मोपासाँ
(अनुवाद: राजीव रंजन सिंह)
पेर ब्वातेल एंतोइन पूरे इलाक़े में साफ़-सफ़ाई से जुड़े कामों के कारीगर के रूप में मशहूर था। यदि किसी नाले, परनाले और मोरी की सफ़ाई करवानी हो तो उसी को बुलाया जाता था।
वह सफ़ाई कर्मचारी के सारे औज़ार लिये आता। उसके लकड़ी के जूते धूल-मिट्टी से सने रहते। वह काम करता जाता और अपने पेशे को लगातार कोसता जाता। जब लोग उससे पूछते कि वह इतना गन्दा काम क्यों करता है तो वह हताश होकर जवाब देता:
“क्या करूँ, यह सब अपने बच्चों को पालने के लिए करना पड़ता है। इस काम में दूसरे कामों के मुक़ाबले ज़्यादा पैसा है।”
दरअसल उसके चौदह बच्चे थे। यदि कोई उनके बारे में पूछता तो वह उदासीनता के साथ जवाब देता:
“अब घर में आठ ही बचे हैं। एक बाहर नौकरी करता है और पाँच की शादी हो चुकी है।”
यदि सवाल पूछने वाला यह भी जानना चाहे कि क्या बच्चों की शादी ठीक-ठाक हुई है, तो वह हँस कर जवाब देता:
“मैंने कोई रोक-टोक नहीं की। दरअसल मैंने किसी भी बात में कोई विरोध नहीं किया। उनकी जहाँ मर्ज़ी थी वहाँ शादी की। हमें बच्चों की पसंद का विरोध नहीं करना चाहिए - इसका बहुत बुरा अंजाम होता है। आज जो मैं गंदगी ढोने का काम करता हूँ, इसके ज़िम्मेवार मेरे माता पिता हैं, जिन्होंने मेरी पसंद का विरोध किया था। यदि ऐसा नहीं होता तो आज मैं भी दूसरों की तरह एक कामगार होता।”
उसके माता-पिता ने उसकी पसंद का कैसे विरोध किया था-उसी की यह कहानी है।
वह उन दिनों हेवर में एक सैनिक के रूप में तैनात था। वह दूसरों के मुक़ाबले न तो चालाक था, न मूर्ख- बस एक सीधा-सच्चा इंसान था। फ़ुरसत के वक़्त उसे बंदरगाह के किनारे टहलना बहुत अच्छा लगता था। वहाँ तरह-तरह के परिंदे बेचने वाले जुटते थे। कभी अकेले, कभी अपने इलाक़े के किसी साथी सैनिक के साथ, वह धीरे-धीरे उन पिंजरों की बग़ल से गुज़रता, जिनमें अलग-अलग क़िस्म के पक्षी थे-----अमेजन के तटीय प्रदेशों से आनेवाले हरी पीठ और पीले सिर वाले तोते, बड़े मकाओ, जिनके फूल सरीखे पंख और कलगी को देखकर ऐसा लगता था जैसे उन्हें कंजरवेटरी में पाला गया हो; हर आकार के छोटे-छोटे टुइयाँ तोते, जिन्हें उस नक़्क़ाश-ए-अज़ल परवरदिगार ने बेहद एहतियात से रंग और रेखाओं से सजाया था; छोटे-छोटे नीले,पीले और चितकबरे चूज़े, जिनकी चीख़-पुकार बंदरगाह के शोर में मिल जाती थी। जहाज़ से सामान उतारने और मुसाफ़िरों और गाड़ियों की आवाजाही से बंदरगाह पर ज़बरदस्त रोर मचा रहता था और ऐसा लगता था जैसे किसी दूर, भयावह घने जंगल से किसी हिंस्र पशु का गुरु गर्जन स्वर आ रहा है।
ब्वातेल आश्चर्यचकित हो पिंजरे में क़ैद काकातुओं के पास थम जाता। उन्हें हँसते हुए मुँह खोलकर अपने दाँत दिखाता। काकातुआ उसकी बंदूक़ की लाल नालों और उसके कमरबंद में ताम्बे से बनी बकल की ओर आकृष्ट होकर अपनी सफ़ेद या पीली कलगी वाले सिर बार-बार झुकाते। यदि उसे कोई ऐसा पक्षी मिल जाता जो बातें करता हो, तो वह उससे सवाल पूछता। यदि कोई पक्षी बात करने के मूड में हो वह अंधेरा होने तक उसी के पास प्रसन्नचित्त और संतुष्ट होकर बैठा रहता। उसे बंदरों को देखकर भी बहुत आनन्द आता था। उसका मानना था कि किसी धनी इंसान के लिए ऐश की इंतहा यह होगी कि वह कुत्तों और बिल्लियों के साथ बन्दरों को भी पाले। दूर देश की चीज़ों के प्रति आकर्षण जैसे उसके ख़ून में था, ठीक वैसे ही जैसे कुछ लोगों में शिकार करने का अथवा चिकित्सक या पादरी बनने का धुन सवार हो जाता है। जब भी बैरक के गेट खुलते वह बंदरगाह जाने से अपने आप को रोक नहीं पाता, मानो कोई दुर्लभ लालसा उसे खींच रही हो।
