चेखव
दो सिपाही एक लफ़ंगे को पकड़कर ज़िला मुख्यालय ले जा रहे थे। उस लफंगे ने अपना नाम याद करने से इन्कार कर दिया था। एक सिपाही की टांगें बहुत छोटी थीं, इतनी कि आप यदि उसे पीछे से देखें तो ऐसा लगेगा कि उसकी टांगें दूसरे लोगों की अपेक्षा काफ़ी नीचे जाकर शुरू होती हैं। दूसरा सिपाही लम्बा, दुबला और छड़ी की तरह छरहरा था। उसकी छिटपुट दाढ़ी गहरे लाल रंग की थी। पहला सिपाही बायें-दायें देखते हुए, उछलते- कूदते फलांगते चल रहा था। कभी वह कोई तिनका चबाता, कभी अपनी ही क़मीज़ की आस्तीन मुँह में डालता, कभी अपने आप को ही थप्पड़ मारता और गुनगुनाता, यानी कि उसकी हर बात से लापरवाही और छिछोरापन झलकता था। दूसरा सिपाही, अपने सूखे चेहरे और दुबली-पतली बाहों के बावजूद परिपक्व और संजीदा दिखता था। उसके पूरे व्यक्तित्व से जो भाव प्रकट होता था, उससे वह पुरातन विश्वासियों के पुजारियों जैसा, या पुराने धार्मिक चित्रों के योद्धाओं जैसा दिखता था। “उसकी बुद्धिमत्ता दर्शाने के लिए ईश्वर ने उसकी ललाट को फैला दिया था” यानी वह गंजा था, जिससे ऊपर बताये गये उपमानों से उसकी समानता और बढ़ गयी थी। पहले का नाम आन्द्रे ताहा और दूसरे का नाम निकन्द्र सापोज़निकोव था।
दोनों सिपाही जिसे पकड़कर ले जा रहे थे, वह ‘लफ़ंगे’ के सम्बन्ध में जो आम धारणा है, उससे बिल्कुल अलग था। वह दुबला-पतला, ठिगने क़द का कमजोर और बीमार दिखने वाला आदमी था। उसके नाक-नक़्श, मुखाकृति आदि में कोई ख़ासियत नहीं थी। वह बदरंग दिखता था। उसकी भौहें चिकनी थीं। उसके चेहरे पर नरमी और समर्पण का भाव था। हालाँकि उसकी उम्र तीस से ऊपर थी, उसकी मूँछें लगभग सफ़ाचट थीं। वह आगे की ओर थोड़ा झुकते हुए, सहमते हुए, अपनी हथेलियों को आस्तीनों में छुपाते हुए चल रहा था। उसके बदरंग कपड़े के ओवरकोट के कॉलर खड़े थे और उसकी टोपी को छू रहे थे। इससे उसका चेहरा इतना ढँका-तुपा लगता था कि केवल उसकी छोटी लाल नाक पर ही दिन की रोशनी पड़ रही थी। वह लगातार खाँसते हुए, गिड़गिड़ाते स्वर में बातें कर रहा था। इस बात पर यक़ीन करना कठिन था कि वह एक लफ़ंगा है जिसने अपना नाम छुपाया है। वह दरअसल किसी पुजारी का नाकामयाब बेटा लग रहा था, जिसे ईश्वर का दण्ड मिला होगा और जो भीख माँगने के लिए मजबूर हो गया होगा; या वह कोई क्लर्क होगा और शराब की लत के कारण नौकरी से निकाला गया होगा; या किसी व्यापारी का बेटा या भतीजा होगा, जिसने रंगमंच की दुनिया में अपनी कमजोर प्रतिभा को आज़माया होगा और अब अन्त में वापस घर जा रहा होगा ताकि उड़ाऊ पुत्र की कथा के आख़िरी अंक का अभिनय कर सके; या शायद जिस असीम धैर्य के साथ वह पतझड़ के फिसलन भरे रास्ते से आगे बढ़ रहा था, उससे लगता था जैसे वह कोई कठिन व्रत करनेवाला संन्यासी हो जो एक रूसी मठ से दूसरे मठ तक भटक रहा है, निरन्तर ‘शान्त और पापरहित’ ज़िन्दगी की तलाश कर रहा है, जिसमें उसे अब तक कामयाबी नहीं मिली है….। ये तीनों यात्री बहुत देर से यात्रा कर रहे थे, लेकिन ऐसा लगता था जैसे वे ज़मीन के एक ही टुकड़े पर चल रहे हैं। उनके आगे तीस फुट तक काले-भूरे रंग का कीचड़ फैला हुआ था, उनके पीछे भी वही दृश्य था और उसके परे जिधर भी देखें आपको सफ़ेद कोहरे की अभेद्य दीवार दिखेगी। वे चलते जा रहे थे, लेकिन ज़मीन आसमान के रंग रूप में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा था, कोहरे की दीवार भी निकट आती प्रतीत नहीं होती थी, और जिस ज़मीन के टुकड़े पर वे चल रहे थे वह भी ज्यों का त्यों दिखाई दे रहा था। उन्हें दूर से किसी सफ़ेद अनगढ़ पत्थर की, किसी छोटी गुफा की या किसी राहगीर द्वारा राह में फेंके गये पुआल के पुलिन्दे की झलक मिलती या किसी बड़े दलदली पोखर में पल भर के लिए रोशनी में चमकते पानी की झलक मिलती या अचानक उन्हें कोई अस्पष्ट रूपरेखा वाली छाया दिख जाती, लेकिन जब वे नज़दीक जाते तो वह वस्तु पहले से छोटी दिखती और कुछ और नज़दीक जाने पर उन राहगीरों के सामने कोई टेढ़ा मील स्तम्भ खड़ा होता, जिसपर लिखे गये अंक धुँधले हो गये हैं या कोई पत्रविहीन भींगा भोजवृक्ष खड़ा मिलता, जैसे कोई रास्ते का भिखारी हो। भोजवृक्ष अपने बचे-खुचे पीले पत्तों से कुछ फुसफुसाता और उसका एक पत्ता टूटकर हवा में धीरे-धीरे तैरते हुए ज़मीन पर गिरता…..और फिर वही कोहरा, वही कीचड़ और सड़क के किनारे भूरी घास। घास पर मलिन अनाकर्षक आँसू । ये आँसू मधुर आनन्द के उन आँसुओं जैसे नहीं हैं , जब धरती ग्रीष्म ऋतु में सूरज का स्वागत करते हुए और फिर उसे विदा करते हुए रोती है और उषाकाल में बगुलों, बटेरों और लम्बी चोंच वाले धारीदार चहा पक्षियों की प्यास बुझाती है। यहाँ इन आँसुओं के कारण राहगीरों के पैर भींगी मिट्टी में चिपक कर भारी हो जाते हैं। उन्हें एक-एक कदम उठाने में मशक़्क़त करनी पड़ती है।
आन्द्रे ताहा कुछ उत्तेजित था। वह बार-बार उस लफ़ंगे को देखता था और यह समझने की कोशिश करता था कि कैसे एक संजीदा आदमी अपना नाम भूल सकता है।
“तुम पुरापंथी ईसाई हो न ?” उसने पूछा
“हाँ,” लफ़ंगे ने धीमे स्वर में जवाब दिया।
“हूँ… तो तुम्हारा नामकरण हुआ होगा?”
“हाँ, क्यों नहीं! मैं तुर्क नहीं हूँ। मैं चर्च जाता हूँ और पवित्र प्रसाद भी लेता हूँ और जिस दिन मना किया जाता है उस दिन मांसाहार नहीं करता। मैं अपने मज़हबी फ़र्ज़ समय से पूरा करता हूँ…”
““तो, उस समय तुम्हें किस नाम से पुकारा जाता है?”
