मोपासाँ
(अनुवाद :राजीव रंजन सिंह)
वह ऐसे परिवार में पली-बढ़ी थी जहाँ ज़िन्दगी बाहर की दुनिया से कटकर चलती है। इस तरह के परिवार राजनीतिक उठा-पटक से पूरी तरह उदासीन रहते हैं। खाने की मेज पर भले ही राजानीतिक घटनाओं की बात हो, सत्ता परिवर्तन उनसे इतनी दूरी पर होता है कि उनकी चर्चा ऐतिहासिक घटनाओं की तरह होती है, मानो वे पंद्रहवें लुई की मौत या नेपोलियन के आगमन का ज़िक्र कर रहे हों।
समय के साथ रस्म रिवाज़ बदलते हैं, एक के बाद एक नये फैशन का चलन होता है, लेकिन ऐसे शांत परिवारों में इन बदलावों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है और साल-दर-साल वही पुरानी परिपाटी चलती रहती है। यदि पास-पड़ोस में कोई सनसनीखेज़ घटना घटे या लोकापवाद हो तो उस घर की दहलीज तक पहुँचते-पहुँचते ही बदनामी की दास्ताँ दफ़न हो जाती है। शायद माँ-बाप ऐसे विषयों पर आपस में किसी शाम जब वे अकेले हों थोड़ी-बहुत चर्चा कर लेते हैं, लेकिन ऐसा वे फुसफुसाकर दबी जुबान में करते हैं- क्योंकि दीवारों के भी कान होते हैं। पिता साँस रोककर कहता है:
''रिवोइल परिवार में जो हादसा हुआ है, उसके बारे में तुमने सुना?''
और माँ जवाब देती है:
'' किसको गुमान होगा कि ऐसी घटना घटेगी? बड़ी ख़ौफ़नाक बात है।''
ऐसे परिवारों में बच्चों के मन में कभी कोई सवाल नहीं उठता है, किसी भी तरह का शक-शुबहा नहीं होता है और जब वे बड़े होते हैं तो उनके दिलो-दिमाग और आँखों पर जैसे पट्टी बँधी रहती है। जीवन की असलियत से अनजान, वे यह नहीं जानते कि लोगों के सोचने और कहने में, कथनी और करनी में फ़र्क़ होता है; उन्हें यह मालूम नहीं रहता कि जिन्दगी बाकी लोगों के साथ लड़ते-झगड़ते या आपसी खींचतान में बितानी पड़ती है; उन्हें इस बात का कोई अंदेशा नहीं रहता कि इस जिन्दगी में सीधे-सच्चों को हमेशा धोखा मिलता है, भले लोगों का माखौल उड़ाया जाता है और अच्छों के प्रति दुर्व्यवहार होता है।
कुछ लोग अपनी जिन्दगी के आखिरी दिन तक इस अंधी सत्यनिष्ठा, वफ़ादारी और गौरव में विश्वास बनाये रखते हैं। उनका मन इतना निश्छल होता है कि कोई भी घटना उनकी आँखें नहीं खोल सकती, जबकि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनकी नज़र से सच छुपा नहीं रहता, लेकिन उस सच को पूरी तरह समझे बिना वे गलतियों पर गलतियाँ करते जाते हैं। वे जीवन में कटु और निराश हो जाते हैं। वे मानने लगते हैं कि क्रूर नियति के सामने वे असहाय हैं और बुरे हालात और बेहद दुष्ट लोगों के शिकार हैं।साविगनोल परिवार ने अपनी बेटी बेर्था का विवाह अठारह वर्ष की उम्र में कर दिया था। उसका विवाह पेरिस में रहने वाले एक युवक जॉर्ज बैरोन से हुआ था। वह शेयरबाजार में कारोबार करता था। वह सुदर्शन और शिष्ट था और ऊपरी तौर पर उसमें वे सब ख़ूबियाँ थीं जिनकी लोग अपेक्षा रखते हैं। परन्तु, अपने पुरातनपंथी सास-ससुर के प्रति उसके मन में सम्मान नहीं था । वह अपने अन्तरंग मित्रों के बीच उनका जिक्र '' मेरे प्रिय फॉसिल'' कह कर करता था।वह अच्छे परिवार से था, लड़की भी धनी थी। वे पेरिस में ही बस गये।
