प्लेटो
फिदरस: यदि यह हमारे शुभ के लिए है, तो सुकरात, मैं भी तुम्हारे साथ प्रार्थना में शामिल हूँ। मैं तुम्हारे सम्भाषण से गद्गद् हो गया हूँ, क्योंकि यह सम्भाषण पहले सम्भाषण से महत्तर उपलब्धि है। मुझे डर है कि कि यदि लाइसियस अपने एक और भाषण से इसका मुक़ाबला करना चाहे तो वह सबको निराश ही करेगा। सच तो यह है कि कुछ दिन पहले ही हमारे एक राजनेता ने इसी बात को लेकर उसकी बड़ी भर्त्सना की थी, उसे बार-बार एक ‘भाषण लेखक’ कहा था। इसलिए सम्भव है कि वह अपनी साख बचाने के लिए कोई और रचना करने से बचेगा।
सुकरात: क्या कह रहे हो? तुम हमारे दोस्त को बिल्कुल ग़लत समझ रहे हो। वह इतना कायर नहीं है। क्या तुम सोचते हो वह राजनेता उसकी भर्त्सना कर रहा था?
फिदरस: मुझे तो ऐसा ही लगा। यह बात तुम भी जानते हो सुकरात और मैं भी जानता हूँ कि राजनीतिक जीवन में उच्च प्रभाव और प्रतिष्ठा वाले लोग अपना भाषण ख़ुद तैयार करना नहीं चाहते। वे भावी पीढ़ी के लिए अपनी रचना छोड़ना नहीं चाहते। उन्हें डर लगा रहता है कि लोग उन्हें कहीं ‘सोफिस्ट’ न करार दें।
सुकरात: फिदरस, तुम्हें यह नहीं मालूम है कि ‘सुखद मोड़’ शब्द नील नदी के मोड़ से आया है। इसी तरह तुम यह नहीं जानते हो कि इज़्ज़तदार राजनेताओं के अन्दर तीव्रतम आकांक्षा रहती है कि वे अपने भाषण लिखकर भावी पीढ़ी के लिए छोड़ें। वे जब भी अपना भाषण लिखते हैं तो उन्हें अपने प्रशंसकों का इतना ख़याल रहता है कि वे अपने भाषण के आरम्भ में ही उस भाषण के प्रशंसकों के नाम का उल्लेख करते हैं।
फिदरस: तुम कहना क्या चाहते हो?
सुकरात: क्या तुम यह नहीं जानते कि राजनेता अपने भाषण में सबसे पहले अपने प्रशंसक का नाम लिखता है?
फिदरस: सच में?
सुकरात: हाँ। वह लिखता है—‘परिषद द्वारा संकल्प पारित’ या ‘जनता द्वारा संकल्प पारित’ और उसके बाद ‘अमुक द्वारा प्रस्तावित’—-जो कि लेखक के आत्म-प्रचार का आडम्बरपूर्ण तरीक़ा है। इसके बाद वह अपना मंतव्य लिखता है। इसी बहाने वह अपने प्रशंसकों के समक्ष अपनी बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन करता है, अक्सर बहुत लम्बी रचना के माध्यम से। तो क्या यह सब भाषण लिखना नहीं कहा जायेगा?
फिदरस: हाँ, इसे भाषण लिखना ही कहेंगे।
सुकरात: इसके बाद यदि भाषण प्रभावी साबित हुआ तो लेखक हँसते हुए विदा होता है, लेकिन यदि भाषण निष्प्रभावी रहा तो उसे उत्तम भाषण लेखक नहीं माना जाता। उसे और उसके दोस्तों को यह बात अच्छी नहीं लगती है।
फिदरस: हाँ, ऐसा होता है।
सुकरात: तो इससे यह स्पष्ट है कि वे भाषण की रचना को मज़ाक़ का विषय नहीं मानते, बल्कि उसकी सराहना करते हैं।
फिदरस: सच में!
सुकरात: तो मुझे बताओ, जब कोई वक्ता या कोई राजा लाइकरगस, सोलोन या दारियस के समान सामर्थ्यवान होता है और अपनी जनता में एक अच्छे भाषण लेखक के रूप में जाना जाता है, तो क्या वह अपने आपको जीवन के दौरान ही देव-तुल्य नहीं मानता ? क्या भावी पीढ़ी भी उनके भाषणों को पढ़कर उन्हें देवतुल्य नहीं मानती?
फिदरस: हाँ, मानती है।
सुकरात: तो क्या तुम मानते हो कि उस तरह के लोग, चाहे वे कोई भी हों और लाइसियस को कितना भी नापसन्द करते हों, लाइसियस की केवल इस आधार पर भर्त्सना कर सकते हैं कि वह लिखता है?
फिदरस: जो तुम कह रहे हो उससे तो यह बात असम्भव लगती है, क्योंकि तब वह ऐसी बात की भर्त्सना करने का दोषी होगा जो वह ख़ुद करना चाहता है।
सुकरात: ज़ाहिर है कि इससे हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि केवल भाषण लेखन के कर्म में कोई शर्म की बात नहीं है।
फिदरस: यक़ीनन।
सुकरात: लेकिन शर्म की बात तब ज़रूर आती है जब कोई शर्मनाक बात लिखे या बोले, जो कि उसे नहीं करना चाहिए।
फिदरस: बिलकुल ।
सुकरात: तो अच्छे लेखन और बुरे लेखन की प्रकृति क्या है? क्या हमारा यह दायित्व नहीं है कि हम इस आधार पर फिदरस या फिदरस जैसे उन लोगों की जाँच करें, जिन्होंने निजी तौर पर या सार्वजनिक रूप से पद्य में या आम बोलचाल की भाषा वाले गद्य में कुछ लिखा है या लिखना चाहते हैं?
फिदरस: दायित्व? जीवन में इस प्रकार की चर्चा में जो ख़ुशी है, यदि वह न हो तो जीवन जीने लायक़ नहीं रह जाएगा। हम केवल ऐसी ख़ुशियों के सहारे नहीं जी सकते, जिनमें पहले दर्द के अहसास से गुज़रना पड़ता है, जैसा कि देह से जुड़ी हर ख़ुशी के साथ होता है और जिस वजह से ऐसी ख़ुशियों को हीन माना जाता है।
सुकरात: ठीक है, हम दोनों इस चर्चा के लिए समय दे सकते हैं। मुझे ऐसा भी लगता है कि इस कड़ी धूप में आदतन गाने वाले और आपस में बतियाने वाले झींगुर भी हमें ऊपर से देख रहे हैं। यदि वे यह देखें कि हम भी आम लोगों की तरह दोपहर में आपस में बातचीत करना छोड़कर तन्द्रा से बोझिल होकर नीन्द की गिरफ़्त में आ गये हैं तो वे हम पर हँसेंगे और हमें ऐसे दास-युगल मानेंगे जो भेड़ों की तरह झरने के पास दोपहर की नींद लेने आ गये हैं। लेकिन यदि वे हमें आपस में बातचीत करते देखेंगे और उनके मोहक गीत का हम पर कोई जादुई असर नहीं होगा , तो उनके मन में हमारे प्रति आदर उत्पन्न हो सकता है और वे हमें वह वरदान दे सकते हैं, जिसकी अनुमति उन्हें देवताओं से मिली है।
फिदरस: वह क्या है? शायद मैंने इस बारे में कुछ नहीं सुना है।
सुकरात: कला की प्रेरणा देने वाली म्यूज़ देवियों के अनुयायी को यह शोभा नहीं देता कि उसे इस बात की जानकारी न हो। यों, कथा इस प्रकार है कि बहुत पुराने ज़माने में— उस समय जब कोई म्यूज़ देवी नहीं थी—- ये जन्तु मनुष्य थे। जब म्यूज़ देवियों का दुनिया में आगमन हुआ और उनके साथ संगीत का उदय हुआ तो उस ज़माने के कुछ लोग इतने ख़ुश हुए और गाने में इतने मशगूल हो गये कि उन्हें खाने-पीने की सुध नहीं रही और वे गाते-गाते मर गये। उन्हीं में से कुछ दिन बाद झींगुरों की जाति उत्पन्न हुई, जिन्हें म्यूज़ देवियों ने यह वरदान दिया कि वे जन्म से ही बिना कोई आहार लिए मृत्युपर्यन्त गीत गाते रहेंगे और मरने के बाद वे म्यूज़ देवियों को इस बात की ख़बर देंगे कि मनुष्य जाति में कौन किस म्यूज़ देवी का गौरव बढ़ा रहा है। इस प्रकार जब वे यह बताते हैं कि अमुक व्यक्ति ने नृत्य की देवी तर्पसिकरी का गौरव बढ़ाया है, तो उस व्यक्ति को तर्पसिकरी की कृपा मिलती है। इसी प्रकार अन्य म्यूज़ देवियों की आराधना का भी फल मिलता है। सबसे बड़ी म्यूज़ कैलिपो और दूसरे क्रम पर आनेवाली उसकी बहन यूरेनिया को झींगुर उन लोगों की ख़बर देते हैं, जो दर्शन पर आधारित जीवन जीते हैं, इन दो देवियों का मान बढ़ाते हैं, क्योंकि इन दोनों देवियों के संगीत का विषय स्वर्ग, देवता और मनुष्यों से जुड़ी कथाएँ हैं, जिनके गीत सब गीतों से मधुरतम हैं।
इसलिए इस भरी दुपहरी में नींद के आग़ोश में जाने के बजाय अपनी चर्चा को आगे बढ़ाने का हर कारण मौजूद है।
फिदरस: ठीक है, हम वैसा ही करें।
सुकरात: अभी-अभी हमने विचार के लिए जो विषय चुना है, वह है अच्छे और बुरे भाषण और लेखन की प्रकृति क्या है। हम इसी मुद्दे पर विचार करने वाले हैं।
फिदरस: हाँ।
सुकरात: क्या एक अच्छे और सफल सम्भाषण के लिए आवश्यक नहीं है कि वक्ता के मन में अपने विषय का सही-सही ज्ञान हो?
फिदरस : इस विषय पर, प्रिय सुकरात, मैंने यह सुना है कि वक्ता के लिए यह समझना ज़रूरी नहीं है कि क्या सही है, बल्कि उसे यह ज्ञान होना चाहिए कि जो समूह उसपर निर्णय देने वाला है, वह क्या समझता है; उसे यह भी जानने की ज़रूरत नहीं है कि वस्तुतः क्या अच्छा है या क्या श्रेष्ठ है, बल्कि उसे यह मालूम होना चाहिए कि किसे अच्छा या श्रेष्ठ माना जाएगा—क्योंकि श्रोता को विश्वस्त करने के लिए सच्चे ज्ञान के बजाय यह ज्ञान होना चाहिए कि श्रोता की राय क्या है।
सुकरात: बुद्धिमान व्यक्तियों की किसी भी बात को बिना विचार किये अस्वीकार नहीं करना चाहिए। शायद वे सही हैं। हमें इसकी जाँच करनी चाहिए। ख़ासकर अभी जो तुमने कहा, उसपर अवश्य विचार होना चाहिए।
फिदरस: मैं राज़ी हूँ।
सुकरात: तो मेरे इस सुझाव पर विचार करो।
फिदरस: क्या?