“भले आदमी, तुम जो चाहो उस नाम से पुकारो।”
ताहा ने अपने कंधे उचकाये और बेहद हैरानी में अपने पुट्ठे पर चपत मारी। दूसरा सिपाही, निकन्द्र सापोज़निकोव, गम्भीर चुप्पी बनाये हुए था। वह ताहा जैसा नादान नहीं था। ज़ाहिर था कि वह अच्छी तरह जानता था कि किन कारणों से कोई पुरापंथी ईसाई दूसरों से अपना नाम छिपाने के लिए विवश हुआ होगा। उसके अभिव्यंजक चेहरे पर उदासीनता और सख़्ती का भाव था। वह अलग-थलग चल रहा था और अपने सहयात्रियों की फ़िज़ूल की गपबाजी में शरीक नहीं होना चाहता था, बल्कि वह सबको, यहाँ तक कि कुहरे को भी अपनी गम्भीरता और विवेक का परिचय देना चाहता था ।
“ईश्वर ही जानता है कि तुम क्या हो,” ताहा ने लफ़ंगे से पूछताछ जारी रखी। “किसान तुम हो नहीं, भद्रलोक भी नहीं हो, लेकिन शायद उन दोनों के बीच की चीज़ हो….उस दिन मैं तालाब में जाल धो रहा था, तो एक जलचर पकड़ में आया, उँगली के बराबर लम्बा था, गलफड़ा और पूँछ दोनों थे। पहले क्षण मैंने सोचा मछली है, फिर देखा —उसपर फूँक मारी, यह देखने के लिए पंजा तो नहीं है। वह मछली नहीं थी, साँप था, या क्या पता क्या था… तो, तुम भी वैसे ही हो….. क्या काम करते हो?”
““मैं किसान हूँ और किसान परिवार से हूँ,” लफ़ंगे ने आह भरी। “मेरी माँ घरेलू काम करनेवाली दासी थी। मैं किसान जैसा दिखता नहीं, यह सच है, क्योंकि, भले आदमी, मेरी ऐसी ही क़िस्मत है। मेरी माँ एक कुलीन परिवार में नर्स थी और उसे हर प्रकार की सुख-सुविधा मिलती थी। चूँकि मैं उसके खून और मज्जा का ही हिस्सा था, मैं माँ के साथ मालिक के घर में ही रहता था। उसने मुझे अपने लाड़-प्यार से बिगाड़ दिया। उसने पूरी कोशिश की कि मैं अपने निम्न वर्ग से ऊपर उठकर भद्रलोक का हिस्सा बनूँ। मैं बिस्तर में सोता था, हर दिन सही मायने में डिनर लेता था, भद्रलोक के बच्चों की तरह जूते और मौजे पहनता था। मेरी माँ जो खाती थी, वही खाना मुझे भी दिया जाता था; माँ को ढेर सारे उपहार मिलते थे, उनमें मेरे लिए पोशाकें भी होती थीं….. हम बहुत उम्दा ज़िन्दगी जीते थे! मैंने अपने बचपन में इतनी मिठाइयाँ और केक खाए हैं कि यदि आज उनको बाज़ार में बेचा जाता तो उस पैसे से एक बढ़िया घोड़ा ख़रीदा जा सकता था । माँ ने मुझे पढ़ना-लिखना सिखाया, छुटपन से ही ख़ुदा से ख़ौफ़ करना सिखाया। उसने मुझे जो तालीम दी उसका यह असर हुआ है कि मैं कोई भी भदेस-गँवारू शब्द नहीं बोल पाता। और मैं वोदका नहीं पीता। मेरे कपड़े साफ-सुथरे हैं। मैं जानता हूँ कि अच्छे समाज में कैसे उठा-बैठा जाता है। यदि माँ अभी भी ज़िन्दा है तो ईश्वर उसे अच्छी सेहत दे। यदि वह मर चुकी है तो ईश्वर उसकी आत्मा को शान्ति दे, क्योंकि ईश्वर के राज में धर्म परायण लोगों को शान्ति मिलती है।” लफ़ंगे ने अपने सिर पर से टोपी हटायी। उसके सिर पर बहुत कम बाल थे, जो ब्रश की तरह खड़े थे। उसने ऊपर की ओर देखा और दो बार अपने ऊपर सलीब का चिन्ह बनाया।
“हे ईश्वर, उसे एक हरा-भरा शान्तिपूर्ण विश्राम स्थल दे,” उसने धीरे-धीरे लगभग गाते हुए कहा। उसकी आवाज़ मर्द के बजाय किसी बुढ़िया की लग रही थी। “अपनी सेविका जेनिया को सिखाओ ताकि वह तुम्हारे लायक़ हो सके। यदि मेरी प्यारी माँ नहीं होती तो मैं एक मूर्ख किसान होता। अभी, तुम नौजवान, कुछ भी पूछो, मैं सब समझता हूँ । मैं पवित्र धर्मशास्त्र समझता हूँ और धर्मशास्त्र से बाहर की चीजें भी; मैं हर प्रार्थना और धार्मिक प्रश्नोत्तरी जानता हूँ । मैं धर्मशास्त्र के अनुसार जीवन जीता हूँ…….. मैं किसी को चोट नहीं पहुँचाता। मैं पवित्रता और संयम की ज़िन्दगी जीता हूँ । मैं उपवास रखता हूँ। समय पर ही खाता हूँ । और लोगों को तो वोदका और अभद्र बातचीत के अलावा कोई चीज़ अच्छी नहीं लगती है, लेकिन मेरे पास जब भी समय रहता है मैं किसी कोने में बैठकर किताब पढ़ता हूँ । मैं पढ़ता हूँ और रोता जाता हूँ।”
““तुम रोते क्यों हो?”