बेर्था ऐसी पेरिसवासी बन गयी, जिनकी संख्या लाखों में है। वह इस महानगर से, उसके सामाजिक पक्ष से, उसकी मौज-मस्ती से और उसके रस्म रिवाज़ से सर्वथा अनजान बनी रही- ठीक वैसे ही जैसे वह जिन्दगी, उसके रहस्यों और विश्वासघातों से अनजान थी।
वह अपने घर के प्रति पूरी तरह समर्पित थी। उसे अपनी गली के परे की दुनिया के बारे में कुछ भी पता नहीं था। यदि वह छठे-छमासे कभी पेरिस के दूसरे इलाके में जाती, तो उसे लगता जैसे उसने किसी अनजान, नये शहर की लम्बी और कठिन यात्रा की है। वह शाम में अपने पति को कहती:
'' आज मैं बुलेवार्ड गयी थी।''
साल में दो या तीन बार उसका पति उसे थियेटर ले जाता था। यह ऐसी घटना थी जिसकी स्मृति कभी भी धुँधली नहीं पड़ती। बहुत दिनों बाद तक बातचीत में इसका जिक्र होता रहता।
कभी तीन महीने बाद वह अचानक हँस पड़ती और बोल उठती:
'' तुम्हें याद है, जेनरल की वर्दी पहने उस एक्टर ने कैसे मुर्गे की तरह कुकड़ूँ-कू किया था?''
उसके दोस्त भी उसके मायके और ससुराल के परिवारों में से ही थे। वह इन परिवारों को ''मार्टिन खानदान'' और ''मिशेलिन खानदान'' कहती।
उसका पति अपनी मरज़ी का मालिक था। अपनी सुविधा के अनुसार वह रात में देरी से घर लौटता- कभी-कभी घर पहुँचने में सुबह भी हो जाती। वह हमेशा कारोबार का बहाना बनाता था, लेकिन अपनी दिनचर्या के बारे में ज़्यादा सफाई देने की कोशिश भी नहीं करता था, क्योंकि उसे अच्छी तरह मालूम था कि उसकी भोली-भाली बीवी कभी भी उस पर शक नहीं कर सकती।
लेकिन एक सुबह बेर्था को एक गुमनाम ख़त मिला।
ख़त पढ़कर उसे एसा लगा जैसे उसपर वज्रपात हुआ हो। वह इतनी भोली थी कि उसके दिमाग में भूल से भी यह ख़्याल नहीं आया कि बिना दस्तख़त के भेजा गया खत कितनी शरारत भरा हो सकता है और इसलिए उसे इस ख़त को हिक़ारत की नज़र से देखना चाहिए था। ख़त लिखनेवाले ने दावा किया था कि वह उसे खुश देखना चाहता है, उसे बुराइयों से नफ़रत है और सच्चाई से प्रेम है।
ख़त में यह सूचना थी कि पिछले दो वर्षों से उसके पति की एक प्रेमिका है। वह एक युवा विधवा है और उसका नाम मादाम रोस्सेट है। उसका पति उसी के साथ अपनी सारी शामें बिताता है।
बेर्था न तो अपना दुख छुपाना जानती थी और न यह जानती थी कि अपने पति की जासूसी कैसे की जाए। जब उसका पति लंच के लिए घर आया तो उसने वह ख़त उसके सामने फेंक दिया और रोते हुए अपने आपको अपने कमरे में बंद कर लिया।
परिस्थिति की गम्भीरता समझने और अपना जवाब तैयार करने के लिए जॉर्ज को वक़्त मिल गया था। उसने अपनी पत्नी के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया। बेर्था ने दरवाज़ा तुरंत खोला, लेकिन अपने पति से आंखें नहीं मिलायी। वह मुस्कुराया, उसकी बगल में बैठ गया, उसे अपनी ओर खींचा और हँसते हुए कहने लगा:
''मेरी प्यारी बच्ची, सच तो यह है कि मादाम रोस्सेट नाम की मेरी एक दोस्त है, जिन्हें मैं पिछले दस सालों से जानता हूँ और जिनके लिए मेरे मन में बहुत आदर है। मैं बीसियों लोगों को जानता हूँ जिनकी मैंने कभी भी तुम्हारे सामने चर्चा नहीं की, क्योंकि मैंने यह देखा है कि तुम्हें लोगों से मिलने-जुलने या नई जान-पहचान करने में कोई रुचि नहीं है। लेकिन लोग यदि इस तरह का ओछा इलज़ाम लगाते हैं तो मेरे विचार में इससे निबटने का तरीका यह है कि तुम लंच के बाद तैयार हो जाओ, हम दोनों मादाम रोस्सेट के पास जाएंगे। मुझे पूरा यक़ीन है कि वह तुम्हारी भी दोस्त बन जाएगी।”