सुकरात: मान लो कि मैं तुम्हें शत्रुओं से युद्ध करने के लिए एक घोड़ा ख़रीदने के लिए राज़ी कर रहा हूँ। हम दोनों यह नहीं जानते कि घोड़ा कैसा होता है, लेकिन तुम्हारे बारे में मुझे यह मालूम है कि तुम यह मानते हो कि घोड़ा एक पालतू जानवर है, जिसके कान बहुत बड़े होते हैं।
फिदरसः यह तो बड़ी हास्यास्पद बात है।
सुकरात: थोड़ा सब्र करो। मान लो कि मैं पूरी संजीदगी के साथ एक खच्चर की बड़ाई करते हुए कहूँ कि यही घोड़ा है और तुम्हारे लिए यह बेहद ज़रूरी है। इसका उपयोग तुम घर में, मैदान में और युद्ध-स्थल में कर सकते हो। मैं तुम्हें यह भी यक़ीन दिला दूँ कि इसकी अतिरिक्त विशेषता यह है कि यह तुम्हारे औज़ारों को ढोने के भी काम आएगा।
फिदरस: इस हद तक पहुँचकर तो बात और हास्यास्पद हो जाएगी।
सुकरात: क्या एक हास्यास्पद मित्र एक चतुर शत्रु से बेहतर नहीं होता?
फिदरस: होता है।
सुकरात: तो जब कोई भाषण विद्या में प्रवीण व्यक्ति, जो अच्छाई और बुराई में फ़र्क़ करना नहीं जानता, एक ऐसे जनसमूह के समक्ष, जो उस व्यक्ति जैसा ही अज्ञानी है, किसी खच्चर को घोड़े के रूप में तो नहीं, लेकिन किसी बुराई को अच्छाई के रूप में पेश करता है और उस जनसमूह को अच्छाई के बजाय बुराई का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करता है, तो उसकी भाषण विद्या का असर अच्छा होगा या बुरा?
फिदरस: बहुत बुरा!
सुकरात: परन्तु, मेरे दोस्त, क्या हम भाषण विद्या की निन्दा करने में मर्यादा का तो अतिक्रमण नहीं कर रहे हैं? क्या यह विद्या प्रत्युत्तर में यह नहीं कह सकती — “तुम जैसे असाधारण लोग इस प्रकार की बेसिरपैर की बातें क्यों कर रहे हैं? मैंने यह कभी नहीं कहा है कि जो भाषण विद्या सीखना चाहते हैं, वे सत्य से अनजान रहें; इसके विपरीत मेरी सलाह, यदि उसका कोई महत्व है, तो यही रही है कि लोग मेरा सहारा तभी लें जब उन्हें सत्य की जानकारी हो जाए। हाँ, मुझे इस बात का गर्व ज़रूर रहा है कि मेरी सहायता लिए बिना, केवल सत्य के ज्ञान के आधार पर, दूसरों को यक़ीन दिलाने की कला में कुशलता पाना सम्भव नहीं है।”
फिदरस: क्या इस तरह का प्रत्युत्तर समुचित नहीं माना जाएगा?
सुकरात: हाँ, यदि भाषण कला के विरुद्ध दी गयी दलीलें यह मान लेती हैं कि भाषण कला एक कला है। मैं ऐसी दलीलों से भी अवगत हूँ, जो भाषण कला को कला नहीं, बल्कि एक आदत और अभ्यास मानती हैं। स्पार्टावासी मानते हैं कि कोई सच्ची भाषण कला है ही नहीं, वस्तुतः सत्य-ज्ञान के सिवा कोई सच्ची भाषण कला हो भी नही सकती।
फिदरस: सुकरात, हमें इन दलीलों को सुनना चाहिए और उनके आशय की जाँच करनी चाहिए।
सुकरात: तो, हे श्रद्धेय दलीलो,आप आएँ और फिदरस को समझाएँ, क्योंकि वे इतने गुणवान हैं कि जबतक वे किसी दर्शन को समझ नहीं लेते तब तक वे उस विषय पर मुँह नहीं खोलेंगे। आपको फिदरस ही जवाब देंगे।
फिदरस: मैं उनके सवालों का सामना करने के लिए तैयार हूँ।
सुकरात: वक्तृत्व कला को यदि हम सम्पूर्णता में देखें तो क्या हम यह नहीं कह सकते कि यह वह कला है, जो शब्दों की सहायता से श्रोता के मन को प्रभावित करती है, न केवल अदालतों और अन्य सार्वजनिक स्थानों में जनसमूहों को सम्बोधित करते समय , बल्कि निजी स्थलों पर भी? इस कला का सम्बन्ध बड़े मुद्दे से हो या छोटे मुद्दे से, मामला महत्वपूर्ण हो या मामूली, हर स्थिति में क्या यह कला एक ही नहीं है? क्या इस सम्बन्ध में तुम्हें यही नहीं बताया गया है?
फिदरस: नहीं-नहीं, ऐसी बात नहीं है। मुख्य रूप से भाषण और लिखने की कला क़ानूनी मुक़दमों और सार्वजनिक बहस-मुबाहसों के लिए है। इससे अधिक व्यापक क्षेत्र में इसके उपयोग के बारे में मैं नही जानता।
सुकरात: क्यों? क्या तुम नेस्टर और ओडिसस की सम्भाषण कला के बारे में नहीं जानते, जिसकी रचना उन्होंने ट्राय में फ़ुरसत के क्षणों में की थी? क्या तुमने पालामिडिस की रचना के बारे में नहीं सुना है?
फिदरस: नहीं, मैंने नहीं सुना है। नेस्टर के बारे में भी नहीं, बशर्ते तुम्हारा आशय जार्जियास द्वारा अभिनीत नेस्टर या थ्रेसियेचस या सम्भवत: थियोडोरस द्वारा अभिनीत ओडिसस से हो।
सुकरात: हाँ, सम्भवतः मैं उनका ही ज़िक्र कर रहा हूँ। लेकिन, ख़ैर, उन्हें जाने दो। मुझे यह बताओ कि अदालतों में परस्पर विरोधी पक्ष क्या करते हैं? क्या वे शब्दों के सहारे लड़ते नहीं? यदि नहीं, तो उसे हम क्या कहें?
फिदरस: हाँ, वे शब्दों के सहारे आपस में विवाद करते हैं।
सुकरात: वे बहस करते हैं कि सही क्या है और ग़लत क्या है। है न?
फिदरस: हाँ।
सुकरात: और जिसके पास यह कला है वह अपनी मर्ज़ी से एक ही चीज़ को कुछ लोगों के लिए कभी सही और कभी ग़लत सिद्ध कर सकता है?
फिदरस: हाँ।
सुकरात: और सार्वजनिक बहस-मुबाहसों में पूरे समुदाय के लिए एक ही चीज़ को कभी अच्छा और कभी बुरा सिद्ध कर सकता है?
फिदरस: हाँ।
सुकरात: तो क्या हम यह नहीं पाते हैं कि एलिया के पालामेडिस के पास ऐसी वक्तृत्व कला है कि वह अपने श्रोताओं के सामने एक ही चीज़ को समान और असमान या एक और अनेक या स्थिर और गतिशील के रूप में पेश कर सकता है?
फिदरस: हाँ, वह ऐसा कर सकता है।
सुकरात: तो इस प्रकार शब्दों के सहारे वाद-विवाद न केवल मुक़दमों और सार्वजनिक बहस-मुबाहसों में होता है, बल्कि यह कला, यदि इसे कला का नाम दिया जाए, तो हर उस जगह मिलती है, जहाँ लोग बोलते हैं। यह एकमात्र कला है, जिसके सहारे लोग किसी एक चीज़ को किसी अन्य चीज़ के समान सिद्ध करते हैं, हालाँकि इसकी एक सीमा हो सकती है। इसी प्रकार इस कला के सहारे लोग दूसरों के द्वारा किये गये प्रयास को बेनक़ाब करते हैं।
फिदरस: वह कैसे?
सुकरात: यह स्पष्ट हो जाएगा यदि हम यह प्रश्न करें कि हमें भ्रम कब होता है, जब दो चीज़ों में अधिक अन्तर हो या कम अन्तर?
फिदरस: जब दो चीज़ों में कम अन्तर हो।
सुकरात: तो, यदि तुम अपनी दलीलों को एकबारगी अचानक बदलने के बजाय धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा करके बदलो तो लोगों को पता नहीं चलेगा।
फिदरस: बिलकुल।
सुकरात: तो इससे यह सिद्ध होता है कि यदि कोई किसी को भरमाना चाहता है और इस प्रक्रिया में ख़ुद भ्रमित नहीं होना चाहता है तो उसे दो बातों के बीच किस हद तक समानता और असमानता है, उसका सही ज्ञान होना चाहिए।
फिदरस: हाँ, यह ज़रूरी है।
सुकरात: तो, यदि कोई किसी चीज़ की सच्चाई नहीं जानता है, तो वह कैसे जानेगा कि उस चीज़ और अन्य चीज़ों के बीच कितनी समानता है?
फिदरस: ऐसी जानकारी सम्भव नहीं होगी।
सुकरात: जब लोग सच के विपरीत धारणा रखते हैं और दूसरों के द्वारा भरमाये जाते हैं, तो यह कहा जा सकता है कि उन्होंने समझने में ग़लती इसलिए की क्योंकि वे किसी प्रकार की समानता की बात से प्रभावित हो गये हैं।
फिदरस: हाँ, ऐसा ही होता है।
सुकरात: लेकिन क्या यह सम्भव है कि कोई शख़्स लोगों को बहकाने के लिए अथवा उन्हें सच के बजाय झूठ की ओर ले जाने के लिए सादृश्य के उपयोग की कला में सिद्धहस्त हो जाए ? क्या कोई इस प्रकार के धोखे से बच सकता है यदि उसे वस्तुस्थिति मालूम न हो?
फिदरस: नहीं, कभी नहीं।
सुकरात: तो, मेरे दोस्त, इससे हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सच्चाई जानने के बजाय जो लोग केवल विश्वास के आधार पर वक्तृत्व कला का प्रदर्शन करते हैं, उनकी कला हास्यास्पद मानी जाएगी और वस्तुतः उसे कला का दर्जा नहीं दिया जा सकता।
फिदरस: हाँ, ऐसा कहा जा सकता है।
सुकरात: तो क्या तुम्हारे पास जो लाइसियस का भाषण है और मैंने जो भाषण दिये, उनमें कला की मौजूदगी या ग़ैर-मौजूदगी के कुछ उदाहरण तुम पेश कर सकते हो?
फिदरस: हाँ,हाँ, क्यों नहीं? अभी हम जो चर्चा कर रहे हैं, वह उदाहरणों के अभाव में अमूर्त लग रही है।
सुकरात: तो यह हमारा सौभाग्य है कि हमारे पास जो दो भाषण हैं, वे इस बात के उदाहरण हैं कि किस प्रकार सच जानने वाला वक्ता अपने भाषण के माध्यम से अपने श्रोताओं की भावनाओं से खिलवाड़ करते हुए उसे भ्रमित कर सकता है। मैं तो फिदरस, यही मानता हूँ कि यह सब स्थानीय देवताओं की कृपा है या म्यूज़ देवियों के उन प्रवक्ताओं से हमें प्रेरणा मिल रही है, जो हमारे आसपास फुसफुसाते रहते हैं, क्योंकि सच तो यह है कि मेरे पास कोई भाषण कौशल नहीं है।
फिदरस: ऐसा हो सकता है, लेकिन अपनी बात स्पष्ट करो।
सुकरात: तो, आओ, लाइसियस के भाषण की आरम्भिक पंक्तियाँ पढ़ो।
फिदरस: ‘तुम जानते हो कि तुम्हारे साथ मेरा कैसा सम्बन्ध है (मैं तुम्हारा प्रेमी नहीं हूँ)। मैंने तुम्हें बताया है कि यह सम्बन्ध हम दोनों के लिए फ़ायदेमंद है। अब मैं यह कहना चाहता हूँ कि यदि मैं तुमसे कोई मांग करूँ तो केवल इस आधार पर इन्कार मत करो कि मैं तुम्हारा प्रेमी नहीं हूँ। जो प्रेमी हैं, उनका लगाव जब कम होने लगता है, तो उन्हें पछतावा होता है...
