निकोलाई सर्जेयिच एक प्रतिष्ठित खानदान से आते थे, हालाँकि काफ़ी लम्बे अरसे से यह ख़ानदान पतनोन्मुख था। अपने माता-पिता के इन्तक़ाल के बाद उन्हें एक अच्छी सी जागीर मिली थी, जहाँ डेढ़ सौ कृषक दास काम करते थे। बीस साल की उम्र में वे सेना में भर्ती हुए थे। सबकुछ ठीक-ठाक गुज़र रहा था, लेकिन एक दिन, अपने सैन्य जीवन के छठे साल में एक दुर्भाग्यपूर्ण शाम को ताश की बाज़ी में वे अपनी सारी सम्पत्ति हार बैठे।
रात भर उन्हें नींद नहीं आयी। अगली शाम वे फिर खेलने बैठे और उन्होंने अपनी आख़िरी सम्पत्ति — अपने घोड़े को दाँव पर लगाया।
वह यह बाज़ी जीत गये। उसके बाद उन्होंने दूसरी बाज़ी खेली और फिर तीसरी और आधे घंटे के भीतर उन्होंने अपना एक गाँव वापस जीत लिया। इस गाँव का नाम इचमेन्येवका है, जिसकी आबादी पिछली मर्दुमशुमारी के दौरान पचास थी। उन्होंने अगले दिन ही अपना इस्तीफ़ा भेज दिया और नौकरी से रिटायर हो गये। वे सौ कृषि दास सदा के लिए हार चुके थे। दो महीने बाद लेफ्टिनेंट की पदवी के साथ उन्हें सेना से मुक्ति मिली। वे अपने गाँव चले आये। उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में ताश की बाज़ी में हुई उस हार का कभी भी ज़िक्र नहीं किया और यदि किसी ने उस घटना की ओर इशारा भी किया होता तो बेशक वे उससे लड़ पड़ते। गाँव में उन्होंने अपना पूरा ध्यान खेतीबाड़ी में लगाया। पैंतीस की उम्र में एक अच्छे लेकिन निर्धन परिवार की लड़की अन्ना अन्द्रेयेव्ना शुमिलोव से उन्होंने शादी की। लड़की के पास दहेज के नाम पर फूटी कौड़ी भी नहीं थी, गो वह पढीलिखी थी। उसने एक फ़्रांसीसी अप्रवासी द्वारा चलाये जानेवाले उच्च स्तरीय स्कूल, मोन-रेवेशे में शिक्षा पायी थी। उन्हें इस बात पर ज़िन्दगी भर गर्व रहा, हालाँकि उनकी शिक्षा में क्या शामिल था यह किसी को मालूम नहीं था।
निकोलाई सर्जेयिच बहुत क़ाबिल किसान थे। पास-पड़ोस के ज़मींदार अपनी मिल्कियत चलाने के गुर उनसे सीखने आते थे। कुछ साल बीतने के बाद पड़ोस की मिल्कियत वास्सिलयेव्स्को में अचानक एक नया ज़मींदार आया, जिसका नाम प्रिंस प्योत्र अलेक्जेंड्रोविच वाल्कोव्स्की था। वे पीटर्सबर्ग से आये थे। उनके अधीन नौ सौ कृषिदास थे। उनके आगमन से उस इलाक़े में एक ज़बरदस्त सनसनी फैल गयी थी। प्रिंस हालाँकि कच्ची उम्र के नहीं थे, फिर भी उन्हें युवा कहा जा सकता था। सरकारी नौकरी में उन्हें एक अच्छा ओहदा मिला था, उनके पास महत्वपूर्ण सम्पर्क थे, अच्छी-खासी सम्पत्ति थी, सुदर्शन व्यक्तित्व था और विधुर थे और इसलिए उस इलाक़े की सभी युवतियों और महिलाओं के आकर्षण के केन्द्र बन गये थे। लोगों में चर्चा थी कि किस तरह गवर्नर ने उनका शानदार स्वागत किया था। शायद गवर्नर से उनका कोई रिश्ता भी था। यह भी चर्चा थी कि उन्होंने अपनी बहादुरी के कारनामों से सभी महिलाओं का दिल जीत लिया था—— वग़ैरह, वग़ैरह। लुब्बे-लुबाब यह कि प्रिंस पीटर्सबर्ग के कुलीन समाज के ऐसे रोबीले सदस्यों में से