वह खुश होकर अपने पति से लिपट गयी। उसके मन में एक स्त्री-सुलभ उत्सुकता जगी, जो यदि एक बार जग जाए तो फिर शान्त होने का नाम नहीं लेती है । वह उस अनजान विधवा से मिलने के लिए तैयार हो गयी, जिससे उसे बस थोड़ी सी ईर्ष्या थी। वह अपनी सहज-बुद्धि से जानती थी कि किसी ख़तरे को जानना उससे सचेत होने का पहला कदम है।
वह एक आलीशान इमारत की चौथी मंजिल पर एक छोटे किन्तु सुरुचिपूर्ण तरीके से सुसज्जित फ्लैट में दाख़िल हुई। वह पाँच मिनट तक बैठक में इंतज़ार करती रही। अनेकों परदों और लटकनों के कारण कमरे में थोड़ा-थोड़ा अंधेरा था। एक दरवाज़ा खुला और उससे एक ठिगने क़द की काली और थोड़े गदराये बदन वाली युवती ने प्रवेश किया। वह उन्हें देखकर अचम्भे में थी और मुस्कुरा रही थी।
जॉर्ज ने उनका परिचय कराया:
“मेरी बीवी—मादाम जूली रोस्सेट”
उस युवा विधवा ने आश्चर्य और आनन्द मिश्रित दबी-दबी सी चीख के साथ उसका स्वागत किया और दोनों हाथ फैलाते हुए उसकी ओर दौड़ पड़ी। उसने कहा, उसे इसकी आशा नहीं थी कि उसे यह खुशी मिलेगी, क्योंकि वह जानती थी कि मादाम बैरोन कभी भी किसी से नहीं मिलती थीं। आज उनसे मिलकर उसे बहुत खुशी हो रही है। वह जॉर्ज को बहुत पसंद करती थी (उसने ''जॉर्ज'' का नाम कुछ ऐसे चिरपरिचित अंदाज़ में लिया जैसे कोई बहन अपने भाई का नाम ले रही हो) और इसलिए वह उसकी युवा पत्नी से मिलने और उससे दोस्ती करने के लिए बहुत आतुर थी।
एक महीना बीतते न बीतते दोनों नये दोस्त इतने करीब आ गये कि उन्हें कोई अलग नहीं कर सकता था। वे रोज़ मिलते, कभी-कभी दिन में दो बार और हर शाम साथ खाना खाते, कभी एक घर में तो कभी दूसरे घर में। जॉर्ज अब घर से दूर नहीं रहता, न कारोबार की व्यस्तता की बातें करता। वह कहता, उसे अपने घर की गर्माहट बेहद भाती है।
कुछ दिनों बाद मादाम रोस्सेट जिस मकान में रहती थी उसमें एक फ्लैट खाली हुआ। मादाम बैरोन ने आनन-फ़ानन में वह फ्लैट ले लिया ताकि वह अपने दोस्त के क़रीब रह सके और उसके साथ पहले की तुलना में और भी ज़्यादा वक़्त बिता सके।
पूरे दो साल तक उनकी दोस्ती पर कोई आँच नहीं आई। यह दोस्ती दो दिलों की दोस्ती थी- परिपूर्ण, प्रगाढ़ और समर्पित। जूली का नाम लिये बिना बेर्था कोई बात ही नहीं करती थी। उसकी नज़र में मादाम रोस्सेट पूर्णता की पराकाष्ठा थीं।
बेर्था बेहद खुश, शान्त और संतुष्ट थी।
लेकिन मादाम रोस्सेट अचानक बीमार हो गयी। बेर्था कभी भी उसके बिस्तर के पास से नहीं हटती। वह रात में भी उसके पास रहती। दुख और चिन्ता से उसका बुरा हाल था; यहाँ तक कि उसका पति भी एकदम अशांत दिखने लगा।
एक सुबह डॉक्टर ने, रोगी की जाँच करने के बाद जॉर्ज और उसकी पत्नी को रोगी के बिस्तर से थोड़ा हटकर एक ओर बुलाया और उन्हें कहा कि जूली की हालत बेहद गम्भीर है। डॉक्टर के वहाँ से जाते ही पति और पत्नी आमने-सामने बैठ गये और भाव-विह्वल होकर रोने लगे। उस रात दोनों रोगी के पास बैठे रहे। बेर्था रह-रहकर अपने दोस्त को प्यार से चूमती थी, जबकि जॉर्ज बिस्तर के पैताने खड़े रहकर लगातार रोगी के चेहरे पर टकटकी लगाए हुए था।