सुकरात: रुको। हमारा उद्देश्य यह है कि हम बतायें कि कहाँ वक्ता दोषी है और कहाँ कला अनुपस्थित है। है न?
फिदरस: हाँ।
सुकरात: तो, अब, क्या यह कहना ज़ाहिर तौर पर सही नहीं है कि कुछ शब्दों के अर्थ के बारे में हम आपस में सहमत रहते हैं, जबकि कुछ ऐसे शब्द भी हैं, जिनके अर्थ के सम्बन्ध में हमारी अलग-अलग राय होती है।
फिदरस: मैं तुम्हारा आशय समझ रहा हूँ, लेकिन इसे थोड़ा और स्पष्ट करो।
सुकरात: जब कोई ‘लोहा’ या ‘चांदी’ कहता है तो हमारे मन के सामने एक ही वस्तु का चित्र आता है, है न?
फिदरस: हाँ।
सुकरात: लेकिन जब हम ‘उचित’ या ‘अच्छा’ कहते हैं, तो क्या हम इन शब्दों के अर्थ के बारे में आपस में और कभी-कभी अपने साथ भी असहमत नहीं रहते?
फिदरस: बिलकुल।
सुकरात: तो कुछ मामलों में हम असहमत रहते हैं और कुछ में नहीं।
फिदरस: हाँ।
सुकरात: अब तुम यह बताओ कि किन मामलों में हमें आसानी से भ्रमित किया जा सकता है और जिनमें वाक्चातुर्य अधिक प्रभावी होता है?
फिदरस: ज़ाहिर है कि उन मामलों में जिनमें हमारी राय स्थिर नहीं है।
सुकरात: इसलिए वक्तृत्व कला के विद्यार्थी को सबसे पहले शब्दों को दो स्पष्ट श्रेणियों में विभाजित करना चाहिए और दोनों प्रकार के शब्दों में भेद करने वाली विशेषता का ध्यान रखना चाहिए ताकि उसे यह ज्ञात हो कि किन शब्दों के अर्थ के बारे में बहुसंख्यक लोगों की राय स्थिर नहीं है और किन शब्दों के बारे में वे अडिग हैं।
फिदरस: सुकरात, इस भेद को समझना तो प्रखर बुद्धि का परिचायक है।
सुकरात: और दूसरी बात यह है कि जब उसके सामने कोई शब्द आए तो उसे तुरन्त समझ में आना चाहिए कि उस शब्द का अर्थ क्या है और चर्चा का विषय दो में से किस श्रेणी का है।
फिदरस: बिलकुल
सुकरात: तो हम प्रेम को विवादास्पद शब्द मानें या दूसरे प्रकार का।
फिदरस: अवश्य ही यह विवादास्पद शब्द है, अन्यथा क्या यह सम्भव था कि तुमने पहले यह कहा कि प्रेम, प्रेमी और प्रियपात्र दोनों के लिए हानिकारक है और बाद में अपनी बात पलटते हुए उसे दुनिया की सर्वोत्तम वस्तु क़रार दिया।
सुकरात: तुम्हारी बात में दम है, लेकिन एक बात बताओ, क्योंकि प्रेरणा से आविष्ट होकर मुझे ठीक-ठीक याद नहीं आ रहा है, क्या मैंने अपने भाषण के आरम्भ में प्रेम की परिभाषा दी थी?
फिदरस: बिल्कुल दी थी और काफ़ी विस्तार से दी थी।
सुकरात: सचमुच! तुम वक्तृत्व कला में लाइसियस की तुलना में एचेलस की परियों और हेरमिज़ के पुत्र पैन को बेहतर कलाकार मानते होगे, या मैं ग़लत कह रहा हूँ? क्या प्रेम पर लिखे अपने सम्भाषण के आरम्भ में लाइसियस ने प्रेम की कोई निश्चित परिभाषा दी है और क्या यह परिभाषा उसने स्वयं निश्चित की है? और क्या उसने बाद में आरम्भ से अन्त तक जो कुछ कहा वह प्रेम की उसी परिभाषा को ध्यान में रखते हुए कहा गया था? क्यों न उसके भाषण के आरम्भिक अंश को एक बार फिर से पढ़ा जाए?
फिदरस: यदि तुम चाहते हो, तो पढ़ता हूँ, लेकिन जो तुम खोज रहे हो, वह वहाँ नहीं है।
सुकरात: फिर भी पढ़ो, ताकि मैं लेखक की ज़बानी ही सुन सकूँ।
फिदरस: ‘तुम जानते हो कि तुम्हारे साथ मेरा कैसा सम्बन्ध है (मैं तुम्हारा प्रेमी नहीं हूँ)। मैंने तुम्हें बताया है कि यह सम्बन्ध हम दोनों के लिए फ़ायदेमंद है। अब मैं यह कहना चाहता हूँ कि यदि मैं तुमसे कोई मांग करूँ तो केवल इस आधार पर इन्कार मत करो कि मैं तुम्हारा प्रेमी नहीं हूँ। जो प्रेमी हैं, उनका लगाव जब कम होने लगता है, तो उन्हें पछतावा होता है..
सुकरात: नहीं, नहीं। हम जो खोज रहे हैं, वह उसके आसपास भी नहीं पहुँच रहा है। वह पीठ के बल उलटा तैरने वाला तैराक लगता है, जो अन्त से आरम्भ करता है। वह आरम्भ में ही ऐसी बातें कहता है, जो एक प्रेमी स्वभावतः अन्त में कहेगा—-या, प्रिय फिदरस, मैं बिल्कुल ग़लत हूँ?
फिदरस: मैं यह मानने को तैयार हूँ सुकरात, कि उसके सम्बोधन का मुख्य अंश वह है जो आम तौर पर भाषण के अन्त में कहा जाता है।
सुकरात: कुछ और बातों की ओर ध्यान दो। क्या तुम्हें यह नहीं लगता कि वह बिना किसी व्यवस्था के, जो भी मन में आया है कहता चला गया है? उसकी अगली टिप्पणी या किसी भी टिप्पणी का कोई प्रयोजन है? मैं अज्ञानतावश यह मान रहा था कि लेखक निर्भीकतापूर्वक जो भी मन में आ रहा है, कह रहा है। लेकिन वह अपनी बातों को जिस क्रम में रख रहा है, क्या उसमें तुम रचना का कोई सिद्धान्त ढूँढ़ सकते हो?
फिदरस: तुम्हें लगता है कि मैं इतना क़ाबिल हूँ कि मैं उसके मन में छिपी बातों को ठीक-ठीक जान सकता हूँ!
सुकरात: तुम कम से कम इतना तो मानोगे कि किसी भी सम्भाषण की रचना इस प्रकार की जानी चाहिए, मानो वह एक जीवित प्राणी है, जिसका अपना एक शरीर है। ऐसा तो नहीं होना चाहिए कि उसके हाथ या पैर न हों। उसका मध्यांश या अन्तिम अंश इस तरह रचा जाना चाहिए कि उसकी आपस में और पूरी रचना के साथ संगति हो।
फिदरस: बिल्कुल।
सुकरात: तो अपने आप से पूछो कि तुम्हारे मित्र का भाषण कैसा है? क्या वह मिदास, द फ्रिजियन की कब्र पर खुदी अन्तिम पंक्तियों जैसी नहीं है?
फिदरस: वह क्या है और उसमें क्या ग़लत है?
सुकरात: ये पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:
मैं, कांस्य प्रतिमा, मिदास की कब्र पर खड़ी हूँ।
जब तक जलधारा बहती है और पेड़ बढ़ते हैं
इस दुखी कब्र पर मैं निवास करती हूँ
मुसाफ़िरों को बताती हूँ कि मिदास यहीं सोया है।
तुम देख सकते हो, इन पंक्तियों को किसी भी क्रम में रखा जाए, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है।
फिदरस: सुकरात, तुम हमारे भाषण का मज़ाक़ उड़ा रहे हो!
सुकरात: तुम्हें और परेशान न करने के लिए मैं अब इस विषय पर कुछ नहीं कहूंगा——- हालाँकि मैं सोचता हूँ कि इस भाषण में कई बातें ग़ौर करने लायक़ हैं, बशर्ते हम उनका अनुकरण करने से बचें। अब हम अन्य दो भाषणों की चर्चा करें, क्योंकि उनमें एक ऐसी ख़ासियत थी जिसकी ओर भाषण कला के हर पारखी का ध्यान जान चाहिए।
फिदरस: तुम किन भाषणों की बात कर रहे हो?
सुकरात: उनका उद्देश्य परस्पर विरोधी था। एक का मानना था कि प्रेमी के आगे झुकना चाहिए और दूसरे का मानना था कि प्रेम न करने वाले की बात माननी चाहिए।
फिदरस: हाँ, और उन्होंने अपना पक्ष बड़े ज़ोर-शोर से रखा था।
सुकरात: मैंने सोचा तुम यह कहने जा रहे हो कि उन्होंने अपनी बात ‘पागलपन’ के साथ रखी। ऐसा कहते तो सच ही कहते। लेकिन इससे मुझे याद आया कि मैं क्या पूछने जा रहा था। क्या हमने यह नहीं कहा था कि प्यार एक प्रकार का पागलपन है?
फिदरस: हाँ।
सुकरात: और यह भी कहा था कि पागलपन दो प्रकार का है—- एक इन्सानी बीमारी की वजह से होता है और दूसरा दैवी हस्तक्षेप का प्रभाव है।
फिदरस: हाँ।
सुकरात: और दैवी पागलपन में हमने चार प्रकार के पागलपन की बात कही, जो चार देवताओं से जुड़े हुए हैं। भविष्यवक्ता को अपोलो से, रहस्यवादी को डायोनिसियस से, कवि को म्यूज़ से प्रेरणा मिलती है, जबकि चौथी प्रेरणा, जिसे हमने सर्वोच्च श्रेणी में रखा है, एक प्रेमी का पागलपन है, जो एफ्रोडाइट और इरोस से प्रेरित है। इसके साथ-साथ हमने एक प्रेमी के अनुभव को चित्रित करने का प्रयास किया है, जिसमें हमें कुछ हद तक सफलता मिली है, हालाँकि, सम्भव है कि हम कहीं-कहीं भटक गये— फिर भी हम ऐसा सम्भाषण प्रस्तुत कर पाये, जिसमें सच की सम्भावना दिखती है। हम यह भी कह सकते हैं कि हमने अपने आराध्य देव, प्रेम देवता, जो यौवन और सौन्दर्य के रक्षक हैं, के सम्मान में इस सम्भाषण की रचना के माध्यम से समुचित धार्मिक भाषा में देव-स्तुति प्रस्तुत कर उत्सव मनाया है।
फिदरस: हाँ, उस सम्भाषण को सुनकर मुझे सचमुच प्रसन्नता हुई।
सुकरात: तो इस सम्भाषण की एक विशेषता पर ध्यान दो कि वह कैसे आलोचना से स्तुति की ओर अग्रसर हुआ।
फिदरस: कैसे?
सुकरात: मेरा मानना है कि हमारे उत्सव-गान में मुख्यतया उत्सव से सम्बन्धित आनन्द की अभिव्यक्ति होती है, लेकिन हमने सम्भाषण में कभी-कभी एक युगल प्रक्रिया का भी सहारा लिया है, जिसके महत्व को वैज्ञानिक रीति से प्रतिपादित करना रोचक होगा।
फिदरस: कैसी प्रक्रिया?
सुकरात: पहली प्रक्रिया वह है, जिसमें हम बिखरी हुई बहुलता को एक नाम देते हैं। इसका उद्देश्य किसी चीज़ को परिभाषित करना है, ताकि जिस विषय की विवेचना की जा रही हो, वह स्पष्ट हो। उदाहरण के लिए, अभी-अभी हमने प्रेम की परिभाषा दी। यह परिभाषा सही थी या ग़लत थी, लेकिन उसी के आधार पर हमारे सम्भाषण में सरलता और सुसंगति आयी।
फिदरस: और सुकरात, तुम्हारी दूसरी प्रक्रिया क्या थी?
