त की आवश्यकता है।

 

           अतः, स्वयं-प्रेरित ही गति का प्रथम सिद्धान्त है और इसका विनाश असम्भव है, जैसे इसका उदय भी असम्भव है। यदि ऐसा नहीं होता तो पूरी सृष्टि, जो अस्तित्व में आयी है, गतिहीन और जड़ हो जाएगी और उसे फिर से अस्तित्व में लाने के लिए कोई गति का स्रोत नहीं रहेगा।

      अब, चूँकि हमने यह देख लिया है कि जो स्वयं-प्रेरित है वह अमर है, तो हमें यह पुष्टि करने में कोई संकोच नहीं होगा कि आत्मा का सार, उसकी परिभाषा भी यही है अर्थात् वह आत्मप्रेरित है। यदि किसी देह की गति का स्रोत बाह्य है तो वह देह आत्माहीन है, लेकिन जो देह अपने अन्दर से ही गति प्राप्त करती है, वह ज़िन्दा और आत्मायुक्त है। इससे यह प्रमाणित होता है कि आत्मा की प्रकृति वही है, जिसका हमने अभी वर्णन किया।

 

और यदि आख़िरी वक्तव्य सही है, अर्थात् ‘जो अपने आप को गति प्रदान करता है’ वह आत्मा है, तो आत्मा का न जन्म होता है, न मृत्यु। 


आत्मा की अमरता के सम्बन्ध में तो हमने बहुत कुछ कहा, उसकी प्रकृति के सम्बन्ध में भी कुछ कहा जाना चाहिए। यह आत्मा किस प्रकार की चीज़ है, यह एक लम्बी कहानी होगी और सच तो यह है कि उसे केवल एक देवता ही कह पायेगा, लेकिन यह आत्मा किसके सदृश है इसे कोई इन्सान संक्षेप में बता सकता है। हम अपने सम्भाषण में कुछ ऐसा ही करने का प्रयास करेंगे। 

 

हम आत्मा की तुलना एक ऐसे रथ से कर सकते हैं जिसके सारथी और अश्व युगल पंखयुक्त हैं। सभी देवताओं के रथों के सारथी और अश्व उच्च कोटि के होते हैं, जबकि अन्य प्राणियों के रथों के अश्व और सारथी उतनी उच्च कोटि के नहीं कहे जा सकते। हम इन्सानों के मामले में यह कहा जा सकता है कि यहाँ सारथी को दोनों अश्वों को क़ाबू करना पड़ता है। इनमें से एक अश्व अच्छी नस्ल का है, नेक स्वभाव का है, जबकि दूसरा उसके ठीक विपरीत स्वभाव का है और उसकी नस्ल भी दूसरी है। यही वजह है कि हमारे सारथी का काम काफ़ी कठिन है और कष्टदायक भी।


अब हम यह कहने का प्रयास करेंगे कि प्राणी किस प्रकार नश्वर और अमर कहलाते हैं। सभी आत्माओं को सृष्टि के समस्त निर्जीव पदार्थों की ज़िम्मेदारी है और इसलिए वे पूरी सृष्टि का चक्कर लगाते हैं, हालाँकि नित नये रूपों में। जब वे सर्वगुणसम्पन्न और पंखयुक्त होते हैं, तो वे ऊँची उड़ान भर सकते हैं और ऊँचाई से पूरी दुनिया पर नियंत्रण रख सकते हैं। जब किसी आत्मा के पंख टूट जाते हैं तो वह आत्मा नीचे गिरने लगती है और वह तबतक गिरती जाती है जब तक कि उसकी पकड़ में कोई ठोस आधार न आ जाए। इस ठोस आधार पर स्थिर होकर आत्मा अपने लिए एक पार्थिव देह पाती है। यह देह आत्मा की शक्ति से ही गतिमान होती है। आत्मा और देह की यह संयुक्त रचना ही जीवित प्राणी कहलाता है और इस प्राणी को ‘मरणशील’ माना जाता है। जब लोग अमर प्राणी की बातें करते हैं तो उन बातों का कोई तार्किक आधार नहीं है। वस्तुतः अमर प्राणी के रूप में हम ऐसे देवता की कल्पना करते हैं जिसके पास आत्मा और देह का संयोग सर्वदा बना रहेगा। ऐसे देवता को हमने कभी देखा नहीं है और न इस संबंध में विस्तार से चिन्तन किया है। इस सम्बन्ध में सत्य क्या है, वह केवल ईश्वर जानता है। हाँ, हमें यह बात अवश्य जाननी चाहिए कि आत्मा के पंख क्यों टूटकर गिर जाते हैं। यह इस प्रकार है।


पंखों का स्वाभाविक गुण यह है कि वे भारी शरीर को ऊपर उठाते हैं और उसे उस ऊँचाई पर ले जाते हैं जहाँ देवताओं का निवास है। शरीर के किसी भी अन्य अंग की तुलना में पंखों में देवत्व की प्रकृति का अंश अधिक है। देवत्व सौन्दर्य, विवेक, अच्छाई और ऐसे ही अन्य अनेक गुणों का संगम है। इन गुणों से ही आत्मा की उड़ान भरने की क्षमता अर्थात् उसके पंख/डैने पोषण पाते है और मज़बूत होते हैं, जबकि उनके विरोधी गुणों से, कुरूपता और बुराई से वे दुर्बल और नष्ट हो जाते हैं। 


और अब, तुम यह दृश्य देखो कि किस प्रकार देवताओं का पराक्रमी नेता ज़्यूस अपने पंखयुक्त रथ को आकाश में उड़ा रहा है। सुरों और असुरों के समूह का अग्रणी होने के कारण वह सब चीज़ों की देखभाल करते हुए, उनमें सुव्यवस्था स्थापित करते हुए आगे बढ़ता है और देवताओं के नेतृत्व में विभिन्न दल उसका अनुसरण करते हैं। देवताओं के ऐसे ग्यारह दल हैं , क्योंकि बारह देवताओं में से एक हेस्टिया (गृहदेवी) देवताओं के निवास स्थान पर अकेली रह जाती है और बाक़ी ग्यारह देवता अपने पद-अनुक्रम के अनुसार  अपने-अपने दल का नेतृत्व करते हुए ज़्यूस के जुलूस में शामिल होते हैं। 