थे, जो आम तौर पर प्रान्तों में नहीं आते हैं और यदि कभी वे आ गये तो उनसे एक असाधारण सनसनी फैल जाती है। लेकिन ऐसा नहीं था कि प्रिंस शिष्टाचार की मूर्ति हों, क्योंकि ऐसे लोगों के प्रति उनका व्यवहार अत्यन्त रूखा होता था, जिनका उनके लिए कोई उपयोग नहीं था और जिन्हें वे अत्यंत हेय दृष्टि से देखते थे। ग्रामांचल में अपने पड़ोसियों से मिलना-जुलना उन्हें पसन्द नहीं था और इसलिए जल्द ही उन्होंने अनेक दुश्मन भी बना लिए थे ।
इस स्थिति में एक दिन अचानक जब वे निकोलाई सर्जेयिच से मिलने के लिए उनके घर पहुँचे तो सब लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। हालाँकि यह सच है कि निकोलाई सर्जेयिच उनके निकटतम पड़ोसियों में से एक थे। प्रिंस ने इचमेन्येव परिवार को बेहद प्रभावित किया। उन्होंने पति-पत्नी दोनों पर अच्छी छाप छोड़ी; ख़ासकर अन्ना अन्द्रेयेव्ना के दिल में उन्होंने जगह बना ली थी। थोड़े समय में ही वे उनके क़रीबी बन गये। प्रिंस उनके घर रोज़ जाते थे और उन्हें भी अपने घर आमन्त्रित करते थे।
प्रिंस उन्हें क़िस्से सुनाते थे, चुहलबाजी करते थे, उनका खस्ताहाल पियानो बजाते थे और गाना गाते थे। इचमेन्येव दम्पती को यह बात गले नहीं उतरती थी कि इतने भले और प्यारे इन्सान को लोग घमण्डी, कठोर, आत्मकेन्द्रित कहते थे, जैसा कि सारे पड़ोसियों ने एकस्वर से कहा था। कोई यह मान सकता है कि प्रिंस, निकोलाई सर्जेयिच को सचमुच पसन्द करते होंगे , क्योंकि वे सरल हृदय के सीधे-सच्चे इंसान थे, उन्हें किसी चीज़ का लोभ नहीं था और वे उदार प्रकृति के थे। लेकिन कुछ दिन बाद ही सबको मामला समझ में आ गया।
प्रिंस वास्सिल्येवस्को ख़ासकर इसलिए आए थे, ताकि वे अपने जर्मन स्टुअर्ड की छुट्टी कर सकें, जो बहुत ही दम्भी आदमी था। वह खेतीबाड़ी का अच्छा जानकार था, उसके बाल सफ़ेद थे, चश्मा पहनता था, नाक थोड़ी टेढ़ी थी। इन खूबियों के बावजूद वह प्रिंस को बेशर्म होकर लूटता था और सबसे ख़राब बात यह थी कि वह किसानों पर इतना ज़ुल्म ढाता था कि कई किसान उसके ज़ुल्मों के कारण प्राण गँवा चुके थे। आख़िरकार इवान कार्लोविच की क़लई खुल गई और वे ग़लत काम करते हुए पकड़े गये। अत्यन्त अपमानित महसूस करते हुए वे काफ़ी देर तक जर्मन ईमानदारी की बातें करते रहे, लेकिन इस सब के बावजूद उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया और उनकी बदनामी भी हुई। प्रिंस को एक स्टुअर्ड चाहिए था और इस काम के लिए उन्होंने निकोलाई सर्जेयिच को चुना, जो अच्छे प्रबन्धक थे और जिनकी ईमानदारी पर किसी भी तरह का शक-शुबहा मुमकिन नहीं था। ऐसा लगता था कि प्रिंस इस बात के लिए ख़ास तौर पर आतुर थे कि निकोलाई सर्जेयिच स्वयं अपनी मर्ज़ी से ज़िम्मेवारी लेने की पेशकश करेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं, और एक सुबह प्रिंस ने ही अत्यन्त विनम्रतापूर्वक और बेहद दोस्ताना ढंग से उनके सामने प्रस्ताव रखा। निकोलाई सर्जेयिच ने पहले इन्कार कर दिया; लेकिन उन्होंने देखा कि अन्ना अन्द्रेयेव्ना का मन प्रचुर वेतन की ओर आकृष्ट हो गया है। प्रिंस का व्यवहार भी और अधिक शालीन और मधुर होता जा रहा था, जिसका परिणाम यह हुआ कि उनकी रही सही हिचक भी जाती रही।