सुकरात: पहली प्रक्रिया की विपरीत प्रक्रिया, जिसका अनुसरण कर हम वस्तुमूलक वर्णन करते हुए नाम-रूपों का और विभाजन करते हैं। हम किसी अनाड़ी कसाई की तरह अंगों को नहीं काटते, बल्कि एक सुव्यवस्थित पद्धति अपनाते हैं,जिसका उदाहरण हमारे अभी दिये गये भाषणों में मिलता है। उसमें जो एक सामान्य विचार की चर्चा की गयी वह विचार अतार्किकता था। इसके बाद जैसे एक शरीर में एक नाम वाले दो अंग होते हैं— जैसे दायाँ हाथ और बायाँ हाथ, दायाँ पैर और बायाँ पैर—- उसी तरह हमने इन्सानों में पाये जाने वाले पागलपन की चर्चा की। पहले सम्भाषण में हमने पागलपन के वामांग का विभाजन किया और इस प्रकार और विभाजन करते हुए हम उस विचार तक पहुँचे, जिसे हमने घातक प्रेम कहा और उसकी हमने विस्तार से निन्दा की। दूसरे सम्भाषण में हमने पागलपन के उन रूपों की चर्चा की जो दायें अंग के हैं और इस प्रकार हमने उस प्रेम की खोज की जो समरूप नाम होते हुए भी दैवी है। हमने इस प्रेम की चर्चा की और उसे सर्वोत्तम कल्याण का स्रोत कहकर उसकी बड़ाई की।
फिदरस: तुमने बिल्कुल सही कहा।
सुकरात: फिदरस, मुझ पर विश्वास करो कि मैं इन विभाजनों और समूहीकरण का प्रेमी हूँ, ताकि मैं बोलने और सोचने की सामर्थ्य विकसित कर सकूँ। जब भी मैं किसी ऐसे व्यक्ति से मिलता हूँ, जो वस्तुमूलक एकता और विविधता समझता है तो मैं ‘उसके पदचिह्नों का ऐसे अनुसरण करता हूँ, जैसे वह कोई देवता हो’। ऐसा करते हुए मैं सही हूँ या ग़लत, यह केवल ईश्वर जानता है, लेकिन यह क्षमता जिसके पास है उसे ही मैं द्वन्द्वात्मक तर्कशास्त्री मानता हूँ।
अब इसके बाद तुम मुझे यह बताओ कि यदि कोई लाइसियस और तुमसे शिक्षा ग्रहण करे तो हम उसे क्या कहेंगे? या मैं जिस विद्या का वर्णन कर रहा हूँ क्या यह वही भाषण-कला है, जिसमें थ्रासिमेचस और उनकी तरह के लोग पारंगत माने जाते हैं और जो भी समुचित उपहार के साथ उनके पास पहुँचता है उसे वे उस कला में प्रवीण बना सकते हैं?
फिदरस: यह सच है कि थ्रेसिमेचस जैसे लोग अपने आप को सभी मानवों में श्रेष्ठ समझते हैं, लेकिन उनके पास वह ज्ञान नहीं है, जिसकी तुम चर्चा कर रहे हो। मैं मानता हूँ कि तुमने जिस प्रक्रिया का वर्णन किया है, उसे द्वन्द्वात्मक कहना सही है, लेकिन अब भी हम वक्तृत्व कला को स्पष्ट नहीं कर पाये हैं।
सुकरात: क्या? क्या उस प्रक्रिया के बिना कोई भी महत्वपूर्ण विद्या वैज्ञानिक रीति से सीखी जा सकती है? यदि ऐसी कोई चीज़ है तो हमें उसकी अवश्य चर्चा करनी चाहिए और हमें स्पष्ट करना चाहिए कि द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया को छोड़कर वक्तृत्व- कला में और क्या है?
फिदरस: सुकरात, वक्तृत्व- कला सिखाने वाली पुस्तकों में तो ढेर सारी सामग्री मिलती है।
सुकरात: याद दिलाने के लिए शुक्रिया। इन पुस्तकों में पहली बात यह सिखायी जाती है कि कोई भी भाषण एक भूमिका के साथ आरम्भ होता है। तुम इस कला की इन्हीं बारीकियों की ओर संकेत कर रहे हो न?
फिदरस: हाँ।
सुकरात: इसके बाद क्रमशः विवेचन, प्रत्यक्ष साक्ष्य, परोक्ष साक्ष्य,सम्भाव्यताएँ, प्रमाण और पूरक प्रमाण आते हैं—- जैसा कि इस कला के बाइजैंटीनी आचार्य ने उल्लेख किया है।
फिदरस: तुम क्या थियोडोरस की बात कर रहे हो?
सुकरात: हाँ। उपर्युक्त बातों के अलावा अभियोग और बचाव दोनों पक्षों के लिए खंडन और पूरक खंडन का भी प्रावधान है। और क्या हम पेरोस के इवेनस की चर्चा नहीं करेंगे, जिन्होंने प्रछन्न संकेत और परोक्ष प्रशंसा का आविष्कार किया है? कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि उसी ने स्मृति-सुलभ पद्य में परोक्ष निन्दा की परिपाटी भी चलायी। वह सच्चे माने में आचार्य हैं। परन्तु, हम टिसियास, जार्जियास आदि की चर्चा नहीं करेंगे, जिन्होंने सत्य से अधिक सम्भावना को महत्व दिया, जो केवल भाषा के बल पर छोटी बात को बड़ी और बड़ी बात को तुच्छ सिद्ध कर सकते थे, जो नवीन को पुरातन और पुरातन को नवीन बनाकर पेश कर सकते थे और जिन्होंने किसी भी विषय पर संक्षेप में या अत्यधिक विस्तार से तर्क करने की पद्धति ढूँढ़ निकाली थी। इस आख़िरी उपलब्धि पर ही प्रोडिकस ने चुटकी ली थी कि केवल वह जानता है कि भाषण कैसा होना चाहिए—- न लम्बा, न छोटा, बल्कि सटीक।
फिदरस: प्रोडिकस सर्वश्रेष्ठ था।
सुकरात: क्या हम हिप्पियस को भूल रहे हैं? मैं मानता हूँ कि वह प्रोडिकस के विचारों का समर्थन करेगा।
फिदरस: इसमें कोई सन्देह नहीं।
सुकरात: और फिर पौलुस है। हम उसके ‘म्यूज़ मुहावरा कोश’ को क्या कहें, जिसमें पुनरुक्ति, कहावतें, सूक्ति, उपमाएँ और लाइसियस के लिए संग्रहीत शब्द हैं, जिन्हें पौलुस ने उसके अच्छे लेखन में योगदान के लिए तैयार किया था।
फिदरस: लेकिन सुकरात, क्या प्रोटागोरस भी इसी प्रकार की रचना करते हैं?
सुकरात: हाँ मेरे दोस्त, उनकी ‘अच्छी भाषा’ जैसी अनेक उत्तम रचनाएँ हैं। लेकिन अब हम उस भाषा की चर्चा करें जो निर्धनों और वृद्ध-जनों के लिए प्रयोग की जाती है। मेरी राय में चाल्सेडोन का निवासी इस भाषा में पारंगत था। वह भीड़ को आक्रोश और उत्तेजना से भर देता था और फिर अपने जादुई शब्दों से उन्हें शान्त भी कर देता था। दूसरों पर आक्षेप लगाने और दूसरों के आक्षेपों का जवाब देने में उसका कोई सानी न था।
लेकिन, ख़ैर, चर्चा आगे बढ़ाई जाए। भाषण का समापन करने की विधि के सम्बन्ध में आम तौर पर सहमति है, हालाँकि भाषण के इस हिस्से को कुछ लोग पुनर्कथन कहते हैं, कुछ लोग कोई और नाम देते हैं।
फिदरस: तुम्हारा आशय भाषण के अन्त में श्रोताओं को भाषण की मुख्य-मुख्य बातों की याद दिलाने से है?
सुकरात: हाँ। अब, यदि भाषण-कला पर कोई और टिप्पणी करना चाहते हो तो बताओ।
फिदरस: एक-दो गौण बातें हैं।
सुकरात: यदि वे गौण हैं, तो उन्हें हम छोड़ सकते हैं। लेकिन, अब तक की चर्चा से हमने जो सीखा है, उस पर हम ध्यानपूर्वक विचार करें और देखें कि इस कला के पास क्या शक्ति है और वह शक्ति कब आती है?
फिदरस: सुकरात, बड़ी सभाओं में तो इस कला की अपार शक्ति देखी जा सकती है।
सुकरात: तुमने ठीक कहा। लेकिन, मेरे दोस्त, इसे ध्यान से देखो, तो तुम्हें भी इसके ताने-बाने में कोई खोट दिखायी देगी, जैसा कि मुझे दिखता है।
फिदरस: तो मुझे भी दिखाओ।
सुकरात: तो, देखो। फ़र्ज़ करो कि कोई तुम्हारे मित्र एरिक्सीमेकस या उसके पिता एक्यूमेनस के पास जाकर कहे “मैं किसी रोगी के शरीर को अपनी मर्ज़ी के अनुसार ठंडा या गर्म कर सकता हूँ, यदि मैं चाहूँ तो उसे उल्टी, दस्त आदि करवा सकता हूँ और मैं इस ज्ञान के आधार पर मानता हूँ कि मैं एक सक्षम चिकित्सक हूँ और मैं अपना ज्ञान बाँट कर किसी को भी सक्षम चिकित्सक बना सकता हूँ।” बताओ, कि यह सुनकर उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी?