स्वर्ग के राजमार्ग पर आप अनेक दृश्य देख सकते हैं। वहाँ विभिन्न देवता अपने-अपने कार्य करते हुए इधर से उधर आते-जाते हैं। उनके पीछे वे जाते हैं, जो उनका अनुकरण कर पाते हैं, क्योंकि देवताओं के बीच ईर्ष्या नहीं होती। जब देवगण किसी उत्सव या भोज में शामिल होने जाते हैं, तो आप देख सकते हैं कि वे किस प्रकार उस मेहराब के उच्चतम शिखर तक चले जाते हैं, जिसपर स्वर्ग टिका हुआ है। उनके लिए इस ऊँचाई तक आरोहण आसान है, क्योंकि देवताओं के रथ संतुलित होते हैं और उनका पथ-प्रदर्शन आसानी से किया जा सकता है। इसके विपरीत, जो देवता नहीं हैं उनके लिए यह आरोहण अत्यन्त कठिन है, क्योंकि रथ के एक अश्व की दुष्टता के कारण रथ की गति बोझिल हो जाती है, बशर्ते सारथी ने उस अश्व को अच्छी तरह अनुशासित किया हो।

अब, इस स्थल पर आत्मा को सर्वाधिक परिश्रम और संघर्ष का सामना करना पड़ता है, क्योंकि जो आत्माएँ अमर कहलाती हैं वे जैसे ही शिखर पर पहुँचती हैं, वे विश्व के पृष्ठ भाग में खड़ी हो जाती हैं और परिक्रमा करता हुआ आकाश उन्हें अपने साथ परिक्रमा कराता है और वे स्वर्ग से परे का दृश्य देख पाती हैं।

स्वर्ग से परे उस दृश्य का वर्णन आज तक इस दुनिया के किसी कवि ने नहीं किया है और न किसी के पास उसका सही-सही वर्णन करने की क्षमता है। फिर भी हम कुछ हद तक इसका वर्णन कर सकते हैं, क्योंकि जो सच है उसे कहने के लिए हमें साहस करना होगा, ख़ासकर इसलिए क्योंकि यह सम्भाषण सत्य के सम्बन्ध में है। स्वर्ग से परे यह वह क्षेत्र है जहाँ सच्ची सत्ता का निवास है, जिसका न कोई रंग है न रूप, जिसे स्पर्श नहीं किया जा सकता। इसे केवल आत्मा का सारथी विवेक ही देख पाता है। सब सच्चा ज्ञान इसी सत्ता का ज्ञान है। जैसे किसी देवता का मन विवेक और ज्ञान से पोषण पाता है, वैसे ही आत्मा के लिए उपयुक्त आहार ज्ञान और विवेक ही है। यही कारण है कि जब आत्मा अन्ततः वास्तविक सत्ता का दर्शन कर लेती है तो वह सन्तुष्ट हो जाती है। इस सत्य पर विचार करते हुए उसे पोषण मिलता है और वह ऐश्वर्य से भर उठती है और इस स्थिति में वह स्वर्ग की पूरी परिक्रमा करती है। इस प्रक्रिया में वह समझती है कि न्याय क्या है, न्याय का मूल क्या है, संयम क्या है, ज्ञान क्या है—- वह ज्ञान नहीं जो परिवर्तनशील वस्तुओं और सत्ताओं से सम्बन्धित है, बल्कि वह ज्ञान जो मूल, वास्तविक और चरम सत्ता से सम्बन्धित है। इस प्रकार विचार करने के बाद और सच्ची सत्ता के विविध सौन्दर्य का रसपान करने के बाद वह फिर स्वर्ग में नीचे उतर आती है और अपने निवास पर वापस आ जाती है। आने के बाद सारथी अश्वों को नाँद के सामने लाता है और उसे अमृतपान कराता है।

 

तो देवताओं का जीवन इस प्रकार का है। अन्य आत्माओं में जो आत्मा देवताओं का उत्तम अनुकरण करती है, वह यथासम्भव देवता के सदृश हो जाती है। ऐसी आत्मा का सारथी स्वर्ग के बाह्य क्षेत्र की ओर देखने का भी प्रयास करता है और इस उद्देश्य से वह देवताओं के साथ स्वर्ग की परिक्रमा करता है; लेकिन अपने अश्वों से बाधित होने के कारण उसे सत्य का सम्पूर्ण दर्शन नहीं हो पाता।अनियंत्रित अश्वों के कारण उसे कोई अंश दिखता है और कोई अंश छिप जाता है। जहाँ तक बाक़ी बची आत्माओं का सम्बन्ध है, यद्यपि सभी ऊँचाई तक जाना चाहती हैं और देवताओं का अनुकरण करना चाहती हैं, परन्तु अक्षम होने के कारण वे ऐसा नहीं कर पाती हैं। उनके रथ ऊपर जाने का प्रयास करते हैं, लेकिन उनपर निम्नमुखी दबाव निरन्तर बना रहता और इसलिए वे एक दूसरे को रौंदने लगते हैं, कोई आगे बढ़ता है तो कोई दूसरा उसे पीछे धकेलता है। इसप्रकार अराजकता, हाथापाई और अत्यधिक थकान के कारण उनके सारथी अशक्त हो जाते हैं। उनमें से कई अपंग हो जाते हैं, कइयों के पंख टूट जाते हैं और सारी मेहनत के बावजूद उनमें से किसी को भी सच्ची सत्ता के दर्शन नहीं हो पाते हैं और उस स्थल से विदा होकर वे इस बात से ही संतुष्ट हो जाते हैं कि उन्होंने सत्य की एक झलक पायी है। 

आत्माएँ सत्य का दर्शन करने के लिए इतनी उतावली इसलिए रहती हैं, क्योंकि यह कहा जा सकता है कि उनका श्रेष्ठतम अंश सत्य की इसी भूमि से प्राप्त होता है और ऊँची उड़ान भरने के लिए उनके पंखों को भी पोषण इसी स्थल से प्राप्त होता है।

अब तुम एक अटल नियम की बात सुनो। जिस आत्मा ने किसी देवता के जत्थे का अनुकरण करते हुए सत्य को कुछ हद तक देखा और समझा है, उसे नयी परिक्रमा आरम्भ होने तक दुख से दूर रखा जाएगा और यदि वह हर परिक्रमा में ऐसा कर पाती है, तो वह सर्वदा दुखों और कष्टों से दूर रहेगी। लेकिन जो आत्मा देवताओं का अनुसरण नहीं कर पाती, उसे सत्य की कोई झलक नहीं मिलती है,बल्कि दुर्भाग्य से विस्मृति और दुष्कर्मों के बोझ के कारण उसके पंख नष्ट हो जाते हैं और वह पृथ्वी पर गिर जाती है। 

