Saturday, August 18, 2018

अकेलापन

मोपासाँ


(अनुवाद: राजीव रंजन सिंह)

हमलोग एक दोस्त के घर डिनर पर बुलाये गये थे। डिनर बड़ा तृप्तिदायक था। डिनर समाप्त होने के बाद वहाँ मौजूद लोगों में से एक पुराने दोस्त ने मुझे कहा:

'' चलो, कैम्प्स-एलिसीज़ में थोड़ा टहल आएँ।'' 

मैंने उसकी बात मान ली और हम दोनों बाहर निकल आए। हम उस लम्बे प्रोमिनाड में धीरे-धीरे टहलने लगे। रास्ते के किनारे खड़े वृक्षों में बहुत कम पत्ते थे। कहीं से भी कोई आवाज नहीं आ रही थी- सिवा उस निरन्तर अटपटी घुरघुराहट के जो पेरिस की अपनी खास आवाज है। ताजा हवा का झोंका हमारे गालों को सहला रहा था और काले आसमान में लाखों तारे सोने के बुरादे की तरह बिखरे हुए थे। मेरे मित्र ने मुझे कहा:

'' पता नहीं क्यों, मैं रात के समय किसी भी और जगह के मुकाबले इस जगह अधिक सुकून के साथ साँस लेता हूँ। मुझे ऐसा लगता है जैसे यहाँ मेरे विचारों के दायरे बढ़ जाते हैं। कभी-कभी मेरी आत्मा में एक धुँधला सा आभास होता है जो मेरे मन में एक पल के लिए यह विश्वास पैदा करता है कि शायद मेरे समक्ष सृष्टि का दैवी रहस्य खुलने ही वाला है। लेकिन इसी के साथ जैसे कपाट बन्द हो जाते हैं और मेरी अन्तर्दृष्टि समाप्त हो जाती है।''

कुछ पलों के अन्तराल पर रास्ते के किनारे लगी झाड़ियों पर दो साये तैरते दिखे; इसके बाद हमलोग एक बेंच की बगल से गुजरे जहाँ दो आकृतियाँ आपस में इस कदर युगबद्ध बैठी थीं कि वे मिलकर एक काले धब्बे की तरह लग रही थीं।
मेरा दोस्त फुसफुसाया:
'' बेचारे! इन्हें देखकर मुझे वितृष्णा नहीं होती है, बल्कि इनपर जबर्दस्त तरस आता है। मानव जीवन के समस्त रहस्यों में से केवल एक  रहस्य है, जिसे मैं समझ पाया हूँ। वह रहस्य यह है कि  इस अस्तित्व में हमारा सबसे बड़ा दुख हमारा चिर पुरातन अकेलापन है। हमारे सारे प्रयासों और सारे कर्मों की एक ही दिशा है कि हम इस अकेलेपन से कैसे बचें। खुली हवा में बेंच पर बैठा हुआ यह प्रेमी युगल भी वही खोज रहा है, जिसकी खोज में हम सब  और इस सृष्टि के  समस्त प्राणी भटक रहे हैं- कि हमारा अकेलापन कैसे खत्म हो, भले ही एक मिनट के लिए या उससे भी कम समय के लिए। सभी प्राणी अकेले जी रहे हैं और अकेले ही जीएंगे और हम भी।
''यह सच कमोबेश हम सब जानते हैं। मैं पिछले कुछ दिनों से एक असहनीय पीड़ा भोग रहा हूँ जो मेरे इस अहसास से उपजी है कि मैं किस कदर  भयावह अकेलेपन में जिन्दगी गुजार रहा हूँ और ऐसी कोई चीज नहीं है जो इस अकेलेपन को समाप्त कर देगी- कोई चीज नहीं। सुन रहे हो न? चाहे हम कुछ भी कर लें, हमारे हृदय में कैसा भी दुख हो, हमारे अधरों का आकर्षण और हमारी बाहों का आलिंगन कितना भी मादक क्यों न हो हम हमेशा अकेले हैं। आज की रात मैंने तुम्हें साथ टहलने के लिए इसलिए कहा ताकि मैं अपने घर न जाऊँ, क्योंकि घर का अकेलापन मुझे बुरी तरह काटता है। लेकिन इससे क्या फायदा ? मैं तुम्हें सुना रहा हूँ और तुम सुन रहे हो, लेकिन हम दोनों अकेले हैं, साथ-साथ लेकिन अकेले। तुम समझ रहे हो न?