फिदरस: वे उनसे यह पूछेंगे कि क्या वह जानता है कि किस रोगी को कौन सा उपचार कब और कितनी देर तक दिया जाएगा।
सुकरात: इस पर यदि वह कहे “नहीं, मैं नहीं जानता हूँ, लेकिन मेरे छात्र इन बातों का ख़ुद ख़याल रखेंगे।”
फिदरस: इस पर वे कहेंगे, “यह आदमी पागल है। इसने कोई किताब पढ़कर किसी आम औषधि के बारे में जानकारी हासिल की है और अपने आप को चिकित्सक मानने लगा है, जबकि इसे कोई वास्तविक ज्ञान नहीं है।”
सुकरात: अब कल्पना करो कि कोई सोफोक्लीज़ या यूरीपिदस के पास जाए और यह कहे कि वह किसी मामूली विषय पर लम्बा नाटकीय भाषण और किसी क्षणिक विषय पर छोटा भाषण लिख सकता है। वह यदि चाहे तो करुणा, भय, आतंक को व्यक्त करने वाले अंश भी लिख सकता है। वह मानता है कि वह अपने छात्रों को यह हुनर सिखाकर उन्हें दुखान्त कवि बना सकता है।
फिदरस: मैं मानता हूँ वे ऐसे किसी भी व्यक्ति पर हसेंगे, जो यह नहीं जानता है कि दुखान्त नाटक में विभिन्न अंशों के बीच आपस में तथा सम्पूर्ण नाटक के साथ संगति रहती है। इस ज्ञान के बिना दुखान्त नाटक नहीं लिखा जा सकता।
सुकरात: तथापि वे उसका मज़ाक़ नहीं उडाएंगे, बल्कि उसके साथ इस तरह पेश आएंगे, जैसे कोई संगीतज्ञ ऐसे आदमी के साथ पेश आता है, जो अपने आपको केवल इसलिए संगीतज्ञ मानता है, क्योंकि वह अपने वाद्य यंत्र पर उच्चतम और निम्नतम सम्भव सुर बजा सकता है। संगीतज्ञ ऐसे आदमी को यह कहकर अपमानित नहीं करेगा कि “तुम मूर्ख हो। तुम्हें कुछ नहीं आता है।” बल्कि वह अपने पेशे का ध्यान रखते हुए उससे नरमी से पेश आएगा और कहेगा, “ मेरे प्रिय मित्र, यह सही है कि जो स्वर-साधना में निष्णात होना चाहता है, उसे वह ज्ञान अवश्य होना चाहिए, जिसका तुम उल्लेख कर रहे हो, लेकिन यह भी सम्भव है कि किसी को तुम्हारे बराबर ज्ञान हो, लेकिन स्वर-संगति का कोई ज्ञान न हो। तुम वह जानते हो, जिसे स्वर-संगति के पहले जानना ज़रूरी है, लेकिन स्वर-संगति का तुम्हें ज्ञान नहीं है।”
फिदरस: बिल्कुल सही।
सुकरात: इसी प्रकार जिसने सोफोक्लीज़ और यूरीपिदस के समक्ष ज्ञान प्रदर्शन की कोशिश की थी, उसे सोफोक्लीज़ कहेगा कि वह दुखान्त नाटक की रचना करना नहीं जानता है, बल्कि उसे रचना के पूर्व-चरण का किंचित् ज्ञान है। इसी प्रकार एक्यूमेनस भी चिकित्सा-विज्ञान और उसके पूर्व-चरण के ज्ञान के बीच फ़र्क़ करेगा।
फिदरस: तुम ठीक कह रहे हो।
सुकरात: और यदि सुमधुर अद्रास्तस या पेरिक्लीज़ यह देखते कि हम किन प्रशंसनीय युक्तियों की चर्चा कर रहे हैं—- जैसे संक्षेपण, बिम्ब-विधान आदि, जिनका हमने वर्णन किया और जिनपर हमने पर्याप्त प्रकाश डाला—- तो क्या तुम मानते हो जो लोग वक्तृत्व-कला के नाम पर ऐसी चीज़ें पढ़ा रहे हैं या जो इनका अभ्यास कर रहे हैं, उनके प्रति वे उसी तरह की सख़्ती दिखाएंगे, जैसी हम दोनों ने दिखायी है और क्या वे कठोर भाषा का प्रयोग करेंगे? या वे अपनी बुद्धिमत्ता से प्रेरित होकर हमें ही फटकारेंगे और कहेंगे, “फिदरस और सुकरात, तुम्हें इन लोगों से नाराज़ नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए। वे चूँकि द्वन्द्वात्मक शास्त्र नहीं जानते, इसलिए वे वक्तृत्व-कला की समुचित परिभाषा नहीं दे पाते हैं और इसलिए वे समझते हैं कि वक्तृत्व-कला के पूर्वचरण का आवश्यक ज्ञान प्राप्त करते ही वक्तृत्व-कला सीख ली है। इसीलिए वे अपने छात्रों को इस पूर्वचरण का ज्ञान देकर मान लेते हैं कि उन्होंने वक्तृत्व-कला की पूरी शिक्षा दे दी है। वे इन बारीकियों की ओर ध्यान नहीं देते हैं कि कैसे विभिन्न युक्तियों का प्रयोग कर प्रभाव उत्पन्न किया जाए या कैसे पूरे भाषण को सुव्यवस्थित रूप से तैयार किया जाए। छात्र जब भाषण देने लगते हैं तो वे इन चीज़ों को स्वयं सीखते हैं।
फिदरस: तुमने ठीक कहा, सुकरात। जिन लेखकों और शिक्षकों की हम चर्चा कर रहे हैं, उनकी वक्तृत्व-कला की क्या समझ है, इसका तुमने सही वर्णन किया है। मेरी निजी राय यह है कि तुमने जो कुछ कहा वह सच है। लेकिन अब यह बताओ कि सच्चा वक्ता बनने के लिए या दूसरों को समझाने-बुझाने में सही अर्थों में पारंगत बनने के लिए किस साधन का सहारा लेना चाहिए?
सुकरात: यदि तुम्हारा आशय यह पूछना है कि कोई इस कला में पूर्णता हासिल कैसे करे तो सम्भवतः—- या मैं कह सकता हूँ कि निस्सन्देह — इस कला पर भी वही बातें लागू होती हैं, जो दूसरी कलाओं पर लागू होती हैं। यदि तुम्हारे भीतर वक्तृत्व -कला की जन्मजात प्रतिभा है, तुमने ज्ञानार्जन और अभ्यास किया है तो तुम एक लोकप्रिय वक्ता बन सकते हो। यदि तुममें इन तीनों में से किसी का अभाव है तो तुम उसी अनुपात में अधूरे रहोगे। जहाँ तक कलाकार से पृथक कला की बात है, मैं लाइसियस और थ्रेसीमेचस द्वारा अपनायी गयी विधि का समर्थन नहीं करता।
फिदरस: तो, किस विधि का समर्थन करते हो?
सुकरात: मैं यह मानता हूँ, मेरे दोस्त, कि पेरिक्लीज़ वक्तृत्व-कला में सर्वोच्च स्थान का जो हक़दार बना है, उसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
फिदरस: वह क्यों?
सुकरात: सभी महान कलाओं के लिए यह आवश्यक है कि उसे प्रकृति के अध्ययन द्वारा समर्थित होना चाहिए। कलाकार को अपने विषय के छोटे-छोटे ब्यौरे का भी ज्ञान होना चाहिए। इसके साथ-साथ उसे गम्भीर चिन्तन करने का अभ्यास होना चाहिए। केवल इसी स्रोत से उच्च मानसिक स्तर और कला में पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। पेरिक्लीज़ ने अपनी जन्मजात प्रतिभा का समर्थन इन्हीं गुणों को विकसित करते हुए किया। मेरा विचार है कि एनक्सागोरस के रूप में उसे एक सही व्यक्ति मिला, जिससे उसने उच्च चिन्तन करना सीखा। एनेक्सागोरस विवेक और विवेकहीनता की प्रकृति जैसे विषयों पर बोलता था। पेरिक्लीज़ ने उनसे जो कुछ सीखा, उसे समुचित रूप से वक्तृत्व -कला पर लागू किया।
फिदरस: कैसे?
सुकरात: क्या तुम नहीं मानते वक्तृत्व -कला वैसी ही है, जैसा औषधि-विज्ञान?
फिदरस: वह कैसे?
सुकरात: दोनों ही मामलों में हमें पहले प्रकृति निर्धारित करनी पड़ती है। औषधि विज्ञान में शारीरिक प्रकृति और वक्तृत्व-कला में आत्मा की प्रकृति का ज्ञान आवश्यक है। यदि हम वैज्ञानिक दृष्टि अपनाना चाहते हैं और मात्र बँधे-बँधाये ढर्रे पर नहीं चलना चाहते हैं तो स्वास्थ्य और शक्तिवर्धन के लिए आहार और औषधि निर्धारित करने के पहले हमें शारीरिक प्रकृति को समझना होगा और इसी प्रकार
श्रोताओं में अपेक्षित गुण, विश्वास पैदा करने के लिए शब्दों और आचरण को निर्धारित करने के पहले हमें आत्मा की प्रकृति समझनी होगी।
फिदरस: सम्भवतः तुम सही हो, सुकरात।
सुकरात: तो क्या तुम समझते हो कि कोई व्यक्ति आत्मा को उसकी सम्पूर्णता में समझे बिना उसकी प्रकृति को संतोषजनक रीति से जान सकता है?
फिदरस: यदि एस्क्लेपियाड (चिकित्सक) हिप्पोक्रेटिस पर विश्वास किया जाए तो हम इस प्रक्रिया के बिना शरीर की प्रकृति भी नहीं समझ सकते।
सुकरात: उन्होंने ठीक कहा है, मेरे दोस्त। परन्तु हमें केवल हिप्पोक्रेटिस का सहारा नहीं लेना चाहिए, बल्कि हमें अपने कथन की जाँच करनी चाहिए और यह देखना चाहिए कि क्या यह सत्य है।
फिदरस: बिल्कुल।
सुकरात: तो इस प्रकृति के सम्बन्ध में हिप्पोक्रेटिस क्या कहता है और सत्य क्या है? मेरा मानना है कि किसी भी चीज़ की प्रकृति पर विचार करने का तरीक़ा इस प्रकार है: पहले तो यह निर्णय करना चाहिए कि जिस विषय पर हम वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं और जिस ज्ञान को दूसरों तक पहुँचाना चाहते हैं, वह सरल है या जटिल; दूसरा, यदि यह विषय सरल है तो इस चीज़ की खोज करनी चाहिए कि इसमें दूसरों को प्रभावित करने की कौन-सी स्वाभाविक क्षमता है और यह किस माध्यम से प्रभाव करता है; अथवा इसे किस अन्य वस्तु या माध्यम से प्रभावित किया जा सकता है; अथवा, यदि यह विषय जटिल है, तो इसे कितने अंगों में विभाजित किया जा सकता है और प्रत्येक अंग की स्वाभाविक क्षमता क्या है, वह दूसरों को कैसे प्रभावित करता है अथवा स्वयं कैसे प्रभावित होता है, आदि का निर्धारण उसी प्रकार किया जाना चाहिए, जैसे सरल विषय के मामले में किया जाता है।
फिदरस: सम्भवत:, सुकरात।
सुकरात: बिना इस पद्धति का अनुसरण किये कोई अनुसंधान करना महज़ एक अन्धे आदमी का प्रयत्न माना जाएगा। कोई वैज्ञानिक शोधकर्ता किसी अन्धे या बहरे व्यक्ति की तरह आचरण नहीं कर सकता। ज़ाहिर है कि यदि हम लोगों को वैज्ञानिक रीति से सम्बोधित करना चाहते हैं तो उन्हें सही-सही बताना होगा कि हमारे भाषण की विषय-वस्तु की वास्तविक प्रकृति क्या है। और वह विषय-वस्तु मेरे विचार में आत्मा है।
फिदरस: ठीक।
सुकरात: और इसलिए वक्ता का सारा प्रयास उसी पर केन्द्रित रहता है, क्योंकि वह आत्मा में ही विश्वास आरोपित करने का प्रयास करता है। नहीं?