इस स्थिति में विधान इस प्रकार है। पहले जन्म में आत्मा किसी पशु योनि में नहीं जाएगी। जिस आत्मा को सत्य का अधिक साक्षात्कार हुआ है, वह एक ऐसे मानव शिशु में प्रवेश करेगी, जो बड़ा होकर ज्ञान अथवा सौंदर्य की खोज करेगा, कला और विद्या की देवी का अनुसरण करेगा और एक प्रेमी बनेगा। जिस आत्मा को सत्य का थोड़ा कम साक्षात्कार हुआ है, वह एक ऐसे राजा में निवास करेगी, जो क़ानून का पालन करता है अथवा वह किसी योद्धा में निवास करेगी। तीसरी श्रेणी की आत्मा किसी राजनेता, व्यापारी या कारोबारी में प्रवेश करेगी; चौथी,खिलाड़ी या व्यायाम के प्रशिक्षक या चिकित्सक में प्रवेश करेगी; पाँचवी को भविष्यवक्ता या रहस्यवादी पुजारी की ज़िन्दगी मिलेगी; छठी श्रेणी की आत्मा कवि या अनुकरणात्मक कलाकार होगी; सातवीं श्रेणी की आत्मा शिल्पी या किसान बनेगी; आठवीं श्रेणी शास्त्रार्थ या भाषणबाज़ी करेगी और नौवीं तानाशाह की ज़िन्दगी जिएगी।

इन सारे अवतारों में जो आत्माएँ नैतिक नियमों के अनुसार ज़िन्दगी जीएंगी, उनका भाग्य बेहतर होगा और जो नैतिक नियमों का पालन नहीं करेंगी उनके हिस्से दुर्भाग्य आएगा। जो आत्मा जिस जगह से आयी है, उस जगह वापस जाना चाहती है तो उसे दस हज़ार वर्ष लगेंगे, क्योंकि इससे कम समय में वह अपने पंख वापस प्राप्त नहीं कर पाएगी। इसका अपवाद केवल ऐसे लोगों की आत्माएँ हैं, जिन्होंने सच्चे मन से ज्ञान की साधना की है अथवा किसी प्रियपात्र के प्रति अपने प्रेम को ही अपनी साधना से जोड़ लिया है। ऐसी आत्मा , यदि हज़ार-हज़ार वर्षों की तीन परिक्रमाओं में हर बार दार्शनिक जीवन का ही चुनाव करती है, तो उसे तीन हज़ार वर्षों में ही पंख वापस मिल जाते हैं और वह उड़कर वापस चली जाती है। अन्य आत्माओं के मामले में उनके पहले जन्म के बाद उनका न्याय किया जाता है। न्याय के बाद कुछ लोगों को पाताल लोक में सुधार के उद्देश्य से दण्ड देने के लिए ले जाया जाता है, तो कुछ लोगों को स्वर्ग के किसी ख़ास क्षेत्र में ले जाया जाता है, जहाँ वे अपने पिछले जन्म के कर्मों के अनुसार जीवन जी सकें। एक हज़ार वर्ष बाद इन आत्माओं को और इन जैसी अन्य आत्माओं को अपनी दूसरी ज़िन्दगी चुनने का अवसर मिलता है। प्रत्येक आत्मा अपनी इच्छा के अनुसार चुनाव करती है। इसी समय किसी मनुष्य की आत्मा पशु के शरीर में प्रवेश करती है और किसी पशु की आत्मा, जो पहले मनुष्य थी, पुनः मनुष्य का जीवन पाती है। केवल ऐसी आत्माएँ ही मनुष्य की देह प्राप्त कर सकती हैं, जिन्होंने सत्य का दर्शन किया है, क्योंकि मनुष्य को यह समझ में आना चाहिए कि विचार क्या है अथवा कैसे तर्क-शक्ति के आधार पर अनेक धारणाओं से एक धारणा बनती है। मनुष्य की यह समझ उन पुराने दिनों की स्मृति है, जब हमारी आत्माएँ अपने-अपने देवताओं के साथ यात्रा करती थीं और उस समय उन्होंने उन चीज़ों को प्रत्यक्ष देखा था, जिनकी अब हम कल्पना करते हैं और जिनका वास्तविक अस्तित्व है।

अत: यह स्वाभाविक है कि केवल दार्शनिक की आत्मा ही अपने पंख पुनः वापस प्राप्त कर लेती है, क्योंकि यह आत्मा यथासम्भव अपनी स्मृति में हमेशा उन चीज़ों की संगति में रहती हैं, जो देवताओं को देवता बनाती हैं। अतः कोई मनुष्य यदि अपनी स्मृति का सदुपयोग करे और सर्वोत्तम रहस्यों का सम्पूर्ण साक्षात्कार करने का निरन्तर प्रयास करे तो वह और केवल वह ही पूर्णता की उपलब्धि कर पाएगा। ऐसा मनुष्य मानव समाज की व्यस्तताओं से अलग रहता है और ईश्वर के निकट रहने का प्रयास करता है। लोग उसकी हँसी उड़ाते हैं, क्योंकि वे नहीं जानते कि उसपर किसी देवता का अधिकार है।

अब आप हमारे सम्भाषण के सार तत्व पर ध्यान दें—- यह चौथे प्रकार का पागलपन है, जो मनुष्य पर ईश्वरीय स्वामित्व का सुन्दरतम रूप है।  यह स्रोत और माध्यम दोनों के लिए श्रेयस्कर है—- उसके लिए भी जिसपर यह पागलपन हावी है और उसके लिए भी जो इस पागलपन के माध्यम से अपना संदेश प्रेषित करता है। जब किसी सौन्दर्य-प्रेमी को इस पागलपन का स्पर्श होता है तो वह प्रेमी बन जाता है। ऐसा व्यक्ति जब इस दुनिया का सौन्दर्य देखता है, तो उसकी सच्चे सौन्दर्य की स्मृति जग जाती है और उसकी आत्मा के पर उगने लगते हैं; वह बार-बार अपने पंख फैलाकर उड़ने की कोशिश करता है, लेकिन उसके पंख उड़ने में सक्षम नहीं हो पाये हैं। फिर भी एक पक्षी की तरह उसकी दृष्टि ऊपर की ओर टिकी रहती है और वह नीचे की दुनिया की कोई परवाह नहीं करता। यही वजह है कि लोग उसे विक्षिप्त मानते हैं।