'' धर्म ग्रन्थ में लिखा है- धन्य हैं वे जो दीन हैं। उनके पास आनंद की प्रतीति है। वे हमारी तरह अकेलेपन के दुख से पीड़ित नहीं होते, वे जीवन भर भटकते नहीं रहते हैं, जैसे कि मैं भटकता रहता हूँ और फिर भी भीड़ में  लोगों की कुहनियों से लगने वाले टहोके के सिवा मेरा दूसरों से कोई गहरा रिश्ता नहीं जुड़ पाता है। अपने अन्तहीन अकेलेपन के बोध से होने वाली चिरंतन पीड़ा को देखने और समझने के अहंकार के सिवा मेरे पास कोई खुशी नहीं है।

'' तुम मुझे थोड़ा सनकी समझते हो- है न? फिर भी जो कह रहा हूं उस पर गौर करो।  जिस दिन से मैंने अपने अस्तित्व के अकेलेपन को महसूस किया है, उस दिन से मुझे ऐसा लगता है, जैसे मैं दिन-ब-दिन एक अंधेरी गुफा में गहरे और गहरे धँसता जा रहा हूँ। इस गुफा की दीवार को मैं टटोल नहीं पाता और इसके आखिरी छोर पर क्या है यह भी नहीं जानता, शायद इसका आखिरी छोर है भी नहीं। मैं इस गुफा में अकेले डूब रहा हूँ- मेरे आसपास कोई नहीं है। कोई भी जीवित प्राणी मेरी इस मनहूस यात्रा का संगी नहीं है। यह गुफा जिन्दगी है। कभी-कभी मुझे कोई  आहट, कोई शोर, कोई चीख सुनायी पड़ती है। मैं डरते-सहमते इन अर्थहीन आवाजों की ओर बढ़ता हूँ, लेकिन मुझे कभी भी यह ठीक-ठीक पता नहीं चल पाता है कि ये आवाजें कहाँ से आती हैं; चारों ओर से घेरनेवाले इस अंधकार में कभी भी किसी और शख्स से मेरी भेंट नहीं होती। क्या तुम समझ रहे हो?

'' कभी-कभी कुछ लोगों ने इस पीड़ा की थाह ली है। डी मुसेट ने लिखा है:

'' कौन आया?
किसने मुझे पुकारा?
किसी ने भी नहीं!
अकेला हूँ
घड़ी में एक का घंटा बजा।
ओह अकेलापन!
ओह यातना!''

लेकिन यह सब डी मुसेट के लिए केवल कुछेक पलों के लिए ठहरने वाला प्रश्न है, कोई स्थायी सत्य नहीं है, जैसा कि मेरे साथ है। वह तो एक कवि था; उसकी जिन्दगी में कल्पना और सपनों के रंग थे। दरअसल वह कभी अकेला नहीं था। मैं अकेला हूँ।
'' गुस्ताव फ्लोबा इस दुनिया के महान अभागों में से एक थे, क्योंकि वे इस जगत के लिए एक दिव्य ज्योतिस्तम्भ भी थे। उन्होंने अपने एक दोस्त को यह निराशाजनक वाक्य लिखा था: ''हम सब एक बियाबान में हैं। यहाँ कोई भी किसी को नहीं समझता।''

'' नहीं,  कोई भी किसी को नहीं समझता- चाहे कोई कुछ भी सोच ले, कुछ भी कह ले, कैसी भी कोशिश कर ले। क्या यह धरती जानती है कि उन तारों में क्या चल रहा है, जो नभ मंडल में अग्नि स्फुलिंग के समान बिखेर दिये गये हैं - इतने दूर कि हम केवल उनमें से कुछ की ही झलक पा सकते हैं ? उन अनगिनत तारों के बारे में भी सोचो जो अनन्त आकाश में खो गये हैं - वे शायद एक दूसरे के इतने निकट हैं कि वे मिलकर एक परिपूर्ण आकार बनाते हैं , ठीक वैसे ही जैसे असंख्य अणु मिलकर एक देह बनाते हैं।

'' इसी तरह इंसान भी नहीं जानता कि दूसरे इंसान के भीतर क्या चल रहा है। हमारे बीच तो तारों से भी अधिक दूरी है। हम तारों से भी कहीं अधिक एकाकी हैं, क्योंकि हमारे विचारों, हमारी सोच की  थाह कोई नहीं ले सकता।

'' क्या तुम इससे अधिक भयावह चीज की कल्पना कर सकते हो कि हम निरन्तर ऐसी हस्तियों से घिरे हुए हैं, जो हमारे लिए अबूझ हैं? हम एक दूसरे से इस तरह प्यार करते हैं, जैसे हम पास-पास एक जंजीर से बँधे हों, लेकिन फिर भी हम हाथ बढ़ाकर एक दूसरे को छू नहीं सकते। एक दूसरे से जुड़ जाने की प्यास हमें परेशान करती है, लेकिन हमारे सारे प्रयास निष्फल होते हैं  । हमारा आत्मसमर्पण व्यर्थ, हमारे विश्वास विफल, हमारे आलिंगन बेजान और हमारा सारा लाड़-दुलार अकारथ हो जाता है। जब हम परस्पर जुड़ना चाहते हैं तो हमारी भावनाएँ हमें एक दूसरे से टकराने पर मजबूर करती हैं।