अगले दिन उसकी हालत बदतर हो गयी।
लेकिन शाम होते-होते रोगी ने कहा कि वह अब बेहतर महसूस कर रही है और उसने अपने दोस्तों से आग्रह किया कि वे अपने फ्लैट में जाकर डिनर लें।
वे डाइनिंग रूम में उदास बैठे हुए थे। उनसे खाना नहीं खाया जा रहा था। उसी समय उनकी नौकरानी ने जॉर्ज के हाथ में एक काग़ज़ थमाया। उस काग़ज़ पर लिखे संदेश को पढ़ते ही उसके चेहरे का रंग ज़र्द पड़ गया, और मेज़ से उठते हुए उसने अपनी पत्नी से काँपती आवाज़ में कहा :
“मेरे लिए इंतज़ार करना। कुछ देर के लिए मुझे जाना पड़ेगा। दस मिनट में मैं वापस आ जाऊंगा। किसी भी काम से तुम यहाँ से हिलना नहीं। ”
और वह हड़बड़ाकर उठते हुए अपना हैट लेने के लिए अपने कमरे में चला गया।
बेर्था उसके लिए इंतज़ार करने लगी। उसके मन में नई चिन्ता उठ रही थी, लेकिन पति की हर बात मानने की उसकी इतनी पुरानी आदत थी कि वह अपने दोस्त के पास तब तक नहीं जा सकती थी जबतक वह लौट न आए।
बहुत देर बाद भी जब वह नहीं लौटा, तो उसके मन में यह ख़्याल आया कि उसके कमरे में जाकर देखा जाए कि वह अपने दस्ताने ले गया है या नहीं। इससे यह पता चल जाएगा कि उसे कहीं बाहर मिलने के लिए जाना था या नहीं।
पहली नज़र में ही उसे दस्ताने दिख गये। उनकी बग़ल में एक मुड़ा-तुड़ा काग़ज़ रखा हुआ था, ज़ाहिर था जल्दबाज़ी में छूट गया था।
उसने तुरंत पहचान लिया यह वही काग़ज़ था जो अभी कुछ देर पहले जॉर्ज को मिला था।
ज़िन्दगी में पहली बार उसके मन में एक तीव्र लालसा जगी कि वह उस काग़ज़ को पढ़े और अपने पति के इस तरह अचानक चले जाने की वजह जाने। उसके बाग़ी अन्त:करण ने विरोध किया, लेकिन एक प्रबल और भयावह उत्सुकता उसपर हावी हो गयी। उसने काग़ज़ उठाया। हाथों से खींचकर उसे सीधा किया। वह पहचान गयी कि काँपते हाथों से पेंसिल में लिखी गयी यह लिखावट जूली की है। उसने पढ़ा :
''मेरे बदनसीब दोस्त, अकेले आओ और मुझे अपनी बाँहों में ले लो, मैं मरने वाली हूँ।''
थोड़ी देर तक वह कुछ भी नहीं समझ पायी। जूली के मरने की चिन्ता ही उसके दिलो-दिमाग पर हावी थी। लेकिन कुछ पल बीतते ही एकाएक बिजली की कौंध की तरह उस वाक्य का असली अर्थ उसकी समझ में आ गया। पेंसिल में लिखा हुआ यह वाक्य उसके पूरे अस्तित्व पर एक बेशर्म रोशनी डाल रहा था- उसके जीवन का बदनुमा सच, धोखा और विश्वासघात, सब कुछ उजागर हो रहा था। वह समझ गयी कि किस तरह सालों साल यह धोखा चल रहा है और वह किस तरह उनके हाथों की कठपुतली बनी हुई है। उसने देखा कि वे दोनों शाम में एक दूसरे के साथ अगल-बगल बैठे हैं, लैम्प की रोशनी में एक ही किताब पढ़ रहे हैं और हर पन्ने के आखिर में एक दूसरे को देख रहे हैं।
और उसका अपमानित, तिरस्कृत,क्षुब्ध और आहत हृदय घोर निराशा में डूब गया।
कदमों की आहट नजदीक आ रही थी; वह भागकर अपने कमरे में बंद हो गयी।
उसके पति ने पुकारा:
'' जल्दी आओ! मादाम रोस्सेट मर रही हैं।''
बेर्था अपने दरवाज़े पर आयी और काँपते होठों से जवाब दिया:
'' तुम उसके पास अकेले जाओ; उसे मेरी ज़रूरत नहीं है।''
उसने उसे अबूझ नज़र से देखा। वह शोकाकुल था। उसने फिर कहा:
'' तुरंत आओ! मैं कह रहा हूँ,वह मर रही हैं!''
