एंटन चेखव
(अनुवाद: राजीव रंजन सिंह)
एक दिन, जब वह युवा थी, ख़ूबसूरत थी और उसकी आवाज़ सुरीली थी, उसके समर विला के बाहरी कमरे में उसके साथ उसका मुरीद निकोलाई पेत्रोविच कोलपाकोव बैठा हुआ था। असह्य गर्मी और उमस भरा दिन था। कोलपाकोव ने अभी-अभी लंच लिया था और उसके बाद घटिया पोर्ट वाइन भी चढ़ा रखी थी। उसे ऊब और झुँझलाहट हो रही थी। दोनों इस इंतज़ार में थे कि दिन की ताप कम हो तो वे टहलने के लिए बाहर निकलें।
इसी समय अचानक दरवाज़े की घंटी बजी। कोलपाकोव, जो कोट निकालकर और पैरों में स्लिपर डालकर बैठा था, अपनी कुर्सी से उछलकर खड़ा हो गया और पाशा को सवालिया नज़रों से देखने लगा।
“डाकिया होगा या कोई लड़की होगी” गायिका ने कहा।
कोलपाकोव को इस बात से एतराज़ नहीं था कि डाकिया या पाशा की सहेलियाँ उसे वहाँ देखेंगी, फिर भी सावधानी बरतते हुए उसने अपने कपड़े उठाये और बग़ल के कमरे में चला गया। पाशा दरवाज़ा खोलने के लिए दौड़ पड़ी।
वह यह देखकर अचम्भे में पड़ गयी कि दरवाज़े के बाहर न तो डाकिया था, न कोई सहेली, बल्कि एक अनजान स्त्री खड़ी थी। स्त्री युवा और ख़ूबसूरत थी, पहनावा सम्भ्रान्त महिलाओं जैसा था और शायद कोई सम्भ्रान्त महिला ही थी।
आगन्तुक स्त्री का चेहरा पीला पड़ गया था और वह बुरी तरह हाँफ रही थी, मानो वह दौड़ती हुई सीढ़ियाँ चढ़कर आयी हो।
“क्या है?” पाशा ने पूछा।
महिला ने तुरंत जवाब नहीं दिया। वह एक क़दम आगे बढ़कर कमरे में दाख़िल हुई, धीरे-धीरे पूरे कमरे का मुआयना किया और इस तरह बैठ गयी जैसे थकान या शायद अस्वस्थता के कारण वह खड़ी नहीं रह सकती; और उसके बाद बहुत देर तक बोलने की असफल कोशिश में उसके होंठ काँपते रहे।
“क्या मेरे पति यहाँ पर हैं?” आख़िरकार उसने आँसुओं से डबडबायी आँखों से पाशा को देखते हुए पूछा।
“पति?” पाशा बुदबुदायी और अचानक इस क़दर डर गयी कि उसके हाथ-पाँव ठंडे पड़ गये।
“कौन पति?” उसने काँपते हुए दुहराया।
“मेरे पति----- निकोलाई पेत्रोविच कोलपाकोव।”
“नहीं, मैडम, नहीं ------ मैं------मैं किसी पति को नहीं जानती।”
एक मिनट ख़ामोशी में बीता। अजनबी ने बार-बार अपना रुमाल अपने होंठों से लगाया। वह अपने अन्दर से उठने वाली कँपकँपी को रोकने के लिए अपनी साँस थाम रही थी। पाशा एक खम्भे की तरह स्थिर खड़ी थी और उसे भय और आश्चर्य से घूर रही थी।
“तो तुम कह रही हो वे यहाँ नहीं हैं?” महिला ने कहा। इस बार उसकी आवाज़ में दृढ़ता थी और उसके होंठों पर कुछ अजीब सी मुस्कराहट थी।
“मैं नहीं जानती। आप किसकी बात कर रही हैं?”
“तुम बेहद घिनौनी, नीच और दुष्ट औरत हो।” उसने पाशा को नफ़रत और धिक्कार भरी नज़रों से देखते हुए कहा,”हाँ, तुम्हें देखकर घिन आती है-----मुझे ख़ुशी है कि आख़िर मैंने वह कह ही दिया, जो कहना चाहती थी!”