“लेखक कितना करुण लिखते हैं! कुछ किताबें तो केवल पाँच कोपेक की होती हैं, लेकिन आप कितनी आहें भरते हैं, कितने टेसुए बहाते हैं!”
“क्या तुम्हारे पिता मर चुके हैं?” ताहा ने पूछा
“भले आदमी, मैं नहीं जानता। मैं अपने पिता को नहीं जानता। छुपाने से क्या फ़ायदा! मुझे लगता है मैं अपनी माँ की अवैध सन्तान था। माँ सब दिन कुलीन लोगों के साथ रही। वह किसी सीधे-सादे किसान के साथ शादी नहीं करना चाहती थी।….”
“ और इसलिए वह अपने मालिक के हाथ लग गयी।” ताहा हँसा
“यह सच है, उसने पाप किया। वह धर्मभीरु थी, लेकिन अपनी पवित्रता की रक्षा नहीं कर सकी। यह पाप है, सचमुच महापाप है, इसमें किसी संदेह की गुंजाइश नहीं है। लेकिन शायद इसकी क्षतिपूर्ति के रूप में मेरी रगों में किसी कुलीन का रक्त है। शायद मैं किसान श्रेणी का होकर भी स्वभाव से एक कुलीन भद्रपुरुष हूँ।”
उस ‘कुलीन भद्रपुरुष’ ने यह सब अपने सँकरे ललाट पर शिकन लाते हुए और सर्दी में जमी अपनी छोटी लाल नाक से आवाज़ निकालते हुए कोमल-मधुर स्वर में कहा। ताहा उसे सुन रहा था और लगातार अपने कन्धों को उचकाते हुए उसे अचरज भरी नज़रों से, लेकिन अविश्वास के साथ देख रहा था।
लगभग पाँच मील चलने के बाद सिपाही और लफ़ंगा एक टीले पर आराम करने बैठे।
“एक कुत्ता भी अपना नाम जानता है,” ताहा बड़बड़ाया, “मेरा नाम अन्द्रियुस्का है, उसका निकन्द्र है। हर आदमी का अपना पवित्र नाम होता है। उसे कोई कैसे भूल सकता है। क़तई नहीं ।”
“किसे मेरा नाम जानने की ज़रूरत है?” लफ़ंगे ने अपना गाल अपनी मुट्ठी पर टिकाते हुए आह भरी। “ और कोई जानेगा तो उससे मुझे क्या फ़ायदा होगा? यदि मुझे वहाँ जाने दिया जायेगा जहाँ मैं जाना चाहता हूँ- लेकिन बताने से बात और बिगड़ जाएगी । मैं क़ानून जानता हूँ, ईसाई बन्धु। अभी मैं एक लफ़ंगा हूँ, जिसे अपना नाम याद नहीं है। ज़्यादा से ज़्यादा यह सजा होगी कि मुझे पूर्वी साइबेरिया भेज दिया जायेगा और मुझे तीस या चालीस कोड़े लगेंगे; लेकिन मैं अपना असली नाम और परिचय बताऊंगा तो मैं जानता हूँ वे मुझे फिर कठोर श्रम कारावास में भेज देंगे।”
“क्यों तुम सज़ायाफ़्ता क़ैदी रहे हो?”
“हाँ, मेरे दोस्त । चार साल तक मैं सिर मुँड़ाकर पाँवों में ज़ंजीर डालकर रहा हूँ।”
“क्यों?”