अब, जैसा कि हमने कहा है, हर मानवीय आत्मा की प्रकृति ऐसी है कि उसने अतीत में सच्ची सत्ता का मनन किया है, अन्यथा उसे मानव-देह नहीं मिलती। परन्तु इस दुनिया की चीज़ों को देखकर सच्ची सत्ता का स्मरण हो जाए, यह सभी आत्माओं के लिए सुलभ नहीं है। कुछ आत्माओं ने तो सच्ची सत्ता का केवल एक पल के लिए दर्शन किया है और कुछ आत्माएँ धरती पर गिरने के बाद बुरी संगति में फँस गयीं और दुष्कर्म करने लगीं। उन्होंने जिन पवित्र चीज़ों का दर्शन किया था वे विस्मृत हो गयीं। कुछ आत्माएँ ऐसी अवश्य हैं जिन्हें कुछ याद है, लेकिन जब वे यहाँ की चीज़ों में वहाँ की चीज़ों का कुछ सादृश्य देखती हैं, तो वे आश्चर्य-चकित होकर सुधबुध खो बैठती हैं और चूँकि उनकी स्मृति धुँधली है तो वे यह नहीं समझ पातीं कि उन्हें ऐसा अहसास क्यों होता है।

अब , इस पृथ्वी पर न्याय, संयम और आत्मा के अन्य गुणों में स्वर्गिक गुणों की तुलना में कोई चमक नहीं रहती है; वस्तुतः उनको देखने परखने की हमारी इन्द्रियाँ इतनी निस्तेज हैं कि बहुत कम लोग उनमें स्वर्गिक गुणों की छवि देख पाते हैं। केवल सौन्दर्य के मामले में ऐसा नहीं हुआ।

जब ज़्यूस की अगुवाई वाले जत्थे में शामिल होकर हमें और अन्य देवताओं के अनुसरण में अन्य लोगों को उन दिनों दिव्य दर्शन का अवसर मिला था तो हमने अपनी आँखों से समस्त आभा के साथ जिसका परिपूर्ण दर्शन किया था, वह सौन्दर्य ही था। उस समय हमारे लिए उस रहस्य पर से पर्दा हटाया गया, जो अन्य सभी रहस्यों की तुलना में दिव्यतम माना जाता है। उस रहस्य में शामिल होने वाले हम सम्पूर्ण और निष्पाप थे। हमें उन बुराइयों का स्पर्श नहीं हुआ था, जो आने वाले दिनों में हमें आक्रान्त करने वाली थीं। इसी प्रकार अन्तिम रहस्योद्घाटन के क्षणों में हमने जो दृश्य देखा था, वह भी सम्पूर्ण और दोषरहित था। उसमें किसी भी कृत्रिमता का मिश्रण नहीं था। हमारे चारों ओर एक पवित्रता का आलोक था और हम भी पावन थे, क्योंकि तब तक हमें इस बन्दीगृह का दाग नहीं लगा था, जिसे हम देह कहते हैं, जिसमें हम उसी तरह बन्द कर दिये गये हैं, जैसे एक सीपी शंख में बन्द रहती है।

तो आज हमने जो कुछ कहा है, वह उस स्मृति के प्रति हमारी श्रद्धांजलि है, जिसने हमें प्राचीन आनन्द की याद दिलायी है और जिसके लिए हमारे मन में उत्कट अभिलाषा है। अब, जैसा कि हमने कहा है, उन दिनों देखे गये दृश्यों में सौन्दर्य के दृश्य सर्वोच्च आभा से युक्त थे और यहाँ, नीचे, इस दुनिया में भी हम इन्हें अपनी सबसे प्रखर इन्द्रिय से ग्रहण करते हैं, क्योंकि हमें देह के माध्यम से बाह्य दुनिया से सम्पर्क करने के लिए जो इन्द्रियाँ प्राप्त हुई हैं, उनमें सबसे प्रखर आँखें ही हैं। यह सच है कि हम इस इन्द्रिय की सहायता से ज्ञान का दर्शन नहीं कर सकते। हमारी उत्कट अभिलाषा रही है कि हम ज्ञान को अपनी आँखों से देखें, लेकिन अभी तक हमें इसमें सफलता नहीं मिली है। केवल सौन्दर्य का ही हम दर्शन कर पाते हैं, क्योंकि सौन्दर्य की रचना इस रूप में की गयी है ताकि वह हमारी इन्द्रियों के समक्ष प्रकट हो सके और इसलिए वह हमारे लिए सबसे प्रीतिकर है।