पाशा को महसूस हुआ जैसे उसने ग़ुस्से से लाल आँखों वाली, गोरी, पतली उँगलियों वाली, काले परिधान में लिपटी इस महिला पर अत्यंत घृणित और अशोभनीय छाप छोड़ी है। वह अपने गदबदे लाल गाल, नाक पर चेचक के दाग और आधी ललाट तक झूल आए बाल, जिन्हें कंघी से वापस नहीं पलटा जा सकता था, का ख़याल कर बेहद शर्मिन्दा हो गयी। उसे लगा कि यदि वह दुबली होती, यदि उसके चेहरे पर पाउडर छिड़का न होता और बाल आधी ललाट तक झूलते न होते तो वह इस बात को छिपा सकती थी कि वह ‘सम्भ्रांत’ नहीं है और तब इस अज्ञात रहस्यमयी महिला के सामने खड़े रहने में उसे डर या शर्म नहीं आती।
“मेरा पति कहाँ है?” महिला ने फिर पूछा, “हालाँकि मुझे इसकी परवाह नहीं है कि वह यहाँ है या नहीं। मैं तुम्हें केवल यह बताने आयी हूँ कि लोगों को पता चल गया है कि पैसे ग़ायब हो गये हैं और वे निकोलाई पेत्रोविच को खोज रहे हैं---- उनको गिरफ़्तार किया जाएगा। यह सब तुम्हारा किया कराया है।”
महिला उठ गयी और अत्यधिक उत्तेजना से कमरे में टहलने लगी। पाशा की नज़र उस पर टिकी हुई थी। वह इस क़दर डरी हुई थी कि उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।
“उसे आज ही ढूँढ़ा जाएगा और गिरफ़्तार किया जाएगा।” महिला ने कहा। वह रोने लगी। उसके रोने-सिसकने में उसकी नाराज़गी और झुँझलाहट दिख रही थी। “मैं जानती हूँ उसे इस हालत तक किसने पहुँचाया है। नीच, कमीनी, लोभी, बदकार औरत!” जुगुप्सा से महिला ने अपने होंठ और नाक सिकोड़ लिये।
“मैं बिलकुल लाचार हूँ, सुन रही हो तुम?-----मैं लाचार हूँ और तुम मुझसे अधिक ताक़तवर हो। लेकिन ऊपर एक है, जो मुझे और मेरे बच्चों को बचाएगा। ऊपर वाला सब देखता है। वह इन्साफ़ करेगा। वही तुमसे मेरे आँसुओं की एक-एक बूँद का और रात-रात भर जगने का हिसाब माँगेगा। एक वक़्त ज़रूर आएगा जब तुम मुझे याद करोगी।”
एक बार फिर ख़ामोशी छा गयी। महिला कमरे में टहल रही थी और अपने हाथ झटक रही थी। पाशा आश्चर्य से उसे घूर रही थी। उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था और उसे लग रहा था कोई भयावह घटना घटने वाली है।
“मैडम, मैं इस बारे में कुछ भी नहीं जानती।” उसने कहा और अचानक रोने लगी।
“तुम झूठ बोलती हो!” महिला चिल्लायी और उसे अत्यंत क्रुद्ध दृष्टि से देखा, “मुझे सब पता है। मैं तुम्हें बहुत दिनों से जानती हूँ। पिछले एक महीने से उनका हर दिन तुम्हारे साथ बीतता है।”
“हाँ । तो? तो क्या? न जाने कितने लोग मुझसे मिलने आते हैं। मैं किसी को आने के लिए नहीं कहती। जो भी आते हैं अपनी मर्ज़ी से आते हैं।”
“मैं तुम्हें यह बताने आयी हूँ कि लोगों को पता चल गया है कि पैसे ग़ायब हो गये हैं। तुम जैसी ओछी लड़की के लिए उस आदमी ने जुर्म किया है! सुनो!” पाशा के ठीक सामने रुककर उसने अपनी आवाज़ ऊँची करते हुए कहा, “तुम्हारी ज़िन्दगी का तो कोई उसूल नहीं है। तुम सिर्फ़ दूसरों को नुक़सान पहुँचाने के लिए ज़िन्दा हो। तुम्हारी ज़िन्दगी का बस यही मक़सद है। लेकिन क्या तुम इतनी गिरी हुई हो कि तुम्हारे अन्दर इन्सानियत का एक क़तरा भी नहीं बचा है? उस आदमी की बीवी है, बच्चे हैं-----। यदि उसे सज़ा हो गयी और उसे देशनिकाला दे दिया गया तो हमलोग, मैं और बच्चे, भूखों मरेंगे-----क्या समझ रही हो?----लेकिन उनको जेल से और हमें बदहाली और ज़लालत से बचाने का अभी भी एक रास्ता है। यदि मैं उन लोगों को आज जाकर नौ सौ रूबल दे दूँ तो वे उसे छोड़ देंगे। केवल नौ सौ रूबल!”