“भले आदमी, क़त्ल के इल्ज़ाम में। तब मैं लगभग अठारह साल का ही लड़का था। मेरी माँ ने ग़लती से मालिक के ग्लास में सोडा और एसिड डालने के बदले आर्सेनिक डाल दिया था। स्टोर रूम में हर तरह के डिब्बे रखे हुए थे, किसी से भी ग़लती हो सकती थी।”
लफ़ंगे ने आह भरते हुए अपना सिर हिलाकर कहा:
“वह एक धर्मपरायण स्त्री थी, लेकिन क्या पता? आदमी के लिए दूसरे की आत्मा एक घने जंगल के समान ही अभेद्य है। कौन जानता है, यह एक दुर्घटना ही हो या उसे यह बात पसन्द न आयी हो कि मालिक किसी और नौकरानी को चाहने लगा हो…..शायद उसने यह सब जानबूझकर किया। ईश्वर ही जानता है, मैं उस समय छोटा था और यह सब नहीं समझता था।……अब मुझे याद आता है कि मालिक ने कोई और औरत बिठा लिया था और माँ बहुत बेचैन हो गयी थी। हमारा मुक़दमा लगभग दो वर्षों तक चला …….. माँ को बीस वर्षों की सख़्त सज़ा मिली। मुझे कम उम्र के कारण केवल सात साल की सज़ा दी गयी।”
“तुम्हें क्यों सज़ा मिली?”
“जुर्म में मददगार के रूप में । मैंने मालिक को ग्लास थमाया था। हमेशा ऐसा ही होता था। माँ सोडा तैयार करती थी और मैं उन्हें ग्लास थमाता था। ईसाई बन्धु होने के कारण मैं आपको यह सब बता रहा हूँ, जैसे कि मैं ईश्वर के आगे बताता। यह सब किसी और को नहीं बताना….”
“अरे, हमसे कोई नहीं पूछनेवाला” ताहा ने कहा। “तो तुम जेल से भागे हो, है न?”
“हाँ, दोस्त । हम चौदह क़ैदी भागे थे। कुछ लोगों ने, भगवान उनका भला करे, भागते समय मुझे भी साथ ले लिया। अब भले आदमी, तुम ख़ुद अपने अन्त:करण से पूछकर बताओ कि मैं अपना नाम क्यों बताऊँ? वे मुझे फिर सश्रम कारावास में भेज देंगे। और मैं कठोर कारावास के लिए नहीं बना हूँ । मैं एक सुकुमार आदमी हूँ। मेरी सेहत नाज़ुक है। मैं साफ़-सुथरे माहौल में खाना और सोना पसंद करता हूँ । ईश्वर से प्रार्थना करते समय मैं एक छोटा दीया या मोमबत्ती जलाना चाहता हूँ और आसपास शोर नहीं चाहता। जब मैं सज्दे में झुककर सिर ज़मीन से लगाता हूँ तब मैं यह नहीं चाहता कि फ़र्श गन्दा हो या उसपर किसी ने थूका हो। और मैं हर दिन सुबह-शाम माँ के लिए प्रार्थना करते समय चालीस बार सिर झुकाता हूँ ।”
लफ़ंगे ने अपने सिर से टोपी हटायी और अपने ऊपर सलीब का चिन्ह बनाया।
“और लोग यदि मुझे पूर्वी साइबेरिया भेजना चाहते हैं, तो भेज दें।” उसने कहा, “मैं नहीं डरता ।”
“लेकिन वह भी कोई बेहतर जगह नहीं है, क्यों?”