एक बार ऐसा हुआ कि वह एक बहुत बड़े अरारौना पक्षी के सामने अत्यंत अभिभूत होकर रुक गया। वह पक्षी आगे बढ़कर झुकते हुए अपने डैनों को एक बार फैलाता था और फिर उसे समेटता था, मानो वह किसी शुक-सम्राट के दरबार में आदाब अर्ज़ कर रहा हो। इसी समय उसका ध्यान परिंदों की उस दुकान से सटे एक छोटे से शराबख़ाने का दरवाज़ा खोलकर बाहर आयी एक अफ़्रीकी लड़की की ओर गया। उसने अपने सिर पर एक रेशमी स्कार्फ़ बाँध रखा था। वह अपने ढाबे से बालू और कूड़ा-कर्कट बुहारकर सड़क पर डाल रही थी।
ब्वातेल का ध्यान पक्षी और उस लड़की के बीच बँट सा गया। उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि उसे दोनों में से किसे देखकर अधिक आश्चर्य और ख़ुशी हो रही थी।
शराबख़ाने में झाड़ू लगाने के बाद उस अफ़्रीकन ने उसकी ओर आँख उठाकर देखा। उस सैनिक की चमकती वर्दी का उसपर ज़बर्दस्त असर पड़ा। वह अपने हाथों में झाड़ू लिये उसके सामने ऐसे खड़ी थी जैसे वह उसे शस्त्र भेंट करने वाली हो, और अरारौना भी बदस्तूर आदाब तस्लीमात किये जा रहा था। कुछ क्षणों के बाद अपने ऊपर इस क़दर ध्यान दिये जाने के कारण सैनिक झेंपकर वहाँ से आहिस्ता-आहिस्ता हटने लगा, ताकि ऐसा न लगे कि वह घबराकर भाग रहा है।
लेकिन वह उस जगह फिर वापस आया। लगभग हर दिन वह उस शराबख़ाने के सामने से गुज़रता और खिड़कियों में लगे शीशों से शराबख़ाने के भीतर उस छोटी सी कृष्णवर्णी नौकरानी को देखता, जो पत्तन के नाविकों की ग्लासों में ब्रांडी उँड़ेल रही होती। कभी-कभी वह उसे देखकर बाहर आ जाती। जल्द ही बिना किसी बातचीत के, वे दोनों एक दूसरे को देखते ही मुस्कराते, जैसे वे पुराने परिचित हों और जब ब्वातेल ने उस लड़की के काले होंठों के बीच चमकते हुए सफ़ेद दाँतों की पंक्ति देखी तो उसका दिल उसपर आ गया। आख़िर एक दिन वह शराबख़ाने में घुसा। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वह दूसरे लोगों की तरह ही फ़्रेंच बोलती थी। उसने लेमोनेड मँगवाया और उससे एक ग्लास उसे भी पीने के लिए दिया, जिसे उसने शालीनता के साथ स्वीकार किया। यह घटना बहुत दिनों तक उसकी मधुरतम स्मृतियों का अंग बनी रही। पत्तन के उस छोटे से शराबख़ाने में आना और अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी न किसी पेय पर ख़र्च करना अब उसकी आदत बन गया था।
उसके लिए अब सबसे बड़ी ख़ुशी यह थी कि वह उस छोटी नौकरानी को देखता रहे कि वह किस प्रकार अपने काले हाथ से उसके ग्लास में कुछ उड़ेलती है और हँसते वक़्त उसके दाँत उसकी आँखों से भी अधिक चमकते हैं। दो महीनों तक इस तरह मिलते-जुलते वे दोनों गहरे दोस्त बन गये। ब्वातेल को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वह अफ़्रीकन उसूलन भी उतनी ही अच्छी थी, जितनी उसके गाँव की सबसे अच्छी लड़कियाँ थीं। किफ़ायत, मेहनत, धार्मिकता और अच्छे आचरण के प्रति उसके मन में पूरा झुकाव था और इस कारण ब्वातेल उसे और भी प्यार करने लगा। धीरे-धीरे वह उससे इतना प्रभावित हो गया कि उसने उससे शादी करने का मन बना लिया।
