Monday, November 9, 2020

आहत और अपमानित , दूसरा अध्याय, ( दोस्तोयोवस्की)

 

 

उस समय, ठीक एक वर्ष पहले, मैं कुछ अख़बारों के लिए काम करता था, लेख लिखता था और मुझे पक्का यक़ीन था एक दिन मैं बड़े पैमाने पर कुछ बहुत अच्छा लिखने में कामयाब होऊँगा । मैं एक बड़े उपन्यास पर भी  काम कर रहा था। लेकिन आख़िरकार नतीजा क्या निकला? यही कि मैं अभी यहाँ अस्पताल में हूँ और मुझे लगता है मैं जल्दी ही मरने वाला हूँ और जब मरना ही है तो कोई पूछ सकता है कि अपने संस्मरण क्यों लिखे जाएँ? 


मैं अपनी ज़िन्दगी के इस आख़िरी साल की कटुता नहीं भूल पाता। मैं सारी बातें लिख लेना चाहता हूँ। यदि ऐसा न करूँ तो मुझे यक़ीन है मैं दुख से मर जाऊंगा।  विगत वर्ष की इन स्मृतियों से कभी- कभी मुझे असह्य पीड़ा होती है। उन्हें लिखूंगा तो वे अधिक सह्य और सहज हो जाएंगी। वे किसी दुःस्वप्न जैसी, बेहोशी में किये प्रलाप जैसी नहीं लगेंगी। ऐसा मुझे लगता है। लिखने की जो यांत्रिक प्रक्रिया है , उसका भी महत्व है। उससे मुझे राहत और सान्त्वना मिलेगी, मेरी पुरानी साहित्यिक आदतें पुनर्जीवित होंगी, मेरी स्मृतियाँ और दुःस्वप्न एक कार्य या कारोबार में बदल जाएंगे।…… हाँ यह एक अच्छा विचार है। इसके अलावा शायद मेरी पाण्डुलिपि का भी उपयोग हो जाएगा। और कुछ नहीं तो मेरा नौकर सर्दियों में खिड़कियों में दोहरा फ़्रेम लगाते वक़्त उन्हें चिपका सकेगा ।


लेकिन पता नहीं क्यों, मैंने कहानी की शुरुआत बीच से की है। यदि सब कुछ लिखना है तो मुझे आरम्भ से आरम्भ करना चाहिए। तो लीजिए, आरम्भ से ही आरम्भ करते हैं, हालाँकि मेरी आत्मकथा लम्बी नहीं होगी।


मेरा जन्म यहाँ नहीं, बल्कि एक दूरवर्ती प्रान्त में हुआ था। यह मान लेना चाहिए कि मेरे माता-पिता भले लोग थे, लेकिन जल्द ही मैं यतीम हो गया था। मेरा पालन-पोषण पास में रहने वाले एक छोटे ज़मींदार निकोलाई सर्जेयिच इचमेन्येव के घर हुआ था, जिन्होंने मुझे दयावश शरण दिया था। उनके एकमात्र सन्तान, पुत्री नताशा थी जो मुझसे तीन साल छोटी थी। हम दोनों भाई-बहन की तरह साथ-साथ बड़े हुए। आह, मेरा प्यारा बचपन! यह कितनी बड़ी मूर्खता है कि आज मैं पचीसवें वर्ष में अपने बचपन को याद कर शोक और पश्चात्ताप से भर उठा हूँ, जबकि केवल बचपन ही है जिसे मैं उमंग और कृतज्ञता के साथ याद करता रहा हूँ! उन दिनों आसपास कितनी जगमग धूप होती थी, पीटर्सबर्ग की धूप से बिलकुल अलग! और हमारे शिशु हृदयों में किस तरह निर्मल आनन्द कुलाँचे मारता था। 