“नौ सौ रूबल?” पाशा ने धीरे से कहा, “मैं नहीं जानती।---- मैं ने नहीं लिया है।”
“मैं तुमसे नौ सौ रूबल नहीं माँग रही। तुम्हारे पास पैसे नहीं होंगे और मुझे तुम्हारे पैसे चाहिए भी नहीं। मैं तुमसे कुछ और माँग रही हूँ--- लोग तुम जैसी औरतों को मँहगे उपहार देते हैं। तुम केवल उन चीज़ों को लौटा दो जो तुम्हें मेरे पति से मिली हैं।”
“मैडम, उस आदमी ने मुझे आज तक कोई उपहार नहीं दिया है।” पाशा रोते हुए बोली। उसे कुछ-कुछ समझ में आने लगा था।
“तो पैसा कहाँ गया? उसने अपना, मेरा और दूसरों का भी पैसा लुटाया है---। उतने पैसों का क्या हुआ? सुनो, मैं तुमसे विनती करती हूँ। मैं ग़ुस्से में थी और तुम्हें बहुत बुरा-भला कहा। मैं इसके लिए माफ़ी माँगती हूँ। मैं जानती हूँ तुम मुझसे नफ़रत करती हो। लेकिन तुम्हारे अन्दर दिल है तो ख़ुद को मेरी जगह रखकर देखो। मैं तुमसे विनती करती हूँ —-तुम उन चीज़ों को लौटा दो।”
“हुँह----!” पाशा ने अपने कंधे उचकाते हुए कहा,”मैं ख़ुशी से लौटा देती, पर खुदा गवाह है, उसने कभी भी मुझे कोई भेंट नहीं दी है। मुझ पर यक़ीन कीजिए, मेरी अन्तरात्मा पर भरोसा रखिए। लेकिन--शायद आप ठीक कह रही हैं,” गायिका को अचानक कुछ याद आया, “हाँ, उसने मुझे दो छोटी चीज़ें दी हैं। यदि आप चाहती हैं, तो मैं उन्हें ज़रूर लौटा दूँगी।”
पाशा ने अपनी सिंगार-मेज़ की एक दराज़ खोली और उससे सोने का एक हल्का पोला कंगन और एक रूबी-जड़ी पतली अँगूठी निकाली।
“लीजिए मैडम।” उसने महिला को दोनों चीज़ें देते हुए कहा।
“तुम मुझे क्या दे रही हो?” उसने कहा, “मैं कोई भीख नहीं माँग रही। मैं वह माँग रही हूँ, जो तुम्हारा नहीं है----जिसे तुमने अपनी स्थिति का फ़ायदा उठाकर मेरे पति से ठगा है। वे तो एक कमज़ोर और दुखी इन्सान हैं। बृहस्पतिवार को बन्दरगाह पर तुम मेरे पति के साथ थी। उस दिन मैंने देखा था कि तुमने क़ीमती ब्रोच और कंगन पहन रखे थे, इसलिए निर्दोष मेमना बनने का नाटक बन्द करो। मैं तुमसे आख़िरी बार पूछ रही हूँ----तुम चीज़ें लौटाओगी या नहीं?”