जब ब्वातेल ने उसे अपना इरादा बताया तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा।उस लड़की के पास थोड़ी जमा-पूँजी भी थी, जो उसे उस औरत से मिला था, जिसने उसका बहुत दिनों तक पालन-पोषण किया था। ऑयस्टर बेचने वाली इस औरत ने हेवर के बंदरगाह में उसे अपनाया था। वह पहले एक अमरीकी कैप्टन को मिली थी, जिसने न्यूयार्क से जहाज़ रवाना होने के कुछ ही घंटों बाद जहाज़ के तहखाने में कपास की गट्ठरों पर उसे लेटे हुए पाया था।उस वक़्त वह केवल छह वर्ष की थी। हेवर में आने के बाद कैप्टन ने इस छोटी बच्ची को ऑयस्टर बेचनेवाली इस दयालु औरत के हवाले कर दिया था। वह नहीं जानता था कि वह उसके जहाज़ में कैसे पहुँची। उस औरत के मरने के बाद वह इस शराबख़ाने में काम करने लगी थी।
एंटोइन ब्वातेल ने कहा, “ यह सब ठीक है, बशर्ते मेरे माता-पिता शादी के ख़िलाफ़ न हों। तुम्हें याद रखना चाहिए कि मैं कभी भी उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ नहीं जाऊँगा -- कभी भी नहीं। इस बार जब मैं गाँव जाऊँगा तो उनसे बात करूँगा।”
अगले हफ़्ते चौबीस घंटे की छुट्टी मंज़ूर कराकर वह अपने परिवार से मिलने गया। उसका परिवार इवेत्तो के पास तूर्तविले में एक छोटे से फ़ार्म पर खेती करता था।
डिनर के बाद जब ब्रांडी मिश्रित कॉफ़ी के असर से लोगों के दिल एक दूसरे के प्रति उदार हो जाते हैं, उस वक़्त तक इंतज़ार करने के बाद ही ब्वातेल ने अपने माता-पिता को बताया कि उसे एक ऐसी लड़की मिली है, जो उसे हर दृष्टि से पसंद है। वह मानता है कि उसके लिए उससे अधिक लायक लड़की दुनिया में नहीं हो सकती।
यह सुनते ही उसके बूढ़े माता-पिता ने एक सतर्क रुख़ अपना लिया और उससे पूछताछ करने लगे। शुरुआत में उसने लड़की के कृष्ण वर्ण के अलावा कुछ नहीं छिपाया।
उसने कहा, वह एक नौकरानी है, उसके पास बहुत कम पैसे हैं, लेकिन वह तंदुरुस्त, किफ़ायती, साफ़-सुथरी और अच्छे चाल-चलन की समझदार लड़की है। उसके सारे गुण किसी बदमिज़ाज धनी युवती की धन-दौलत से बेहतर हैं। इसके अलावा उसके पास कुछ पैसे भी हैं, जो उसे उस औरत से मिले थे, जिसने उसे पाला था। खासी रक़म है--आप उसे छोटा-मोटा दहेज भी कह सकते हैं। उसके बचत खाते में पन्द्रह सौ फ़्रैंक हैं। बूढ़े माता-पिता उसकी बातों से प्रभावित दिख रहे थे और ऐसा लग रहा था कि वे राज़ी हो जाएँगे। ठीक उसी घड़ी वह नाज़ुक मुद्दे की ओर बढ़ा। थोड़ा झेंपते हुए उसने कहा:
“बस एक बात है, जो शायद आप दोनों को पसंद न आए। वह श्वेत नहीं है।”
उन्हें यह बात समझ में नहीं आई।
उसे इस बात को कुछ विस्तार से समझाना पड़ा। इस बात का पूरा ख़याल रखते हुए कि उसकी बातों से उन्हें ज़्यादा आघात नहीं पहुँचे, उसने अत्यंत सावधानी बरतते हुए बताया कि लड़की कृष्णवर्णी जाति की है, जिसके कुछ उदाहरण उन्होंने एपिनल के अजायबघर की मूर्तियों में देखे होंगे।
यह सुनते ही वे अशांत हो गये। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या कहें। वे इस क़दर भयभीत हो गये, जैसे उसने किसी शैतान से नाता जोड़ने का प्रस्ताव रखा हो।
माँ ने पूछा, “काली है? उसका कितना हिस्सा काला है? क्या पूरी की पूरी काली है?”