अब, जिस व्यक्ति को उस रहस्य का दर्शन किये हुए लम्बा समय बीत गया है या जिसकी पवित्रता नष्ट हो गयी है, वह जब इस दुनिया में उस वस्तु का दर्शन करता है, जिसे यहाँ सुन्दर कहा जाता है, तो उसे यहाँ के सौन्दर्य को देखकर तुरन्त स्वर्गिक सौन्दर्य की याद नहीं आती है और इसलिए उसके मन में सौन्दर्य के प्रति कोई सम्मान और समर्पण का भाव उत्पन्न नहीं होता है, बल्कि सुख-भोग की लालसा जन्म लेती है और वह चौपायों का अनुकरण करते हुए सन्तानोत्पत्ति की ओर अथवा बिना किसी शर्म या लिहाज़ के अप्राकृतिक स्वेच्छाचारिता की ओर आकृष्ट होता है। इसके विपरीत जिस व्यक्ति को उस रहस्य के दर्शन की ताज़ा स्मृति है तथा जिसने उस दृश्य के अपेक्षाकृत बृहत्त्तर अंश का दर्शन किया था, तो जब वह किसी देवतुल्य मुखाकृति को देखता है या उसके समक्ष ऐसी रूपाकृति आती है जो सौन्दर्य की सच्ची अभिव्यक्ति है, तो सबसे पहले उसके सम्पूर्ण शरीर में एक सिहरन उत्पन्न होती है और उसका हृदय विस्मय और भय से उसी तरह भर जाता है, जैसा उस रहस्य के दर्शन के क्षणों में हुआ था। इसके बाद उसके मन में आदर और समर्पण का भाव उत्पन्न होता है, जैसा किसी देवता के दर्शन के समय होता है। यदि उसे यह डर न हो कि लोग उसे पूरी तरह पागल समझेंगे, तो वह अपने प्रियतम की उसी प्रकार पूजा करता, मानो वह किसी देवता की प्रतिमा हो। इसके बाद शरीर में सिहरन थम जाने के बाद, एक अनोखी उत्तेजना और ज्वर की अनुभूति होती है, क्योंकि प्रेमी की आँखों के रास्ते जब सौन्दर्यधारा प्रवेश करती है, तो उस सौन्दर्य के ताप से उसकी आत्मा के परों को नयी ज़िन्दगी मिलती है, उनकी जड़ें भींग जाती हैं, जो लम्बे अरसे से इतनी शुष्क हो गयी थीं कि उनमें कुछ भी उत्पन्न नहीं हो सकता था। जैसे ही जड़ों को पोषण मिलता है, पंखों की नसें तेज़ी से बढ़ने लगती हैं और वे पूरी आत्मा में फैल जाती हैं, क्योंकि पूर्व अवस्था में पूरी आत्मा पंखों से भरी रहती थी। इस बीच आत्मा अपने हर हिस्से में एक अजीब तरह की बेचैनी महसूस करती है। जैसे एक दुधमुँहा बच्चा दाँत आने के पहले अपने मसूड़ों में दर्द महसूस करता है, वैसे ही जिस व्यक्ति की आत्मा में पंख आने लगते हैं, उसे जलन और उत्तेजना महसूस होती है। यही कारण है कि जब वह अपने प्रियतम के सौन्दर्य को निहारती है तो सौन्दर्य किरणों की धारा उसमें प्रवेश करती है और हम कहते हैं कि आत्मा प्रेम रस में डूब गयी है। इस प्रेमरस का पान करने के बाद ही आत्मा को चैन मिलता है और वह आनन्दविभोर हो जाती है। इसके विपरीत जब वह अपने प्रियतम से बिछुड़ती है तो वह शुष्क हो जाती है और जिन स्थलों पर पंख पनप रहे होते हैं, वे भी शुष्क हो जाते हैं और पंखों के अंकुर के ऊपर सूखी पपड़ी जम जाती है। इस पपड़ी के नीचे प्रेम वेदना के कारण यह इस तरह धड़कती है, जैसे किसी ज्वरग्रस्त इन्सान की नाड़ी हो। उस स्थल पर आत्मा को एक टीस का अनुभव होता है और वह दर्द और पीड़ा से बेचैन हो जाती है, लेकिन जैसे ही उसे अपने प्रियतम के सौन्दर्य की याद आती है तो उसका मन एक बार फिर आनन्द से भर उठता है। इस प्रकार आनन्द और वेदना के बीच उलझी आत्मा कुछ इस तरह परेशान रहती है कि उसे यह भान नहीं रहता है कि उसके साथ क्या हो रहा है। उसके ऊपर एक दीवानगी छायी रहती है, जो उसे रात में सोने नहीं देती, न दिन में चैन से रहने देती है। वह यहाँ वहाँ बेचैन दौड़ती फिरती है, ताकि उसे उसका दर्शन हो सके, जिसमें सौन्दर्य का निवास है। आख़िरकार जब उसे अपने प्रियतम का दर्शन मिलता है, और उसपर सौन्दर्य की वर्षा होती है, तब जाकर उसे अपने दर्द, पीड़ा और टीसों से मुक्ति मिलती है। उसे उस समय वह आनन्द मिलता है, जिसकी मधुरता अतुलनीय है। वह इस आनन्द से कभी भी स्वेच्छापूर्वक अलग होना नहीं चाहती। उसके हृदय में प्रियतम के सौन्दर्य का सर्वोच्च स्थान है। वह माँ, भाई, मित्र—- सबको भूल जाती है। न उसे इस बात की चिन्ता रहती है कि वह अपनी लापरवाही के कारण दुनियावी दौलत गँवा सकती है। पहले वह अपने आचार-व्यवहार के तरीक़ों पर या अपनी जीवन शैली पर गर्व महसूस करती थी, लेकिन अब वह उनकी परवाह नहीं करती। वह अपने प्रियतम के निकट रहने के लिए किसी भी तरह का दासत्व स्वीकार करने के लिए तैयार रहती है, क्योंकि प्रियतम के सौन्दर्य के प्रति तीव्र आकर्षण के साथ-साथ उसे यह भी अहसास है कि उसकी मर्मान्तक पीड़ा का इलाज भी उसके प्रियतम के पास ही है।

तो, मैं जिस प्रिय युवक से बात कर रहा हूँ, वह मेरी बात पर ग़ौर करे। लोग इस अहसास को प्यार (इरोस) का नाम देते हैं, लेकिन देवगण इसे क्या कहते हैं, यदि तुम जानो तो सम्भवतः इसके अनोखेपन पर तुम्हें विस्मय होगा। होमर के साहित्य के कुछ जानकारों ने होमर की अप्रकाशित रचनाओं में से एक पद्य का उल्लेख किया है, जो प्यार से सम्बन्धित है। इस पद्य की दूसरी पंक्ति ध्यान देने लायक़ है, हालाँकि यह छन्द के नियमों के अनुसार थोड़ी असंगत है। पद्य इस प्रकार है:

मानव इसे इरोस कहते हैं,

पर देवता प्तेरोस कहते हैं;

यह सही है, क्योंकि प्यार के लिए

इरोस को अपने आप में

पंख उगाने होते हैं।

अब यह तुम्हारी मर्ज़ी पर है कि तुम इन बातों पर यक़ीन करो या न करो; लेकिन हर स्थिति में प्रेमी के अनुभवों की प्रकृति और उनका मूल कारण वही है, जैसा मैंने वर्णन किया है।

अब यदि प्रेम का अवतरण उस व्यक्ति पर हुआ है, जो पहले ज़्यूस के जत्थे में शामिल था, तो वह इस पंखयुक्त देवता के भार का वहन धैर्यपूर्वक करेगा, लेकिन जो एरिस देवता के अनुयायी थे और जिन्होंने उनके जत्थे में शामिल होकर स्वर्ग की परिक्रमा की थी, तो उनपर जब प्रेम का अवतरण होता है तो वे सोचते हैं कि उनका प्रियतम उन्हें चोट पहुँचा रहा है। ऐसे लोग ख़ून बहाएंगे और अपना और अपने प्रियतम का बलिदान करने से नहीं हिचकेंगे। इस प्रकार हर प्रेमी अपने जीवन में उसी देवता का अनुकरण करता है, जिसकी कभी उसने संगति की थी। वह जब तक निष्कलुष रह पाता है तब तक पृथ्वी पर अपने पहले जन्म के दौरान अपने आराध्य देव का ही यथासम्भव अनुसरण करता है। वह अपने जीवन में उसी देवता को प्रतिष्ठा देता है और अपने प्रियतम और अपने अन्य मित्रों के प्रति आचरण में भी वह अपने आराध्य देव का ही ध्यान रखता है। इस प्रकार प्रत्येक प्रेमी अपने स्वभाव के अनुसार प्रियतम का चुनाव करता है, मानो प्रियतम उसके देवता की प्रतिमा हो जिसे उसने पूजा-अर्चना के लिए सजाया सँवारा है। 