“आप अजीब हैं------सच में!” पाशा ने कहा। उसे बहुत बुरा लग रहा था, “मैं आपको कैसे यक़ीन दिलाऊँ कि इस कंगन और छोटी अँगूठी के सिवा आपके निकोलाई पेत्रोविच से मुझे कुछ भी नहीं मिला है? मीठे केक के सिवा वह कभी कुछ नहीं लाता है।”
“मीठे केक!” महिला हँस पड़ी। “घर में बच्चों को खाने के लाले पड़े हैं और यहाँ तुम्हें मीठे केक मिलते हैं! तो तुम उपहार वापस करने से पूरी तरह इन्कार करती हो?”
जब उसे कोई जवाब नहीं मिला तो वह बैठ गयी और सामने शून्य में ताकते हुए कुछ सोचने लगी।
“अब क्या करूँ?” वह बुदबुदायी, “यदि मुझे नो सौ रूबल नहीं मिले तो वह बरबाद हो जाएगा और उसके साथ मैं और बच्चे भी। क्या मैं इस नीच औरत का गला घोंट दूँ या घुटनों पर झुककर इससे भीख माँगू?” वह रुमाल से अपना चेहरा ढककर रोने लगी।
“मैं तुमसे विनती करती हूँ।” पाशा ने महिला को सिसकियों के बीच कहते सुना, “देखो, तुमने मेरे पति को लूटा और बरबाद किया है।---उसे बचाओ! तुम भले उसपर तरस न खाओ---लेकिन बच्चे?---बच्चों ने क्या किया है?”
पाशा की आँखों के सामने एक दृश्य तैर गया कि बच्चे सड़क पर खड़े होकर भूख-प्यास के मारे रो रहे हैं। वह भी रोने लगी।
“मैं क्या करूँ मैडम?” उसने पूछा, “आप कहती हैं कि मैं एक नीच औरत हूँ और मैंने निकोलाई पेत्रोविच को बरबाद कर दिया है, लेकिन मैं सर्वज्ञ ईश्वर के सामने आपको यक़ीन दिलाना चाहती हूँ कि उनसे मुझे कुछ नहीं मिला। हमारे कोरस में केवल एक लड़की है जिसके पास एक धनी प्रशंसक आता है। बाक़ी सारी लड़कियाँ किसी तरह ब्रेड और क्वास पर गुज़ारा करती हैं। निकोलाई सुशिक्षित, सुसंस्कृत, भद्र पुरुष हैं, इसलिए मैंने उन्हें यहाँ आने दिया है। कोई सज्जन यहाँ आए तो हम मना नहीं कर सकते।”
“मुझे चीज़ें वापस चाहिए। मुझे वे चीज़ें दे दो। मैंने रो-रोकर ख़ुद को तेरे सामने ज़लील किया है। यदि तुम कहो तो मैं घुटनों पर गिरकर तुमसे भीख माँगूँगी।”
पाशा आतंकित होकर चीख़ी और अपना हाथ नकार में हिलाया। उसे लगा कि यह पीली, सुन्दर महिला, जो अपने मनोभाव इतने असरदार तरीक़े से ज़ाहिर कर रही थी, मानो वह किसी मंच पर अभिनय कर रही हो, सचमुच अपने घुटनों पर झुक सकती है---- केवल अपना दर्प, अपनी महत्ता दिखाने के लिए और उसे, महज़ एक कोरस गर्ल को, ज़लील करने के लिए।
“ठीक है, मैं आपको दूंगी!” पाशा ने आँखें पोंछते हुए, व्यस्त होते हुए कहा, “आप ले जाइए। सिर्फ़ यह याद रखिए कि ये चीज़ें मुझे निकोलाई पेत्रोविच से नहीं मिली हैं---- मुझे यह सब दूसरों से मिला है। फिर भी आप की जैसी मर्ज़ी।”
पाशा ने तिजोरी का ऊपरी दराज़ खींचा और उससे एक हीरे का एक ब्रोच, एक कोरल नेकलेस, कुछ अँगूठियाँ और कंगन निकाले और सारी चीज़ें महिला के सामने रख दीं।