उसने कहा, “हाँ। पूरी की पूरी। वैसे ही जैसे तुम सिर से पाँव तक श्वेत हो।”
पिता ने बीच में टोका, “क्या वह उतनी काली है, जितना यह बर्तन काला है?”
बेटे ने जवाब दिया, “शायद उससे थोड़ा कम। वह काली है, लेकिन कुरूप नहीं है। पादरी का चोगा काला होता है, लेकिन उसके सफ़ेद उत्तरीय की तुलना में उसे बदसूरत नहीं कहा जा सकता।”
पिता ने पूछा, “क्या उसके देश में उसके जैसे और भी काले लोग हैं?”
बेटे ने यक़ीन के साथ कहा, “हाँ।”
बूढ़े ने अपना सिर हिलाया, “यह अच्छा नहीं लगता होगा।”
बेटे ने कहा, “बहुत सारी बातों की तुलना में यह बात उतनी बुरी भी नहीं है। कुछ समय बीतते ही आप इसके आदी हो जाएंगे।”
माँ ने पूछा, “क्या दूसरी चमड़ी की तुलना में काली चमड़ी से कपड़े ज़्यादा गंदे होते हैं?”
“नहीं, उतने ही जितने तुम्हारे, क्योंकि यह उसका असली रंग है।”
इसके बाद ढेर सारे और सवालों के बाद यह तय हुआ कि किसी भी निर्णय पर पहुँचने के पहले माता-पिता लड़की देखेंगे। एक महीने बाद ही उसकी नौकरी समाप्त होने वाली थी। इसके बाद वह लड़की के साथ घर आएगा, ताकि माता-पिता जाँच-परख कर यह निर्णय ले सकें कि उसका कालापन ब्वातेल परिवार में प्रवेश के मार्ग में बाधा है या नहीं।
लिहाज़ा एक महीने बाद एंटोइन ने उन्हें इत्तिला दिया कि वह रविवार बाइस मई को नौकरी से डिस्चार्ज होने के दिन अपनी महबूबा के साथ तुर्तविले के लिए रवाना होगा।
उसकी महबूबा ने यात्रा के लिए अपनी सबसे सुंदर और चटख रंगों वाली ड्रेस पहनी,जिसमें लाल, पीला और नीला रंग कुछ अधिक चमचमा रहा था। ऐसा लगता था जैसे वह राष्ट्रीय मेले के लिए सज-धज कर जा रही हो।
हेवर छोड़ते वक़्त टर्मिनस पर जुटी भीड़ उसे घूर-घूर कर देख रही थी।ब्वातेल को इस बात का अभिमान था कि उसकी संगिनी इस क़दर लोगों के आकर्षण का केन्द्र है। तीसरे दर्जे के डिब्बे में जब वह ब्वातेल की बग़ल में बैठी, तो आसपास बैठे किसानों में सनसनी फैल गयी। बग़ल के डिब्बों के मुसाफ़िर भी अपनी-अपनी बेंच पर खड़े हो गये और डिब्बों के बीच बने लकड़ी के पार्टीशन के ऊपर से झाँक-झाँककर देखने लगे।