'' मैं उतना अकेला  कभी नहीं महसूस करता जितना उस समय जब मैं किसी दोस्त के सामने अपना दिल खोलकर रखता हूँ, क्योंकि ऐसे वक्त मुझे यह समझ में आता है कि हमारे बीच कितनी अलंघ्य बाधा है। मेरा दोस्त मेरे सामने बैठा है; में उसकी पारदर्शी आँखों में झाँक रहा हूँ, लेकिन मैं उन आँखों के पीछे विराजमान आत्मा को नहीं देख पाता। वह मुझे सुन रहा है, लेकिन वह क्या सोच रहा है? हाँ, वह क्या सोच रहा है? तुम इस यातना को नहीं समझ सकते। शायद वह मुझसे नफरत करता है- शायद उसके मन में मेरे प्रति घोर तिरस्कार है- शायद वह मन ही मन मुझ पर हँस रहा है। मैंने उसे जो कुछ बताया है उसपर वह विचार कर रहा है; वह मेरे ऊपर कोई आरोप लगा रहा है, मेरे विरुद्ध दलीलें दे रहा है और मुझे धिक्कार रहा है। वह मूझे बेहद मामूली या मूर्ख समझ रहा है। 

'' मैं कैसे जानूँ कि वह क्या सोचता है? कैसे जानूँ कि मैं उसे जितना प्यार करता हूँ वह भी मुझे उतना ही प्यार करता है? उस छोटे से गोल माथे के भीतर  आखिर क्या चल रहा है? किसी इंसान के भीतर छिपा हुआ अनजान और स्वतंत्र विचार कितना बड़ा रहस्य है कि न तो हम उसे जान सकते हैं, न उसे अपने वश में कर सकते हैं, न उसे अपने इशारे पर नचा सकते हैं और न उस पर विजय ही पा सकते हैं।

'' और मैं? मैंने व्यर्थ ही सोचा था कि मैं पूरी तरह अपने आपको उसके सामने उद्घाटित करूंगा; अपनी आत्मा के सारे कपाट खोल दूंगा। लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पाया। मैं अभी भी अपने गहरे अंधकार से आवृत्त हूँ, जहाँ कोई दूसरा नहीं पहुँच सकता। वहाँ तक किसी की  इसलिए पहुँच नहीं है, क्योंकि कोई भी मेरे जैसा नहीं है, क्योंकि एक इंसान किसी दूसरे इंसान को नहीं समझ सकता।

'' कम से कम तुम मुझे इस क्षण समझ रहे हो। है न? क्या तुम मुझे पागल समझ रहे हो? तुम मुझे परख रहे हो; मुझसे कतरा रहे हो। अपने आपसे पूछ रहे हो: ' आज इसे  हुआ क्या है?'  लेकिन यदि तुम किसी दिन मेरी इस भयावह गूढ़ यातना को समझ पाओ, तो मेरे पास आना और केवल यह कहना: ' मैं तुम्हें समझता हूँ।' इससे मुझे खुशी मिलेगी, भले ही एक पल के लिए, शायद।

'' औरतें मुझे अपने अकेलेपन का और भी अधिक अहसास कराती हैं। मैंने  औरतों के हाथों कितना दुख पाया है; क्योंकि पुरुषों की तुलना में स्त्रियाँ मुझमें यह प्रतीति पैदा करती हैं कि मैं अकेला नहीं हूँ।

'' जब किसी को प्यार हो जाता है तो लगता है जैसे उसके अस्तित्व का प्रसार हो रहा है। उसे एक अलौकिक संतुष्टि घेरे रहती है। जानते हो क्यों? क्या तुम जानते हो उस समय तुम्हें असीमित आनंद की अनुभूति क्यों होती है? ऐसा सिर्फ इसलिए है क्योंकि हम सोचने लगते हैं अब हम अकेले नहीं हैं। ऐसा लगने लगता है जैसे मानव का अकेलापन, उसका निर्वासन समाप्त हो गया है। लेकिन यह कितनी बड़ी भूल है!