यह देखा गया है कि ज़्यूस के अनुयायी ऐसे प्रियतम की तलाश में रहते हैं, जिसकी आत्मा ज़्यूस जैसी हो; वे ऐसे प्रियतम को खोजते हैं जो स्वभाव से ज्ञान-पिपासू हैं और जो मनुष्यों का नेतृत्व करना चाहते हैं। ऐसे लोग जब किसी में इन गुणों को देखते हैं तो उसे उन्हें प्यार हो जाता है और वे अपने प्रियतम में इन गुणों को और विकसित करने के लिए अपनी क्षमता के अनुरूप पूरा प्रयास करते  हैं। यदि उन्होंने कभी पहले इस पथ का अनुसरण नहीं किया है तो वे स्वयं खोज करके अथवा किसी अन्य स्रोत से जानकारी लेकर इस पथ पर आगे बढ़ते हैं। चूँकि उनके अन्तरतम में उनके देवता की प्रकृति की छाप रहती है, उनके लिए यह कार्य अपेक्षाकृत आसान होता है, क्योंकि स्वभावतः उनकी दृष्टि अपने देवता पर टिकी रहती है। वे अपने देवता का निरन्तर स्मरण करते रहते हैं और इस प्रकार वे देवता के अधीन हो जाते हैं और अपने जीवन के सभी तौर-तरीक़ों में देवता का ही अनुसरण करते हैं। इस प्रकार एक मनुष्य के लिए जिस सीमा तक अनुकरण करना सम्भव है, वे देवता का अनुकरण करते हैं; परन्तु ध्यान रहे कि अपने आचरण का श्रेय वे देवता को नहीं, बल्कि अपने प्रियतम को देते हैं। उन्हें ज़्यूस से जो कुछ प्राप्त हुआ है वे उन्हें अपने प्रियतम की आत्मा में आरोपित करते हैं। वे वस्तुतः प्रियतम के रूप में अपने आराध्य देव के निकटतम सादृश्य की रचना करते हैं। 

जो हेरा के जत्थे में शामिल थे, वे राजसी स्वभाव वाले व्यक्ति की तलाश में रहते हैं और जब उन्हें ऐसा व्यक्ति मिल जाता है तो उनकी ओर वे इस प्रकार आकृष्ट होते हैं और इस प्रकार आचरण करते हैं मानो उन्हें देवता मिल गया हो। इसी प्रकार अपोलो और अन्य देवताओं के अनुयायियों के बारे में भी यही बात कही जा सकती है। हर प्रेमी की लालसा रहती है कि उसका प्रियतम उसके देवता के स्वभाव वाला हो और जब वह अपने प्रियतम का दिल जीत लेता है, तो वह उसे अपने देवता का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करता है। ऐसे प्रेमी के आचरण में क्षुद्र ईर्ष्या या विद्वेष का कोई स्थान नहीं रहता है। उसके हर कार्य का उद्देश्य प्रियतम को अपने और अपने आराध्य देव के निकट लाना है।

इस प्रकार प्रेम के इस रहस्यमय अनुष्ठान में सच्चे प्रेमियों का प्रयास महान और कल्याणकारी कहलाता है, बशर्ते वे उसी प्रकार प्रयास करें जैसा मैंने वर्णन किया है और प्रेम से प्रेरित पागलपन के कारण उनके बीच पारस्परिक प्रीति उत्पन्न हो गयी हो। इसके लिए आवश्यक है कि प्रियतम को अपने वश में किया जाए और यह कैसे होता है, इसका वर्णन मैं अब करूंगा।

अपनी कथा के आरम्भ में हमने प्रत्येक आत्मा के तीन अंग बताये हैं- दो अश्वों जैसे हैं और एक सारथी जैसा। अस्तु! हमने यह भी बताया था कि दो अश्वों में एक अच्छा है और एक बुरा, लेकिन हमने अच्छे अश्व की अच्छाई या बुरे अश्व की बुराई का वर्णन नहीं किया है। अब हम वही करने जा रहे हैं। जो अश्व श्रेष्ठ है, वह सरल और स्वच्छ है; उसके सारे अंग सुडौल हैं; उसकी गर्दन ऊँची और नासिका उन्नत है; उसका वर्ण सफ़ेद है और आँखें काली हैं। वह यश और प्रतिष्ठा का प्रेमी है, लेकिन संयमित और विनम्र है। वह सच्चा सुनाम चाहता है। उसे चलाने के लिए चाबुक की ज़रूरत नहीं पड़ती, बल्कि वह सारथी के आदेश से ही चल पड़ता है। दूसरा अश्व कुटिल और वक्र है; उसकी गर्दन छोटी और मोटी है, नाक चिपटी, त्वचा काली और आँखें सलेटी हैं। वह तुनकमिजाज और मनमाने स्वभाव का है। उसके कान रोएँदार हैं और लगभग बहरा है। उसे चाबुक मारकर या पैने चुभाकर भी वश में लाना कठिन है। 

अब, जब सारथी प्रियतम को देखता है तो पूरी आत्मा में एक गरमाहट फैल जाती है। इसके साथ ही उसके अन्दर कामना की चुभन होने लगती है।  जो आज्ञाकारी अश्व है वह सदा की तरह शर्म-हया और संकोच के कारण प्रियतम पर झपट्टा नहीं मारता, लेकिन दूसरा अश्व सारथी के चाबुक की परवाह किये बग़ैर ज़ोरों की छलांग लगाकर प्रियतम के ऊपर झपटता है और अपने सारथी और संगी अश्व को मुसीबत में डालते हुए उन्हें बाध्य करता है कि वे भी प्रियतम की ओर आगे बढ़ें और उन्हें भी प्रियतम के साथ मिलन के आनन्द की याद दिलाता है। कुछ देर तक तो सारथी और सफ़ेद अश्व काले अश्व की कुप्रेरणा का प्रतिरोध करते हैं, लेकिन अन्ततः अपनी दयनीय हालत से छुटकारे की कोई तरकीब न पाकर वे काले अश्व की बात मान लेते हैं। इस प्रकार काला अश्व सारथी और सफ़ेद अश्व को आगे बढ़ने के लिए बाध्य करता है। जब वे प्रियतम के निकट पहुँच जाते हैं, तो उसके सौन्दर्य को देखकर सारथी को स्वर्गिक सौन्दर्य की याद आ जाती है और उसे यह भी याद आता है कि उसके प्रियतम का सौन्दर्य संयम की पवित्र मर्यादा में बँधा हुआ है। इस स्मृति के जगने के साथ ही सारथी विस्मय और श्रद्धा से अपनी सुध-बुध खो बैठता है और चारों खाने चित्त होकर गिर जाता है। इस क्रम में वह अपनी लगाम इतने ज़ोर से खींचता है कि दोनों अश्व अपने घुटनों पर आ जाते हैं। सफ़ेद अश्व इसका विरोध नहीं करता है, लेकिन काला अश्व भुनभुनाने लगता है। चूँकि वे अपने प्रियतम से थोड़ी दूर पर ही हैं, अच्छे अश्व की आत्मा शर्म-संकोच और भय से द्रवित हो जाती  है, जबकि दूसरा अश्व अचानक रुकने और घुटनों के बल गिरने से हुई पीड़ा से उबरते हुए सारथी और संगी को कोसता है, उन्हें कायर, धोखेबाज़, भगोड़ा कहता है। एक बार फिर वह उन्हें आगे बढ़ने के लिए कहता है, लेकिन वे उसे थोड़ी देर ठहरने के लिए कहते हैं, जिसे वह भुनभुनाते हुए मान लेता है। थोड़ी देर बाद ही काला अश्व लगाम खींचकर, हिनहिनाकर, उछल-कूद कर सारथी और सफ़ेद अश्व को याद दिलाता है कि अब फिर से आगे बढ़ने का वक़्त आ गया है। वह उन दोनों को प्रियतम की ओर आगे बढ़ने के लिए मजबूर करता है और जब वे नज़दीक जाते हैं, तो काला अश्व अपना सिर झुकाकर और पूँछ फैलाकर, लगाम की मुखरी को दाँतों से काटते हुए बेशर्म होकर आगे कूदता है। सारथी इस पर पहले से भी अधिक आवेग से प्रतिरोध करता है । वह स्वेच्छाचारी अश्व की लगाम को ज़ोरों से खींचता है, जिससे उसके जीभ और जबड़े लहुलुहान हो जाते हैं और वह दर्द से छटपटाते हुए अपने घुटनों के बल झुक जाता है। 