एक बच्चा उसे देखकर रोने लगा, जबकि दूसरे ने अपनी माँ के एप्रन में अपना मुँह छिपा लिया। फिर भी गंतव्य स्टेशन पहुँचने तक सब कुछ ठीक-ठाक ही था। लेकिन जैसे ही इवेत्तो पहुँचने के पहले ट्रेन की रफ़्तार धीमी हुई, एंटोइन का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। उसकी हालत ऐसे सैनिक जैसी हो रही थी, जिसने क़वायद का अभ्यास न किया हो और अचानक उसका निरीक्षण होने वाला हो। जब उसने डिब्बे के दरवाज़े से सिर बाहर निकाला तो उसने देखा उसके पिता एक बग्घी में जुते घोड़े की लगाम थामे कुछ दूर पर खड़े हैं और माँ प्लेटफ़ार्म की रेलिंग से घिरे हिस्से में खड़ी हैं, जहाँ कुछ और तमाशबीन भी इकट्ठे हो गये हैं।
पहले वह डिब्बे से नीचे उतरा, फिर उसने अपने हाथ से अपनी महबूबा का हाथ थामा और एकदम सीधा तनकर, मानो वह किसी जेनरल के साथ चल रहा हो, अपने परिवार की ओर बढ़ गया।
रंग-बिरंगे परिधान में लिपटी उस कृष्णवर्णी कन्या को अपने पुत्र के साथ देखकर माँ इस क़दर स्तब्ध हो गयी कि उसके मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकली। पिता के लिए घोड़े को थाम रखना मुश्किल हो रहा था, क्योंकि वह इंजन के कारण या शायद उस युवती को देखकर लगातार पीछे हट रहा था। लेकिन एंटोइन अपने माता-पिता को फिर से देखने की अमिश्रित ख़ुशी के कारण अपने दोनों हाथ फैलाकर उनकी ओर लपका, माँ को सीने से लगाया और पिता से दौड़कर मिला, हालाँकि इससे घोड़ा बिदक गया। इसके बाद वह अपनी महबूबा की ओर मुड़ा, जिसे प्लेटफ़ार्म पर खड़े मुसाफ़िर घोर अचरज से घूर-घूरकर देख रहे थे।
उसने अपने माता-पिता को कहा:
“यही है वह। मैंने आपको बताया था कि पहली नज़र में थोड़ी अजीब लग सकती है; लेकिन जैसे ही आप इसे सचमुच जानने लगेंगे, तो आपको पूरी दुनिया में इससे बेहतर कोई नहीं मिलेगा। आप बेहिचक इसका स्वागत-अभिवादन कर सकते हैं।”
इसके बाद मेर ब्वातेल ने, जो अपना होश-हवास लगभग खो चुकी थी, किसी तरह उस युवती का अभिवादन किया और पिता भी सिर से कैप हटाते हुए बुदबुदाये, “मैं आपके सौभाग्य की कामना करता हूँ।”
इसके बाद बिना और देरी किये वे बग्घी पर सवार हो गये। दोनों औरतें निचली सीटों पर बैठीं, जहाँ सड़क पर गाड़ी के हिचकोले खाने के कारण वे बार-बार उछल रही थीं। दोनों मर्द बाहर की ओर अगली सीट पर बैठे।
सभी ख़ामोश थे। एंटोइन असहज होकर एक सैन्य धुन पर सीटी बजाने लगा। उसका पिता घोड़े पर चाबुक बरसाने लगा और उसकी माँ कोने में बैठकर दबी-छिपी नज़रों से उस युवती को देखने लगी। युवती का ललाट और उभरा हुआ गाल धूप में उसी तरह चमक रहा था, जैसे अच्छी तरह पॉलिश किये हुए काले जूते चमकते हैं।
चुप्पी तोड़ने के लिए एंटोइन ने पीछे मुड़कर कहा:
“ऐसा लगता है हम कुछ भी बोलना नहीं चाहते!”