“वह बिल्कुल अलग बात है। कठोर कारावास की सज़ा में आप केकड़ों से भरी टोकरी में एक केकड़े की तरह हैं। भारी भीड़, एक दूसरे को दबाते-कोंचते, लड़ते-झगडते, आपके लिए साँस लेने की भी जगह नहीं; पूरी तरह से नरक! स्वर्ग की रानी हमें ऐसे नरक से बचाये! आप एक डाकू हैं और आपके साथ डाकू जैसा ही बर्ताव किया जाता है- किसी कुत्ते से भी बदतर। आप सो नहीं सकते, आप खा नहीं सकते, यहाँ तक कि प्रार्थना भी नहीं कर सकते। लेकिन साइबेरिया की बस्तियों में ऐसा नहीं होता। मैं बस्ती में दूसरे लोगों की तरह किसी कम्यून का सदस्य बनूँगा । लोगों को क़ानूनन मेरा हिस्सा देना पड़ेगा….. हाँ! लोग कहते हैं कि वहाँ ज़मीन की क़ीमत कुछ भी नहीं है, उतनी ही समझिए जितनी बर्फ़ की। आप को जो पसंद हो ले सकते हैं। वे मुझे खेती के लिए, मकान बनाने के लिए, बाग लगाने के लिए ज़मीन देंगे। मैं दूसरे लोगों की तरह हल चलाऊँगा, बीज बोऊँगा। मेरे पास हर तरह के मवेशी, मधुमक्खी, भेड़, कुत्ते….. एक साइबेरियन बिल्ली भी होगी, ताकि चूहे मेरी उपज न चट कर जाएँ। मैं एक घर बनाऊंगा, धार्मिक चित्र, प्रतिमा ख़रीदकर उसे सजाऊंगा ……. हे ईश्वर, मैं शादी करूँगा, मेरे बच्चे होंगे…..।”
लफ़ंगा बुदबुदा रहा था। उसकी दृष्टि, अपने श्रोताओं पर नहीं, बल्कि दूर क्षितिज पर टिकी हुई थी । उसके सपने भले ही बचकाने हों, लेकिन उन्हें जिस ईमानदारी और मन की गहराई से बयान किया जा रहा था, उनपर यक़ीन न करना कठिन था। लफ़ंगे के छोटे-छोटे अधरों पर एक टेढ़ी मुस्कान थी। उसकी आँखें, उसकी छोटी नाक और उसका पूरा चेहरा सुदूर भविष्य की आनन्ददायक परिकल्पना की प्रतीक्षा में खो गया था। दोनों सिपाही उसे गम्भीरतापूर्वक और सहानुभूति के साथ सुन रहे थे। ऐसा लगता था उन्हें भी उसके सपनों पर विश्वास था।
“मुझे साइबेरिया से डर नहीं लगता।” लफ़ंगा बुदबुदाते जा था। “साइबेरिया भी रूस है। वहाँ भी वही ईश्वर है, वही ज़ार है। वहाँ भी लोग हम और आप जैसे पुरातन ईसाई हैं। लेकिन वहाँ ज़्यादा आज़ादी और ख़ुशहाली है। हर चीज़ वहाँ बेहतर है। मसलन, नदियों की ही बात करें। यहाँ की नदियों से तो वहाँ की नदियाँ हर हाल में बेहतर हैं। मछलियों की कोई कमी नहीं; हर तरह के जंगली पक्षी मिल जाते हैं। और, बन्धु, मुझे तो सबसे अधिक आनंद मछली पकड़ने में आता है। भले ही मुझे खाने के लिए रोटी न दो, लेकिन हाथ में एक बंसी पकड़ाकर मुझे नदी किनारे बैठा दो। सच में! मैं तार की डोरी और उसमें लगे अंकुड़े का इस्तेमाल करता हूँ और सींक की डलिया में मछली जमा करता जाता हूँ ।जब बर्फ़ होती है तो मैं जाल से मछली पकड़ता हूँ । जाल खींचने लायक़ मुझमें ताक़त नहीं है, मैं इस काम के लिए पाँच कोपेक में किसी आदमी को रख लूँगा। और हे ईश्वर, इसमें कितना आनंद है! मछली पकड़ते समय आपको यदि कोई ईल, पाउट या रोच मिल जाय तो आपको इतनी ख़ुशी मिलती है जैसे आप अपने भाई से मिल रहे हैं। और क्या आप यक़ीन करेंगे कि हर मछली को पकड़ने की अलग कला है। किसी के लिए ज़िन्दा चारा डाला जाता है, तो किसी के लिए कीड़े-मकोड़े रखे जाते हैं, किसी के लिए मेंढक तो किसी के लिए टिड्डी रखी जाती है।