यह सब बार-बार तब तक होता है, जब तक बुरा अश्व अपनी पराजय स्वीकार कर स्वेच्छाचारिता छोड़ने के लिए मजबूर न हो जाये । जब बुरा अश्व यह देखता है कि उसका प्रियतम भय से मृतप्राय हो गया है, तो वह सारथी के आदेश को मानने के लिए तैयार हो जाता है। इस प्रकार प्रेमी की आत्मा अन्ततःविस्मय और श्रद्धा से भरपूर होकर प्रियतम का अनुसरण करने लगती है।

इस प्रकार देवतुल्य प्रियतम उस प्रेमी से, जो प्रेम का दिखावा नहीं, बल्कि पूरी निष्ठा के साथ सच्चा प्यार करता है, उसकी सभी सौग़ातों को स्वीकार करता है। ऐसा हो सकता है कि अतीत में उसके मित्रों ने उसे सलाह दी हो कि उसे किसी प्रेमी के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए और इसलिए उसने आरम्भ में प्रेमी की पहल का विरोध किया हो,लेकिन समय गुज़रने के साथ उसमें परिपक्वता आती है और उसकी नियति भी उसे प्रेमी का साहचर्य स्वीकार करने के लिए बाध्य करती है, क्योंकि नियति किसी बुरे इन्सान को अच्छे इन्सान का मित्र नहीं बनाती और न ही किसी अच्छे इन्सान को दूसरे अच्छे इन्सान की मैत्री से वंचित करती है। 

अब, जब प्रियतम अपने  प्रेमी का स्वागत करता है और उसके साहचर्य में, उससे बातचीत करने में उसे ख़ुशी मिलती है तो उसे पता चलता है कि उसके प्रेमी में कितनी करुणा है। उसका हृदय यह पाकर विस्मय से भर जाता है कि उसका प्रेमी उसे जो दे सकता है, उसकी तुलना में उसके अन्य सभी मित्र और सम्बन्धी कुछ भी नहीं दे सकते, क्योंकि उसके प्रेमी में किसी देवता का निवास है। और इस प्रकार, जब प्रियतम अपने प्रेमी के साथ अपना समय बिताता है, क्रीड़ास्थल और अन्य जगहों पर प्रेमी के साथ-साथ डोलता है , तो प्रसन्न होकर ज़्यूस, जो स्वयं गैनिमिड का प्रेमी है, प्रेमी के ऊपर प्रेम की रस-वर्षा करता है, जिसका कुछ अंश तो प्रेमी अपने भीतर समाहित करता है, लेकिन सम्पूर्ण रस-धारा को पूरी तरह आत्मसात करने में असमर्थ होने के कारण रस का बाक़ी अंश उसके बाहर छलकने लगता है। जैसे कोई हवा या प्रतिध्वनि किसी चिकनी और सख़्त सतह से टकराकर वापस अपने उद्भव-स्थल की ओर चली जाती है, उसी प्रकार सौन्दर्य की रस-धारा वापस सुन्दर प्रियतम की आँखों में प्रवेश करती है। इस प्रकार वह रस-धारा सहज प्राकृतिक मार्गों से होकर प्रियतम की आत्मा में उतरती है और उसे एक नयी ताजगी प्रदान करती है, आत्मा के पंखों की जड़ों का सिंचन करती है, जिससे वे पंख तेज़ी से बढ़ने लगते हैं और इस प्रकार प्रियतम की आत्मा भी प्रेम से भर जाती है। प्रियतम प्यार करता है, लेकिन वह नहीं जानता कि उसे किससे प्यार है; उसकी समझ में नहीं आता और न वह कह सकता है कि उसे क्या हुआ है। जैसे किसी की आँख किसी और की आँखों की बीमारी से संक्रमित हो जाती है, उसे समझ में नहीं आता कि यह सब कैसे हुआ है और कैसे वह अपने प्रेमी की आँखों में अपना प्रतिबिम्ब देखने लगता है। जब उसका प्रेमी उसके साथ होता है तो उसे भी उसी तरह चैन मिलता है, जैसे उसके प्रेमी को; जब वह उसके पास  नहीं होता है, तो वह भी वैसे ही तड़पता है, जैसे उसका प्रेमी; जैसे प्रेमी के हृदय में प्रेम का निवास है , वैसे ही उसके हृदय में भी प्रेम की प्रतिच्छाया है, जिसे वह प्यार नहीं, बल्कि दोस्ती का नाम देता है। उसके भीतर भी कामना उत्पन्न होती है, हालाँकि उसकी कामना अभी उतनी तीव्रतर नहीं हुई है, जितनी प्रेमी की। वह भी प्रेमी को देखने, सुनने, उसे छूने, चूमने और उसके साथ लेटने के लिए आतुर रहने लगता है और यही आतुरता दोनों को मिलन के लिए प्रेरित करती है।