उसकी माँ ने कहा, “हमें वक़्त दो।”
उसने कहा, “माँ! तुम अपनी उस मुर्ग़ी की कहानी ही सुना दो, जो आठ अंडे देती थी।”
परिवार की यह पुरानी मज़ाक़िया दास्तान थी। लेकिन, माँ चुप ही रही। वह मानसिक उथल-पुथल से अशक्त हो चुकी थी। यह देखकर एंटोइन ख़ुद उस यादगार घटना का बयान करने लगा। कहानी सुनाते हुए वह ज़ोर -ज़ोर से ठहाके भी लगाता जा रहा था। पिता का चेहरा चिरपरिचित कहानी की शुरुआत के साथ ही खिल उठा और माँ भी जल्द ही रुचि लेने लगी और जब एंटोइन कहानी के सबसे पुरमज़ाक हिस्से पर पहुँचा तो वह युवती भी इतने उच्च स्वर में ठठाकर हँस पड़ी कि घोड़ा उत्तेजित होकर काफ़ी देर तक सरपट दौड़ता चला गया।
यह उनके आपसी जान-पहचान की शुरुआत थी। धीरे-धीरे उनमें बातचीत होने लगी।
घर पहुँचने पर सब बग्घी से उतरे। एंटोइन अपनी महबूबा को एक कमरे में ले गया ताकि वह कपड़े बदलकर रसोई में जाकर उसके माता-पिता के लिए एक अच्छा व्यंजन बनाए और इस प्रकार पेट के रास्ते उनका दिल जीते। इसके बाद वह अपने माता-पिता को थोड़ा अलग कर दरवाज़े की ओर ले गया और धड़कते दिल से पूछा, “तो अब आपलोग क्या कह रहे हैं?”
पिता ने कुछ नहीं कहा। माँ ने हिम्मत दिखाई। कहा:
“वह बहुत काली है। मुझसे बर्दाश्त नहीं होगा। देखते ही मेरा ख़ून सूख गया।”
“हो सकता है, लेकिन आपको बस थोड़ी देर तक बुरा लगेगा।”
इसके बाद वे घर के अन्दर आए। उस युवती को रसोई में जुटी देखकर माँ पर कुछ अच्छा असर पड़ा। जल्द ही वह भी पेटिकोट ऊपर खोंसकर उसकी मदद करने के लिए आगे बढ़ी। उम्रदराज़ होने के बावजूद वह बहुत फ़ुर्तीली थी।
खाना बहुत लज़ीज़ बना था और वे बहुत देर तक उसका आनन्द उठाते रहे। खाने के बाद बाहर साथ-साथ चहलक़दमी करते हुए एंटोइन ने पिता से पूछा:
“तो डैड, आपका क्या विचार है?”
किसान सावधान था। वह इस झमेले में नहीं फँसना चाहता था।कहा, “मेरा इस बारे में कोई विचार नहीं है। अपनी माँ से पूछो।”
एंटोइन माँ के पास वापस गया। उसे कमरे में एक किनारे ले जाकर पूछा:
“तो माँ, उसके बारे में तुम क्या सोचती हो?”
“मेरे बच्चे, वह सचमुच बहुत काली है। यदि वह थोड़ी भी कम काली होती तो मैं तुम्हारा विरोध नहीं करती। यह तो हमपर ज़्यादती होगी--लोग कहेंगे कि वह शैतान है!”
उसने ज़ोर नहीं दिया। वह जानता था माँ कितनी हठी है।उसके हृदय में निराशा का झंझावात चलने लगा। वह सोचने लगा कि उसे क्या करना चाहिए, किस तरह की योजना बनानी चाहिए। उसे आश्चर्य हो रहा था कि उसकी महबूबा ने जिस तरह उसका दिल जीता था, उस तरह वह उसके माँ-बाप पर कोई असर क्यों नहीं छोड़ पायी!
इसके बाद चारों बाहर निकलकर मक्के के खेतों से होकर धीरे-धीरे टहलने लगे। वे ख़ामोश थे। जब वे किसी खेत के बाड़े की बग़ल से गुज़रते तो सीढ़ियों और मचानों पर चढ़कर शरारती छोकरों का झुंड उन्हें घूरने लगता। लोग सड़क पर इकट्ठा हो गये थे ताकि वे ब्वातेल के साथ आई लड़की की एक झलक पा सकें। उन्होंने देखा कि दूर खेतों से लोग उत्तेजित हो दौड़े आ रहे हैं, मानो किसी ने एक हैरतअंगेज़ चलते-फिरते अजूबे को देखने के लिए डुगडुगी पिटवाई हो। पेर और मेर ब्वातेल अपने चारों ओर बढ़ती भीड़ की उत्सुकता से घबरा गये और अपने बेटे और उसके संगी को पीछे छोड़ते हुए तेज़ क़दमों से आगे बढ़ गये। युवती ने ब्वातेल से पूछा, “तुम्हारे माता-पिता मेरे बारे में क्या सोचते हैं?”