आपको इन सब की समझ होनी चाहिए। मिसाल के तौर पर ईल पाउट की बात करें। यह कोई नाज़ुक मछली नहीं है, इसे मीठे जल वाली मछली पसंद है। पाइक मछली को गजन मछली पसंद है। शिल्सपर को तितली चाहिए। तेज धार में रोच मछली पकड़ने से ज़्यादा मज़ेदार कोई बात नहीं हो सकती। आप सत्तर फ़ीट लम्बी डोरी बिना डंडे के पानी में फेंकते हैं ताकि चारा पानी में तैरता रहे। चारे के लिए आप तितली या भौंरे का इस्तेमाल करते हैं। आप पतलून उतारकर नंगे पाँव पानी में खड़े हो जाइए और चारे धारा के साथ बहने दीजिए और अचानक आपको हल्का झटका लगेगा! रोच खींच रहा है! केवल आपको इतनी सावधानी बरतनी है कि वह बदमाश एक झपट्टे में चारा लेकर चम्पत न हो जाए । जैसे ही वह डोरी पर झटका दे, आपको तुरन्त ऊपर खींच लेना है। यहाँ इन्तज़ार करने में कोई फायदा नहीं है। मैंने अपने समय में कितनी मछली पकड़ी है! जब हमलोग भाग रहे थे तो बाक़ी क़ैदी जंगल में सो जाते थे, मुझे नींद नहीं आती थी, मैं नदी चला जाता था। वहाँ नदियाँ चौड़ी और तेज धारा वाली हैं और किनारे कितने ऊँचे और ख़तरनाक हैं! किनारों पर घने जंगल हैं। पेड़ इतने ऊँचे हैं कि ऊपर देखने में चक्कर आता है। यहाँ की क़ीमत से वहाँ हर देवदार दस रूबल का होगा।”
अपनी कल्पना, अतीत के सुनहरे स्मृति-बिम्बों और भविष्य में आनेवाली ख़ुशियों की मधुर दस्तकों की रौ में डूबकर वह बेचारा चुप हो गया, केवल उसके ओठ हिल रहे थे, जैसे वह अपने आपको ही फुसफुसाकर कुछ कह रहा हो। उसके ओठों पर एक रहस्यमय मुस्कुराहट खेल रही थी। दोनों सिपाही चुप थे । वे सिर झुका कर उसकी बातों पर विचार कर रहे थे। पतझड़ के सन्नाटे में, जब धरती से उठनेवाली सर्द और मनहूस धुंध दिल पर बोझ की तरह छायी हो, जब वह आँखों के सामने कैदखाने की दीवार की तरह खड़ी हो और आदमी को अपनी आज़ादी की सीमाओं का अहसास दिलाती हो, तब चौड़ी, तेज धारा वाली नदियों, उनके ऊँचे कछारों, घने जंगलों और क्षितिज तक फैले हुए घास के मैदानों के बारे सोचना कितना मोहक है!
कल्पना धीमे-धीमे चुपचाप आपकी आँखों के सामने यह चित्र बनाती है कि कैसे सुबह-सुबह, जब आकाश में ऊषा की लाली पूरी तरह विलीन न हुई हो, एक आदमी एक सुनसान नदी की ऊँची कछार पर अकेला चल रहा है। दूर से वह एक छोटे धब्बे की तरह दिख रहा है। धारा के दोनों तरफ़ ऊँचाई पर मस्तूल जैसे पुराने देवदार के पेड़ खड़े हैं और उस आज़ाद इन्सान को धमकी भरी नज़र से देख रहे हैं और फुसफुसा रहे हैं। उस आदमी की राह में चट्टानें हैं,बड़े-बड़े पत्थर हैं, कँटीली झाड़ियाँ हैं, लेकिन वह शरीर से ताक़तवर है और मन से साहसी। उसे न तो देवदार के पेड़ों से, न चट्टानों से डर है, न तो वह अपने अकेलेपन से घबरा रहा है और न वह अपने हर पदचाप की देर तक गूँजती प्रतिध्वनि से ही डर रहा है।
उन किसानों के सामने आज़ाद ज़िन्दगी की ऐसी तस्वीर थी, जिन्हें उन्होंने कभी नहीं जिया था; सम्भवतः वे बहुत पहले सुनी हुई कहानियों के दृश्य याद कर रहे थे या बहुत प्राचीन काल के आज़ाद पूर्वजों से विरासत के तौर पर रक्त और मज्जा में ही उन्हें आज़ाद ज़िन्दगी की धारणा मिली थी। सच क्या है ईश्वर ही जानता है ।