जब वे एक दूसरे की बग़ल में लेटे रहते हैं तो प्रेमी की आत्मा का स्वेच्छाचारी अश्व सारथी से कहता है कि उसने जो अब तक इतनी मुसीबतें झेली हैं, उनके लिए उसे थोड़ा पुरस्कार मिलना चाहिए। प्रियतम की आत्मा में जो समतुल्य अश्व है वह कुछ नहीं कहता, लेकिन वह भी एक अनजान कामना से भरकर अपने प्रेमी का आलिंगन करता है और उसे चूमता है, मानो वह उसकी सभी मेहरबानियों के लिए शुक्रिया अदा कर रहा हो। जब वे एक दूसरे की बग़ल में लेटे रहते हैं, तो प्रियतम का समतुल्य अश्व इस बात को ध्यान में रखता है कि वह प्रेमी के अनुरोध को मानने में आनाकानी न करे, लेकिन उसका जो संगी अश्व है वह आदर और सावधानी से प्रेरित होकर सारथी के साथ मिलकर उसके प्रयासों का विरोध करता है। इस प्रकार यदि आत्मा के उच्चतर तत्वों की विजय होती है, तो वे उनसे प्रेरणा पाकर एक स्वस्थ दार्शनिक जीवन जीते हैं और पृथ्वी पर बिताये गये उनके दिन आनन्द और प्रेम से भरे रहते हैं, क्योंकि उनकी आत्मा में बुराई की शक्ति क्षीण हुई है और अच्छाई की शक्ति उन्मुक्त हुई है। उन्होंने आत्म-नियंत्रण और आन्तरिक शान्ति पाने में सफलता पायी है। पृथ्वी पर जब उनकी जीवन-लीला समाप्त होती है, तो वे भारमुक्त होकर तथा अपने पंखों को पुनः पाकर, उस सच्चे ओलम्पिक संघर्ष की तीन में से पहली परिक्रमा में विजयी होते हैं। मानव बुद्धि के बल पर अथवा देवता से प्राप्त पागलपन के सहारे इससे श्रेष्ठतर कोई और पारितोषिक नहीं मिल सकता।

लेकिन यदि वे ऐसी जीवन-शैली का चुनाव करते हैं, जो अपेक्षाकृत हेय है और दार्शनिकता से शून्य है, तो हो सकता है कि किसी असावधान क्षण में या जब सुरापान का दौर चल रहा हो, तो उन दोनों की आत्माओं के स्वेच्छाचारी अश्व उन्हें असंयमित पाकर उन्हें एक दूसरे के क़रीब लाएँ और उन्हें वह करने को मजबूर करें, जिन्हें बहुसंख्यक आबादी आनन्ददायक मानती है। ऐसा एक बार घटित होने के बाद बार-बार घटित होता है, हालाँकि उन्हें कभी-कभी यह अहसास होता है कि उनका मन पूरी तरह से इस ओर नहीं है। इस प्रकार की जोड़ी भी परस्पर प्रिय मित्र होते हैं, हालाँकि उनमें इतनी घनिष्ठता नहीं होती, जितनी पहले प्रकार के मित्रों में होती है। फिर भी यह जोड़ी भी , प्यार के दिनों में  और प्यार बीत जाने के बाद भी एक दूसरे के लिए प्रिय बने रहते हैं, क्योंकि उन्हें अहसास रहता है कि उन्होंने एक दूसरे को वचन दिये हैं, जिन्हें तोड़ना पाप है और इसलिए वे परस्पर दुश्मन नहीं बन सकते। मृत्योपरांत वे बिना पंख के ही यह शरीर छोड़ते हैं, हालाँकि पंख पाने की लालसा उनमें बरक़रार रहती है। इस प्रकार प्रेमियों के पागलपन का उन्हें जो पारितोषिक मिलता है, उसे भी कमतर नहीं आँका जाना चाहिए, क्योंकि अटल नियम यह है कि जो भी इस स्वर्गिक राजमार्ग पर पहला क़दम उठायेंगे, वे पाताल लोक के अंधेरे पथ की ओर कभी नहीं लौटेंगे, बल्कि वे अपने मित्र के साथ आनन्दमय और ज्योतिर्मय ज़िन्दगी जीएंगे और परस्पर प्रेम के कारण उपयुक्त समय पर वे दोनों पंखयुक्त होंगे।

तो , प्रिय युवक, एक प्रेमी की मित्रता के सुपरिणाम के रूप में ही उपर्युक्त महान और महिमापूर्ण वरदान मिलता है। जो प्रेमी नहीं है, वह भला क्या दे सकता है —- मात्र एक जान-पहचान, थोड़ी दुनियावी बुद्धि और थोड़े-बहुत दुनियावी साज-सामान। ऐसे व्यक्ति से जो आत्मा जुड़ी होगी, उसमें ऐसे गुणों को विकसित करने की प्रेरणा मिलेगी, जो श्रेष्ठ नहीं हैं, लेकिन जिन्हें बहुसंख्यक आबादी गुण मानती है। ऐसी आत्माएँ नौ हज़ार वर्षों तक पृथ्वी पर और पाताल में इधर-उधर भटकने के लिए अभिशप्त हैं। 

तो, इस प्रकार, हे प्रेम देवता, मैंने अपनी सामर्थ्य से यथासम्भव सम्पूर्ण और सर्वोत्तम पश्चात्ताप और पापशुद्धि प्रस्तुत की है। इसकी भाषा कहीं-कहीं काव्यात्मक हो गयी है, जो वस्तुतः फिदरस को प्रसन्न करने की कोशिश है। इस सम्भाषण के पहले जो कुछ कहा गया, उसके लिए हमें क्षमा करें और बाद में इस सम्भाषण में जो कहा गया उसके लिए हमें आशीष दें। हमारे प्रति करुणा और कृपा बनाए रखें तथा हमें जो प्रेम करने का गुण मिला है, उसे न छीनें और न अपनी नाराज़गी के कारण उसे मुरझाने दें, बल्कि हमारे मन में सौन्दर्य की प्रतिष्ठा में और वृद्धि हो।

यदि फिदरस और मैंने पहले जो कुछ कहा था, वह कर्णकटु लगा हो, तो इसके लिए लाइसियस को दोषी ठहराएँ, क्योंकि वही उसका एकमात्र रचयिता है। उसे ऐसे सम्भाषणों से विमुख करें तथा उसे ज्ञान और विवेक के प्रेम की ओर अग्रसर करें, जैसा कि आपने उसके भाई पोलेमारकस के साथ किया था। तब यहाँ उपस्थित उसका प्रिय शिष्य दो विचारों के बीच नहीं फँसेगा, जैसा कि आज उसके साथ हुआ, बल्कि वह दार्शनिक सम्भाषण की सहायता से केवल प्रेम के लिए जीवन जीने के एकमात्र उद्देश्य का अनुसरण करेगा। 

 


 


 

 

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