'' हमारे एकाकी हृदय को व्याकुल करने वाली प्रेम की यह चिरंतन पिपासा हमसे भी अधिक स्त्रियों को सताती है, जो स्वयं अपने आप में एक महान विभ्रम और स्वप्न हैं।
'' तुम्हें मालूम है कि लम्बी केशराशि, तीखे नाक-नक्श और हमें प्यार करने के लिए उकसाती चंचल चितवन वाली रूपसी के सामने घंटों गुजारना हमारे जीवन के मधुरतम अनुभव हैं। हमारे मन-मस्तिष्क पर कैसा पागलपन छाया रहता है? कैसी प्रवंचना हमें छलती रहती है? क्या ऐसा नहीं लगता जैसे बस एक क्षण में हमारी आत्माएँ एक दूसरे से मिलकर एक हो जाएंगी। लेकिन वह एक क्षण कभी नहीं आता; और हफ्तों के इंतजार, उम्मीदों और छलावे भरी खुशी के बाद आप अपने आपको एक बार फिर इतना तनहा पाते हैं जितना आप कभी न थे।

'' हर चुम्बन, हर आलिंगन के बाद अलगाव बढ़ता ही जाता है और आदमी कितनी भयावह यातना से गुजरता है!

क्या सल्ली प्रूधोम ने नहीं लिखा है:

'' प्यार भरे स्पर्श केवल व्याकुल करते हैं-
यह तो केवल देह के द्वारा 
आत्माओं के असंभव मिलन की 
निष्फल खोज है।''

'' और इसके बाद - पटाक्षेप!! वह स्त्री जो जीवन के किसी एक क्षण में हमारे लिए सब कुछ थी, अचानक अजनबी हो जाती है - जैसे उसकी सोच, उसकी अंतरंगता से हमारा कभी परिचय ही न हुआ हो!   

'' ठीक उस समय जब दो प्राणियों का लोकोत्तर मिलन हो रहा हो, विचारों और कामनाओं का पूर्ण ऐक्य हो रहा हो- जब आप अपने प्रियपात्र के हृदय की अतल गहराइयों का स्पर्श कर रहे हैं- अचानक केवल एक शब्द आपको अपनी भूल का अहसास करा देगा और अंधेरी रात में बिजली की कौंध की तरह यह दर्शा देगा कि आप दोनों के बीच कितनी गहरी अंधेरी खाई है।

'' और फिर भी इस दुनिया में सबसे बड़ा सौभाग्य यह है कि जिसे तुम प्यार करते हो उसके साथ एक रात बिलकुल खामोश होकर गुजारी जाए- केवल उसकी मौजूदगी के अहसास में पूरी तरह डूबकर। इससे अधिक की आशा मत रखो, क्योंकि कभी भी दो प्राणी मिलकर एक नहीं हुए हैं।

'' जहाँ तक मेरा सवाल है, मैंने अपनी आत्मा के कपाट बन्द कर लिए हैं। मैं किसी से यह नहीं कहता कि मेरा विश्वास क्या है, मेरी सोच क्या है या मेरी पसंद क्या है। जानता हूँ मुझे इस भयावह अकेलेपन का शाप मिला है। मैं चीजों को देखता हूँ, लेकिन उनपर अपने विचार जाहिर नहीं करता। विचार,विवाद, प्रसन्नता या विश्वास का मेरे लिए क्या मतलब रह गया है! किसी के साथ भी मेलजोल बढ़ाने में बिलकुल नाकाबिल होने के कारण मैंने अपने आपको सबसे काट लिया है। मेरा अदृश्य 'स्व' एक संभावनाहीन जिन्दगी जीता है।  मैं किसी से कोई बात करना नहीं चाहता और इसलिए हर दिन के सवालों के जवाब के लिए मेरे पास बने बनाये वाक्य हैं या हामी भरने वाली एक मुस्कुराहट है। क्या तुम इसे समझ सकते हो?''

हम लम्बे अवेन्यू  में टहलते हुए आक दी ट्रायम्फ तक गये और फिर वहाँ से वापस टहलते हुए प्लेस दी ला कोनकोर्ड आ गये। वह बहुत धीरे-धीरे बातें कर रहा था, और इन बातों के अलावा भी बहुत कुछ कह रहा था, जो मुझे अब याद नहीं है।

वह रुक गया और उसने पेरिस की फुटपाथ पर ग्रेनाइट से बने चौमुखे स्तम्भ की ओर इशारा किया जो तारों भरी रात में अपना लम्बा मिस्री चेहरा खोकर. अपनी धरती से दूर, अजीबोगरीब लिपि में अपने देश का इतिहास अपने पार्श्व में उकेरे हुए, खड़ा था। उसने कहा - '' इसे देखो- हम सब इसी पत्थर की तरह हैं।''

और इसके बाद बिना कुछ बोले वह चला गया। क्या वह नशे में था? क्या उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं थी? क्या उसे  जीवन का ज्ञान प्राप्त हो गया था? मैं आज भी नहीं तय कर पाता।  कभी उसकी सारी बातें सही लगती हैं और कभी ऐसा लगता है जैसे सब कुछ  एक  विक्षिप्त व्यक्ति का प्रलाप था। 

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