फिदरस: हाँ।
सुकरात: तो यह स्पष्ट है कि थ्रेसिमेचस या कोई और यदि वैज्ञानिक वक्तृत्व -कला का प्रदर्शन करना चाहता है, तो वह सबसे पहले आत्मा का सटीक वर्णन करेगा और हमें दिखलाएगा कि आत्मा की प्रकृति एकल या समरूप है या शरीर की तरह ही जटिल है। ऐसा करना हमारी दृष्टि से किसी वस्तु का स्वभाव दर्शाना है।
फिदरस: हाँ, निस्सन्देह।
सुकरात: और इसके बाद वह दूसरी बात यह बताएगा कि दूसरों को प्रभावित करने की उसकी स्वाभाविक क्षमता क्या है या वह किस माध्यम से प्रभावित करता है या किस प्रकार आत्मा को प्रभावित किया जा सकता है।
फिदरस: बिल्कुल।
सुकरात: और तीसरी बात यह कि वह विभिन्न प्रकार के सम्भाषणों और आत्माओं का वर्गीकरण करेगा। वह बताएगा कि आत्माएँ कितने भिन्न-भिन्न तरीक़ों से प्रभावित होती हैं। वह हर मामले में कारण बताएगा और यह भी सुझाएगा कि भिन्न-भिन्न प्रकार की आत्माओं के लिए कैसे अलग-अलग प्रकार के भाषण उपयुक्त हैं। वह यह दर्शाएगा कि किसी आत्मा में विश्वास पैदा करने के लिए और किसी दूसरी आत्मा में अविश्वास पैदा करने के लिए किस प्रकार के भाषणों का सहारा लिया जा सकता है।
फिदरस: हाँ, यह एक बेहतरीन प्रक्रिया होगी।
सुकरात: वस्तुत: मेरे दोस्त मैं तुम्हें यक़ीन दिला सकता हूँ कि वर्तमान विषय या किसी अन्य विषय पर प्रकाश डालने के लिए कोई और वैज्ञानिक विधि नहीं हो सकती, जिसे तुम विद्यालयों में पढ़ाये जाने वाले नमूनों या वास्तविक रूप से दिये गये भाषणों में भी देख सकते हो। परन्तु, वक्तृत्व- कला सिखाने वाली आधुनिक पुस्तकों के लेखक धूर्त हैं। वे आत्मा के बारे में जानते हैं, लेकिन वे उस ज्ञान की चर्चा नहीं करते हैं। इसलिए हम उनके इस दावे को स्वीकार नहीं कर सकते कि वे वैज्ञानिक रीति से लिखते हैं। उनका दावा तभी स्वीकार्य होगा जब वे अपने भाषण और लेखन में वही पद्धति अपनाएंगे जिसका हमने वर्णन किया है।
फिदरस: यह क्या पद्धति है।
सुकरात: उपयुक्त शब्दों में बताना कठिन होगा, तथापि मैं यह कहने के लिए पूरी तरह तैयार हूँ कि यदि कोई यथासम्भव वैज्ञानिक रीति से रचना करना चाहता है तो वह किस प्रकार आगे बढ़े।
फिदरस: तो बताओ।
सुकरात: चूँकि भाषण कला का उद्देश्य लोगों की आत्माओं को प्रभावित करना है, तो इच्छुक वक्ता को यह ज्ञात रहना चाहिए कि आत्माओं के कितने प्रकार हैं। इन आत्माओं के विविध रूपों की एक निश्चित संख्या है और यह विविधता ही विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों में दिखायी पड़ती है। इस प्रकार वर्गीकृत/विभेदीकृत आत्माओं के विभिन्न प्रकारों के अनुसार ही निश्चित संख्या में सम्भाषणों के प्रकार भी मिलते हैं। अतः एक विशेष प्रकार का श्रोता एक विशेष प्रकार के भाषण से ही किसी कार्य को करने के लिए आसानी से समझाया जा सकेगा, जबकि अन्य प्रकार का श्रोता उस भाषण से प्रभावित नहीं होगा। वक्ता को इन बातों की पूरी समझ होनी चाहिए और यदि उसने विद्यालय में जो कुछ सीखा था उससे वह लाभ उठाना चाहता है, तो उसे इन सब बातों को मनुष्यों के आचरण में घटित होते हुए देखना चाहिए और इसे जाँचने-परखने के लिए अपनी नज़र पैनी रखनी चाहिए। जब वह यह कहने में सफल हो जाए कि किस प्रकार का इन्सान किस प्रकार के भाषण से प्रभावित होगा, तब वह किसी व्यक्ति को देखकर सोचेगा “ मेरे समक्ष जो यह इन्सान है, वह वस्तुतः वह चरित्र है, जिसके बारे में मैंने विद्यालय में सुना था और इसे ’इन’ बातों के लिए राज़ी करने के लिए मुझे ‘इन’ तर्कों का ‘इस’ रीति से प्रयोग करना पड़ेगा।” और जब इन सबके साथ-साथ वह जानता है कि बोलने और चुप रहने के उपयुक्त अवसर कौन-से हैं; वह समझता है कि विभिन्न शैलियों यथा समास शैली, करुण शैली, अतिरंजना और अन्य शैलियों के प्रयोग का समय है या नहीं— तभी माना जाएगा कि वह अपनी कला का अच्छा जानकार है या नहीं। परन्तु, यदि वह अपने भाषण या अध्यापन या लेखन में इनमें से किसी भी अपेक्षा का पालन करने में चूक करता है तो भले ही वह दावा करे कि वह वक्तृत्व-कला का जानकार है, हमें उसके दावे को स्वीकार नहीं करना चाहिए।
अब यदि हमारा लेखक हमें कहे, “ फिदरस और सुकरात, इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है? क्या तुमलोग हमसे सहमत हो या हमें भाषण-कला का कोई और निरूपण स्वीकार करना होगा?
फिदरस: निस्सन्देह हमें कोई और निरूपण स्वीकार नहीं होगा, सुकरात। लेकिन यह काफ़ी कठिन कार्य है।
सुकरात: तुम ठीक कह रहे हो और इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपने तर्कों की पूरी जाँच करें और देखें कि क्या इस कला को हासिल करने के लिए कोई सरल और संक्षिप्त मार्ग है। यदि कोई आसान रास्ता उपलब्ध हो तो हम दीर्घ और कठिन मार्ग से क्यों चलें? इस सम्बन्ध में यदि तुमने लाइसियस या किसी और से कुछ सुना हो तो याद कर बताओ।
फिदरस: मैं याद करने की कोशिश कर सकता हूँ, लेकिन अभी तत्काल कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूँ।
सुकरात: तो क्या तुम मुझसे वह सुनना चाहोगे जिसे मैंने उनसे सुना है जिनका इन मामलों में दख़ल है?
फिदरस: क्यों नहीं?
सुकरात: वैसे फिदरस, मैंने सुना है कि हमें अपने धुर विरोधी का पक्ष भी सुनना चाहिए।
फिदरस: तो उनका पक्ष रखो।
सुकरात: वे कहते हैं कि इस कला को इतना अधिक दुरूह बनाने की ज़रूरत नहीं है। इच्छुक वक्ता के लिए यह जानना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है कि न्यायपूर्ण या अच्छा आचरण क्या है या अच्छा और न्यायनिष्ठ आदमी कौन है, उसके गुण जन्मजात हैं या शिक्षा की बदौलत हैं। अदालतों में कोई भी इन बातों की परवाह नहीं करता है। वहाँ केवल यह देखा जाता है कि क्या स्वाभाविक है। जो स्वाभाविक है उसे सम्भाव्य सच माना जा सकता है। भाषण-कला में निपुणता हासिल करने के इच्छुक लोगों को केवल सम्भाव्य सच से सम्बन्ध रखना चाहिए। कभी-कभी वास्तविक तथ्यों का भी उल्लेख नहीं करना चाहिए, यदि वे सम्भाव्य सच के विपरीत हों। अभियोग या बचाव दोनों पक्षों को वास्तविक तथ्यों के बजाय सम्भाव्य सच का उल्लेख करना चाहिए। आप जो भी कहें आप इसी सम्भाव्य सच का अनुसरण करें और सत्य को आप सदा के लिए अलविदा कह सकते हैं। आप अपने भाषण में हमेशा इस नियम का पालन करें तो आप अपनी कला में पूर्णता हासिल कर सकते हैं।
फिदरस: सुकरात तुमने जो कहा, वह वही है, जो भाषण-कला के विशेषज्ञ होने का दावा करने वाले कहते हैं। कुछ देर पहले ही हमने इस तरह के दावे की संक्षिप्त चर्चा की थी। जो पेशेवर हैं वे इस विशेषता को बहुत महत्व देते हैं।
सुकरात: बहुत अच्छा। तिसियस की ही चर्चा करो। तुमने तिसियस को ध्यान से पढ़ा होगा। क्या तिसियस यह मानता है कि सम्भाव्य सच वह सच है जिसे बहुमत मानती है?
फिदरस: इसके सिवा और क्या हो सकता है?
सुकरात: तो, उसने जो गुरु-गम्भीर सत्य का आविष्कार किया है उसका यह परिणाम होगा कि यदि किसी कमजोर लेकिन बहादुर आदमी ने किसी कायर लेकिन ताक़तवर आदमी का अंगरखा या कोई और पोशाक लूट ली हो और इस जुर्म में उसे गिरफ़्तार किया गया हो तो दोनों में से किसी को भी सच्चाई बयान नहीं करना चाहिए। कायर आदमी को यह नहीं कहना चाहिए कि बहादुर आदमी ने उसपर अकेले हमला किया है और बहादुर आदमी को यह कहना चाहिए कि उन दोनों के सिवा कोई तीसरा नहीं था और उसे इस प्रसिद्ध युक्ति का सहारा लेना चाहिए कि “मेरे जैसा छोटा आदमी इस भारी-भरकम आदमी को कैसे लूट सकता है।” इसपर उस भारी-भरकम आदमी को अपनी कायरता का एलान नहीं करना चाहिए, बल्कि कोई नया झूठ पेश करना चाहिए, जिसपर उसका विरोधी आपत्ति करेगा। अन्य मामलों के लिए भी इसी प्रकार के ‘वैज्ञानिक’ नियम दिये गये हैं। क्यों ऐसा नहीं है, फिदरस?
फिदरस: हाँ, ऐसा ही है।
सुकरात: क्या ख़ूब! ऐसा लगता है तुम्हारे तिसियस या उसके नाम पर दूसरों ने एक गुप्त कला खोज निकाली है। लेकिन मेरे दोस्त, क्या उनसे हम यह नहीं कहें…
फिदरस: क्या?
सुकरात: यह “सच तो यह है, तिसियस, कि आपके आगमन के कुछ पहले से ही हम यह कहते आ रहे हैं कि बहुसंख्यक आबादी के लिए सम्भाव्य सच वह है जो सत्य के सदृश हो और अभी-अभी हमने कहा है कि यह सादृश्य सबसे अच्छी तरह वह रेखांकित कर सकता है जो सच जानता हो। अतः, यदि आपको भाषण कला के सम्बन्ध में कुछ और कहना हो तो हमें सुनकर ख़ुशी होगी, अन्यथा हम अपनी इस बात पर अड़े रहेंगे कि भाषण-कला के प्रशिक्षणार्थी को एक ओर तो अपने भावी श्रोताओं की प्रकृति का विश्लेषण करने आना चाहिए, तो दूसरी ओर अपने विषय-वस्तु को उसके प्रकारों में विभाजित कर , हर वस्तु को एक ‘रूप’ या एक ‘विचार’ के अन्तर्गत लाना चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं करेगा तो उसे वह सफलता नहीं मिलेगी जो मानव जाति के लिए सम्भव है। अथक परिश्रम के बिना यह क्षमता प्राप्त नहीं हो सकती। विवेकवान व्यक्ति अपना सारा प्रयास केवल अपने समकालीन इन्सानों को सम्बोधित करने में नहीं लगाएगा, बल्कि वह ऐसे भाषण देने की योग्यता हासिल करना चाहेगा जो देवताओं को प्रिय हो। वह अपने सारे क्रिया-कलापों में यथासम्भव देवताओं की इच्छा के अनुकूल आचरण करेगा, क्योंकि, जैसा कि, तिसियस, आपको मालूम होगा, हमसे अधिक समझदार लोगों ने सच ही कहा है कि बुद्धिमान व्यक्ति को छोटे-मोटे अपवादों को छोड़कर उन लोगों को प्रसन्न करने के लिए कार्य नहीं करना चाहिए, जो उनकी तरह ही दास हैं, बल्कि उसे अपने सर्वोत्कृष्ट स्वामियों (देवताओं) को सन्तुष्ट करने का प्रयास करना चाहिए। इसलिए आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि हमने अपनी बात कहने के लिए एक लम्बी परिक्रमा की। हमने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि हमारा लक्ष्य उच्चतर है, हालाँकि यह लक्ष्य वह नहीं है, जो आप सोचते हैं। हमारा तर्क यह भी है कि यदि आप महत्तर लक्ष्य का अनुसरण करते हैं, तो इसके फलस्वरूप आपके छोटे-छोटे लक्ष्य भी प्राप्त हो सकते हैं।”
फिदरस: सुकरात, तुम्हारी योजना बेहतरीन है, बशर्ते उसपर कोई अमल करे।
सुकरात: यदि कोई इन्सान अच्छे काम को हाथ में लेता है, तो उसे अच्छाई का ध्यान रखना चाहिए।
फिदरस: अवश्य।
सुकरात: तो अब हम यह कह सकते हैं कि हमने भाषण-कला, सच्ची और झूठी, दोनों पर पर्याप्त प्रकाश डाला है।
फिदरस: सही।
सुकरात: लेकिन लेखन में औचित्य और अनौचित्य का प्रश्न अभी बाक़ी है, यानी कौन सी बातें लेखन को सही या ग़लत बनाती हैं।
फिदरस: हाँ।
सुकरात: क्या तुम जानते हो, लेखन में शब्दों के प्रयोग के द्वारा हम किस प्रकार देवता को प्रसन्न कर सकते हैं?