प्रिंस मनोवांछित पाने में सफल रहे। कोई यह भी कह सकता है कि प्रिंस को आदमी के चरित्र की अच्छी पहचान थी। इचमेन्येव के साथ संक्षिप्त परिचय के दौरान उन्हें यह बात समझने में देर नहीं लगी कि वह किस किस्म का आदमी है। वह इस नतीजे पर पहुँचे कि इस व्यक्ति को केवल प्यार और दोस्ती से ही जीता जा सकता है और उसका दिल जीते बिना केवल पैसे के बल पर उससे कोई काम नहीं कराया जा सकता। वाल्कोव्स्की को एक ऐसा स्टुअर्ड चाहिए था, जिसपर आँख मूँदकर भरोसा किया जा सके ताकि उसे भविष्य में फिर कभी वास्सिलयेव्स्को आना न पड़े। उनकी पूरी कोशिश इसी दिशा में थी। निकोलाई सर्जेयिच पर उन्होंने कुछ ऐसा अद्भुत प्रभाव डाला था कि वह सचमुच उसकी मित्रता में यक़ीन करने लगे थे। निकोलाई सर्जेयिच की गिनती रूस के ऐसे नेकदिल और भोले इंसानों में की जा सकती है, जिनके ख़िलाफ़ लोग कुछ भी कहें, वे इतने स्नेही होते हैं कि उन्हें यदि कोई भा गया तो वे उनके प्रति पूरी आत्मा से समर्पित हो जाते हैं और कभी-कभी उनकी निष्ठा और समर्पण इस हद तक आगे बढ़ जाता है कि वे हँसी के पात्र भी बन जाते हैं।
कई वर्ष बीते। प्रिंस वाल्कोव्स्की की जायदाद में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि होती गयी। वास्सिलयेव्स्को के मालिक और स्टुअर्ड के बीच का सहज सम्बन्ध क़ायम रहा और दोनों ओर से किसी प्रकार का कोई मनमुटाव नहीं देखा गया। लेकिन यह सम्बन्ध अपने कारोबारी स्वरूप से आगे कभी नहीं बढ़ा। हालाँकि प्रिंस, निकोलाई सर्जेयिच के कामकाज में कोई दख़लंदाज़ी नहीं करते थे, फिर भी कभी-कभार उन्हें कोई राय-मशविरा देते थे, जो इतनी व्यावहारिक सूझ-बूझ से भरा रहता था कि निकोलाई सर्जेयिच अचम्भे में पड़ जाते थे। ज़ाहिर था कि वे धन का अपव्यय नहीं करना चाहते थे और धन कैसे कमाया जाता है वे इस कला में निपुण थे। वास्सिलयेव्स्को के दौरे के पाँच वर्ष बाद प्रिंस ने निकोलाई सर्जेयिच को एक अधिकार पत्र भेजा जिसमें उन्हें उसी प्रांत में एक दूसरी बहुत बड़ी जायदाद ख़रीदने का अधिकार दिया गया था। इस जायदाद पर चार सौ कृषि दास काम करते थे। निकोलाई सर्जेयिच की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। प्रिंस की कामयाबी, उन्नति, उनकी पदोन्नति की ख़बर उनको उतनी ही प्रिय थी मानो उन्होंने अपने भाई की उन्नति की ख़बर सुनी हो। लेकिन उनकी ख़ुशी का उस दिन ठिकाना नहीं रहा, जिस दिन प्रिंस ने उनपर असाधारण विश्वास दर्शाया। यह घटना ऐसे घटी……..लेकिन यहाँ पर मैं यह आवश्यक समझता हूँ कि इस प्रिंस वाल्कोव्स्की के जीवन की कुछ और बातें बतायी जाएँ, क्योंकि वे एक तरह से मेरी कहानी के एक मुख्य पात्र हैं।
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