हमारे चारों ओर हरे भरे मैदान और जंगल थे, आज की तरह निष्प्राण पत्थरों की ढेर नहीं थी। वास्सिलयेव्स्कोए में,  जहाँ निकोलाई सर्जेयिच स्टुअर्ड थे, कितने बेहतरीन बाग़-बग़ीचे और पार्क थे! नताशा और मैं एक बाग़ में टहलने जाया करते थे। उस बाग़ के परे एक घना जंगल था, जिसमें एक बार हम दोनों खो गये थे। वे हमारे सबसे ख़ुशनुमा और स्वर्णिम दिन थे। ज़िन्दगी का पहला आस्वाद रहस्यमय और मोहक था और इस रहस्य की एक-आध झलक पाना भी कितना प्रीतिकर था। उन दिनों हर झाड़ी और हर पेड़ के पीछे लगता था जैसे कोई है, कोई अदृष्ट रहस्यमय जीवन्त उपस्थिति,मानो परीलोक और हक़ीक़त आपस में घुलमिल गये हों; और जब कभी- कभी शाम में घाटी में गहरी धुंध छा जाती और जंगल की पथरीली पसलियों पर उगी झाड़ियों में वह धुंध वर्तुलाकार घेरा बना लेती तो नताशा और मैं एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए भयमिश्रित उत्सुकता के साथ ऊपर से नीचे घाटी में झाँका करते थे और हर पल हमें ऐसा लगता था, जैसे नीचे घाटी पर छाई धुंध से कोई ऊपर आएगा या  हमें आवाज़ देगा  और इस तरह हमारी नर्स हमें जो परियों की कहानियाँ सुनाती है, वे सच साबित होंगी। एक बार बहुत दिनों के बाद मैंने नताशा को याद दिलाया था कि हम दोनों के लिए किस तरह “बच्चों के लिए कहानियाँ” मंगवायी गयी थी; किस तरह किताब लेकर हम दोनों बाग़ में बने तालाब के किनारे पुराने मेपल वृक्ष की ओर भागे थे और वहाँ हरी घास पर बैठकर परी कथा “अल्फोन्सो और डलिन्डा” पढ़ने लगे थे। आज भी जब मैं उस कहानी को याद करता हूँ तो  अपने  हृदय में एक अनोखा रोमांच महसूस करता हूँ। जब एक साल पहले मैंने नताशा को उस कहानी की पहली पंक्ति सुनायी: “मेरी कहानी का नायक, अल्फोन्सो,  पुर्तगाल में पैदा हुआ था; डॉन रामिरो उसके पिता थे,” तो मेरी आँखें नम हो गयी थीं। मेरा हाव-भाव सचमुच मूर्खतापूर्ण रहा होगा,सम्भवतः इसी वजह से नताशा मुझे देखकर मुस्करायी।  लेकिन तुरन्त उसने अपने आप को रोका (मुझे यह याद है), और मुझे ख़ुश करने के लिए पुराने दिनों को याद करने लगी। एक बात से दूसरी बात शुरू हुई, और दूसरी से तीसरी और वह भी भावुक हो गयी। वह बड़ी ख़ुशनुमा शाम थी।  हम दोनों हर बात याद कर रहे थे। कैसे मुझे जिले के स्कूल में भेजा गया था—- तब वह किस तरह रोयी थी! और हमारी आख़िरी जुदाई, जब मैंने सदा के लिए वास्सिल्येव्स्को छोड़ा। 


उस समय मैंने बोर्डिंग स्कूल की पढ़ाई पूरी की थी और युनिवर्सिटी में दाख़िले की तैयारी के लिए पीटर्सबर्ग जा रहा था।  मैं उस वक़्त सत्रह साल का था और वह पन्द्रह की। नताशा का कहना है कि तब मैं अजीब क़िस्म का बेढब इन्सान था, जिसे देखकर बरबस हँसी आती थी। 


विदा के वक़्त मैंने उसे एक ओर एकान्त में बुलाकर कुछ अत्यन्त महत्वपूर्ण बात कहनी चाही, लेकिन मेरी ज़ुबान से एक भी लफ़्ज़ नहीं निकला, जैसे वह तालू से चिपक गयी हो।    उसे यह बात याद है कि मैं बेहद हैरान-परेशान सा था। मेरी कोशिश किसी नतीजे पर नहीं पहुँची। मैं यह नहीं जानता था कि मुझे क्या कहना चाहिए था और शायद मुझे वह समझती भी नहीं। 


मैं केवल रोता रहा और बिना कुछ कहे चला गया। 


हम दोनों बहुत दिनों बाद पीटर्सबर्ग में फिर मिले—— दो साल पहले। वृद्ध निकोलाई सर्जेयिच अपने एक मुक़दमे के सिलसिले में पीटर्सबर्ग आये थे। उस समय मैंने अपने साहित्यिक जीवन की शुरूआत ही की थी।


अनुवाद: राजीव रंजन सिंह 

 

 

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