फिदरस: नहीं, क्या तुम जानते हो?
सुकरात: हमें पूर्ववर्तियों से जो परम्परा मिली है, उसकी चर्चा कर सकता हूँ, हालाँकि उसकी सच्चाई वे ही जानें। क्या हमें मानव जाति की कपोल-कल्पनाओं से प्रभावित होना चाहिए?
फिदरस: यह सवाल हास्यास्पद है। फिर भी, तुम जिस परम्परा की बात कर रहे हो, उसे बताओ।
सुकरात: अस्तु! कथा इस प्रकार है कि मिस्र के नौक्रेटिस इलाक़े में एक प्राचीन देवता का निवास था। इस देवता का नाम थ्यूथ है और बुज्जा ( आइबिस) पक्षी इस देवता के लिए पवित्र पक्षी है। इसी देवता ने अंकगणित, ज्यामिति, खगोल-विद्या, बिसात और पाँसा के साथ-साथ लेखन का आविष्कार किया था। उस समय पूरे देश का राजा थेमस था, जो दक्षिणी मिस्र के प्रसिद्ध नगर में निवास करता था, जिसे यूनानवासी मिस्री थेब्स कहा करते थे और जो थेमस कोएमन कहते थे। तो इस राजा के पास थ्यूथ देवता आये और उन्होंने अपनी कला के बारे में बताया और राजा से कहा कि उसकी कला मिस्र के सभी निवासियों में प्रचारित की जाए।
ऐसा कहा जाता है कि प्रत्येक कला के पक्ष और विपक्ष में थेमस के अपने विचार थे। यहाँ उसका विस्तार से वर्णन करने में बहुत समय लगेगा। जब लेखन की बात उठी तो थ्यूथ ने कहा, “राजन्, यह ऐसी विद्या है, जो मिस्रवासियों को अधिक बुद्धिमान बनाएगी और उनकी याददाश्त को मज़बूत करेगी। मेरी यह खोज स्मरण-शक्ति और विवेक प्रदान करेगी।” परन्तु, राजा ने यह उत्तर दिया, “हे कलावन्त, कला का आविष्कार करने की प्रतिभा जैसे सबको नहीं मिलती है, उसी प्रकार उस कला के प्रयोग से होने वाले लाभ-हानि का मूल्याँकन करना भी सबके वश की बात नहीं है। यह बात आप पर भी लागू है, क्योंकि लेखन-कला को जन्म देने के कारण आप इस कला के प्रति पक्षपात कर रहे हैं और इसके सच्चे प्रभाव के बजाय इसके विपरीत प्रभाव की चर्चा कर रहे हैं। यदि लोगों ने लेखन सीख लिया तो उनकी आत्मा में विस्मृति स्थापित हो जाएगी। वे स्मरण शक्ति का प्रयोग करना बन्द कर देंगे , क्योंकि वे अब लिखित दस्तावेज़ों पर निर्भर करेंगे। वे स्वयं कुछ याद करना छोड़ देंगे और केवल बाह्य चिह्नों का सहारा लेंगे। आपने जिस कला का आविष्कार किया है, वह स्मरण-शक्ति नहीं बढ़ाएगी, बल्कि वह केवल याद दिलाने का काम करेगी। यह सच्ची बुद्धिमानी नहीं है कि आप अपने अनुयायियों को असली कला नहीं बल्कि उसका सादृश्य दे रहे हैं, क्योंकि आप लेखन के माध्यम से उनके सामने प्रचुर सामग्री तो रख रहे हैं, लेकिन शिक्षा नहीं दे रहे हैं। ऐसा लगेगा कि वे बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में उनका ज्ञान आधा-अधूरा होगा। वे ज्ञान से नहीं, बल्कि ज्ञान के अभिमान से भरे रहेंगे और इस तरह वे अपने बन्धुओं पर बोझ साबित होंगे।”
फिदरस: सुकरात, तुम्हारे लिए कहानियाँ गढ़ना बायें हाथ का खेल है, चाहे उनका सम्बन्ध मिस्र से हो या किसी दूसरे देश से।
सुकरात: मेरे दोस्त, दोदोना में ज़्यूस के मन्दिर के अधिकारी बताते हैं कि पहली भविष्यवाणी करने वाला बलूत का एक पेड़ था। सच तो यह है कि पुराने ज़माने के लोग तुम नवयुवकों जैसे होशियार नहीं थे, इसलिए वे अपने भोलेपन में पेड़-पौधों या पत्थरों से भी सच जानने के लिए तत्पर रहते थे। ज़ाहिर है तुमलोगों को इस बात से बहुत फ़र्क़ पड़ता है कि वक्ता कौन है और किस देश का है; तुम्हें केवल इससे सन्तुष्टि नहीं मिलती कि जो वह कह रहा है, वह सच है या नहीं।
फिदरस: तुम्हारा डाँटना जायज़ है। मैं मानता हूँ कि थेब्सवासी का लेखन के बारे में विचार सही है।
सुकरात: तो, यदि कोई अपने पीछे कोई लिखित दिशानिर्देश छोड़ दे और कोई दूसरा उस दिशानिर्देश को पाकर यह सोचे कि उस दिशानिर्देश से उसे कोई विश्वसनीय और चिरस्थायी ज्ञान प्राप्त हो जाएगा, तो ऐसे व्यक्ति को मैं नादान ही मानूंगा। अवश्य ही वह एमन के विचार से अनभिज्ञ होगा यदि वह यह नहीं जानता है कि लिखित शब्द केवल ऐसे व्यक्ति को याद दिलाने का काम करते हैं जो पहले से ही सम्बन्धित विषय जानता है।
फिदरस: बिलकुल सच!
सुकरात: तुम जानते हो, फिदरस, लेखन की एक अनोखी विशेषता है, जो उसे चित्रकला के सदृश बनाती है। तुम्हारे सामने किसी चित्रकार की कलाकृति हो, तो उसे देखकर ऐसा लगता है जैसे वह कलाकृति बोल उठेगी, लेकिन यदि तुम उस चित्र से कोई प्रश्न पूछो तो वह एक गम्भीर मौन धारण किये रहता है। लिखित शब्दों के साथ भी ऐसा ही है; ऐसा लगता है, जैसे वे तुमसे बात कर रहे हैं, मानो वे बहुत मेधावी हों; परन्तु यदि आप जिज्ञासावश उनसे कुछ पूछ बैठते हैं, तो वे अपनी कही बात को ही दोहराते रहते हैं। एक बार कोई बात जब लिपिबद्ध कर ली जाती है, तो वह रचना किसी के भी हाथ में पड़ सकती है—— जो उसे समझते हैं, उनके हाथ में और जिनका उससे कोई सरोकार नहीं है, उनके भी हाथों में। रचना यह नहीं जानती है कि सही या ग़लत व्यक्ति को कैसे अलग-अलग सम्बोधित किया जाए। यदि कोई उसका दुरुपयोग करता है या उसपर ग़लत इल्ज़ाम लगाता है तो वह अपना ख़ुद बचाव नहीं कर सकती। उसे बचाव के लिए अपने रचयिता से मदद लेना आवश्यक हो जाता है।
फिदरस: एक बार फिर तुम बिल्कुल सही हो।
सुकरात: अब तुम मुझे बताओ कि क्या कोई और सम्भाषण है, जो लिखित रचना जैसा ही है, लेकिन जिसके औचित्य पर कोई सवाल उठाया नहीं जा सकता? क्या हम यह जान सकते हैं कि यह सम्भाषण कैसे उत्पन्न होता है और क्यों यह लेखन की तुलना में बेहतर और अधिक प्रभावी है?
फिदरस: तुम किस सम्भाषण की बात कर रहे हो?
सुकरात: मैं उस सम्भाषण की बात कर रहा हूँ जो ज्ञान का वहन करता है, जो सीखने वाले की आत्मा में लिखा जाता है, जो अपना बचाव कर सकता है और जो यह जानता है कि उसे किससे बात करनी है और किससे नहीं।
फिदरस: तुम्हारा आशय निर्जीव सम्भाषणों से नहीं, अपितु जीवित भाषा से है, वह, जो मूल है और लिखित सम्भाषण जिसकी एक परछाई मात्र है।
सुकरात: बिल्कुल। अब मुझे यह बताओ कि यदि किसी चतुर किसान के पास कुछ बीज हों और वह उन बीजों से फल प्राप्त करना चाहता हो, तो क्या वह उन बीजों को एंडोनिस के बाग़ में ग्रीष्म ऋतु के दौरान बोएगा और आठ दिन के भीतर ही फल की अपेक्षा करेगा? यदि वह ऐसा करता है , तो क्या यह केवल एक मज़ाक़ नहीं होगा? यदि वह गम्भीर है तो क्या वह एक वैज्ञानिक कृषक की तरह उपयुक्त ज़मीन में बीज नहीं बोएगा और आठ महीने तक फल का इन्तज़ार नहीं करेगा?
फिदरस: सुकरात, तुम सही कह रहे हो कि कोई किसान गम्भीर है या मज़ाक़ कर रहा है, इसका हम फ़र्क़ कर सकते हैं।
सुकरात: तो, क्या हम यह मान सकते हैं कि जिसे यह ज्ञान है कि क्या उचित है, क्या श्रेष्ठ है और क्या शुभ है, उसे उस किसान से कम विवेक है, जो यह जानता है कि बीजों के साथ क्या किया जाए?
फिदरस: नहीं।
सुकरात: यदि ऐसा है तो वह गम्भीरतापूर्वक अपनी क़लम को पानी या काले द्रव, जिसे हम स्याही कहते हैं, में डुबोकर ऐसे शब्द नहीं बोएगा, जो न तो अपना भली-भाँति बचाव कर सकते हैं और न सत्य को सही-सही व्यक्त कर सकते हैं।
फिदरस: नहीं। ऐसा नहीं होना चाहिए।
सुकरात: नहीं। ऐसा नहीं है। मेरा मानना है कि वह साहित्यिक बाग़ों में बीज बोने का काम अर्थात् लिखने का काम महज़ एक शौक़ के बतौर करेगा, ताकि बुढ़ापे में विस्मृति के दौरान उन्हें पढ़कर अपनी स्मृति ताज़ा की जा सके तथा जो लोग उसके अनुयायी हैं, उन्हें भी उससे लाभ मिल सके। जब दूसरे लोग फ़ुरसत के क्षणों में विभिन्न प्रकार की दावतों, मद्यपान आदि में शरीक होते हैं, वह इनके बजाय बेहतर मनोरंजन का सहारा लेगा।
फिदरस: हाँ, सुकरात, यह कितना बेहतरीन मनोरंजन है! जब इन्सान न्याय और अन्य विषयों पर सम्भाषण करते समय शब्दों से अपना मनोरंजन करता है, तो वह मनोरंजन अन्य प्रकार के मनोविनोद से कितना बेहतर है!