“आपकी मर्ज़ी है तो ये सब ले जाइए। सिर्फ़ याद रखिए कि इनमें से कुछ भी आपके पति से नहीं मिला है। ले जाइए और अमीर बन जाइए।” पाशा ने कहा। घुटनों पर गिरने की धमकी से वह चिढ़ गयी थी। उसने कहा, “यदि आप कुलीन महिला हैं और उनकी क़ानूनन ब्याहता हैं तो मेरा विचार है कि उन्हें अपने पास ही रखिए। मैंने उन्हें यहाँ नहीं बुलाया था----वे अपने आप आये थे।”
अपने आँसुओं के बीच उस महिला ने उन चीज़ों की जाँच की और कहा, “बस इतना ही?----- ये तो पाँच सौ रूबल की भी नहीं होंगी।”
पाशा ग़ुस्से में उठी और तिजोरी से सोने की घड़ी, सिगार केस और जड़ाऊ आभूषण निकाले और उन्हें उसके हाथों में फेंकते हुए कहा, “मेरे पास और कुछ नहीं है----चाहें तो खोज लीजिए!”
आगन्तुका ने गहरी साँस ली और काँपते हाथों से सारी चीज़ों को समेटकर अपने रुमाल में बाँधा और बिना एक लफ़्ज़ बोले, पाशा से नज़र न मिलाते हुए, बाहर चली गयी।
पिछले कमरे का दरवाज़ा खोलकर कोलपाकोव सामने आया। वह पीला पड़ चुका था और अपना सिर बार-बार हिला रहा था, मानो उसने कुछ कड़ुआ निगल लिया हो। उसकी आँखों में आँसू चमक रहे थे।
“तुमने मुझे कौन-सा उपहार दिया था?” पाशा चीख़ी, “कब तुमने मुझे कुछ भी माँगने की इजाज़त दी?”
“उपहार-- वह कोई बात नहीं है।” कोलपाकोव ने सिर हिलाते हुए कहा, “हे ईश्वर ! वह तुम्हारे सामने रोयी! तुम्हारे सामने गिड़गिड़ायी!—”
“मैं तुमसे पूछ रही हूँ तुमने मुझे कौन-सा उपहार दिया था?” पाशा चिल्लायी।
“हे ईश्वर! वह भद्र महिला है, कितनी अभिमानी है, कितनी पवित्र है----- और वह तुम्हारे सामने-- इस दो टके की छोकरी के सामने-- घुटनों पर गिरने के लिए तैयार थी! मैंने उसे इस हाल तक पहुँचा दिया? मैंने यह सब होने दिया?”
उसने अपने हाथों से अपना सिर थाम लिया और कराहने लगा।
“नहीं, मैं अपने -आपको इसके लिए कभी नहीं माफ़ करूंगा। मुझसे दूर हो जाओ---- नीच औरत!” वह जुगुप्सा से चिल्लाया और पाशा को काँपते हाथों से धकेलते हुए पीछे हट गया। उसने कहा, “वह तुम्हारे आगे घुटनों पर गिरने वाली थी! हे ईश्वर!”
उसने जल्दबाज़ी में कपड़े पहने और हिक़ारत से पाशा को एक ओर हटाते हुए दरवाज़े की ओर बढ़ा और बाहर निकल गया।
पाशा बिस्तर पर लेटकर विलाप करने लगी। उसे पछतावा होने लगा था कि उसने आवेश में आकर अपनी सारी चीज़ें क्यों दे दी! उसे गहरी चोट पहुँची थी। उसे याद आया कि तीन वर्ष पहले किस तरह एक सौदागर ने एक छोटी सी बात पर उसे कितना पीटा था और वह और ज़ोर-ज़ोर से विलाप करने लगी।
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