उसने थोड़ा हिचकते हुए जवाब दिया, “उन्होंने अभी तक कुछ तय नहीं किया है।”
जब उन्होंने गाँव में प्रवेश किया तो सब लोग अपने-अपने घरों से बाहर निकल आए। चारों ओर जैसे सनसनी फैल गयी। बढ़ती भीड़ को देखकर वृद्ध ब्वातेल दम्पति अपने निवास की ओर लगभग दौड़ पड़े, जबकि एंटोइन अपना ग़ुस्सा पीकर, अपनी महबूबा को अपनी बाँहों का सहारा देते हुए, अचरज से खुली,बेशर्म,घूरती आँखों का दिलेरी से सामना करते हुए आगे बढ़ता गया।
वह समझ गया कि उसके लिए अब कोई उम्मीद नहीं बची है-- वह अपनी महबूबा से शादी नहीं कर पाएगा। लड़की भी समझ गयी। फ़ार्म हाउस के निकट आते-आते वे दोनों रोने लगे।
घर वापस लौटते ही लड़की अपने कपड़े बदलकर घर के काम में माँ का हाथ बँटाने लगी। वह उसके साथ हर जगह गयी--- डेयरी, अस्तबल, मुरगीखाना और हर बार अधिक मेहनत वाला काम आगे बढ़-बढ़कर ख़ुद करती रही। बार-बार उसने कहा, “मादाम ब्वातेल, यह काम मुझे करने दीजिए।” उस वृद्धा पर इसका कुछ असर ज़रूर पड़ा, लेकिन उसकी धारणा नहीं बदली। रात में उसने बेटे से कहा, “वह अच्छी लड़की है, लेकिन यह सचमुच उसका दुर्भाग्य है कि वह इतनी काली है। कुछ ज़्यादा ही। मैं उसकी अभ्यस्त नहीं हो पाऊँगी। उसे वापस भेज दो-- बहुत काली है!”
और युवा ब्वातेल ने अपनी महबूबा से कहा:
“माँ नहीं मानेगी। वह सोचती है, तुम बहुत ज़्यादा काली हो। तुम वापस जाओ। मैं ट्रेन तक पहुँचाने जाऊँगा।फ़िक्र मत करो। तुम्हारे जाने के बाद मैं उससे फिर बात करूँगा।”
इसके बाद वह उसे रेलवे स्टेशन छोड़ने गया। वह बार-बार उसकी उम्मीद जगाकर उसे प्रसन्न करने की कोशिश करता रहा। उसने उसे चूमा, ट्रेन में बिठाया और ट्रेन को नज़रों से ओझल होने तक देखता रहा। रो-रोकर उसकी आँखें सूज गयी थीं।
उसने माता-पिता को मनाने की पूरी कोशिश की, लेकिन वे राज़ी नहीं हुए।
उसकी कहानी इस इलाक़े के सभी बाशिंदों को मालूम है। कहानी सुनाकर एंटोइन ब्वातेल अंत में कहता:
“उसके बाद मेरे मन में किसी भी चीज़ के लिए कोई लगाव, कोई उत्साह नहीं रह गया। कोई भी काम मुझे पसंद न आया और इसलिए मैं वह बना जो आज हूँ--- एक नाइट कार्टमैन!”
इसपर लोग कहते, “लेकिन तुमने शादी की।”
“हाँ। और यह भी नहीं कहूँगा कि मुझे अपनी बीवी पसंद नहीं है---आख़िर मेरे चौदह बच्चे हैं। लेकिन जो वह थी, वह मेरी बीवी कभी नहीं हो सकती-- कभी भी नहीं। उसकी तो बस एक निगाह मेरे लिए ज़न्नत के सारे दरवाज़े खोल देती थी।”
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