सबसे पहले निकन्द्र सापोज़निकोव ने चुप्पी तोड़ी, जिसकी ज़ुबान से अब तक एक भी लफ़्ज़ नहीं निकला था। या तो उसे उस लफ़ंगे की पारदर्शी ख़ुशी से जलन हो रही थी या उसे यह सचमुच अहसास हो रहा था कि ख़ुशी के सपने इस स्लेटी धुंध और गंदे भूरे कीचड़ से मेल नहीं खाते। उसने लफ़ंगे को घूरते हुए कहा:
“यह सब ठीक है, लेकिन बन्धु, तुम उस सुख और सपने वाली दुनिया तक नहीं पहुँच पाओगे। तुम जाओगे कैसे? दो सौ मील जाते-जाते तो तुम्हारे प्राण-पखेरू उड़ जाएँगे। अपनी हालत तो देखो। तुम कितने कमज़ोर हो! तुम तो अभी पाँच मील भी नहीं चले हो और तुम्हारी साँस उखड़ चुकी है।”
लफ़ंगा धीरे से निकन्द्र की ओर मुड़ा । उसके चेहरे से आह्लाद भरी मुस्कुराहट ग़ायब हो गयी। उसने उस सिपाही के गम्भीर चेहरे को भय और अपराध-भाव से देखा, ज़ाहिर था उसे कुछ याद आया और उसने अपना सिर झुका लिया। फिर से चुप्पी छा गयी……… तीनों गहरे सोच में पड़ गये। वे अपने दिमाग़ पर ज़ोर देकर उस बात को समझने का प्रयास कर रहे थे जिसे केवल ईश्वर समझ सकता था। वे जानना चाहते थे कि उसे जिस जगह पर आज़ादी मिलेगी उस जगह और इस जगह के बीच कितना बड़ा विस्तार है।
लफ़ंगे के मन में उस विस्तार से भी अधिक भयावह चीजों की तस्वीरें एकजुट होने लगीं। क़ानून के दाँवपेंच में होने वाला लम्बा विलम्ब, टालमटोल, अस्थायी और स्थायी जेलें, क़ैदियों की नावें, रास्ते में थका देनेवाले ठिकाने, बर्फ़ में जमी सर्दी, बीमारी, सहयात्रियों की मौत……….इन सब की ज़िन्दा तस्वीरें उसके ज़ेहन में एक साथ उभरने लगीं।
लफ़ंगे ने आँखें झपकायी, जैसे वह क़सूरवार हो, अपनी ललाट पर आये पसीने की बूँदों को अपने आस्तीन से पोंछा, एक गहरी साँस ली मानो अभी-अभी अत्यन्त गर्म पानी से नहाकर बाहर निकला हो, फिर दूसरे आस्तीन से भी अपना ललाट पोंछा और भयभीत नज़रों से चारों तरफ़ देखने लगा।
“यह सच है; तुम वहाँ तक नहीं पहुँच पाओगे!” ताहा ने कहा। “तुम ज़्यादा नहीं चल पाते हो। ख़ुद को देखो। इतने दुबले हो कि केवल हड्डी का ढाँचा दिखता है। तुम मर जाओगे, भाई!”
“सच में मर जाएगा! वह कर क्या सकता है?” निकन्द्र ने कहा। “ वह तो अभी अस्पताल में भर्ती कराने लायक़ है…. सच में!”
अपना नाम भूलने वाले उस आदमी ने अपने कुटिल सहयात्रियों के कठोर, बेरुख़ी से भरे चेहरों को देखा और बिना टोपी हटाये तेज़ी से अपने ऊपर सलीब का चिन्ह बनाया, फटी-फटी आँखों से उन्हें घूरते हुए…. वह काँपने लगा, उसका सिर हिलने लगा और उसके पूरे शरीर में इस तरह ऐंठन आने लगी जैसे किसी कीड़े के ऊपर पाँव पड़ गया हो।
“चलो, अब चलने का समय है,” निकन्द्र ने उठते हुए कहा; “आराम कर लिया।”
एक मिनट बाद वे उस कच्चे रास्ते से जा रहे थे। लफ़ंगा पहले से भी अधिक झुका हुआ था और उसने अपने हाथों को आस्तीनों में और भी अधिक छुपा लिया था। ताहा ख़ामोश था।
अनुवाद : राजीव
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