बेर्था ने कहा:
'' तुम्हें अच्छा लगता यदि उसकी जगह मैं मरती।''
आख़िरकार उसे बात समझ में आयी और वह अकेले ही मरणासन्न मित्र के पास लौट गया।
जॉर्ज ने अपने दोस्त की मृत्यु का शोक बिलकुल बेशर्म होकर जाहिर किया । इस शोक में वह अपनी पत्नी के दुख के प्रति पूरी तरह उदासीन रहा। बेर्था उससे बात नहीं करती थी, उसकी ओर देखती तक नहीं थी। नफ़रत और गुस्से से भरी हुई, रात दिन ईश्वर से प्रार्थना करती हुई, वह अपनी जिन्दगी नितान्त अकेलेपन में बिताने लगी।
हालाँकि वे अभी भी उसी घर में रह रहे थे और खाने की मेज़ पर पहले की तरह एक दूसरे के सामने बैठते थे, लेकिन चुपचाप और निराश।
धीरे-धीरे पति का दुख कम हो गया, लेकिन पत्नी ने उसे माफ़ नहीं किया।
और इस तरह उनके दिन गुज़रने लगे, जो दोनों के लिए बोझिल और कटु थे।
पूरे एक साल तक वे एक दूसरे के लिए पूरी तरह अजनबी बने रहे जैसे वे आपस में कभी भी नहीं मिले हों। बेर्था को ऐसा लगता था जैसे उसकी सोचने-समझने की शक्ति ही खत्म हो गयी हो।
आख़िरकार एक सुबह मुँह अंधेरे ही वह घर से बाहर निकली और लगभग आठ बजे सफ़ेद गुलाबों का एक बहुत बड़ा बुके लेकर लौटी। उसने अपने पति को संदेश भेजा कि वह उससे बात करना चाहती है। वह चिन्तित और घबराया हुआ आया।
'' हम दोनों साथ-साथ बाहर निकल रहे हैं,'' उसने कहा। ''जरा इन फूलों को उठा लो, ये मेरे लिए बहुत भारी हैं।''
एक गाड़ी से वे क़ब्रिस्तान तक गये। वहां उतरते ही बेर्था की आंखें भर आयीं और उसने जॉर्ज से कहा:
'' मुझे उसकी क़ब्र तक ले चलो।''
वह काँपने लगा। वह बेर्था की मंशा को नहीं समझ पा रहा था। फिर भी हाथों में बुके उठाये, उसे रास्ता दिखाते हुए वह आगे-आगे चलने लगा। अन्त में वह संगमर्मर के एक शिलाखंड के पास रुक गया और बिना कुछ बोले उसकी ओर इशारा किया।
उसने उससे बुके ले लिया और घुटनों के बल बैठकर उसे कब्र पर रख दिया। इसके बाद उसने चुपचाप एक प्रार्थना की जो उसके दिल की गहराइयों से निकल रही थी।
उसके पीछे उसका पति खड़ा था- अतीत की यादों में डूबा हुआ।
वह उठी और उसने अपने दोनों हाथ अपने पति की ओर बढ़ाये।
'' यदि तुम चाहो तो हम दोस्त बन सकते हैं।'' उसने कहा।
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1 comment:
Wonderful translation!
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