सुकरात: हाँ फिदरस। मेरे विचार में इससे भी बेहतर वह सम्भाषण है, जिसमें द्वन्द्वात्मक विधि अपनायी जाती है। ऐसी विधि का अनुसरण करने वाला व्यक्ति एक सही पात्र चुनता है और उसकी आत्मा में ज्ञान पर आधारित शब्द बोता है—-ऐसे शब्द , जो अपना भी बचाव कर सकते हैं और उनका भी जिन्होंने वे शब्द बोए हैं—-ऐसे शब्द , जो अनुर्वर नहीं हैं, बल्कि उनमें ऐसे बीज हैं, जिनसे नये शब्द, नये चरित्र जन्मेंगे। इस प्रकार उन बीजों को अमरत्व मिलेगा और जिनके पास भी वे शब्द होंगे, उन्हें एक अनिवर्चनीय आनन्द प्राप्त होगा।
फिदरस: यह कहीं अधिक उत्तम मार्ग है।
सुकरात: चूँकि यह बात सिद्ध हो चुकी है, इसलिए फिदरस, हम दूसरे मुद्दे की ओर बढ़ें।
फिदरस: वह क्या?
सुकरात: मैं उस मुद्दे की बात कर रहा हूँ, जिसकी छानबीन हम वर्तमान निष्कर्ष पर पहुँचने के पहले करना चाहते थे। हम भाषण-लेखन के सम्बन्ध में लाइसियस पर लगाये गये आरोपों की जाँच करना चाहते थे और उसके साथ-साथ इस सामान्य प्रश्न पर विचार करना चाहते थे कौन सी चीज़ भाषण लेखन को कला बनाती है या नहीं बनाती है। मेरा मानना है कि हमने कला के प्रश्न पर पूरा विचार कर लिया है।
फिदरस: हाँ, मुझे भी लगता है, लेकिन एक बार फिर मुझे याद दिलाओ कि हमने यह सब कैसे किया।
सुकरात: इस सम्बन्ध में निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना होगा। पहला, तुम जिस विषय पर बोलना या लिखना चाहते हो, उस सम्बन्ध में तुम्हें सत्य का ज्ञान रहना चाहिए; अर्थात्, तुम्हें इस प्रकार का ज्ञान होना चाहिए, ताकि तुम उसकी अलग से परिभाषा दे सको और उसे परिभाषित करने के बाद उसे उसके विभिन्न प्रकारों में विभाजित कर सको और उसे तब तक विभाजित कर सको जब तक वह और आगे विभाजित न हो सके। दूसरा, तुम्हें आत्मा की प्रकृति का भी उसी स्तर का ज्ञान होना चाहिए। अलग-अलग स्वभाव के व्यक्तियों के लिए अलग-अलग प्रकार की भाषा का चुनाव करना चाहिए और तदनुरूप अपने भाषण को तैयार करना चाहिए। मिले-जुले स्वभाव वाले व्यक्तियों के लिए मिली-जुली शैली का भाषण होना चाहिए, जिसमें सम्बोधन के अनेक तरीक़ों का प्रयोग हो सकता है, जबकि सरल स्वभाव के व्यक्तियों को सम्बोधित करने का तरीक़ा सरल होगा। तुम्हारा उद्देश्य किसी विषय की व्याख्या करना हो या श्रोताओं को किसी बात के लिए विश्वस्त करना हो और यदि तुम भाषा का वैज्ञानिक रीति से प्रयोग करना चाहते हो और इस क्षेत्र में मानवलभ्य क्षमता हासिल करना चाहते हो तो तुम्हें उपर्युक्त विधि का पालन करना होगा। अब तक हुई हमारी क्षमता का यही सारांश है।
फिदरस: हाँ, निस्सन्देह हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचे थे।
सुकरात: और अब हम दूसरे प्रश्न की ओर मुड़ते हैं। भाषण की रचना और उसकी अदायगी सराहनीय है या निन्दनीय ? वह किन परिस्थितियों में आपत्तिजनक हो सकती है? इस सम्बन्ध में हमारा पूर्व निष्कर्ष यह था कि….
फिदरस: कौन-सा निष्कर्ष?
सुकरात: यह निष्कर्ष कि कोई भी रचना, अतीत की या भविष्य की, लाइसियस की या किसी और की, निजी क्षमता में रची गयी हो अथवा सार्वजनिक भूमिका निभाते हुए किसी क़ानून की प्रस्तावना में राजनीतिक रचना की गयी हो, आपत्तिजनक मानी जाएगी, भले ही आपत्ति को स्वर दिया गया हो या नहीं, यदि रचनाकार यह मानता है कि रचना में कोई महत्वपूर्ण चिरस्थायी सत्य व्यक्त हुआ है, क्योंकि जिस रचना में न्याय और अन्याय, अच्छाई और बुराई के यथार्थ दर्शन और काल्पनिक स्वप्निल छवि के बीच फ़र्क़ न किया गया हो, वह दोषपूर्ण ही होगी, भले ही जनसमुदाय उसकी वाहवाही करे।
फिदरस: सच में!
सुकरात : दूसरी ओर, यदि कोई आदमी यह मानता है कि किसी भी विषय पर लिखी रचना में काफ़ी कुछ ऐसा होगा, जो काल्पनिक होगा, पद्य या गद्य में जो कुछ भी लिखा गया है, वह अत्यंत गम्भीर ध्यान के उपयुक्त नहीं है। वस्तुतः, जितने भी आवेशमय जोशोखरोश वाले भाषण हैं, उनका उद्देश्य प्रश्न पूछे बिना या स्पष्टीकरण दिये बिना लोगों को किसी बात के लिए राज़ी कराना है। ऐसी रचनाएँ ज़्यादा से ज़्यादा उनके लिए स्मरण दिलाने का काम करती हैं, जो पहले से ही सत्य जानते हैं। न्याय,प्रतिष्ठा और अच्छाई के विषय पर दिये गये ऐसे भाषण, जिनमें किसी को शिक्षित करने के लिए विषय की विस्तृत व्याख्या की गयी हो——ऐसी रचनाएँ वस्तुतः श्रोता की आत्मा में लिखी जाती हैं और ऐसी रचनाओं को रचयिता की वैध सन्तानों का दर्जा दिया जाना चाहिए। यह दर्जा उन्हीं रचनाओं को दिया जा सकता है जो मुख्य रूप से किसी आदमी के खुद भीतर जन्म लेती हैं और गौण रूप से उन रचनाओं को जो दूसरों की आत्माओं में सही-सही उभरी हैं। जो लोग ऐसा विश्वास करते हैं और जो ऐसी रचनाओं को छोड़कर अन्य रचनाओं को महत्व नहीं देते, वे ऐसे लोग हैं जिनके उदाहरण हम दोनों अनुसरण करने की कामना रखते हैं।
फिदरस: सच में, मेरी कामना इसी प्रकार की है।
सुकरात: तब हम यह मान सकते हैं कि हमने जो यह साहित्यिक मनबहलाव किया है, उसे हमने एक संतोषजनक समाधान तक पहुँचा दिया है। अब तुम जाकर लाइसियस को कह सकते हो कि हम टहलते हुए नीचे नदी तक गये, जहाँ अप्सराओं का पवित्र स्थान है। वहाँ हमने उन शब्दों को सुना जिनसे हमें प्रेरणा मिली है कि पहले लाइसियस को और सम्भाषणों के सकल रचयिताओं को, इसके बाद होमर को और समस्त कवियों को जिन्होंने काव्य-पाठ या गायन के लिए काव्य लिखा है और अन्त में सोलन और उन जैसे राजनीतिक रचनाओं के रचयिताओं को, जिन्होंने क़ानून की रचना की है, हम यह सन्देश दें कि यदि उनमें से किसी ने अपना कार्य इस आधार पर किया है कि उसे सत्य का ज्ञान है तथा यदि उसे चुनौती दी जाए तो वह अपना बचाव कर सकता है तथा ख़ुद अपनी रचनाओं के दोष दर्शा सकता है, तो उसे उसके लेखन के आधार पर सम्बोधित नहीं किया जाएगा, बल्कि उसे ऐसे नाम से पुकारा जाएगा, जो उसकी गम्भीर साधना का परिचायक होगा।
फिदरस: तो तुम उसे किस नाम से पुकारोगे?
सुकरात: फिदरस, ऐसे व्यक्ति को ज्ञानी कहना तो मेरी समझ में अतिशयोक्ति होगी, क्योंकि यह विशेषण केवल देवताओं के लिए शोभनीय है। हाँ, उसे ज्ञान का प्रेमी या ऐसे ही किसी समानार्थी नाम से पुकारना अधिक उपयुक्त होगा।
फिदरस: हाँ, यह सही होगा।
सुकरात: दूसरी ओर, ऐसे लोग जिनके पास कहने के लिए कोई मूल्यवान कथ्य नहीं है और अपनी रचनाओं पर घंटों मशक़्क़त करते हैं—— कभी उसे एक रूप देते हैं, तो कभी कोई दूसरा रूप, कभी अलग-अलग अनुच्छेदों को आपस में जोड़ते-तोड़ते हैं —— तो ऐसे लोगों को कवि या भाषण-लेखक या क़ानून-लेखक कहा जा सकता है।
फिदरस: बिलकुल सही।
सुकरात: तो तुम अपने दोस्त को यह सब बता सकते हो।
फिदरस: और तुम? तुम क्या करने वाले हो? तुम्हारा भी तो एक दोस्त है, जिसकी तुम्हें उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
सुकरात: कौन?
फिदरस: ख़ूबसूरत इसोक्रेटिस। सुकरात, तुम उसे क्या सन्देश दोगे और हम उसे किस नाम से पुकारेंगे।
सुकरात: इसोक्रेटिस तो अभी अल्पवयस है, फिदरस, लेकिन मैं उसके भविष्य का अनुमान लगा सकता हूँ।
फिदरस: और वह भविष्य क्या है?
सुकरात: मुझे ऐसा लगता है, उसकी जन्मजात प्रतिभा लाइसियस द्वारा साहित्य में अर्जित किसी भी उपलब्धि से उच्चतर है। उसका चरित्र भी श्रेष्ठतर तत्वों से बना है। इसलिए मुझे आश्चर्य नहीं होगा यदि वह आगामी वर्षों में अपने सभी साहित्यिक पूर्ववर्तियों से आगे निकल जायेगा—-बशर्ते, वह जिस प्रकार का लेखन आज कर रहा है, उसे वह जारी रखे और अपने कार्य से सन्तुष्ट न होने के कारण उसे और भी महत्तर रचनाओं की प्रेरणा मिले; क्योंकि, फिदरस, उस प्रतिभा में एक जन्मजात दार्शनिकता का भाव है।
तो, इस स्थल के देवताओं की ओर से मैं अपने प्रिय इसोक्रेटिस को यही सन्देश देता हूँ। तुम्हारे प्रिय लाइसियस के लिए भी मैंने देवताओं का सन्देश दे दिया है।
फिदरस: ऐसा ही हो! अब हम वापस चल सकते हैं। अब धूप उतनी असह्य नहीं रह गयी है।
सुकरात: क्या हम जाने के पहले इस स्थान के देवी-देवताओं से प्रार्थना नहीं करेंगे?
फिदरस: क्यों नहीं?
सुकरात: इस स्थान पर निवास करने वाले प्रिय पैन और अन्य देवता! हमें वर दें कि हम अन्तर्मन से सुन्दर हों और हमारे पास जो भी बाह्य सम्पदा हो उसका हमारे आन्तरिक सौन्दर्य से टकराव न हो। मैं उसे सम्पन्न मानूँ जो बुद्धिमान है और जहाँ तक स्वर्ण की बात है, मेरे पास वह उतना ही हो, जितना एक संयमी आदमी वहन कर सके।
क्या हम और किसी चीज़ के लिए प्रार्थना करें फिदरस? यह प्रार्थना मुझे सन्तुष्टि देती है।
फिदरस: मेरे लिए भी यही प्रार्थना करो, क्योंकि दोस्तों के लिए सब कुछ साझा है।
सुकरात: चलो, वापस चलें।
No comments:
Post a Comment